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गजल(आ चलो)

गजल

2122 2122

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मैं चलो सपने सजा दूँ

आ सुनो अब गीत गा दूँ।

जो पड़ीं सोयी जहन में

ख्वाहिशें फिर से जगा दूँ।

जो बुझी है आरजू अब

आ उसे जलना सिखा दूँ।

है पड़ी सूनी डगर अब

राग मीठा गुनगुना दूँ ।

चल अली सूनी गली का

साँस से रिश्ता लगा दूँ ।

रश्मियों से आरती कर

आ अभी पलकें बिछा दूँ।

छू गया कबका पवन मुख

बन हवा तुझको रिझा दूँ।

छा रहीं मुख पे घटायें

आ अभी फिरसे सजा दूँ।

ताप तेराअब शमन… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 5, 2015 at 9:07am — 10 Comments

डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’(गजल)

122    122    122    122

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डरे जो तिमिर से भला क्या मिलेगा

लड़ो  जुगनुओं  का  सहारा  मिलेगा /1



हमेशा   नहीं   यूँ   अँधेरा मिलेगा

भले  ही रहे कम  उजाला मिलेगा /2



कहावत है तम की जहाँ बस्तियाँ हों

वहीं   दीपकों   का   बसेरा   मिलेगा /3



चलो  ढूँढते  हैं   उसे   रात  भर अब

कहीं तो तिमिर का किनारा मिलेगा /4



भटक जाओ गर तुम गगन को निहारो

बताता  दिशा   इक  वो  तारा  मिलेगा /5



फकत जागने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2015 at 6:00am — 14 Comments

