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ग़ज़ल : दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

बह्र : 2122 1122 1122 22

 

दिल के जख्मों को चलो ऐसे सम्हाला जाए

इसकी आहों से कोई शे’र निकाला जाए

 

अब तो ये बात भी संसद ही बताएगी हमें

कौन मस्जिद को चले कौन शिवाला जाए

 

आजकल हाल बुजुर्गों का हुआ है ऐसा

दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

 

दिल दिवाना है दिवाने की हर इक बात का फिर

क्यूँ जरूरी है कोई अर्थ निकाला जाए

 

दाल पॉलिश की मिली है तो पकाने के लिए

यही लाजिम है इसे और उबाला…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 21, 2016 at 9:17pm — 2 Comments

लड़ाई (कविता)

एक दिन कुछ अलग हुआ

समुन्दर और आकाश के बीच

आकाश को देख समुन्दर चिल्लाया

मेरी जगह तुम आ जाओ

यह बात सुनकर आकाश मुस्काया

बोला ठीक है करलो ये प्रयास

सारी मछलियां गभरायीं

अब पंख कहाँ से लायें

चिड़िया उनको देख मुस्काईं

जैसे हम जल में तैरेंगे

तुम सब हवा में उड़ जाना

यह सब देख धरा मुस्काई

दोनों की कैसे खत्म करूँ लड़ाई

पूछा उसने समुन्दर से

दादा बोलो मैं कहाँ जाऊँ

वन , जंगल कहाँ ले जाऊँ?

आकाश से भी पूछा उसने

दिन और रात का… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 21, 2016 at 7:33pm — 7 Comments

गजल(काफियों की...)

2122 2122 2122 2

काफियों का बढ़ गया बाजार देखा है

इश्क को होते हुए लाचार देखा है।1



डूबती कश्ती नहीं मँझधार है तो क्या?

हर बखत सहमी नजर में प्यार देखा है।2



लड़ रहा कोई धनुर्धर रोशनी खातिर

व्यूह का निर्माण तो बेकार देखा है।3



सच पराजित हो रहा हर मोड़ पर दिखता

झूठ की गर्दन सजाया हार देखा है।4



माँगते दाता यहाँ पर भीख में हक भी

रहजनों को तो बने सरकार देखा है।5



दे सकेंगे क्या फ़रिश्ते देश को कुछ भी

लूट का हर शख्स है… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 21, 2016 at 7:30pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बदले-बदले लोग - मिथिलेश वामनकर

बदले-बदले लोग

============

 

बहुत दिन हो गए,

हमने नहीं की फिल्म की बातें।

न गपशप की मसालेदार,

कुछ हीरो-हिरोइन की।

न चर्चा,

किस सिनेमा में लगी है कौन सी पिक्चर?

 

पड़ोसी ने नया क्या-क्या खरीदा?

ये खबर भी चुप।

सुनाई अब न देती साड़ियों के शेड की चर्चा।

कहाँ है सेल, कितनी छूट?

ये बातें नहीं होती।

 

क्रिकेटी भूत वाले यार ना स्कोर पूछे हैं।

न कोई जश्न जीते का,

न कोई…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on December 21, 2016 at 3:00pm — 18 Comments

कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

2122/1212/22

चाँद जब भी निकल रहा होगा।
कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

ज़िन्दगी भर न वो रहेगा यूँ,
उस का दिल भी पिघल रहा होगा।

मर्ज़-ए-दिल हम को ही नहीं केवल,
उसका भी दम निकल रहा होगा।

चोट खाने के बाद हम सा ही,
आज वो भी सँभल रहा होगा।

हम को इतना यक़ीं तो है 'रोहित',
हिज़्र में वो भी जल रहा होगा।

रोहिताश्व मिश्रा
फ़र्रुखाबाद
(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Added by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 11:21am — 14 Comments

सैंटा क्लॉज़ (अतुकान्त कविता)

टाँग देना दरवाज़े पर अपने मोज़े

रख देना खिड़कियों पे चमका कर जूते

और फिर

सो जाना जल्दी

अच्छे बच्चों की तरह

क्योंकि

आने वाला है सैंटा क्लॉज़

ले कर अपने झोले में

ढेर सारे गिफ्ट्स

जैसे...

