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All Blog Posts (19,174)

ग़ज़ल

2122 2122 212

चाँद को जब भी सवाँरा जाएगा ।

टूट कर कोई सितारा जाएगा ।।



है कोई साजिश रकीबों की यहाँ ।

जख़्म दिल का फिर उभारा जाएगा ।।



सिर्फ मतलब के लिए मिलते हैं लोग ।

वह नज़र से अब उतारा जाएगा ।।



कुछ अदाएं हैं तेरी कातिल बहुत ।

यह हुनर शायद निखारा जाएगा ।।



रिंद है मासूम उसको क्या खबर ।

जाम से बे मौत मारा जाएगा ।।



उम्र गुजरी है वफादारी में सब ।

बेवफा कहकर पुकारा जाएगा ।।



टूट जायेंगी वो दिल की… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 20, 2017 at 2:39am — 15 Comments

गजल /// बहरे मीर

 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2  

झिलमिल तारों सा सपनो के अम्बर में रहते हो क्यों ?

मलयानिल की मधु धारा सा मानस में बहते हो क्यों?

 

रेशम सी शर्मीली आँखे गाथा कहती है मन की

निर्ममता के अभिनय क्षण में अंतर्गत चहते हो क्यों?

 

अंतस में भावों की गंगा यदि पावन है पूजा सी

तो संकल्पों की वर्षा हो फिर पीड़ा सहते हो क्यों?

 

वृन्दावन की वीथी में तुमने ही झिटकी थी बाहें

फिर उन बाँहों को मंदिर की शाला में गहते हो…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 19, 2017 at 8:30pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

212 1222 212 1222

वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

मेरी हर तमन्ना को, वो कुचल गया चुपचाप

 

चाक दिल, शिकस्ता पा, बेचराग़ गलियों से

भूल अपने ख्वाबों को, मैं निकल गया चुपचाप

 

एक आइना था…

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Added by शिज्जु "शकूर" on January 19, 2017 at 6:16pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत लिखो कोई ऐसा --(गीत)-- मिथिलेश वामनकर

गीत लिखो कोई ऐसा जो निर्धन का दुख-दर्द हरे।

सत्य नहीं क्या कविता में,  

निर्धनता का व्यापार हुआ?

 

जलते खेत, तड़पते कृषकों को बिन देखे बिम्ब गढ़े।

आत्म-मुग्ध होकर बस निशदिन आप चने के पेड़ चढ़े।

जिन श्रमिकों की व्यथा देखकर क्रंदन के नवगीत लिखे।

हाथ बढ़ा कब बने सहायक, या कब उनके साथ दिखे?

इन बातों से श्रमजीवी का

बोलो कब उद्धार हुआ?

 

अपनी रचना के शब्दों को, पीड़ित की आवाज कहा।

स्वयं प्रचारित कर, अपने को धनिकों से…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2017 at 6:00pm — 26 Comments

कुछ हाइकू

व्यस्त है हवा
रुक जाए चिंगारी
दावानल से

बीमार पिता
बेटों का झगड़ना
इतना खर्च!

महानगर
भूल गये अपने
पुराने दिन

भूख ग़रीबी
क्या जाने, महलों में
पैदा हुआ जो.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on January 19, 2017 at 4:57pm — 8 Comments

वीर अब्दुल हमीद

हम मजा लूटते कितने सुख चैन से

कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?

जो शहादत दिए हैं हमारे लिए

याद उनको करो, ना तो धिक्कार है



अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए

फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ

मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की

खो गया आज है जो न जाने कहाँ



वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है

बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है

ऐसे ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ

वीर अब्दुल हमीद की कथा…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 2:30pm — 4 Comments

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी



होठों पर मुस्कान सजाये

बालों में बादल लहराए

गालों पर थी सुबह लालिमा

माथे पर बिंदिया चमकाए

जब तुमको मैंने देखा था

पास खड़ी तुम मुस्काई थी

हाँ तुम सपने में आई थी…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 1:45pm — 10 Comments

रिश्ते--लघुकथा

"तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो", बालों में अंगुलियां फिराते हुए उसने कहा|

"हूँ", कहते हुए वह खड़ी होने लगी|

"थोड़ी देर और बैठो ना", उसने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया| वह वापस बिस्तर पर बैठ गयी|

"सच में तुमको देखे बिना चैन नहीं मिलता", एक बार फिर उसने उसका हाथ पकड़ा|

वह उसको लगभग अनदेखा करते हुए बैठी रही| थोड़ी देर बाद वह फिर से उठने लगी तो उसने कहा "तुम जवाब क्यों नहीं देती, क्या मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता?

