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शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है : सलीम रज़ा रीवा ग़ज़ल

2122 2122 212

..

शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है

मिल गए तुम जाम का क्या काम है

.. 

ये वज़ीफा़ मेरा सुब्ह-ओ-शाम है

मेरे लब पे सिर्फ तेरा नाम है

..

तू मिला मुझको सभी कुछ मिल गया

ये मुक़द्दर का बड़ा इनआम है



तुम हो सांसों में तुम्ही धड़कन में हो

ज़िन्दगी मेरी  तुम्हारे  नाम  है

..

हम किसी से दुश्मनी करते नहीं

दोस्ती तो प्यार  का  पैग़ाम है 

..

मेरा घर खुशिओं से है फूला फला 

मेरे रब का ये  बड़ा  इनआम… Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 9, 2017 at 3:30pm — 13 Comments

कुछ यादें बचपन की

बीत गया जो बचपन अपना, वह भी एक जमाना था

पल में हँसना पल में रोना, पल पल इक अफसाना था



बारिश में कागज की नैया, भैया रोज बनाते थे

बागों में तितली के पीछे, हमको वह दौड़ाते थे

रोने की थी वजह न कोई, हँसने के न बहाने थे

कमी नहीं थी किसी चीज की, सारे पास खजाने थे



चिन्ता फिक्र न कोई कल की, हर मौसम मस्ताना था

पल में हँसना पल में रोना, पल पल इक अफसाना था



जिधर निकलते थे हम यारों उधर दोस्त मिल जाते थे

गिल्ली डंडा और कबड्डी, फिर हम वहीं जमाते… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 9, 2017 at 1:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल -ये’ बातचीत में’ खरसान बैर बू क्या है?(संशोधित)

१२१२  ११२२  १२१२  २२

सटीक बात की’, आक्षेप बाँधनू क्या है

ये’ बातचीत में’ खरसान बैर बू क्या है?

नया ज़माना’ नया है तमाम पैराहन

अगर पहन लिया’ वो वस्त्र, फ़ालतू क्या है |

हसीन मानता’ हूँ मैं उसे, नहीं शोले

नजाकतें जहाँ’ है इश्क, तुन्दखू क्या है |

किया करार बहुत आम से चुनावों में

वजीर बनके’ कही रहबरी, कि तू क्या है ?

हो’ वुध्दिमान मिला राज, अब करो कुछ भी  

उलट पलट करो’ खुद आप, गुफ्तगू क्या…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 9, 2017 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल -- ग़लती कर पछताए कौन // दिनेश कुमार

22__22__22__2
.
ग़लती कर पछताए कौन
ख़ुद से नज़र मिलाए कौन
.
अपनी अना मिटाए कौन
सच्ची अलख जगाए कौन
.
पिछले लेखे-जोखे हैं
अपने कौन पराए कौन
.
राम भी कब से भूखे हैं
झूठे बेर खिलाए कौन
.
कस्तूरी मिल जाएगी
ख़ुद में गहरे जाए कौन
.
तूफ़ां नाम का तूफ़ां है
लहरों से टकराए कौन
.
माज़ी माज़ी करें सभी
मुस्तक़बिल चमकाए कौन
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 9, 2017 at 6:18am — 20 Comments

विकल्प ( लघुकथा )

कुछ क्षण ही बीते होंगे उस कोहराम को मचे।इला की दृष्टि घड़ी पर गई।ऑफिस का समय हो रहा था।रोज की ही कहानी है सोच उसने अपने आँसू पौंछे और तुरन्त रसोई में पहुँच लंच' तैयार कर दफ़्तर को निकल गई।दिनभर मन उचाट ही रहा।शाम को लौटते हुए उसके कदम मायके की ओर मुड़ गये।

" अरे इला बेटी ! कैसी है ? आ भीतर आ ..."