रोटिनुमा केक

शिक्षारूपी कैण्डी

टॉफ़ी का घर

चिकित्सा की चॉकलेट

रोज़गार का बिस्कुट

सुरक्षा, सम्मान व न्याय के

रंग-बिरंगे खिलौने

ख़ुशियों की टोपी

और अच्छे दिनों का

झुनझुना

तुम्हारे मोज़ों और जूतों में

भरने के… Continue

Added by Mahendra Kumar on December 21, 2016 at 10:30am — 10 Comments

हक़ीक़त - लघुकथा

"हे परवरदिगार! ये तूने मुझे आज कैसे इम्तिहां में डाल दिया ?" उसने पीछे लेटे लगभग बेहोश, युवक को एक नजर देखते हुए हाथ इबादत के लिए उठा दिए।

...... रात का दूसरा पहर ही हुआ था जब वह सोने की कोशिश में था कि 'कोठरी' के बाहर किसी के गिरने की आवाज सुनकर उसने बाहर देखा, घुप्प अँधेरे में दीवार के सहारे बेसुध पड़ा था वह अजनबी। देखने में उसकी हालत निस्संदेह ऐसी थी कि यदि उसे कुछ क्षणों में कोई सहायता नहीं मिलती तो उसका बचना मुश्किल था। युवक की हालत देख वह उसके कपडे ढीले कर उसे कुछ आराम की स्थिति…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on December 20, 2016 at 10:30pm — 23 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
पतझड़

दिल के रिश्तों की बगिया में जब भी पतझड़ आता है.

ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...



दिल को तो पतझड़ में भी

जाने क्यों सावन याद रहे,

दिल कोई तिनका है क्या

जो हालातों के साथ बहे?

सावन इसने अपनाया,ये पतझड़ भी अपनाता है...

ठूँठ बनी उम्मीदों में विश्वास छुपा मुस्काता है...



बागबान बन कर जिसने

रिश्तों की हर डाली सींचीं,

वो पागल क्या समझेगा

क्यों सावन ने बाँहें खींचीं?

इंतज़ार में सावन के वो फिर-फिर पलक बिछाता… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on December 20, 2016 at 8:30pm — 4 Comments

गरीब सैंटा की अमीरी ( लघु कथा ) जानकी बिष्ट वाही- नॉएडा

" आज कड़ाके की ठण्ड है।" कहते हुए उसने दोनों हाथों को आपस में रगड़ कर अपने अंदर गर्मी का अहसास जगाया। बदन पर पहनी एकमात्र कमीज और पतली सी सांता क्लॉज की ड्रेस उसको गर्म रखने में नाक़ाम लग रही थी।

" ममा ! देखो सैंटा " एक छह या सात साल का बच्चा उसकी ओर उत्सुकता से देखने लगा।

" सारी सुस्ती छोड़कर उसने मुस्कुराते मुखौटे के अंदर ठण्डी साँस भरी और मुठ्ठी टॉफियों के साथ गर्मजोशी से बच्चे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

"थैंक्यू सैंटा !" बच्चे ने लपक कर टॉफियां पकड़ ली।साथ ही उसके पापा ने…

Continue

Added by Janki wahie on December 20, 2016 at 1:30pm — 14 Comments

दोस्ती भी सँभल के करता हूँ

बह्र 2122 1212 22



मै अनायास आह भरता हूँ

जब गली से तेरी गुजरता हूँ।



डोर नाजुक बहुत है रिश्तों की

दोस्ती भी सँभल के करता हूँ।



साथ माँ की दुआयें है जिनसे

दिन ब दिन ज़ीस्त में निखरता हूँ।।



कोई मजहब नहीं मेरा यारों

मै तो इंसानियत पे मरता हूँ।।



हौसलों में उड़ान है मेरे

आँधियों के भी पर कतरता हूँ।



मैं भी नेता बनूँ मगर कैसे

मैं कहाँ बात से मुकरता हूँ।।



तेरी यादों के तेज झोंको से

रोज़ मैं टूट… Continue

Added by नाथ सोनांचली on December 20, 2016 at 12:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल वो सुर्खरूं चेहरे पे कुछ आवारगी पढ़ने लगी

