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ग़ैर मुदर्रफ ग़ज़ल की कोशिश

ये हवा कैसी चली है आजकल

सब यहाँ दिखते दुखी हैं आजकल

दुख किसीको है अकेला क्यों खड़ा

और किसीको भीड का ग़म आजकल

है शिकायत नौजवाँ को बाप से

बाप को लगता वो बिगड़ा आजकल

मायने हर चीज के बदले यहाँ

है नहीं अच्छा बुरा कुछ आजकल

बाँटकर खाने के दिन वो लद गये

लूटलो जितना सको बस आजकल

मुल्क के ख़ातिर गँवाते जान थे

क़त्ल करते मुल्कमें ही आजकल

क़ौल के ख़ातिर गँवायें जान…

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Added by Kishorekant on August 5, 2018 at 9:30pm — 9 Comments

सुष्ठु दुनिया(लघुकथा)

 "ऑफ़ ओह! शीला मैं तो तंग आ गया हूँ, तुम्हारे हाथ में चौबीसों घण्टे मोबाइल को देखकर।" शीला अपनी धुन में थी, नित्यक्रम से निबट कर टी.वी. के आगे अपना मनपसन्द सीरियल देख रही थी और साथ में उसकी उँगलियॉ मोबाइल पर लगातार चल रही थी। शीला की सास, और ससुर जी भी वहीं बैठे हुए थे। वे तपाक से बोले," शेखर की माँ! मुझे तुम्हारी जवानी याद आ रही है...।" शीला के कान चौकन्ने हो गये, वह उनकी तरफ देख रही थी। ससुर जी उसके देखने का आशय समझ गये; उन्होंने कहा,"अरे उस ज़माने में यह मुआ मोबाइल -शोबाइल नहीं था, तुम्हारी…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 5, 2018 at 9:25pm — 11 Comments

गजल(जब सँभलना...)

2122 2122 212
जब सँभलना आदमी को आ रहा
घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1

पाँव भारी हो गए हैं शब्द के
अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2

क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक
घाव घुटनों में मुआ चिपका रहा।3

थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की
कौन जहरीली हवा भड़का रहा?4

चैन से नीरो बजाता बंसियाँ
धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on August 5, 2018 at 8:03pm — 3 Comments

छ्टपटाह्ट

छटपटाहट

समझ नहीं पाता हूँ 

उदासी से भरी गुमसुम निस्तब्धता

अनदीखे  अन्धेरे  में  वेदना  का 

चारों ओर सूक्षम समतल प्रवाह

पास हो तुम, पर पास होकर भी

इतनी  अलग-सी, व …

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Added by vijay nikore on August 5, 2018 at 8:00pm — 14 Comments

जब सँभलना.....(गजल)

2122   2122  212

जब सँभलना आदमी को आ रहा

घुट्टियों का खेल खेला जा रहा।1



पाँव भारी हो गए हैं शब्द के

अर्थ क्या से क्या निकाला जा रहा।2



पोथियाँ जज़्बात से घायल हुईं

जो नहीं समझा वही समझा रहा।3



क्या कुलाँचे भर सकेगा अब शशक

घुन मुआफ़िक पाँव कोई खा रहा।4



थम गई थीं आँधियाँ दुर्द्वंद्व की

कौन जहरीली हवा भड़का रहा?5



चैन से नीरो बजाता बाँसुरी

धुन वही हर शख्स फिर-फिर गा रहा।6



कोयलों की बस्तियाँ अब मौन… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 5, 2018 at 7:30pm — 8 Comments

विश्व मित्रता दिवस पर

(पद-पादाकुलक छंद)

मित्रता कहाँ जब परिभाषा अपने हित में आंकी जाये

कालिमा सदा अन्यत्र किसी की ग्रीवा पर झांकी जाये

थोड़ी सी ठेस न निभ पाए विश्वास घना यह दावा हो

तो दंभ मित्रता का कैसा फिर तुम भी एक छलावा हो



मित्रता शोभती है उसको जो प्रिय हित में कुछ त्याग सके

निज स्वार्थ छोड़कर, हो तटस्थ संबंधो को अनुराग सके

विश्वास-नीव भी अविचल हो कुछ धैर्य-शक्ति हो सहने की

हो निर्विकार मानस जिसका हिम्मत भी हो सच कहने की



मित्रों पर मान किया मैंने , अवलम्ब… Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 5, 2018 at 7:11pm — 3 Comments

खुशबुएँ ज़ेहनी अभी भी कर रहे गुलजार क्यों??

2122-2122-2122-212

आप को जाना ही है तो आज कल इतवार क्यों।

तोडना गर दिल ही है तो प्यार और मनुहार क्यों।।

आप की नजरें बयाँ क्यों कर बहाना है नया ।

आप की यह भीगती पलकों में ये उपहार क्यों।।

शौख था गर भूलना ही भूल जाते बे -शबब।

खुशबुएँ ज़ेहनी , अभी भी कर रहे गुलजार क्यों।।

रोक लो यह छटपटाती रूह का एहसास है ।

जल चुका है आशियाँ जो खोज इसमें प्यार क्यों।।

देखना गर चाहते हो मेरे चेहरे में ख़ुशी।

हाथ में लेकर खड़े हो आप…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on August 5, 2018 at 1:01pm — 4 Comments

लघु रचना : यथार्थ ...

