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ग़ज़ल ( मुहब्बत करना मुश्किल हो गया है )

(मफाईलुन---मफाईलुन ----फऊलन )

ज़माना दुश्मने दिल हो गया है |

मुहब्बत करना मुश्किल हो गया है |

सफ़ीना बच गया तूफां से लेकिन

बहुत ही दूर साहिल हो गया है |

यह क्या कम है जुदा थी राह जिसकी

वो साथी क़ब्ले मंज़िल हो गया है |

खिलाफे ज़ुल्म कोई लब न खोले

जिसे देखो वो बुज़दिल हो गया है |

निगाहें बोलती हैं यह किसी की

ये दिल अब उनके क़ाबिल हो गया है |

किसी की खूब रूई का है जादू …

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 19, 2016 at 8:30pm — 10 Comments

उसके दरबार में ……………

उसके दरबार में ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निश्चित है कि

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर उधर देखकर

प्रभु के परम भक्त होने पर इतराते…

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Added by Sushil Sarna on December 19, 2016 at 6:31pm — 12 Comments

मेरी दादी [गीत ] प्रतिभा पांडे

ऊन सलाई संग दादी का

बहुत पुराना था याराना

चपल उँगलियों का दादी की  

जाड़े ने भी लोहा माना

 

छत पर जब दादी को पाती

धूप गुनगुनी  मिलने आती

ख़ास सहेली बन दादी की  

वो भी फंदों से बतियाती

 

सीधे पर दो उल्टे फंदे

बुनता जाता ताना बाना

 

कल जो था बाबा का स्वेटर

अब छोटू का टोपा मफलर

नई पुरानी ऊनों के संग

चपल उँगलियाँ चलतीं सर सर

 

इस रिश्ते से उस रिश्ते तक

गर्माहट का आना…

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Added by pratibha pande on December 18, 2016 at 1:00pm — 8 Comments

आदमी (अतुकान्त कविता)

गौर से देखो...
यह खाता है
पीता है
चलता है
फिरता है
उठता है
गिरता है
हँसता है
रोता है
देखता है
सुनता है
बोलता है
सोचता है
इसके पास
हाथ है
पैर है
दिल है
जिगर है
गुर्दा है
आँख है
नाक है
कान है
जीभ है
त्वचा है
और साथ ही
वह सब है
जो होना चाहिए
मगर फिर भी
यह आदमी नहीं है
क्योंकि
आदमी वह है
जो दो मुँहा हो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 18, 2016 at 8:31am — 8 Comments

माँ की ममता

माँ की ममता कोई कल्पना नहीं,

ये सृष्टि संरचना की एक दास्तां 

जो जन्म लेती अनंत गहराई में  

पुष्पित,पल्लवित होती धरातल पर

एक कल्पतरु का सुंदर रूप लेकर

सदियों से चल रहा यह शिलशिला

ये हृदय से निकली प्यार ज्योति 

सूर्य की रोशनी में हर दिन बढ़ती

बांधती सभी को एक प्रेम डोर में

अपने खुशियों की देती तिलांजली

नन्ही सी चिड़िया लड़ती साँप से  

अपने प्राणों को संकट में डालकर

उसे बचाती मुसीबतों को झेलकर

उसके…

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Added by Ram Ashery on December 17, 2016 at 8:30pm — 5 Comments

गज़ल --है गलतियाँ रहस्य, बहानों ने ले लिया

काफिया :ओं ; रदीफ़: ने ले लिया

बह्र:  २२१ २१२१ १२२१ २१२

बन्दे का काम घेर, उसूलों ने ले लिया

है गलतियाँ रहस्य, बहानों ने ले लिया |१

वो बात जो थी कैद तेरे दिल के जेल में

आज़ाद करना काम अदाओं ने ले लिया |२

चुपके से निकले घर से, सनम ने बताया था

वो जिंदगी का राज़ निशानों ने ले लिया |३

धरती को चाँदनी ने बनायीं मनोरमा

विश्वास नेकनाम सितारों ने ले लिया |४

मिलता है सुब्ह शाम समय रिक्त अब…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on December 17, 2016 at 8:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल...ओ चन्दा

22 22 22 22 22 2
दिल की बात उन्हें समझाना ओ चन्दा
गुजरी कैसे रात बताना ओ चन्दा

छाँव तले तेरी निकलेंगे जब भी वो
मखमल से ज़ज़्बात बिछाना ओ चन्दा

आह भरे ख़ामोशी तन्हा रातों में
सोये हैं अरमान जगाना ओ चन्दा

आयेगा वो मीत जरा शर्मीला है
बदरी बीच तनिक छुप जाना ओ चन्दा

थम जाऊँ मैं हर आहट पे ,चौंक उठूँ
'ब्रज' के सब हालात सुनाना ओ चन्दा

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 17, 2016 at 5:09pm — 8 Comments

ज़ंग .....

