For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

June 2014 Blog Posts (163)

तू मेरी मोहब्बत है,तू मेरी इबादत है।

तू मेरी मोहब्बत है,तू मेरी इबादत है।

कैसे मैं तुझसे कहूँ,मुझे तेरी ज़रुरत है।



हरदम मैं लूँ नाम तेरा,चाहे शाम हो या सवेरा,

ये तुझको भी है मालूम, मुझे तेरी आदत है।



पाने को न कुछ पाया,जो तुझको नहीं पाया,

फिर चाहे जहाँ भर की,मेरे पास ये दौलत है।



ये साँस भी छिन जाये,जो पास न तू आये,

आकर आगोश में ले ले,बस इतनी हसरत है।



तुझसे ज़िंदगानी मेरी,तुझसे ही कहानी मेरी,

तेरे बिन जीना कैसा,कह दे,मरने की इज़ाज़त है।

 

'सावित्री राठौर'

[मौलिक…

Continue

Added by Savitri Rathore on June 21, 2014 at 8:36pm — 6 Comments

गज़ल

कभी का मर चुका हूँ मैं महज साँसें ही चलती है

मेरी पथरा गयी आँखें मगर फिर भी बरसती हैं

के अक्सर खींच लाती है मुझे लहरों की ये मस्ती

मगर मँझधार में लाकर ये लहरें क्यों मचलती हैं

बहुत है दूर वो मुझसे नहीं आना कभी उसको

मगर दीदार को आँखें न जाने क्यों तरसती हैं

कहीं गुमनाम हो जाऊँ ये शहरा छोड कर मैं भी

मगर दुनियाँ तेरे जैसी तेरे जैसी ही बस्ती हैं

मेरा ये बावफा होना किसी को रास ना आया

सभी की आदतें आपस में…

Continue

Added by umesh katara on June 21, 2014 at 7:00pm — 4 Comments

कविता ,,,,,,,, क्योंकि अक्सर ,,,,,,,,

लोग अक्सर राह चलते

देखकर मादा शरीर

ठिठक जाते हैं

और लेने लग जाते हैं जायजा

शरीर के उतार चढ़ाओं का

खोजने लगते हैं परिस्थितियाँ

जहाँ मादा शरीर उपभोग की वस्तु हो जाए

अक्सर वो ही लोग

देख कर गर्भों में मादा शरीर

डर जाते हैं

नष्ट कर उसे

आश्वस्त हो जाते हैं

क्योंकि अक्सर

लोग अपनी ही नज़र से

तोलते हैं दुनिया को

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,



गुमनाम… Continue

Added by gumnaam pithoragarhi on June 21, 2014 at 1:13pm — 3 Comments

सरस्वती वंदना -गोपाल नारायन

आपगा सरस्वती

मंत्र है प्रमाण इस भारत मही में कभी

 वाणी की प्रतीक देवि आपगा यशस्विनी  I

बहती थी मंद -मंद  सींचती थी छंद -छंद

बोलती थी कल , कल -कंठ से मनस्विनी  I

स्नान करते थे आर्य, पान करते थे वारि

ध्यान  धरती  थी  यह धारिणी तपस्विनी I

आज यदि होती वह , मेरे पाप धोती वह

  ज्ञान  बीज  बोती,   मेरी  मातः पयस्विनी  I

 

 

(मौलिक और अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 21, 2014 at 1:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कोई कश्ती नदी में ज्यूँ रवाँ है ( गिरिराज भंडारी )

1222      1222      122

कोई खामोश, मेरा हम ज़बाँ है

बड़ी चुप सी ,मेरी हर दास्ताँ है

 

कोई अब साथ आये या न आये

अकेलेपन से मेरा कारवाँ है

 

कहीं है आदमी में उस्तवारी    

कहीं हर शख़्स लगता नातवाँ है 

 

ये मीठी झिड़कियाँ ज़ारी हैं जब तक

तभी तक कोई रिश्ता दरमियाँ है

 

यहाँ कब ज़िन्दगी हरदम है जीती

यहाँ तो मौत ही बस जाविदाँ है

 

दिया बाती कहीं से खोज लाओ

उजाला चंद पल का मेहमाँ…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 21, 2014 at 10:36am — 23 Comments

फुसफुसाहट नफरतों की तेज फिर होने लगी - ग़ज़ल

2122  2122  2122  212

**************************

एक भी उम्मीद उन  से  तुम न पालो दोस्तो

रास्ता  इन  बीहड़ों  में  खुद  बना  लो दोस्तो

***

बंद दरवाजे जो  दस्तक से  नहीं खुलते कभी

इंतजारी  से  तो  अच्छा  तोड़  डालो  दोस्तो

***

फुसफुसाहट नफरतों की तेज फिर होने लगी

प्यार का परचम  दुबारा तुम उठा लो दोस्तो

***

होश में तो  कह  रहे  थे ‘साथ  हम तेरे खड़े’

गिर रहा मदहोशियों  में अब सॅभालो…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 21, 2014 at 9:30am — 18 Comments

