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सदस्य कार्यकारिणी
लंगडा मज़े में है (हास्य व्यंग ग़ज़ल 'राज')

राजा ये सोचता है कि प्यादा मज़े में है 

प्यादा ये सोचता है कि राजा मज़े में है



लंगड़ा ये सोचता है कि अंधा मज़े  में है 

अंधा ये सोचता है कि लंगड़ा मज़े में है



हर नाज़ नखरे दिल के उठाता है  ज़िस्म ये 

पर दिल ये सोचता है कि गुर्दा मज़े में है 



गुल के बिना वुजूद तो इसका भी कुछ नहीं 

पर सोचता गुलाब कि काँटा मज़े में है 



उस वक्त  चढ़ गई थी  हवाओं…

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Added by rajesh kumari on December 4, 2018 at 11:15am — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७७

2122 2122 2122 212



बाग़पैरा क्या करे गुल ही न माने बात जब

शम्स का रुत्बा नहीं कुछ, हो गई हो रात जब //१



बाँध देना गाँठ में तुम गाँव की आबोहवा

शह्र के नक्शे क़दम पर चल पड़ें देहात जब //२



दोस्त मंसूबा बनाऊं मैं भी तुझसे वस्ल का

तोड़ दें तेरी हया को मेरे इक़दमात जब //३



इक किरन सी फूटने को आ गई बामे उफ़ुक़

रौशनी की जुस्तजू में खो गया…

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Added by राज़ नवादवी on December 3, 2018 at 7:30pm — 7 Comments

३ क्षणिकाएँ ...

३ क्षणिकाएँ ...

छोटी सी बात

साँय-साँय करती रात

स्मृति पटल को दे गई

अमर

स्पर्श

सौग़ात

........................

व्योम

शून्यता के पर्याय के अतिरिक्त

आश्रय स्थल भी है

उन स्मृतियों का

जो जीती हैं

मिट कर भी

अंत से अनंत तक

.....................................

भला घर

खंडहर में

तब्दील कब होते हैं

जब तक

रस मधुरस में एक…
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Added by Sushil Sarna on December 3, 2018 at 7:00pm — 8 Comments

'नव जागृति' (लघुकथा)

ट्रेन की बोगी में वह बालक न तो ख़ुश बैठा हुआ था और न ही दुखी। सजे-धजे किन्नरों से भरी बोगी में, पैसे गिनते हुए एक बुज़ुर्ग किन्नर को वह देख ही रहा था कि एक फेरी वाला मूंगफली बेचता हुआ वहां आया और दो-चार सवारियों को मूंगफलियां बेच कर,पैसे गिन कर उन्हें बाक़ी पैसे लौटाने लगा।

"अरे देखो, यह लंगड़ा और दोनों आंखों से अंधा है, फ़िर भी पैसों का सही हिसाब कर रहा है !" वह बालक बगल में बैठे उस किन्नर से बोल पड़ा, जो उसे समझा-बुझाकर उसके घर से अपने दल में शामिल करने के लिए लाया था उसके…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 3, 2018 at 4:00pm — 5 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

एक ताज़ा ग़ज़ल

वो खुद ही मजबूर बहुत हैं उनको हाल बताना क्या

जिनके दिल में प्यार नहीं है उन पर प्यार लुटाना क्या

हम तो तेरे नाम के जोगी अपना यार ठिकाना क्या

बिरहा में जलना है हमको महफिल क्या वीराना क्या

टूट गया है उस से नाता जो दुनिया का मालिक है

अब सारी दुनिया को अपने दिल के जख्म दिखाना क्या

सारे जीवन के पछतावे सांसो को झुलसाते हैं

अपनी किस्मत में लिक्खा है तिल तिल कर मिट जाना क्या

जीवन के…

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Added by मनोज अहसास on December 2, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल

12221222 122



वो भौरे पास हैं जब से कली के ।

हैं बिखरे रंग तब से पाँखुरी के ।।

सुना है चांद आएगा जमी पर ।

बढ़े हैं हौसले अब चांदनी के ।।

जरा कमसिन अदाएं देखिए तो ।

अजब अंदाज़ उनकी बेख़ुदी के ।।

वो बेशक पास मेरे आ रही है ।

लगे हैं स्वर सही कुछ बाँसुरी के ।।

मुहब्बत हो गयी उनसे जो मेरी ।

हुए मशहूर किस्से आशिकी के ।।

तुम्हारा खत मिला जो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2018 at 10:30am — 6 Comments

गज़ल -13( फिर भी नादान कलेजे में ज़हर रखता है)

2122 1122 1122 22/112

छोड़ जाएगा यहीं सब ये ख़बर रखता है

फिर भी दौलत पे वो मर मर के नज़र रखता है//१

ज़िन्दगी प्यार के अमरित से ही होती है रवां

फिर भी नादान कलेजे में ज़हर रखता है //२

कितना मज़बूर है वो रोड पे भूखा बच्चा

एक रोटी के लिए कदमों में सर रखता है//३

आदमी कितना अकेला है भरी दुनिया में

कहने को भीड़ भरे शह्र में घर रखता है//४

पहले शैतान से डरने की ख़बर आती थी

आज इंसान ही इंसान से डर रखता…

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Added by क़मर जौनपुरी on December 2, 2018 at 8:17am — 7 Comments