लघु रचना : यथार्थ ...

एक मैं
चल दिया
एक मैं को
छोड़कर


एक यथार्थ
आभास हो गया
एक आभास
यथार्थ हो गया


जिसका वो अंश था
उस अंश में
उस यथार्थ का
वास हो गया

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 5, 2018 at 11:05am — 13 Comments

'बेटी फंसाओ या बचाओ?' (लघुकथा)

"अरे रुको! तुम हमारी मिहनत को यूं बरबाद नहीं कर सकते! हटाओ अपनी ये झाड़ू! रोको अपना खोखला मिशन!" अपने माथे की ओर की अपनी डोर में टपकती मकड़ी की चुनौती सुनकर भय्यन के हाथ से मकड़जाल की ओर जाती झाड़ू डंडे सहित नीचे गिर पड़ी।



"न तो तुम जैसे आम आदमी हमारे शिकारों को बचा सकते हो, न ही तुम्हारे तथाकथित सेवक और सरकारी या प्राइवेट रक्षक! सबको भक्षक और ग्राहक बनाना हमें बाख़ूबी आता है, समझे!" उस बड़ी सी मकड़ी ने मकड़जाल में फंसे और तड़पते 'बड़े से कीड़े' को देखते हुए भय्यन से कहा - "हमारी पहुंच और…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 5, 2018 at 9:05am — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

कुछ धुंआ घर के दरीचों से उठा हो जैसे ।

फिर कोई शख्स रकीबों से जला हो जैसे ।।

खुशबू ए ख़ास बताती है पता फिर तेरा ।

तेरे गुलशन से निकलती ये सबा हो जैसे ।।

बादलों में वो छुपाता ही रहा दामन को ।

रात भर चाँद सितारों से ख़फ़ा हो जैसे ।।

जुल्म मजबूरियों के नाम लिखा जायेगा ।

बन के सुकरात कोई ज़ह्र पिया हो जैसे ।।

खैरियत पूँछ के होठों पे तबस्सुम आना ।

हाल ए दिल मेरा तुझे खूब पता हो जैसे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 4, 2018 at 9:03pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
नसीहत को गिनिए नहीं धमकियों में - अरुण कुमार निगम

एक ग़ज़ल.......


122 122 122 122


नजर है तो पढ़िए गजल झुर्रियों में
ये चेहरा कभी है रहा सुर्खियों में।


वतन को सजाने के वादे किए थे
सदा आप उलझे रहे कुर्सियों में।


मसीहा समझ के था अगुवा बनाया
मगर आप भी ढल गए मूर्तियों में।


चढ़ाया हमीं ने उतारेंगे हम ही
पलक के झपकते, यूँ ही चुटकियों में।


अरुण के इशारे समझ लें समय है
नसीहत को गिनिए नहीं धमकियों में।।

(मौलिक व अप्रकाशित)☺

Added by अरुण कुमार निगम on August 4, 2018 at 8:00pm — 5 Comments

दिख रहा इंसान है- ग़ज़ल

हर तरफ बस दिख रहा इंसान है

हाँ, मगर अपनों से वो अंजान है



थे कभी रिश्ते भी नाते भी मगर

आजतो यह सिर्फ इक सामान है



जिसको कहते थे कभी काबिल सभी

सबकी नज़रों में वो अब नादान है 



जिसको सौंपी थी हिफाज़त बाग़ की

बिक रहा उसका ही अब ईमान है 



हर तरफ बैठे शिकारी घात में

चंद लम्हों का वो अब मेहमान है



था कभी गुलज़ार जो शाम-ओ-सहर 

अब वही दिखने लगा शमशान है



जिसने देखे अम्न के सपने कभी

अब उसी का टूटता अरमान है …



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Added by विनय कुमार on August 4, 2018 at 6:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल

1222,1222, 1222, 1222

चलो ये बोझ भी दिलपर उठाकर देख लेते हैं

किसीको हम ज़रा दिलमें बसाकर देख लेते हैं

जियेगें किस तरह तन्हाँ यहाँ साथी अगर छूटा

यहाँ जो बेवजह रूठा मनाकर देख लेते हैं .....

कहाँतक हार है अपनी ज़रा इसका पता करलें

यहाँ भी ईक नयी बाज़ी लगाकर देख लेते है....

कहो कैसे यक़ीं तुमको दिलायें आशनाई का.

लगेहैं जख्म जो दिल पर दिखाकर देख लेते हैं

जमींपर जो नहीं मिलते वो मिलते आसमानों पर

चलो…

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Added by Kishorekant on August 4, 2018 at 5:30pm — 5 Comments

" टूटन का पुष्पण" - कविता/ अर्पणा शर्मा, भोपाल

हँस पड़ती हूँ ,

अक्सर मैं,

मुझे तोड़ने में

मशगूल,

अपनी अमोल ऊर्जा,

व्यर्थ करते उन,

मिथ्या हितैषियों को

देखकर,



टूटन को नित,

यूँ पान करती

आई हूँ कि,

ये गरल तो मेरी

हर श्वांस में

घुला-मिला है,

इसे नित जीकर....