ज़ंग .....

गलत है

मिथ्या है

झूठ है

कि 

उदासी

अकेलेपन की दासी है

अकेलेपन के किनारों पर

नमी का अहसास होता है

क्या अकेलापन

अंतस का

दर्द से

परिचय कराने का पर्याय है ?

जब कुछ नहीं होता

तो अकेलापन होता है

अकेलेपन में

स्व से परिचय होता है

अपने वज़ूद से

पहचान होती है

ज़िदंगी करीब आती है

अपना पराया समझाती है

अकेलेपन में

पीछे छूटे लम्हात

साथ निभाते हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 17, 2016 at 4:45pm — 6 Comments

तुम मुझको कितना भाती हो

कैसे मै बतलाऊँ तुमको,

तुम मुझको कितना भाती हो|



जैसे ये मनमोहक सावन,

जैसे पवन बसन्ती पावन,

जैसे उर मे बस जाती है

हरी-भरी यह धरा लुभावन,



तुम इस भाँति लुभा जाती हो,



कैसे मै बतलाऊँ तुमको

तुम मुझको कितना भाती हो|



जैसे वात मलयजी डोले,

जैसे पेंग भरे हिंडोले,.

जैसे ताँक-झाँक करने को ,.

चंदा घन-वातायन खोले..



मेरे हृदय समा जाती हो ,



कैसे मै बतलाऊँ तुमको

तुम मुझको कितना भाती हो|



ज्यों… Continue

Added by आशीष यादव on December 17, 2016 at 6:56am — 6 Comments

आकाश ( कविता)

यह आकाश सबको बुलाता

दूर से ही सबको लुभाता

अपने में बहुत कुछ समेटे

आकर्षित खुद ही बन जाता ।

यह आकाश सबको बुलाता ।

बादलों में कभी छुप जाता

रंग बदलता ,मेघ बरसाता

चाँद सितारों के संग रहता

धरा को अपनी छाँव देता

कभी इठलाता कभी बिखरता

यह आकाश सबको बुलाता

इंद्रधनुष की चादर ओढ़े

जब कभी भी है यह आता

कहीं कोई तराना है गाता

करता है अठखेलियां बहुत

कभी आग यह बरसाता ।

ख्वाबों को सजाता

आकाश अपना हो जाता ।



मौलिक एवं… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 16, 2016 at 9:13pm — 4 Comments

ग़ज़ल: जुबाँ से वक्त भी मुकरा हुआ है

1222 1222 122

बहुत खामोश सा चेहरा हुआ है ।

वो अपने दर्द में उलझा हुआ है ।।



दिखा है आँख में हिलता समंदर ।

किसी के इश्क़ पर पहरा हुआ है ।।



जो सुनता है तुम्हारी धड़कनो को ।

कहा किसने ख़ुदा बहरा हुआ है ।।



मिली जब से नज़र बेहोश है वो ।

यकीनन जख़्म कुछ गहरा हुआ है ।।



तुम्हारे जश्न की चर्चा हुई क्यों।

सुना कुछ रात का सौदा हुआ है ।।



बड़ा अदना समझ रक्खा है मुझको।

तमाशा क्यूँ मेरे घर का हुआ है ।।



हुआ बदनाम तेरी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2016 at 2:00pm — 5 Comments

इंतज़ार ....

इंतज़ार ....

भोर की पहली किरण
सर्द हवा
आधी जागी
आधी सोयी
तू गर्म शाल में लिपटी
बालकनी के कोने में
हाथों में
कॉफी का कप लिए
यक़ीनन
मेरे आने का
इंतज़ार करती होगी
कितना
रुमानियत भरा होगा
वो मंज़र
तेरी आँखों में
मेरे आने के
इंतज़ार का

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 16, 2016 at 1:01pm — 8 Comments

ग़ज़ल- जुबाँ से वक्त तक मुकरा हुआ है

1222 1222 122

बहुत खामोश सा चेहरा हुआ है ।

वो अपने दर्द में उलझा हुआ है ।।



दिखा है आँख में हिलता समंदर ।

किसी के इश्क़ पर पहरा हुआ है ।।



जो गिनता है तुम्हारी धड़कनो को ।

कहा किसने ख़ुदा बहरा हुआ है ।।



मिली जब से नज़र बेहोश है वो ।

यकीनन जख़्म कुछ गहरा हुआ है ।।



तुम्हारे जश्न की चर्चा शहर में ।

सुना कुछ रात का सौदा हुआ है ।।



बड़ा अदना समझ रक्खा है मुझको।

तमाशा क्यूँ मेरे घर का हुआ है ।।



हुआ बदनाम तेरी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2016 at 12:39pm — 6 Comments

