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April 2017 Blog Posts (120)

ग़ज़ल: उसको ये समझाना है

(बह्र--22/22/22/2)
उसको ये समझाना है ,
इक दिन सबको जाना है ।

.
हँस के रोकर कैसे भी ,
जीवन क़र्ज़ चुकाना है ।

.

देखो, भटका फिरता वो ,
वापस घर तो आना है ।

.

अच्छी सच्ची राहें हैं
सबको ये बतलाना है ।

.

उसके संगी-साथी को ,
मिलकर हाथ बढ़ाना है ।

.

आशा की किरणों वाला ,
फिर से दीप जलाना है ।

.
मौलिक एवं आप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on April 30, 2017 at 4:00pm — 14 Comments

शराफ़त (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"तुम्हारे अब्बू तो बस क़िताबी बातें करते रहेंगे! तू तो छोड़-छाड़ अपने शौहर को!" मायके में आई अपनी लाड़ली बिटिया सलमा को समझाते हुए उसकी अम्मी ने कहा- "तुझे इतना पढ़ा-लिखा कर नौकरी इसलिए नहीं करवाई है कि तू शौहर से यूं दब कर रहे। आख़िर उसकी औक़ात क्या है, तू उससे तिगुना कमाती है!"



"तुम सही कहती हो अम्मी! ऐसे आदमी के साथ ज़िंदगी जीना तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है, यहां अब्बू से परेशान रही और वहां शौहर और ससुर के उसूलों से!"



"अपनी सहेली नग़मा को देखो, शौहर को छोड़ अपने बेटे के… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 30, 2017 at 8:39am — 12 Comments

ग़ज़ल।--हो गई बात कुछ इशारों से ।

2122 1212 22

फूल ढूढे गए किताबों से ।

हो गयी बात कुछ इशारों से ।।



कुछ गलत फहमियां हुई होंगी ।।

उस से मिलता कहाँ मै वर्षों से ।।



फेसबुक से उसे भी नफरत है ।

डर उसे है अनाम रिश्तों से ।।



कुछ तो है वो खफा ख़फ़ा शायद ।

लग गया बेलगाम बातों से ।।



आशिकी का नशा हुआ महंगा ।

रिन्द घटने लगे हैं खर्चों से ।।



बाद मुद्दत के जब मिले उस से ।

दर्द छलका तमाम आंखों से ।।



हो यकीनन जफ़ा के काबिल तुम ।।

शर्म तुमको… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 30, 2017 at 8:03am — 3 Comments

ग़ज़ल

2212-1212-2212-12

थोड़ी तसल्लियों में मेरा इंतजार हो ।

माना कि आज तुम जियादा बेकरार हो ।



वह मैकदों के पास से गुजरा नहीं कभी ।

गर चाहते हो रिन्द को तो इश्तिहार हो ।।



निकला है आज चाँद शायद मुद्दतों के बाद ।

अब वस्ल पर वो फैसला भी आरपार हो ।।



आया शिकार पर न् वो खुद ही शिकार हो ।

इतना खुदा करे उसे बेगम से प्यार हो ।।



लिख्खा दरख़्त पर किसी पगली ने कोई नाम ।

शायद गरीब दिल की कोई यादगार हो।।



हालात हैं खराब क्यों…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 30, 2017 at 7:30am — 4 Comments

विश्वास की जीत

" मम्मा , मै अपनी आगे की पढाई पूरी कर पाउन्गी ना ?" माधुरी ने निराशा और अविश्वास भरे स्वर मे माँ से कहा जो उसका सर अपनी गोद मे रख अपनी आंखो से बहती नदी को रोकने का प्रयास कर रही थी l

" हाँ ...मेरी बेटी तो बहुत बहादुर है वो सब कर पायेगी , भगवान का लाख लाख शुक्र है तुम अब पहले से बहुत ठीक हो नही तो...."कहते कहते माँ का गला रुन्ध गया और कुछ दिन पहले हुआ वो भयानक एक्सिडेंट याद आ गया l

भय के कारण उनके रोन्ग्टे खडे हो गये और उन्होने माधुरी के हाथ को कस कर पकड़ लिया l

माँ के इस तरह के… Continue

Added by Renuka chitkara on April 30, 2017 at 1:03am — 3 Comments

ग़ज़ल नूर की - ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२



अँधेरों!! “नूर” ने जुगनू अभी उछाला है,

ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला है.