2212 2212 2212 2212



शर्मो हया के साथ कुछ दीवानगी पढ़ने लगी।

वो सुर्खरूं चेहरे पे कुछ आवारगी पढ़ने लगी ।।



हर हर्फ़ का मतलब निकाला जा रहा खत में यहां ।

खत के लिफाफा पर वो दिल की बानगी पढ़ने लगी ।।



वह बेसबब रातों में आना और वो पायल की धुन ।

शायद गुजरती रात की वह तीरगी पढ़ने लगी ।।



गोया के वो महफ़िल में आई बाद मुद्दत के मगर ।

ये क्या हुआ उसको जो मेरी सादगी पढ़ने लगी ।।



कुछ हसरतों को दफ़्न कर देने पे ये तोहफा मिला ।

वो फिर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 20, 2016 at 6:00am — 8 Comments

सरसी छन्द,,,

सरसी छन्द :

शिल्प :16,11 मात्राएँ चरणान्त गुरु+लघु

****************************

प्रसंग : "धनुष यज्ञ" रामचरित मानस

****************************



सुनें जनक के वचन लखन नें,उमड़ पड़ा आक्रोश ।।

दहल उठी थीं दसों दिशायें,देख लखन का जोश ।।

लगता ज्वालामुखी खड़ा हो,भरे हृदय में रोष ।।

या फ़िर जैसॆ प्रलय सामने,खड़ा हुआ ख़ामोश ।।



काँप उठी थी सभा समूची,नत भूपॊं की दृष्टि ।।

लगता सम्मुख खड़ा शेष अब,खा जाएगा सृष्टि ।।

भृकुटि तनीं भुजदण्ड फड़कते,रक्त…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on December 19, 2016 at 10:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल ( मुहब्बत करना मुश्किल हो गया है )

(मफाईलुन---मफाईलुन ----फऊलन )

ज़माना दुश्मने दिल हो गया है |

मुहब्बत करना मुश्किल हो गया है |

सफ़ीना बच गया तूफां से लेकिन

बहुत ही दूर साहिल हो गया है |

यह क्या कम है जुदा थी राह जिसकी

वो साथी क़ब्ले मंज़िल हो गया है |

खिलाफे ज़ुल्म कोई लब न खोले

जिसे देखो वो बुज़दिल हो गया है |

निगाहें बोलती हैं यह किसी की

ये दिल अब उनके क़ाबिल हो गया है |

किसी की खूब रूई का है जादू …

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 19, 2016 at 8:30pm — 10 Comments

उसके दरबार में ……………

उसके दरबार में ……………

पूजा कहीं दिल से की जाती है

तो कहीं भय से की जाती है

कभी मन्नत के लिए की जाती है

तो कभी जन्नत के लिए की जाती है

कारण चाहे कुछ भी हो

ये निश्चित है कि

पूजा तो बस स्वयं के लिए की जाती है

कुछ पुष्प और अगरबती के बदले

हम प्रभु से जहां के सुख मांगते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

उसकी चौखट पे अपना सर झुकाते हैं

अपनी इच्छाओं पर

अपना अधिकार जताते हैं

इधर उधर देखकर

प्रभु के परम भक्त होने पर इतराते…

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Added by Sushil Sarna on December 19, 2016 at 6:31pm — 12 Comments

मेरी दादी [गीत ] प्रतिभा पांडे

ऊन सलाई संग दादी का

बहुत पुराना था याराना

चपल उँगलियों का दादी की  

जाड़े ने भी लोहा माना

 

छत पर जब दादी को पाती

धूप गुनगुनी  मिलने आती

ख़ास सहेली बन दादी की  

वो भी फंदों से बतियाती

 

सीधे पर दो उल्टे फंदे

बुनता जाता ताना बाना

 