"लगते तो हो, लेकिन तुम्हीं नहीं, बाकी सब भी", उसने एक गहरी नजर डाली और…

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Added by विनय कुमार on January 18, 2017 at 9:51pm — 14 Comments

कोई तो मरा है (लघुकथा)

भोजन कक्ष में बैठ कर परिवार के सभी सदस्यों ने भोजन करना प्रारंभ किया ही था कि बाहर से एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आई। घर की सबसे बुजुर्ग महिला यह आवाज़ सुनते ही चौंकी, उसने सभी सदस्यों की तरफ देखा और फिर चुपचाप भोजन करने लगी।

 

उसने मुश्किल से दो कौर ही खाये होंगे और कुत्ते के रोने की आवाज़ फिर आई, अब वह बुजुर्ग महिला चिंताग्रस्त स्वर में बोली, "यह कुत्ता क्यों रो रहा है?"

 

उसके पुत्र ने उत्तर दिया, "चिंता मत करो, होगी कुछ बात।"

 

"नहीं! यह तो अपशगुन…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on January 18, 2017 at 8:59pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘खुशबू’ (लघु कथा 'राज')

“भैय्या, जल्दी बस रोकना!!” अचानक पीछे से किसी महिला की तेज आवाज आई|

सभी सवारी मुड़ कर  उस स्त्री को घूरती हुई नजरों से देखने लगी शाम होने को थी सभी को घर पँहुचने की जल्दी थी|

महिला के बुर्के  में शाल में लिपटी एक नन्ही सी बच्ची थी जो सो रही थी |ड्राइवर ने धीरे धीरे बस को एक साइड में रोक दिया| पीछे से वो महिला आगे आई और तुरत फुरत में बच्ची को ड्राईवर की गोद में डाल कर सडक के दूसरी और झाड़ियों में विलुप्त हो गई|

 ड्राईवर हतप्रभ रह गया कभी बच्ची को कभी सवारियों को देख…

Continue

Added by rajesh kumari on January 18, 2017 at 7:16pm — 18 Comments

इंतज़ार ...

इंतज़ार ...



छोड़िये साहिब !

ये तो बेवक़्त

बेवज़ह ही

ज़मीं खराब करते हैं

आप अपनी उँगली के पोर

इनसे क्यूं खराब करते हैं

ज़माने के दर्द हैं

ज़माने की सौगातें हैं

क्योँ अपनी रातें

हमारी तन्हाईयों पे

खराब करते हैं

ज़माने की निगाह में

ये

नमकीन पानी के अतिरिक्त

कुछ भी नहीं

रात की कहानी

ये भोर में गुनगुनायेंगे

आंसू हैं,निर्बल हैं

कुछ दूर तक

आरिजों पे फिसलकर

खुद-ब-खुद ही सूख जायेंगे

हमारे दर्द…

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Added by Sushil Sarna on January 18, 2017 at 6:34pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -आग किसने लगायी थी घर की-- ( गिरिराज भंडारी )

2122    1212    22

गर वो करता है बात बेपर की ?

क्या ज़रूरत नहीं है पत्थर की

 

क्या हुकूमत लगा रही है अब ?

कीमत उस फतवे से किसी सर की 

 

सिर्फ तहरीर में मिले भाई

सुन कहानी तू दाउ- गिरधर की

 

जिनके अजदाद आज ज़िन्दा हों  

वो करें बात गुज़रे मंज़र की

 

क्या मुहल्ला तुझे बतायेगा ?

आग भड़की थी कैसे उस घर की

 

दीन ओ ईमाँ की बात करता है

क्या हवा लग न पायी बाहर की

 

रोशनी आज…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 18, 2017 at 8:30am — 15 Comments

मेरे कंधे पे अपना सर रक्खो (ग़ज़ल)

2122 1212 22



पूरे करने का जब हुनर रक्खो

ख़्वाब आँखों में तो ही भर रक्खो



इक नज़र ख़ुद पे डाल लो पहले

बाद में दुनिया पर नज़र रक्खो



बच्चे हैं, बचपना दिखाएँगे

चाहे कितना भी डाँटकर रक्खो



चैन की नींद चाहिए जो तुम्हें

ख्वाहिशें अपनी मुख़्तसर रक्खो



मेरा ईमान ही ख़ुदा है मेरा

अपनी दीनारें अपने घर रक्खो



आओ कुछ दर्द बाँट लूँ तुमसे

मेरे कंधे पे अपना सर रक्खो



तीरगी है जो दिल की बस्ती में

एक जलता दिया… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 18, 2017 at 6:56am — 7 Comments