.

बिदा करेंगे तो हम ज़ार ज़ार रोयेंगे,

तुम्हारे दर्द को अपना बना के पाला है. 

.

नज़र भी हाय उन्हीं से लड़ी है महफ़िल में,

कि जिन के नाम का मेरे लबों पे ताला है.  

.

शजर घनेरे हैं तख़लीक़ में मुसव्विर की

सफ़र की धूप ने उस पर असर ये डाला है.  

.

निकल के कूचा-ए-जनां से आबरू न गयी,

लुटे हैं सुन के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2017 at 7:27pm — 20 Comments

भूल गया जो मै खुद (कविता)"मल्हार"

भूल गया जो मै खुद को तुझको पाकर

ये क्या कर बैठा दिल मेरा तुझपे आकर,

बस गये जो तुम मेरे इस दिल में आकर

मर न जाऊँ कहीँ मै इतनी ख़ुशी पाकर,

तूने ये क्या कर दिया दिल में मेरे आकर

अब  तोड़ो ना दिल इस तरह से जाकर,

ख़ुदा मिल गया था जैसे तुझको पाकर

बता अब क्या कहूँ में ख़ुदा के घर जाकर,

पूछे जो क्यों भूल गया था किसी को पाकर

तू ही कुछ राह सूझा जा वापिस आकर,

कैसे बताऊँ मिल गया था क्या तुझको पाकर

ख़ुदा ही रूठ गया मेरा तो जैसे…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on April 29, 2017 at 6:26am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दिल ए नाकाम पर हँसी आई

2122/1122 1212 22/112

दिल ए नाकाम पर हँसी आई

तेरे इलज़ाम पर हँसी आई



जिस मुहब्बत की आरज़ू थी बहुत

उसकेे अंजाम पर हँसी आई



दास्ताँ अपनी लिखने बैठा था

अपने इस काम पर हँसी आई



जिसमें तुमने कभी रखा था मुझे

आज उस दाम पर हँसी आई



मेरे क़ातिल का तज़किरा जो हुआ

तो हर इक नाम पर हँसी आई।



दफ्अतन मेरी जाँ से लिपटे हुए

सभी आलाम पर हँसी आई



सारे असरार जब खुले मुझपर

अपने औहाम पर हँसी… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2017 at 5:26pm — 23 Comments

गर्व ....

गर्व ....

रोक सको तो

रोक लो

अपने हाथों से

बहते लहू को

मुझे तुम

कोमल पौधा समझ

जड़ से उखाड़

फेंक देना चाहते थे

मेरे जिस्म के

काँटों में उलझ

तुमने स्वयं ही

अपने हाथ

लहू से रंग डाले

बदलते समय को

तुम नहीं पहचान पाए

शर्म आती है

तुम्हारे पुरुषत्व पर

वो अबला तो

कब की सबला

बन चुकी ही

जिसे कल का पुरुष

अपनी दासी

भोग्या का नाम देता था

देखो

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

यकीं के बाम पे ...



यकीं के बाम पे ...

हो जाता है

सब कुछ फ़ना

जब जिस्म

ख़ाक नशीं

हो जाता है

गलत है

मेरे नदीम

न मैं वहम हूँ

न तुम वहम हो

बावज़ूद

ज़िस्मानी हस्ती के

खाकनशीं होने पर भी

वज़ूद रूह का

क़ायनात के

ज़र्रे ज़र्रे में

ज़िंदा रहता है

ज़िंदगी तो

उन्स का नाम है

बे-जिस्म होने के बाद भी

रूहों में

इश्क का अलाव

फ़िज़ाओं की धड़कनों में

ज़िंदा रहता है

लम्हे मुहब्बत…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 2:05pm — 7 Comments

चला गया ये बचपन बनके यादों का बराती

शीर्षक : चला गया ये बचपन बनके यादों का बराती



" बचपन. .. के दिन हमने भी.. थे देखे

जवानी की रातें हमने भी.. हैं काटी ..