गज़ल -12( जब मुल्क़ में नफ़रत का ये बाजार नहीं था)

221--1221--1221--122

जब मुल्क़ में नफऱत का ये बाज़ार नहीं था

हर शख़्स लहू पीने को तैयार नहीं था //१

अब बाढ़ सी आई है शबे ग़म की नदी में

जब तुम न थे दिल में तो ये बेज़ार नहीं था//२

जो देश की सरहद पे सदा ख़ून बहाए

क्या देेेश की मिट्टी से उन्हें प्यार नहीं था//३

मिट जाएं सभी जंग में हिन्दू व मुसलमाँ

ऐसा तो मेरे हिन्द का त्यौहार नहीं था//४

जब मुल्क़ परेशां था फिरंगी के सितम से

मिल जुुल के लड़े मुल्क ये लाचार नहीं…

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Added by क़मर जौनपुरी on December 2, 2018 at 7:30am — 5 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७६

2121 2121 2121 212



उड़ रहे थे पैरों से ग़ुबार, देखते रहे

वो न लौटे जबकि हम हज़ार देखते रहे //१



ताब उसकी, बू भी उसकी, रंग भी था होशकुन

गुल को कितनी हसरतों से ख़ार देखते रहे //२



हम तो राह देखते थे उनके आने की मगर

वो हमारा सब्रे इन्तेज़ार देखते रहे //३

तोड़ते थे बेदिली से वो मकाने इश्क़, हम 

टूटते मकाँ का इंतेशार देखते रहे //४ …



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Added by राज़ नवादवी on December 2, 2018 at 3:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना (ग़ज़ल "राज")

गर है अंजाम महब्बत का क़यामत होना 

मुझको मंजूर क़यामत से महब्बत होना 



बे-मआनी नहीं ये सब है  महब्ब्त की  ख़ुराक

दरमियाँ  उसके गिले  शिकवे  शिकायत होना



आस्माँ  की ही अना का है नतीज़ा यारो  

उसके ही चाँद सितारों में बगावत होना



बेच दी है मेरे गुलशन की महक गुलचीं ने  

इसको कहते हैं अमानत में ख़यानत होना



ये ही करता है मुकम्मल मेरे…

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Added by rajesh kumari on December 1, 2018 at 4:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

2122 2122 2122 212

खुदकुशी बेहतर है ऐ दिल बेवफ़ा के साथ से

चाहो मत बढकर किसी को चाह की औकात से।

जिसकी ख़ातिर छोड़ दी दुनिया की सारी दौलतें

रख न पाया मन भी मेरा वो दो मीठी बात से ।

दे रहा है तुहमतें उल्टा मुझे ही बेवफ़ा 

बेहया से क्या कहूँ मैं, क्या कहूँ इस जात से।

मैं समझता था मुहब्बत की सभी को हैं तलब

उसको तो मतलब है लेकिन और कोई बात से।

हैं मुसलसल शिद्दतें कुछ यूँ जुदाई की…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 1, 2018 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2122



हैं जो अफसानें पुराने, सब भुलाना चाहता हूँ

इस धरा को स्वर्ग-जैसा ही बनाना चाहता हूँ

देश में अपने सदा सद्भाव फैलाएँ सभी जन

अब सभी दीवार नफरत की गिराना चाहता हूँ

दिल सभी का हो सदा निर्मल नदी-जैसा धरा पर

अब परस्पर प्यार करना ही सिखाना चाहता हूँ

धन कमाऊँगा मगर धोखा न सीखूँगा किसी से

हर कदम अपना पसीना ही बहाना चाहता हूँ

है ये तेरा, है ये मेरा की लड़ाई खत्म हो अब

और खुशियाँ संग सबके…

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Added by Dayaram Methani on December 1, 2018 at 12:30pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७५

2122 1122 1212 22/ 112



उसका बदला हुआ तर्ज़े करम सताता था

यार बेज़ार था कुछ यूँ कि कम सताता था //१



होके कुछ यूँ वो ब मिज़गाने नम सताता था

कब मैं समझा कि वो अबरू-ए-ख़म सताता था //२ 



दूर रहने पे तेरी क़ुरबतों की याद आई

पास रहने पे जुदाई का ग़म सताता था //३ 



जिनको इफ़रात थी रिज़्को ग़िज़ा की जीने में

ऐसे लोगों को भी कर्बे शिकम…

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Added by राज़ नवादवी on December 1, 2018 at 11:30am — 8 Comments

"आजकल"

आजकल कोई बुलाता भी नहीं।

आजकल मैं भी कहीं जाता नहीं

आजकल हर ओर है बदली फिज़ा

आजकल गायब है चेहरे से गीज़ा॥

 

आजकल कुछ भी सुहाता ही नहीं।

आजकल मैं गुनगुनाता भी नहीं

आजकल बदले हुए हालात हैं

आजकल मैं मुस्कुराता भी नहीं॥

 

