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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८५

२२१२ १२१२ २२१२ १२



हस्ती का मरहला सभी इक इक गुज़र गया

मैं भी तमाशा बीन था, अपने ही घर गया //१



इश्वागरी के खेल से मैं यूँ अफ़र गया

सारा जुनूने आशिक़ी सर से उतर गया //२



खोया न मैं हवास को आई जो नफ़्से मौत

ज़िंदा हुआ मशामे जाँ, मैं जबकि मर गया //३



हैराँ हूँ अपने शौक़ की तब्दीलियों पे मैं

नश्शा था तेरे हुस्न का, कैसे उतर गया //४…

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Added by राज़ नवादवी on December 17, 2018 at 7:41pm — 8 Comments

शरद ऋतू

मैं इठलाती,

मैं बलखाती,

मंद चाल से,

बढ़ती हूँ

शरद ऋतु जब,

वर्ष में आये

अपना जाल,

बिछाती हूँ||

 

कहीं थपेड़े,

पवन दिलाती

कहीं,

बर्फ पिघलाती हूँ

कहीं,

तरसते धूप

को सब जन

कहीं कपकपी,

खूब दिलाती हूँ

वर्षा ऋतू,

के बाद में आयी,

शरद ऋतू,

कहलाती हूँ||

 

कोई निकाले,

कम्बल अपने,

कोई,

रजाई खोज रहा

कोई जला…

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Added by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 3:00pm — 8 Comments

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिये- ग़ज़ल

2122 2122 212

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिए

ठीक हो वह ध्यान पूरा चाहिए।

दर्द को भी झेलता है खेल में

दिल भी होना एक बच्चा चाहिए।

जान लेना राह को हाँ ठीक है

पर इरादा भी तो पक्का चाहिये।

टूट कर शीशा  जुड़ा है क्या कभी

टूट जाए तो न रोना चाहिए।

झूठ की बुनियाद पर है जो टिका

वो महल हमको तो कचरा चाहिए।

 विष वमन कर जो हवा दूषित करे

उस जुबाँ पर ठोस ताला चाहिए।

मौलिक एवं…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 17, 2018 at 6:30am — 10 Comments

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212



रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।

प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।



दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी

बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।



रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया

रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने

हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।



छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें

प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 16, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

गज़ल -16 ( पत्थर जिगर को प्यार का दरिया बना दिए)

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु, फ़ाइलातु, मुफ़ाईलु, फ़ाइलुन

221, 2121, 1221, 212

ग़ज़ल

*****

उनकी नज़र ने मेरे सभी ग़म भुला दिए

पत्थर जिगर को प्यार का दरिया बना दिए//१



जैसे छुआ हो अब्र ने तपती ज़मीन को

छू कर वो मेरी रूह को शीतल बना दिए//२

ख़ुशबू उठी है क़ल्ब में सोंधी सी इश्क़ की

यादों ने उनके प्यार के छींटे गिरा दिए//३

हल्की सी बस ख़बर थी कि निकलेगा चाँद कल

स्वागत में उसके मैंने सितारे…

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Added by क़मर जौनपुरी on December 15, 2018 at 11:00pm — 3 Comments

एक गीत मार्गदर्शन के निवेदन सहित: मनोज अहसास

आज मन मुरझा गया है

मर गई सब याचनाएं
धूमिल हुई योजनाएं
एक बड़ा ठहराव जैसे ज़िन्दगी को खा गया है
आज मन मुरझा गया है

खुरदरी सी हर सतह है
आंसुओ से भी विरह है
वेदना का तेज़ झोंका मेरा पथ बिसरा गया है
आज मन मुरझा गया है

किसलिये बाकी ये जीवन
किसलिये सांसों का बंधन
भावना ,विश्वास पर जब घुप अंधेरा छा गया है
आज मन मुरझा गया है

मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on December 15, 2018 at 9:20pm — 5 Comments

दोहा संकलन :

दोहा संकलन :

नैन करें अठखेलियाँ, स्पर्श करें संवाद।

बाहुबंध में हो गए, अंतस के अनुवाद।१ ।

नैन शरों के घाव का ,अधर करें उपचार।

श्वास-श्वास में खो गयी,स्पर्श हुए साकार।२ ।

नैन विरह में प्रीत के ,बरसे सारी रात।

गूँगे स्वर करते रहे, मौन पलों से बात।३ ।

अद्भुत पहले प्यार का, होता है आनंद।

देह-देह में रागिनीं , श्वास -श्वास मकरंद।४ ।

केशों में जूही सजे , महके हरसिंगार।

नैनों की हाला करे,…

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Added by Sushil Sarna on December 15, 2018 at 5:12pm — 10 Comments

फिर लौट कर ना आनी है

बुलबुले सी होती जिंदगी

मिट्टी में मिल जानी है

जो भी करना आज ही कर ले

फिर लौट कर ना आनी है||

 