" ठीक हूँ माँ।"इला ने एक ओर पर्स पटका और धम्म से सोफ़े पर बैठ गई।

" आज फिर हाथ उठाया कमल ने ?" इला अक़्सर तभी आती,जब उसका कमल से झगड़ा होता।ये बात इला की माँ बहुत अच्छे से जानती थी… Continue

Added by shashi bansal goyal on October 8, 2017 at 10:39pm — 4 Comments

बचपन

*बचपन*



न समंदर-सा गहरा,न पर्वत-सा ऊँचा



न ही लताओं-सा उलझा



जटिल तो हो ही नहीं सकता है



बचपन



क्योंकि बड़ा सादा-सा होता है



बचपन



बड़ा सीधा-सा होता है



बचपन



खुली उन्मक्त हवा-सा बहता है



करता है अठखेलियां



विभिन्न पत्तियों से



टहनियों से



कभी-कभी हिला देता है



वृक्ष को भी जड़ तक



क्योंकि बहती हवा-से



बचपन का विवेक इतना ही



होता… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2017 at 10:37pm — 4 Comments

ग़ज़ल...ज़िन्दगी मुस्कुराने लगी शाम से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुतदारिक सालिम मुसम्मन बहर

212 212 212 212

आपकी याद आने लगी शाम से

ज़िन्दगी मुस्कुराने लगी शाम से



गुनगुनाती हुई चल रही है हवा

शाम भी गीत गाने लगी शाम से



चाँदनी रात से क्यों करें हम गिला

हर ख़ुशी झिलमिलाने लगी शाम से



बड़ रही प्यार की तिश्नगी हर घड़ी

हसरतें सिर उठाने लगी शाम से



ताल बेताल थे सुर बड़े बेसुरे

रागनी वो सुनाने लगी शाम से



आस दिल में लिये चल पड़ी बावरी

रात सपने सजाने लगी शाम से

(मौलिक एवं… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 8, 2017 at 7:00pm — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - चाहे आँखों लगी, आग तो आग है.. // --सौरभ

२१२ २१२ २१२ २१२

 

फिर जगी आस तो चाह भी खिल उठी

मन पुलकने लगा नगमगी खिल उठी

 

दीप-लड़ियाँ चमकने लगीं, सुर सधे..

ये धरा क्या सजी, ज़िन्दग़ी खिल उठी

 

लौट आया शरद जान कर रात को

गुदगुदी-सी हुई, झुरझुरी खिल उठी

 

उनकी यादों पगी आँखें झुकती गयीं

किन्तु आँखो में उमगी नमी खिल उठी

 

है मुआ ढीठ भी.. बेतकल्लुफ़ पवन..

सोचती-सोचती ओढ़नी खिल उठी

 

चाहे आँखों लगी.. आग तो आग है..

है मगर प्यार की, हर घड़ी खिल…

Continue

Added by Saurabh Pandey on October 8, 2017 at 1:00pm — 56 Comments

लघुकथा - मंत्री जी का कुत्ता

लघुकथा - मंत्री जी का कुत्ता –

कलुआ ने जब से होश संभाला था वह मंत्री जी के ही साथ था।सुबह से रात तक, हर काम का भागीदार होता था।

आज मंत्री जी का दौरा उसी के गाँव में था।बड़ी दुविधा के साथ बरसों बाद गाँव आया था।लगभग सभी लोग उसे भूल चुके थे।मगर उसके बचपन के सखा हरिया ने उसे पहचान लिया।

"अरे कालीचरण भैया आप"?

"हरीराम, तुम पहचान लिये हमका"।

"क्या बात करते हो भैया, हम आपको भूल सकते हैं।आज हम आपकी वजह से जिंदा हैं।बचपन में भेड़िया से भिड़ गये थे, हमको बचाने के लिये"।

हरिया… Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 8, 2017 at 12:02pm — 10 Comments

देखो कैसे-कैसे गीत...