देशभक्ति पर वीर रस की कविता

बुझी राख मत हमे समझना, अंगारो के गोले हैं |

देश आन पर मिटने वाले, हम बारूदी शोले हैं ||



हम सब ख़ौफ़ नही खाते हैं, विध्वंसक हथियारों से |

सीख लिया है लड़ना हमने, तुझ जैसे मक्कारो से ||



पहला वार नही हम करते, पहले हम समझाते हैं |

फिर भी कोई आँख दिखाये, महाकाल बन जाते हैं ||



शेरो के हम वंशज सारे, सुन इक बात बताते हैं |

एक झपट्टे में ही पूरा, खाल खींच हम लाते हैं ||



आन बान की रक्षा में हम, हँस कर शीश चढ़ाते हैं |

जिस देश धरा पर… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 18, 2017 at 4:21am — 12 Comments

गीत (लावणी व कुकुभ मिश्रित)

आधार छन्द : 16+14 लावणी व कुकुभ मिश्रित,,



कोयल कुहुकी मैना बोली,भौंरे गूँजे भोर हुई ।।

आँख चुराये चन्दा भागा,रैन बिचारी चोर हुई ।।

कोयल कुहुकी,,,,



पूरब में ज्यों लाली निकली,सजा आरती धरा खड़ी,

उत्तुंग हिमालय पर लगता,कंचन की हो रही झड़ी,

बर्फ लजाकर लगी पिघलने,हिमनद रस की पोर हुई ।।(1)

कोयल कुहकी मैना बोली,भौंरे,,,,



सात अश्व के रथ पर चढ़कर,आ गए दिवाकर द्वारे,

स्वागत में मुस्काई कलियाँ,भँवरों नें मन्त्र उचारे,

सूर्यमुखी को देख…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2017 at 12:00am — 4 Comments

कविता-एक कविता लिखना चाहता हूँ

धूल , मिट्टी और गारे से सनी

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

मिट्टी की सौंधी महक वाली

गोबर से लीपे आँगन वाली

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

टूटे खाट पर बैठी

जाड़े में धूप सेंकती

सौ बरस की बुढ़िया पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

कुएँ , चौपाल , चरवाहें

खूँटे से बंधे चौपायों पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

आम , इमली , नीम ,…

Continue

Added by Mohammed Arif on January 17, 2017 at 10:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (नया नग्मा कोई गाओ)

1 2 2 2     1 2 2 2

नया नग्मा कोई गाओ

पुराने ग़म चले आओ

तुम्हें उड़ना सिखा दूँगा

मिरे पिंजड़े में आ जाओ

अकेलापन अगर अखड़े

उदासी को बुला लाओ

अरे भँवरे, अरी चिड़िया

ग़ज़ल कोई सुना जाओ

शजर बोला परिंदे से

मुहाजिर लौट भी आओ

हमारा दिल तुम्हारा घर

कभी आओ, कभी जाओ

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

Added by दीपक कुमार on January 17, 2017 at 1:37pm — 9 Comments

वो सवाल...

क्या जवाब दूँ तुम्हे मैं...ये जो सवाल है तुम्हारा...

हर रोज्र हारता हूँ...यहीं तो हाल है हमारा...

 

ये ख्वाब हीं बुरे हैं...

या फिर बुरा सा मैं हूँ...

सौ बार सोचता हुँ...

कुछ तो भला सा कह दूँ..

 

हर वक़्त एक सपना...

हाफीज्र सदा है मेरे...

कुछ पास है हमारे...

कुछ पास में है तेरे...

 

मै वक़्त का मुसाफिर...

अब वक़्त ढुँढता…

Continue

Added by Aditya lok on January 16, 2017 at 10:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का

2122       2122       212

रोज करता खेल शह औ मात का।

रहनुमा पक्का नहीं अब बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।

कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।

मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।

क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।

अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।

क्या भरोसा…

Continue

Added by डॉ पवन मिश्र on January 16, 2017 at 9:34pm — 17 Comments

गीत-गुलसितां दिल का खिलाते रह गए//(अलका ललित )

2122 2122 212

.

गुलसितां दिल का खिलाते रह गए

फासले दिल के मिटाते रह गए

गुलसितां दिल का........

.

चाहतें अपनी बड़ी नादान थी

इश्क की राहें कहा आसान थी

फिर भी हम कसमें निभाते रह गए

फासले दिल के मिटाते ......

.

हाथ में तेरे मेरा जब हाथ हो

जिंदगी कट जाएगी गर साथ हो

हम भरोसा ही जताते रह गए

फासले दिल के मिटाते ...

.

चाह थी तो छोड़ कर ही क्यूँ गया

वास्ता देकर वफ़ा का क्यूँ भला

बेवजह दामन हि थामे रह…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on January 16, 2017 at 9:00pm — 12 Comments

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