कि इसके बिना,

हल्की-हल्की सी,

श्वांसों पर यकीं

ना होना

लाजिमी है,



तिल भर भी तो,

 नहीं बची है,

कोई जगह

जहाँ किसी को

अवसर मिले,

मुझे…

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Added by Arpana Sharma on August 4, 2018 at 3:40pm — 6 Comments

आधुनिक शिक्षा संस्थान

शिक्षा संस्थाओं के
हाल आज और हैं
छात्र यूनियनों में
लड़ाई  के दौर हैं

शिक्षालय आज 
राजनीति के अड्डे हैं
कमाई,चुनाव के
थ॓धों पर थंधे हैं

फैली अराजकता
अलग -अलग झंडे हैं
परिसर में घूमते
दलालों के पंडे हैं


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 4, 2018 at 10:30am — No Comments

प्राचीन गुरुकुल

पूर्णतया शिक्षा को गुरू समर्पित थे

कंद,मूल,फल,बिना जोता अन्न खाते थे

पठन -पाठन को समय बचाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



गुरुकुल के प्राँगण में व्यर्थ वाद वर्जित था

गुरू ज्ञान-धारा से हर छात्र सिंचित था

चरणों में उनके नतमस्तक हो जाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



राजा उनसे मिलने गुरुगृह जब जाते थे

आयुध अपने बाहर रख अन्दर आते थे

उलझनें शासन की,उन स॔ग सुलझाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



मौलिक एव॔…

Continue

Added by Usha Awasthi on August 4, 2018 at 10:30am — 8 Comments

'किकी-डांस चैलेंज' (लघुकथा)

"हैल्लउ! हाउ आs..यू? कैसे हैं जनाब?"



"फाइन! रॉकिंग!".. और आप सब ! कैसा लगता है अब विदेश में?"



"क्वाइट गुड! बट बेटर देन इंडिया! कुछ एक बातें तो 'अनकॉमन और पॉज़िटिव' हैं, लेकिन हम जैसे भावुक भारतीयों के लिए अधिकतर बातें 'कॉमन और निगेटिव' ही हैं पैसे, स्वार्थों की होड़ और 'तकनीक व ग्लोबलाइज़ेशन' की दौड़ में !"



"मतलब तुम सब भी हमारी तरह विदेश में भी ज़माने के साथ नाच ही रहे हो न!"



"हां, यही कह लो! लेकिन अंतर तो है! हम यहां सेहत और सुव्यवस्था के साथ…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2018 at 12:30am — 6 Comments

नजरे झुकाये बैठे हैं- ग़ज़ल

आप महफिल में आये बैठे हैं

फिर भी नजरें  झुकाये बैठे हैं

मसअला ये कि मेरी बात से वो

अब  तलक़  खार  खाये  बैठे हैं

मुझको तो याद भी नहीं और वो

बात  दिल  से  लगाए  बैठे  हैं

हम तो करते नहीं कभी पर्दा

वो ही चिलमन गिराए बैठे हैं

हमने हर चीज याद रक्खी है

जाने  वो  क्यूँ  भुलाए बैठे हैं

हर तरफ दौर है ठहाकों का

और वो मुंह  फुलाए  बैठे हैं

बात दर अस्ल थी बहुत छोटी

वो  बड़ी  सी …

Continue

Added by विनय कुमार on August 3, 2018 at 7:00pm — 7 Comments

मेरा घर - लघुकथा –

मेरा घर - लघुकथा –

"हद हो गयी, अभी तीन दिन पहले ही साफ किया था  जाला। फिर बना लिया"।

कमला झाड़ू लेकर मकड़ी के जाले को जैसे ही साफ करने लगी।

मकड़ी गिड़गिड़ाते हुये बोली,"क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा। क्यों मेरा घर संसार उजाड़ रही हो"?

"अरे वाह, मेरे ही घर में बसेरा कर लिया और मुझे ही ज्ञान दे रही हो"।

"हर कोई किसी ना किसी पर आश्रित है। संसार की यही रीति है"।

"होगी, पर मुझे तो नहीं पसंद। और यह तुम्हारा घर संसार। क्या है इसमें? जीवन भर की क़ैद। उम्र भर…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 3, 2018 at 4:38pm — 8 Comments

नवगीत- यही सोचता रहा घड़ा

स्वर्ण-कलश हो गए लबालब,

क्यों हूँ अब तक रिक्त पड़ा.

जाने कब नंबर आयेगा,

यही सोचता रहा घड़ा.

 

नदिया सूखी, पोखर प्यासी,

तालाबों की वही कहानी.

झरने खूब बहे पर्वत से,…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on August 3, 2018 at 4:33pm — 2 Comments

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