बलखा के गिरती .. वो लाखों पतंगे ,

डगमगा के चलती हुयी.. ये जवानी... |

फुदकता-उछलता .. मन वो हमारा ..

थिरकती दिलों पे.. ये अब की रवानी ,

कि पापा के कांधे पे गुजरा..वो ऑगन..

तकिये भिगोता अब के रातों का सावन |

माँ के आँचल.. तले बीते हुये वो लम्हें ..

कि कॉलेज.. मे होते वो नयन.. ईशारे ,

कि रंगों से दिवारों पे.. चित्रकारी… Continue

Added by Vivek Kumar on April 28, 2017 at 1:23pm — 3 Comments

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है

माना तेरा परिचय रूप है श्रंगार है.. पर,

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है |

सब पीर हैं तुझसे तृषित संसार की..

पर कैद सीने मे तेरे भी सहन का भण्डार है |

तू मूर्त है अभिमान की और गर्व भी अपार है,

तोड़ पैरों की बेड़ियाँ ये तेरा भी संसार है |

प्रेम की ओढ़े चुनरिया तू त्याग का गुबार है,

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है ||

गर जमीर तेरा साफ है तो जरूरत नही प्रमाण की,

कि दर्द तेरा हार और परिस्थिति श्रंगार है |

दुनिया ने देखी है तेरी सौंदर्य की…

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Added by Vivek Kumar on April 27, 2017 at 10:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल कर गये तुम बात दिल की आज महफ़िल में मेरी

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

कर गये तुम बात दिल की आज महफ़िल में मेरी |

कह गये तुम हमसफ़र सब राज महफ़िल में मेरी ||



था मुझे इंतज़ार कब से तेरे इस इजहार का |

इश्क का है छेड़ा तुमने साज महफ़िल में मेरी ||



तुम बसाये थे तड़प आँखों में दिल की हमनवां |

तोड़ दी तेरी तड़प ने हर लाज महफ़िल में मेरी ||



थे लबो पर कब से चाहत सी लिये तुम कहने की |

आज दी तुमने मुझे आवाज़ महफ़िल में मेरी ||



देखता तुझ को जमाना दीवाना सा कह मेरा |

जब "मनी" तूने…

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Added by MANINDER SINGH on April 27, 2017 at 12:30pm — 8 Comments

बाल ग ज ल

22 22 22 22 2
ढ़ेरों रंगों के गोल टमाटर
होते हैं कितने लोल टमाटर!1

पककर वे लाल हुए जाते हैं
गिरते,कहते ले तोल, टमाटर।2

अपने अंदर हैं लौह-विटामिन
कहते,खा दिल खोल टमाटर।3

वे खूब चहकते हैं डालों पर
झूलते हैं झूला डोल टमाटर।4

झोंके लगते हैं जोर हवा के
गिरते हैं ढ़म -ढ़म ढ़ोल टमाटर।5
'मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on April 26, 2017 at 7:31pm — 3 Comments

ग़ज़ल--खुदा की कसम शायरी हो न पाई

ग़ज़ल

फ ऊलन -फ ऊलन- फ ऊलन- फ ऊलन 

.

ये हसरत मुकम्मल कभी हो न पाई।

मिले वह मगर दोस्ती हो न  पाई ।

मुलाक़ात का सिलसिला तो है जारी

मगर इब्तदा प्यार की हो न पाई ।

त अज्जुब है बदले हैं महबूब कितने

मगर काम रां आशिक़ी हो न पाई।

गए वह तसव्वुर से जब से निकल कर 

खुदा की क़सम शायरी हो न पाई ।

करें नफ़रतें भूल कर सब मुहब्बत

अभी तक ये जादूगरी हो न पाई ।

मुसलसल वो करते रहे बे…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 26, 2017 at 7:30pm — 8 Comments