अंतःकरण की शुद्धि

अंतःकरण की शुद्धि

सुबह में , शाम में,

वर्षा और घाम में,

जीवन के साम-दाम में,

अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

देवता के पूजन में ,

मन्त्रों के गुंजन में,

सज्जन और दुर्जन में,

अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

राग-वैराग्य में,

स्वार्थ और त्याग में ,

जीवन सौभाग्य में,

अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

दुःख में क्लेश में

किसी भी वेश में ,

दुर्भाग्य और भाग्य में,

अंतःकरण की शुद्धि चाहिए,

डॉ. विजय प्रकाश शर्मा …

Continue

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on June 20, 2014 at 8:08pm — 15 Comments

सूचना क्रांति (लघुकथा) रवि प्रभाकर

कुछ ही मिनट पहले विदेश में जन्मे अपने पौत्र की तस्वीरें इंटरनेट पर देख रहे दंपति को खुशी से झूमते देखकर  कोने में बैठा घर का नौकर भी अपने बेटे के कद काठ के बारे कयास लगा रहा था जिसे वह कुछ साल पहले गांव छोड़कर नौकरी के लिए शहर आ गया था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on June 20, 2014 at 10:30am — 11 Comments

चलो एक वृक्ष लगाएँ !

चलो एक वृक्ष लगाएं

करें पुण्य का काम

जो दे हम सब को

जीवन भर आराम

चलो एक वृक्ष लगाएं |



धरती माँ का गहना है ये

है ये उनका रूप श्रृंगार

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा

देता हमको जीवन दान

चलो एक वृक्ष लगाएं |



बरगद, पीपल, नीम, पाकड़

तुलसी, अक्षय, पारिजात

ये सब है उपहार प्रकृति का

मिला है सबको एक समान

चलो एक वृक्ष लगाएं |



जल का संग्रह करना है अब

सोच लें गर हम सब इक बार

वर्षा जल संचित कर के हम…

Continue

Added by Meena Pathak on June 20, 2014 at 8:30am — 13 Comments

कहा किसने कि राहे इश्क़ में धोका नहीं है

कहा किसने कि राहे इश्क़ में धोका नहीं है

यहाँ जो दिखता है वो दोस्तों होता नहीं है

 

जो कुछ पाया ज़माने की नज़र में था हमेशा

गंवाया जो उसे इस दुनिया ने देखा नहीं है

 

गुज़ारी है वफ़ादारों में सारी उम्र मैंने

दग़ा करना किसी से भी मुझे आता नहीं है

 

मुझे मालूम है इक दिन जुदा होना है सबको

मगर ऐसे भी कोई दूर तो जाता नहीं है

 

मुहब्बत के सफ़र में हमसफ़र जितने थे मेरे

कोई भी साथ थोड़ी दूर चल पाया नहीं…

Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 20, 2014 at 12:37am — 10 Comments

प्रेमगीत : आँखों ने ख़्वाबों के फूल चुने

पलकों ने चुम्बन के गीत सुने

आँखों ने ख़्वाबों के फूल चुने

 

साँसें यूँ साँसों से गले मिलीं

अंग अंग नस नस में डूब गया

हाथों ने हाथों से बातें की

और त्वचा ने सीखा शब्द नया

 

रोम रोम सिहरन के वस्त्र बुने

 

मेघों से बरस पड़ी मधु धारा

हवा मुई पी पीकर बहक गई

बाँसों के झुरमुट में चाँद फँसा

काँप काँप तारे गिर पड़े कई

 

रात नये सूरज की कथा गुने

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 19, 2014 at 9:24pm — 18 Comments

एक ताज़ा नवगीत -----जगदीश पंकज---मैं स्वयं निःशब्द हूँ,



एक ताज़ा नवगीत -----जगदीश पंकज

मैं स्वयं निःशब्द हूँ,

निर्वाक् हूँ

भौंचक्क ,विस्मित

क्यों असंगत हूँ

सभी के साथ में

चलते हुए भी

खुरदरापन ही भरा

जब जिंदगी की

हर सतह पर

फिर कहाँ से खोज

चेहरे पर सजे

लालित्य मेरे

जब अभावों के

तनावों के मिलें

अनगिन थपेड़े

तब किसी अवसाद

के ही चिन्ह

चिपकें नित्य मेरे

मुस्कराते फूल

हंसती ओस

किरणों की चमक से …

Continue

Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on June 19, 2014 at 7:30pm — 34 Comments

बरसाती बादल आ ही गए

बरसाती बादल आ ही गए, ठंढक थोड़ी पहुंचा ही गए.

तपती धरती, झुलसाते पवन, ऊमस की थी घनघोर घुटन,

खाने पीने का होश नहीं, 'बिजली कट' और बढ़ाते चुभन

अब अम्बर को देख जरा, बिजली की चमक दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

सरकारें आती जाती है, बिजली भी आती जाती है,

वादों और सपनों की झोली,जनता को ही दिखलाती है

पर एक नियंता ऐसा भी, बस चमत्कार दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

अंकुरे अवनि से सस्य सुंड, खेतों में दिखते कृषक…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 19, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

गजल- चल रही है आँंधियॉं...