कल जो था बाबा का स्वेटर

अब छोटू का टोपा मफलर

नई पुरानी ऊनों के संग

चपल उँगलियाँ चलतीं सर सर

 

इस रिश्ते से उस रिश्ते तक

गर्माहट का आना…

Continue

Added by pratibha pande on December 18, 2016 at 1:00pm — 8 Comments

आदमी (अतुकान्त कविता)

गौर से देखो...
यह खाता है
पीता है
चलता है
फिरता है
उठता है
गिरता है
हँसता है
रोता है
देखता है
सुनता है
बोलता है
सोचता है
इसके पास
हाथ है
पैर है
दिल है
जिगर है
गुर्दा है
आँख है
नाक है
कान है
जीभ है
त्वचा है
और साथ ही
वह सब है
जो होना चाहिए
मगर फिर भी
यह आदमी नहीं है
क्योंकि
आदमी वह है
जो दो मुँहा हो!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Mahendra Kumar on December 18, 2016 at 8:31am — 8 Comments

माँ की ममता

माँ की ममता कोई कल्पना नहीं,

ये सृष्टि संरचना की एक दास्तां 

जो जन्म लेती अनंत गहराई में  

पुष्पित,पल्लवित होती धरातल पर

एक कल्पतरु का सुंदर रूप लेकर

सदियों से चल रहा यह शिलशिला

ये हृदय से निकली प्यार ज्योति 

सूर्य की रोशनी में हर दिन बढ़ती

बांधती सभी को एक प्रेम डोर में

अपने खुशियों की देती तिलांजली

नन्ही सी चिड़िया लड़ती साँप से  

अपने प्राणों को संकट में डालकर

उसे बचाती मुसीबतों को झेलकर

उसके…

Continue

Added by Ram Ashery on December 17, 2016 at 8:30pm — 5 Comments

गज़ल --है गलतियाँ रहस्य, बहानों ने ले लिया

काफिया :ओं ; रदीफ़: ने ले लिया

बह्र:  २२१ २१२१ १२२१ २१२

बन्दे का काम घेर, उसूलों ने ले लिया

है गलतियाँ रहस्य, बहानों ने ले लिया |१

वो बात जो थी कैद तेरे दिल के जेल में

आज़ाद करना काम अदाओं ने ले लिया |२

चुपके से निकले घर से, सनम ने बताया था

वो जिंदगी का राज़ निशानों ने ले लिया |३

धरती को चाँदनी ने बनायीं मनोरमा

विश्वास नेकनाम सितारों ने ले लिया |४

मिलता है सुब्ह शाम समय रिक्त अब…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on December 17, 2016 at 8:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल...ओ चन्दा

22 22 22 22 22 2
दिल की बात उन्हें समझाना ओ चन्दा
गुजरी कैसे रात बताना ओ चन्दा

छाँव तले तेरी निकलेंगे जब भी वो
मखमल से ज़ज़्बात बिछाना ओ चन्दा

आह भरे ख़ामोशी तन्हा रातों में
सोये हैं अरमान जगाना ओ चन्दा

आयेगा वो मीत जरा शर्मीला है
बदरी बीच तनिक छुप जाना ओ चन्दा

थम जाऊँ मैं हर आहट पे ,चौंक उठूँ
'ब्रज' के सब हालात सुनाना ओ चन्दा

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 17, 2016 at 5:09pm — 8 Comments

ज़ंग .....

ज़ंग .....

गलत है

मिथ्या है

झूठ है

कि 

उदासी

अकेलेपन की दासी है

अकेलेपन के किनारों पर

नमी का अहसास होता है

क्या अकेलापन

अंतस का

दर्द से

परिचय कराने का पर्याय है ?

जब कुछ नहीं होता

तो अकेलापन होता है

अकेलेपन में

स्व से परिचय होता है

अपने वज़ूद से

पहचान होती है

ज़िदंगी करीब आती है

अपना पराया समझाती है

अकेलेपन में

पीछे छूटे लम्हात

साथ निभाते हैं…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 17, 2016 at 4:45pm — 6 Comments

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