"फाॅर्मलिटी" /लघुकथा :अर्पणा शर्मा

"देखिये, मेरे फ्लैट की रजिस्ट्री की सारी रकम आपके बताए सर्विस प्रोवाइड़र के खाते में भिजवा दी गई है , आज रजिस्ट्री की आखिरी तारीख है और अभी तक  आपने मेरे पेपर तैयार नहीं किये",

 सुबह -शाम बिल्ड़र के ऑफिस के चक्कर लगा-लगा कर त्रस्त हुए जयेश ने अंततः लगभग गिड़गिड़ा कर उसके मैनेजर से कहा।



"देखिए मिस्टर जयेश रजिस्ट्री की बाकी फाॅर्मेलिटी आपने पूरी नहीं की, आप मेरे साथ को-ऑपरेट नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा" ,

बिल्ड़र के मैनेजर ने नितांत सधे हुए और सर्वथा व्यावसायिक लहजे में जयेश को… Continue

Added by Arpana Sharma on April 26, 2017 at 5:39pm — 4 Comments

पंडित-मुल्ला खुद नहीं समझे, हमको क्या समझायेंगे - अनुराग

फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फा

पंडित-मुल्ला खुद नहीं समझे, हमको क्या समझायेंगे

मीर  कबीर  से  चल  के  पूछें,   वे  ही  राह  बतायेंगे 

 

झूठ  हैं  सारे  मंदिर-मस्जिद,  पंडित-मुल्ला  झूठे  हैं            

ये  कुछ  और नहीं  करने  के, सुलझे  को  उलझायेंगे

 

राह दुई की  जहर है प्यारे, इधर-उधर क्यों जाएँ हम

केवल  अपनी रूह की सुनियो, बाकी सब भटकायेंगे        

 

राह कठिन है; तल में अगिन है, ऊपर बरसे है…

Continue

Added by Anuraag Vashishth on April 25, 2017 at 5:42pm — 11 Comments

लिस्ट में नाम (लघुकथा)

                                                       

 

लिस्ट में से नाम और पता लेकर अमर ने खुद को विजट पर जाने के लिए तैयार कर लिया मोटर साइकल स्टार्ट कर वो सलेमपुर की तरफ निकल पड़ा।

अपना प्रोग्राम उसने ऐसे तैयार किया था कि कम से कम तीन कैंसर पीड़ित मैंबर के किसी फैमली मैंबर से वह मिल सके ।

चलने से पहले लिस्ट क्रम में इक नंबर पर महिंद्र कौर के घर वालों की तरफ से दिए गए नंबर पर उसने फौन लगाया ऐसा करना इस लिए भी जरूरी था कि कोई घर मिल जाए खास करके वह आदमी…

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Added by मोहन बेगोवाल on April 25, 2017 at 5:13pm — 1 Comment

क़ैद रहा ...

क़ैद रहा ...

वादा
अल्फ़ाज़ की क़बा में
क़ैद रहा

किरदार
लम्हों की क़बा में
क़ैद रहा

प्यार
नज़र की क़बा में
क़ैद रहा

इश्क
धड़कनों की क़बा में
क़ैद रहा

कश्ती
ढूंढती रही
किनारों को
तूफ़ां
शब् की क़बा में
क़ैद रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on April 25, 2017 at 5:00pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले

2122 1122 1122 22/112

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले

वो मेरे दोस्त मुझे रस्ता दिखाने वाले



वक्त ने, काश! उन्हें रुकने दिया होता ज़रा

साथ ही छोड़ गए साथ निभाने वाले



मुफ़लिसी मक्र की छाई है सियाही अब भी

पर बताओ हैं कहाँ शम्अ जलाने वाले



अपने क़ातिल से शिकायत नहीं कोई मुझको

कर गए ग़र्क मेरी कश्ती, बचाने वाले



खूब तासीर नज़र आई मुहब्बत की यूँ

रो पड़े जाँ को मेरी फ़ैज़ उठाने वाले



एकता टूटने पाए न कभी, मसनद पर

आके बैठे…

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Added by शिज्जु "शकूर" on April 25, 2017 at 11:30am — 20 Comments

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