बिन पायल के,

साज बिना ये,

बाज रहा संगीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



राग बसंती, तान-तराने

सुमधुर गायन सकल घराने।

ये सोच रहा अनजाने,

मेरे ही मनमीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



सांझ-सबेरे प्रियतम मेरे

तरसाओ न चित-चोर चितेरे।

नयना बरसे अश्रु मेरे,

बिन प्रियतम ये प्रीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



मधुबन की ये संगत सारी

बिन पायल सब बाजी हारी।

अब कौन कहे मतवारी,

हारकर ये जीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।

"मौलिक व…

Continue

Added by BS Gauniya on October 8, 2017 at 8:15am — 6 Comments

लघुकथा- भेड़िया

" क्या कहा ,हमेशा के लिए आ गई है । "
"हाँ !हाँ ! हाँ !! कितनी बार कहूँ मैं हमेशा के लिए आ गई हूँ ।" श्वेता ने झुँझलाकर कहा ।
"आखिर क्यों बेटी ?कुछ तो वजह होगी ?"
"वही भेड़िया ।अब वो मौका पाकर मेरा शिकार करना चाहता है । "
अब माँ को अच्छे से समझ में आ गया । भेड़िया और कोई नहीं श्वेता का देवर है क्योंकि वह पहले भी कई बार माँ को बतला चुकी है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 7, 2017 at 11:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चाँद निकला छत पे किसकी कर रहा दीदार कौन(ग़ज़ल 'राज')

बहर-ए-रमल मुसम्मिन मक्सूर व मह्जूफ़

2122 2122 2122 2121

किसके चेह्रे पर लिखा है कौन दुश्मन यार कौन 

क्या पता है आड में गुल की  छुपा है ख़ार कौन

हक़ है किसका सिर पे पहने है मगर दस्तार कौन 

चाँद निकला छत पे किसकी कर रहा दीदार कौन

मतलबी हैं आज रिश्ते खो गया है एतबार 

इस जहां में दिल से सच्चा आज करता प्यार कौन

मर गया  है मुफ़्लिसी में भूख से देखो अनाथ 

सब ही  खाते थे  तरस लेकिन उठाता भार कौन

पेट भरने के लिए…

Continue

Added by rajesh kumari on October 7, 2017 at 9:30pm — 15 Comments

गीत - तुझे देखूँ यहाँ वहाँ

संदेसा तेरे दिल का , धड़कने है लातीं,

सवार तेरे धुन मे, खुद को कहाँ रोक पाते,

बस मुस्कुरकर तू देख लेती ज़रा,

दिल क्या, जान भी तेरे हो जाते,

तुझे देखूँ यहाँ वहाँ, ढूँढूँ मैं सारा जहाँ, 

बाहों से लगा लूँ तुझे, दिल मे बसा लूँ तुझे....(2)…

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Added by M Vijish kumar on October 7, 2017 at 7:30pm — 7 Comments

देख रिश्तों की ......संतोष

अरकान:-फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

देख रिश्तों की ऐसी बनावट न कर
दोस्त है दुश्मनी की मिलावट न कर

झूट कहने में हर शख़्स माहिर हुआ
सच यहाँ बोलने की दिखावट न कर

ज़ख़्म दिल के हैं दिल में उन्हें दफ़्न रख
अपने चहरे पे उनकी सजावट न कर

टूट जायेंगे रिश्ते ज़रा देर में
कच्चे धागों से इनकी बुनावट न कर

भूक से थे ये बेताब सोए अभी
देख ये जाग जायेंगे आहट न कर
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on October 7, 2017 at 6:17pm — 8 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५६

ग़ज़ल- २२१ २१२१ १२२१ २१२ 

(फैज़ अहमद फैज़ की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल) 