पंख लगा के अरमानों के

नभ में उड़ान तो भर

निर्भय होके बढ़ता चल

जो भी करना आज ही कर ले

कल की किसने जानी है||

 

कहीं किसी ने, बात बड़ी

इंतज़ार में तेरे, मौत खड़ी

इच्छा अपनी पूरी कर ले

ये, वक्त देने वाली है

बुलबुले सी होती जिंदगी

मिट्टी में मिल जानी है…

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Added by PHOOL SINGH on December 14, 2018 at 3:30pm — 3 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८४

2212 1212 2212 12



अच्छे बुरे का बार है सबके ज़मीर पे

ख़ुद को जवाब देना है नफ़्से अख़ीर पे //१



रख ले मुझे तू चाहे जितना नोके तीर पे

मरने का ख़ौफ़ हो भी क्या दिल के असीर पे //२



कुछ रह्म तो दिखा मेरे शौक़े कसीर पे

पाबंदियाँ लगा न दीदे ना-गुज़ीर पे //३



यकता है इस जहान में क़ुदरत की हर मिसाल

तामीरे ख़ल्क़ मुन्हसिर है कब नज़ीर पे…

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Added by राज़ नवादवी on December 14, 2018 at 4:00am — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८३

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



दिल मेरा ख़ाली नहीं ज्यों कस्रते आज़ार से

है फुगाँ मजबूर अपनी फ़ितरते इसरार से //१



लाख समझाऊँ तेरी तब-ए-सितम को प्यार से

तू मुकर जाता है अपने वादा-ए-इक़रार से //२



वस्ल की तश्नालबी बढ़ जाती है दीदार से

कम नहीं फिर दिल ये चाहे सुहबते बिस्यार से //३



आ गए जब तंग हम हर वक़्त की गुफ़्तार से

सीख ली हमने ज़ुबाने ख़ामुशी…

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Added by राज़ नवादवी on December 14, 2018 at 3:51am — 8 Comments

ग़ज़ल: आइना बन सच सदा सबको दिखाता कौन है

2122 2122 2122 212



आइना बन सच सदा सबको दिखाता कौन है

है सभी में दाग दुनिया को बताता कौन है

काम मजहब का हुआ दंगे कराना आजकल

आग दंगों की वतन में अब बुझाता कौन है

आंधियाँ तूफान लाते है तबाही हर जगह

दीप अंधेरी डगर में अब जलाता कौन है

देश में शोषण किसानों का हुआ अब तक बहुत

दाल रोटी दो समय उनको दिलाता कौन है



बात मेठानी सुनो सबकी सदा तुम ध्यान से

भय हमारी जिन्दगी से अब भगाता कौन है

( मौलिक…

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Added by Dayaram Methani on December 12, 2018 at 10:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से)

1212,1122,1212,22/112

तमाम ख़्वाब जलाने से, दिल जलाने से।

चलो धुंआ तो उठा, इस गरीबख़ाने से।

हमें अदा न करो हक़, हिसाब ही दे दो,

नदी खड़ी हुई है दूर क्यों मुहाने से।

चराग़ ही के तले क्यों अंधेरा होता है,

ये राज़ खुल न सकेगा कभी ज़माने से।

वो सूखती हुई बेलों को सींचकर देखें,

ख़ुदा मिला है किसे घंटियाँ बजाने से।…

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Added by Balram Dhakar on December 12, 2018 at 9:55pm — 14 Comments

दूरदृष्टि - लघुकथा

'दूरदृष्टि'

"बच्चा ऑपरेशन से ही होगा, और कोई ऑप्शन नहीं है। यही कहा था न आपने! क्या सिर्फ कुछ ज्यादा रुपयों के चक्कर में?" उसकी आवाज में झलकता आवेश सहज ही महसूस हो रहा था। बीती रात ही डॉ. कामना ने नर्सिंग होम में भर्ती हुई कावेरी को उसकी नाजुक हालत के देखते ऑपरेशन की सलाह दी थी। लेकिन किसी आपात स्थिति के चलते उसे ख़ुद अपना चार्ज डॉ.अनु को देकर जाना पड़ा था। और अनु के चार्ज में बिना ऑपरेशन के ही सामान्य डिलीवरी का होना ही उसके आवेश में आने की के लिये पर्याप्त था। "देखिये, ये कोई बड़ी बात…

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Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 12, 2018 at 9:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

हर एक शख्स को मतलब है बस ख़ज़ाने से ।

गिला करूँ मैं कहाँ तक यहां ज़माने से ।।

कलेजा अम्नो सुकूँ का निकाल लेंगे वो ।।

उन्हें है वक्त कहाँ बस्तियां जलाने से ।।

न पूछ हमसे अभी जिंदगी के अफसाने ।

कटी है उम्र यहां सिसकियां दबाने से ।।

मैं अपने दर्द को बेशक़ छुपा के…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 12, 2018 at 9:08pm — 4 Comments

खामियाजा ( लघु कथा )

‘बाबू जी, ग्यारह महीने हो गए, मगर अब तक मुझे  पेंशन, बीमा, ग्रेच्युटी, अवकाश नकदीकरण कुछ भी नहीं मिला I

‘मिलेगा कैसे अभी स्वीकृत ही कहाँ हुआ ?’