मंजिल की चाह ने हमें रस्ते पे ला दिया (ग़ज़ल)

221 2121 1221 212



किसने मेरी उदासी पे ये क़ह्र ढा दिया

इक पल को मेरे लब पे तबस्सुम सजा दिया



तन्हाइयां, उदासियां, हैरत में पड़ गयीं

मुश्किल घड़ी जब आई तो मैं मुस्कुरा दिया



यूं सोचने पे रस्ते भी दुश्वार लगते थे

चलने लगे, पहाड़ों भी ने रास्ता दिया



हद से ज़ियादा बढ़ने लगा चाँद का ग़रूर

क़ुदरत को ग़ुस्सा आया तो धब्बा लगा दिया



मुद्दत हुई अंधेरों से टकरा रहा है वो

किसका है जाने मुन्तज़िर इक काँपता दिया



घर से निकल के आज ये… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 16, 2016 at 6:47am — 8 Comments

नये साल का नया सूरज

नये साल का नया सूरज   
बहुत चाह है कि …
Continue

Added by amita tiwari on December 15, 2016 at 11:17pm — 2 Comments

बड़ी अच्छी लगती है...

बड़ी अच्छी लगती है ...

हिज़्र में

तन्हाई

बड़ी अच्छी लगती है

यादों की

परछाई

बड़ी अच्छी लगती है

कभी कभी

रुसवाई भी

बड़ी अच्छी लगती है

आँखों की

गहराई

बड़ी अच्छी लगती है

साँसों की

गरमाई

बड़ी अच्छी लगती है

हुस्न की

अंगड़ाई

बड़ी अच्छी लगती है

दिल में

दिल की

समाई

बड़ी अच्छी लगती है

मगर

हक़ीक़ी ज़िन्दगी…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 15, 2016 at 9:19pm — 6 Comments

गजल(कोई पहले आज बताये..)

नोट नया भी अब हकलाये
कब तक चलना कौन सुझाये?1

सीमाएँ जब हैं निर्धारित
बोलो कौन धता बतलाये?2

ढूँढ रही हैं रोज कतारें,
तहखाने में क्यूँ रिरियाये?3

छोटे-छोटे नोट चहकते
बंद गुलाबी क्यूँ मुरझाये?4

छापा पड़ता लाला के घर
कलुआ बैठ बड़ा मुसुकाये।5

नोट पुराना जलता-बुझता
ढ़ेर घरों में आग लगाये।6

गदहे खाते खेत फिरें सब
मार जुलाहे के सर आये।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 15, 2016 at 8:00pm — 5 Comments

आईना (कविता)

कहतें हैं सच बोलता है आईना
अपने आपकी पहचान करवाता है

देखते हैं जो बार बार इसमें
क्या रंग बदलता है आईना !

सज संवर कर देखें गर इसमें
खूबसूरत मूर्त दिखाता है आईना

गर पहचानने के लिए देखें इसमें
अहँकारी कर पुकारता है आईना ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 15, 2016 at 5:16pm — 3 Comments

तरही गजल/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:22 22 22 22

चाहत यार बढाने निकले

दिलको आज कमाने निकले।



जिनको समझ रहे थे अपना

आज वही बेगाने निकले।



घर छोड़ा अपनों को छोड़ा

बन कर बस अनजाने निकले।



तनहा राहें अपनी साथी

हमसे दूर जमाने निकले।



लब पर ले मुस्कान बताओ

कैसा दर्द छुपाने निकले।





जिनको समझा सबने पागल

देखो यार सयाने निकले।



अपना आपा ठीक नहीं है

गैरों को समझाने निकले।



दर्द नया यूँ ही लगता है

लेकिन जख्म पुराने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 15, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

लम्हों की गर्द में लिपटा
इक साया
ओस में ग़ुम होती
भीगी पगडंडी के
अनजाने मोड़ पर
खामोशियों के लबादे ओढ़े
किसी बिछुड़े साये के
इंतज़ार में
इक बुत बन गया


धुल न जाएँ
सर्दी की बारिश में
कहीं लंबी रातों के
पलकों के लिहाफ़ में
अधूरे से ख़्वाब
वो धीरे धीरे
कोहरे की लहद में
खो गया
इक लफ्ज़
मुहब्बत का
खामोश ही सो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on December 14, 2016 at 9:03pm — 8 Comments

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