हारा नहीं हूँ, हौसला बस ख़ाम ही तो है

गिरना भी घुड़सवार का इक़दाम ही तो है

बोली लगाएँ, जो लुटा फिर से खरीद लें 

हिम्मत अभी बिकी नहीं नीलाम ही तो है



साबित अभी हुए नहीं मुज़रिम किसी भी तौर

सर पर हमारे इश्क़ का इल्ज़ाम ही तो है



ये दिल किसी का है नहीं तो फिर हसीनों को

छुप छुप के यारो देखना भी काम ही तो है



उम्मीद क्या…

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Added by राज़ नवादवी on October 6, 2017 at 8:00pm — 19 Comments

हसरतें, फ़ितरतें और तिजारतें (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मेरे देशवासियों, देश बदल रहा है! कुछ ही सालों में हम सब कुछ बदल डालेंगे!"

छोटे-मोटे नेताओं के बाद अब बड़े नेताजी मंच पर सीना तान कर भाषण दे रहे थे। मंचासीन सेवकों के सीने भी तन चुके थे। थकी हुई जनता उन्हें सुन रही थी।

कुछ जुमले छोड़ने के साथ ही नेताजी अपनी हथेली जनता की ओर करते हुए बोले - "भाइयों और बहनों, मेरे मित्रों! आपके द्वारा चुना गया आपका सच्चा सबसे बड़ा सेवक यानी मैं! मैं पुरानी लकीरें नहीं पीटता, नई लकीरें खींचता हूं। ये हथेली, आपकी हथेली, हथेली नहीं, भारत है भारत!! इसमें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2017 at 4:40pm — 7 Comments

ग़ज़ल "जिन्दगी इक अज़ब पहेली है"

2122 1212 22

ख़ुद उलझती है ख़ुद सुलझती है।

जिन्दगी इक अज़ब पहेली है।।



साथ तेरा मुझे मिला जबसे।

जिन्दगी मेरी मुस्कुराती है।।



सब्र करना व भूख से लड़ना।

मुफ़लिसी क्या नहीं सिखाती है।।



मैं बहुत चाहने लगा तुझको।

हर ग़ज़ल मेरी ये बताती है।।



बात कोई चुभे अगर दिल को।

तब ग़ज़ल ख़ुद मुझे बुलाती है।।



दुख घुटन दर्द आह मजबूरी।

ज़िन्दगी की यही कहानी है।।



मुस्कुराती हुई तेरी तस्वीर।

पास मेरे तेरी… Continue

Added by surender insan on October 6, 2017 at 2:32pm — 20 Comments

ग़ज़ल ( कोई देखे हमें महब्बत से )

फाइलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन 



दिल की हसरत यही है मुद्दत से |

कोई देखे हमें महब्बत से |

नामे उल्फ़त से जो नहीं वाक़िफ़

देखता हूँ मैं उसको हसरत से |

सब्र का फल तो खा के देख ज़रा

क्यूँ है मायूस उसकी रहमत से |

जिस ने देखा उन्हें यही बोला

उनको रब ने बनाया फ़ुर्सत से |

उसके हाथों में आइना दे दो

बाज़ आए नहीं जो गीबत से |

देखिए तो करम अज़ीज़ों का

वो हैं बे ज़ार मेरी सूरत से…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 6, 2017 at 12:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल : उसके लब पे रहती है  मुस्कान सदा - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 2

.....

जो बनकर के जीता है  इंसान सदा,

उसके लब पे रहती है  मुस्कान सदा

..

क्या अफसोस कि शाख़ से पत्ते टूटे हैं,

गुलशन में तो आते हैं तूफ़ान सदा

..

हक़ पे चलने वाले हक़ पे चलते हैं,

माना  की बहकाता है शैतान सदा 

..

धीरे - धीरे शेर मेरे भी चमके गें,

पढ़ता हूँ मै ग़ालिब का दीवान सदा

..

रिज़्क मे उसके बरकत हरदम होती है,

जिसके घर में आते हैं मेहमान सदा

..

भेद भाव से दूर "रज़ा" जो रहता है,

महफ़िल… Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 6, 2017 at 12:00pm — 30 Comments

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