आजकल बेकार है सब कोशिशें।

आजकल हैं लग रही बस बंदिशें

आजकल अपने ही छलते हैं यहाँ

आजकल हैं सब बहुत बस परेशां॥

 

आजकल वादों की ही भरमार है।

आजकल गैरों के सर पे हाथ…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 30, 2018 at 4:00pm — 2 Comments

सावन आया है

फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन

 

गुपचुप उसपर मन आया है

लगता है सावन आया है

 

महका है हर कोना-कोना

अम्बर से चन्दन आया है

 

देखो नभ पर छाये बादल

दूल्हा ज्यों बनठन आया है 

 

भीग रही है प्यासी धरती

ज्यों बीता यौवन आया है

 

रह-रह नाच रही हैं बूँदें

राधा का मोहन आया है

 

झूला झूल रही हैं सखियाँ

सज रक्षा बंधन आया है

 

कागज़ की नैया ले आओ

याद मुझे बचपन आया…

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Added by Ashok Kumar Raktale on November 30, 2018 at 9:00am — 9 Comments

'लुभावने या डरावने दिन?' (लघुकथा)

"हम तो अपनी सरकारी नौकरी से मज़े में हैं! तुम सुनाओ, कैसी चल रही है तुम्हारी प्राइवेट टीचरी?"

"बढ़िया! मेरे ख़्याल से तुमसे भी बेहतर चल रहा है सब कुछ!"

"वो कैसे?"

"तुम्हारी नौकरी में तुम केवल सरकार और जनता को उल्लू बनाते हो या चूना लगाते हो! ... हम तो अपनी नौकरी में मैनेजमेंट को और माता-पिता-पालकों को और छात्रों को भी, क्योंकि वे हमें उल्लू बनाते हैं या चूना लगाते हैं! 'टिट-फॉर-टेट' और 'टेक इट ईज़ी' का ज़माना है न!"

"कुछ समझ में नहीं आया! हमने तो सुना है कि प्राइवेट…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 30, 2018 at 12:30am — No Comments

अब और न हिन्दू न मुसलमान कीजिये

221 1221 1221 212

गर हो सके तो मुल्क पे अहसान कीजिये ।।

अब और न हिन्दू न मुसलमान कीजिये ।।

भगवान को भी बांट रहे आप जात में ।

कितना  गिरे हैं सोच के अनुमान कीजिये ।।

मत  सेंकिए  ये रोटियां नफरत की आग पर ।

अम्नो सुकूँ के वास्ते फ़रमान कीजिये ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 29, 2018 at 11:30pm — 5 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

2122    2122    2122   212

एक ताज़ा ग़ज़ल

जो भी जग में साथ हैं सब छूट जाने के लिए

क्यों हो तेरा ज़िक्र फिर दिल को दुखाने के लिए

दिल्लगी में शायद तेरी रह गई थी कुछ कमी

भेजा है क़ासिद को मेरा हाल पाने के लिए

इसलिए महसूस तेरी बेरुखी होती नहीं

मुझमें कुछ बाकी नहीं तुझको सुनाने के लिए

रात गहरी कट गई फिर भी न पाई रोशनी

आ गई बरसात मेरा दिल जलाने के लिए

आज कल मायूस होकर घूमता हूं दर बदर

इक खिलौना बन गया हूँ…

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Added by मनोज अहसास on November 29, 2018 at 10:24pm — 5 Comments

हौं पंडितन केर पछलगा *उपन्यास का एक अंश )

चौदहवीं की रात I निशीथ का समय I चाँद अपने पूरे शबाब पर I जायस के कजियाना मोहल्ले में एक छोटे से घर की छत पर गोंदरी बिछाए वही लम्बी सी पतली लडकी लेटी थी I उसकी सपनीली आँखों से नींद आज गायब थी I उसकी आँखों के सामने मुहम्मद का भोला किंतु खूबसूरत चेहरा बार-बार घूम जाता I कभी-कभी ऐसी नाटकीय घटनायें हो जाती हैं कि हम बेक़सूर होकर भी दूसरे की निगाहों में कसूरवार हो जाते हैं I उस लड़के ने मुझे उस हंगामे से बचाया I मेरा हाथ थामा I मुझे पानी से निकाला I हाथ थामने के मुहावरे का अर्थ सोचकर उसे उस सन्नाटे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2018 at 10:02pm — 2 Comments

इस तरह जिन्दगी तमाम करें

इस तरह जिन्दगी तमाम करें
लोग आ कर हमें सलाम करें
झूठ का अब न एहतराम करें
इस तरह का भी इंतिजाम करें
तू वना खुद को इस तरह शीशा
देख चेहरा सभी सलाम करें
इस तरह वख्श बन्दगी दाता
सुबह से शाम राम-राम करें
आप के हाथ अब नहीं बाजी
आप अब और कोई काम करें
आज तौफिक दे खुदा सबको
देश पर जां लुटा के नाम करें
देख नफरत उदास है “तन्हा”
आस्तां में कहीं कयाम करें
मुनीश “तन्हा”
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by munish tanha on November 29, 2018 at 9:30pm — 2 Comments

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