‘पर काहे नहीं हुआ ? हमने तो रिटायर होने के छः माह पहले ही सारे प्रपत्र भर कर दे दिए थे I’

‘ज्यादा भोले मत बनो, तुमने भी साठ साल की उम्र तक नौकरी की है I तुम्हें  नहीं पता सरकारी काम–काज कैसे होता है ?’

‘पता है बाबू जी, इसीलिये मैंने आपको पैसे पहले ही दे दिए थे I ‘

‘हां, तो तुम्हे फंड तो मिल गया न…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 12, 2018 at 8:55pm — 7 Comments

देर तक ....

देर तक ....

तुन्द हवाएँ

करती रही खिलवाड़

हर पात से

हर शाख से

देर तक

रोती रही

बेबस चिड़िया

टूटे अण्डों के पास

देर तक

हो गई शान्त

हवाएँ

प्रकृति से

अपना खिलवाड़ करके

हो गया शान्त

रुदन

चिड़िया का

कुछ न समझ सकी

खेल विधाता का

सृजन से पूर्व संहार

क्या यही है

संसार

बस देखती रही

बिखरे तिनके

टूटे अंडे

स्वप्न के अवशेष

देर तक

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on December 12, 2018 at 7:30pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८२

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



जह्र बनके काम करती है दवाई देख ली

अच्छे अच्छों की भी हमने रहनुमाई देख ली //१



पीठ पीछे मर्तबा ए बे अदाई देख ली

तेरी भी मेहमाँ नवाज़ी हमने, भाई देख ली //२



आरज़ी थी दो दिनों की जाँ फ़िज़ाई देख ली

इश्क़ की ताबे जुनूने इब्तिदाई देख ली //३



दिन को सोना और शब की रत-जगाई देख ली

मय की जो भी कैफ़ियत थी इंतिहाई देख ली…

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Added by राज़ नवादवी on December 12, 2018 at 6:38pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८१

2122 1122 1122 22/ 112



बज़्मे अग्यार में नासूरे नज़र होने तक

क्यों रुलाता है मुझे दीदा-ए-तर होने तक //१



कितने मुत्ज़ाद हैं आमाल उसके कौलों से

टुकड़े करता है मेरा लख़्ते जिगर होने तक //२



गिर के आमाल की मिट्टी में ये जाना मैंने

तुख़्म को रोज़ ही मरना है शज़र होने तक //३



मौत का ज़ीस्त में मतलब है अबस हो जाना

ज़िंदा हूँ हालते…

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Added by राज़ नवादवी on December 12, 2018 at 2:30pm — 13 Comments

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

छलकते देख कर आँसू ग़मों की प्यास बढ़ जाये

कभी ऐसा भी मौसम हो चुभन की आस बढ़ जाये।१।



लगे ठोकर किसी को भी न चाहे घाव खुद को हो

मगर देखें तो दिल में दर्द का अहसास बढ़ जाये।२।



भला कब चाहते  हैं  ये  जिन्हें  हम  शूल कहते हैं

मिटे पतझड़ चमन का साथ ही मधुमास बढ़ जाये।३।



लगाई नफरतों  ने  है  यहाँ  हर सिम्त ही बंदिश

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये।४।



रखो ये ज्ञान भी यारो जो चाहत घुड़सवारी की

नहीं घोड़ा सँभलता है अगर जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 12:36pm — 6 Comments

ग़ज़ल: फिर ज़िंदगी से अपनी पहचान हो न जाए

फिर ज़िंदगी से अपनी पहचान हो न जाए

साँसों का आना जाना आसान हो न जाए



अपनी शनावरी पे इतरा न ऐ शनावर

शोहरत का ये समुंदर दालान हो न जाए



इस बार भी मैं दफ़्तर ताख़ीर से गया तो

डर है कि नौकरी का नुक़सान हो न जाए



मज़लूम पे सितम के तुम ती मत चलाओ

अशकों से रेज़ा रेज़ा चट्टान हो न जाए



अपना समझ के जिस की देहलीज़ चढ़ रहा हूँ

यारों कहीं वो हम से अंजान हो न जाए



"सुरख़ाब"उड़ न जाएें यादों के ये कबूतर

दिल का…

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Added by Surkhab Bashar on December 12, 2018 at 11:00am — 1 Comment

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