गजल- चल रही है आँंधियॉं...

बह्र-- 2122 2122 2122 212

जिन्दगी है आस्मां हर ओर खालीपन चुभे। 

आजकल की दास्तां हर ओर खालीपन चुभे।।

चॉंद, अपनी चॉंदनी रखता नहीं जब पास में,

मेघ-मावस से जहां हर ओर खालीपन चुभे।1

भोर की लाली चहक कर मॉंगती वर खास है,

सॉंझ को लुटती यहां हर ओर खालीपन चुभे।2

प्यार आँंखों में दिलों में दर्द का दरिया बहे,

डूबती कश्ती शमां हर ओर खालीपन चुभे।3

झॉंकते हैं अब झरोखों से…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 19, 2014 at 1:30pm — 19 Comments

अहं के ताज़ को

अहं के ताज़ को ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निशिचित है

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 19, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

जिसको तुमने खोया माना-डा० विजय शंकर

जिसको तुमने खोया माना है ,

उसको मैंने पाया जाना है ।

कुछ अटपटा , उलटा सा लगता है ,

पर जिन्दगीं तुमको मैंने ऐसा ही जाना है

जो खो गया , वो क्या ले गया ,

हाँ, अपनी स्मृतियाँ छोड़ गया ||

कुछ मीठी , कुछ तीखी,

पर जीने के लिए बहुत

काफी है , एक सहारे की तरह ||

एक गीत , एक कविता लिखता हूँ ,

जब तक लिखता हूँ , मेरा है , जब

छोड़ देता हूँ , पढ़ने वालों के लिए,

मेरा क्या रह गया उसमें , पर

खो दिया, क्या मैंने उसको ,

गर खो दिया , तो वही तो… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 19, 2014 at 8:53am — 16 Comments

ग़ज़ल -कि साज़िश के निशाने पर ही हमने दिन गुजारे हैं

 १२२२      १२२२     १२२२       १२२२

हमें माझी की आदत है उसी के ही सहारे हैं

डुबो दे बीच में चाहे, वो चाहे तो किनारे हैं

मिटाने को हमें अब जा मिला घड़ियाल से माझी

कि साज़िश के निशाने पर ही हमने दिन गुजारे हैं

चमकती चीज ही मिलती रही सौगात में हमको

समझ बैठे ये धोखे से कि किस्मत में सितारे हैं

सियासत जो हमारे घर में ही होने लगी है अब

तभी हर बात में कहने लगे वो  हम तुम्हारे हैं

अदावत घर में ही…

Continue

Added by sanju shabdita on June 18, 2014 at 11:30pm — 34 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

कुंडलिया छंद- समाज और बेटियाँ 
(1)
सक्षम बेटी वधु बने, वधुएँ घर की लाज 
वंश बढ़ाती कोख से, हर घर करता नाज 
हर घर करता नाज, मिले जब ढेरों खुशियाँ 
जागे सकल समाज, सृजन से महके बगिया 
त्यागे बाल विवाह, अपराध है ये अक्षम 
करे पढ़ाकर ब्याह, बने समाज तब सक्षम ||
(2)

बेटी बिन क्या हो सके, विकसित कभी समाज 

बेटी आती है सदा,  लिए प्यार  का साज 
लिए प्यार का साज, हाथ…
Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 18, 2014 at 8:00pm — 18 Comments

सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

सिसकियाँ भरते रहे हम रात भर

चाँद ने भी देखा पर कुछ ना कहा

हवाएँ भी सुनकर चलती रही

दर्द सीने में लहरों सा उठता रहा

चाँदनी बादलों में छुपने लगी

सांस भी रह-रह कर रूकने लगी

सिर्फ बची मैं और मेरी तन्हाईयाँ

यादें करती रही पीछा बनकर परछाइयाँ

घटाओं ने समझा दर्द बस मेरा

बरसती रही वो रात भर

जख्म रिस-रिस कर ऐसे बहने लगे

घाव मरहम की ख्वाहिश में सहने लगे

पिघलकर रूह बिछने लगी

साया भी खुद से सहमने लगा

लौ जलती रही मगर तेल कम था

एक…

Continue

Added by Pragya Srivastava on June 18, 2014 at 5:30pm — 9 Comments

हाइकु !

६ - हाइकु !

=======
१. 
लटकी लाशें 
जड़ ! पेड़ की जड़ें 
हुए तमाशे। 
२. 
सामंतवाद 
रक्षक ही भक्षक 
समाजवाद !
३. 
अदालत है 
रुके हुए फैसले 
अदावत है 
४. 
गुणात्मक हो 
रिश्तों की बुनावट 
भावात्मक हो 
५. 
चला चरखा 
जीवन की कताई 
चल चर…
Continue

Added by AVINASH S BAGDE on June 18, 2014 at 3:07pm — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
Sunday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
Sunday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
Sunday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ…See More
May 19
Dayaram Methani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर आप यों घबरा कर मैदान छोड़ देंगे तो जिन्होने एक जुट होकर षड़यन्त्र किया है वे अपनी जीत मानेंगे।…"
May 19
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन…"
May 18
amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
May 15
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
May 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service