जवान को नमन

राजस्थानी रेत हो या,बर्फ हो हिमालय की
खड़ा देखो वक्षतान, भारती का लाल है

देश प्रेम की है ज्वाला , हिय में धधक रही
भारती की रक्षा हेतु,बना हुआ ढाल है

उसकी शक्ति कोई, भांप नहीं पाये यहाँ
दुश्मन की जिंदगी को, बना हुआ काल है

शीश काटा जाय चाहे, गोदा जाये अंग-अंग
शान से सीमा पे खड़ा,भारती का लाल है
~~~मेरीकलमसे~~~

मौलिक व अप्रकाशित

Added by आर्यपुत्र सनी जाट स्वदेशी on December 4, 2015 at 9:50pm — No Comments

हाल न हमसे पूछो (ग़ज़ल)

2122   1122   1122   22

किसको कितना है मिला माल,न हमसे पूछो।

हाँ!  करप्शन  का  ये  जंजाल न  हमसे पूछो।

तेरे  कारण  हुई  है, ये  जो  मेरी  हालत  है,

अब  तुम्हीं  आके  मेरा  हाल  न  हमसे  पूछो।

ज़ेह्न-ओ-दिल से तेरी यादों को मिटा डाला,अब

बीते  दिन, गुज़रे  हुए  साल  न  हमसे  पूछो।

कौन आख़िर ले गया गाँव की पंचायत को,

कहाँ  ग़ायब  हुए  चौपाल, न  हमसे  पूछो।

जनवरी और दिसंबर के महीने में…

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Added by जयनित कुमार मेहता on December 4, 2015 at 8:30pm — 17 Comments

"अब लौट चले"

सुरेखा कब से देख रही थी आज माँ-बाबूजी पता नहीं इतना क्या सामान समेट रहे है। बीच मे ही बाबूजी बैंक भी हो आए.एक दो बार उनके कमरे मे झांक भी आयी चाय देने के बहाने मगर पूछ ना पाई।

"माँ-बाबूजी नही दिख रहे ,कहाँ है.?"सुदेश ने पूछा

"अपने कमरे मे आज दिन भर से ना जाने क्या कर रहे है। मैं तो संकोच के मारे पूछ भी नही पा रही.तभी---…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 4, 2015 at 7:00pm — 13 Comments

ड्रीम गर्ल(लघुकथा )राहिला

उस छोटे से कस्बे में अचानक बेहद सुन्दर युवती का आगमन जहाँ एक ओर नुक्कड़ पर खड़े ठलुओं के बीच हलचल का विषय बन गया वहीं उनके लीडर और सबसे सुदर्शन भंवरे रोहन के लिये चुनौती।अब होड़ इस बात की थी कि उस सुन्दरी से सबसे पहले बात करने का सौभाग्य किसे मिलता है । बहुत जतन के बाद सबके अरमान तब ठंडे हो जाते जब वो उन सब को नजरअंदाज कर गुजर जाती । गुजरते वक्त के साथ उसकी बेनियाजी भले ही किसी को इतनी ना अखरी हो लेकिन रोहन के लिये अ़ना का सवाल बन गई थी। ऐसे में एक दिन उसने मित्र मंडली के बीच धमाका किया, कि आज… Continue

Added by Rahila on December 4, 2015 at 5:35pm — 26 Comments

गॉड फ़ादर (लघुकथा )

खूबसूरत राखी एक बेहतरीन नृत्यांगना और अभिनेत्री थी!फ़िल्म उद्योग में तीन साल से हाथ पैर मार रही थी!काम तो मिल रहा था मगर उसकी प्रतिभा के मुताविक…

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Added by TEJ VEER SINGH on December 4, 2015 at 5:30pm — 15 Comments

जुगुप्सा

खुशियाँ उनकी ,

आतिशवाजी की तरह छूती हैं , आसमान।

फुदकती हैं, फब्बारों सी, और 

उनके अट्टहास में, अनजान, भी होते…

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Added by Dr T R Sukul on December 4, 2015 at 4:30pm — 10 Comments

मुरीदों के जादुई चिराग़ - (लघुकथा) /कहानी /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (40)

गहरी नींद में सोये हुये इक्कीसवीं सदी के मानव को सपने में पता नहीं कहाँ से अलाउद्दीन का चिराग़ मिल गया। एकांत में घिस-घिस कर परेशान हो गया, चिराग़ काम नहीं कर रहा था, मानव निराश हो रहा था। ग़ुस्से में जैसे ही उसने ज़मीन पर पटका , अट्टाहास करता हुआ जिन्न प्रकट होकर बोला-

"क्या हुक़्म है आका ! "

पहले तो मानव औंधे मुंह गिरा, फिर संभलकर खड़े होकर उसने विशालकाय जिन्न से पूछा-

"क्क्क्कौन हो तुम, क्या नाम है तुम्हारा ?"

"सतरंगी विकास ! सतरंगी विकास है नाम मेरा !"

मानव ने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 4, 2015 at 3:00pm — 16 Comments

कागज़ का गाँव ( लघुकथा )

 जीप में बैठते ही मन प्रसन्नता से भर रहा था। देश में वर्षों बाद वापसी , बार -बार हाथों में पकडे पेपर को पढ़ रही थी , पढ़ क्या रही थी , बार -बार निहार रही थी। सरकार ने पिछले दस साल से इस प्रोजेक्ट पर काम करके रामपुरा जैसी बंज़र भूमि को हरा -भरा बना दिया है।गाँव की फोटो कितनी सुन्दर है , मन आल्हादित हो रहा था। उसका गाँव मॉडल गाँव के तौर पर विदेशों में कौतुहल का विषय जो है ! बस अब कुछ देर में गाँव पहुँचने ही वाली थी। दशकों पहले सुखा और अकाल ने उसके पिता समेत गाँव वालो को विवश कर दिया था गावं…

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Added by kanta roy on December 4, 2015 at 3:00pm — 17 Comments

मेरी पाँच हाईकू रचनाएं ।

टूटी आशाएं,

बिखरा परिवार,

मैं मिट गया ।। 1 ।।

 

तुम्हारी खुशी,

जीं-तोड़ मेहनत,

फिर भी विफल ।। 2 ।।

 

बहती पवन,

विकराल रूप,

सब कुछ बंजर ।। 3 ।।

 

रब नाऱाज,

लहरो का कहर,

बहते आँसू ।। 4 ।।

 

धुँधली रेखा,

तुम्हारा आगमन,

सूर्य उदय ।। 5 ।।

  

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by DIGVIJAY on December 4, 2015 at 3:00pm — 11 Comments

मुफ़्त शिविर

बिटिया के छोटे-छोटे बच्चे,दो वक़्त की रोटी जुटाने की मशक्कत,और बेटी की जान पर मंडराता खतरा देखकर परमेसर सिहर उठा।उसने अपनी एक किडनी देकर उसके जीवन को बचाने का संकल्प कर लिया।

" तुम तो पहले ही अपनी एक किडनी निकलवा चुके हो,तो अब क्या मजाक करने आये थे यहाँ ?" डॉक्टर ने रुष्ट होकर कहा।

" जे का बोल रै हैं डागदर साब,हम भला काहे अपनी किटनी निकलवाएंगे।

ऊ तो हमार बिटिया की जान पर बन आई है।छोटे-2 लरिका हैं ऊ के सो हमन नै सोची की एक उका दे दै।"

" पर तुम्हारी तो अब एक ही किडनी है,और ये… Continue

Added by jyotsna Kapil on December 4, 2015 at 2:18pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - कहीं पंडित मरे, टूटे थे मन्दिर - गिरिराज भंडारी

1222    1222    122

हथेली खून से जो तर हुई थी

न जाने क्यूँ यहाँ रहबर हुई थी

 

जो सच जाना उसे सहना कठिन था

ज़बाँ तो इसलिये बाहर हुई थी

 

कि उनके नाम में धोखा छिपा है

समझ धीरे सहीं , घर घर हुई थी  

 

वही इक बात जो थी प्रश्न हमको

वही आगे बढ़ी , उत्तर हुई थी

 

निकाले जब गये सब ओहदों से

ज़मीं बस उस समय बेहतर हुई थी

 

कहीं पंडित मरे, टूटे थे मन्दिर

कहो कब आँख किसकी तर हुई थी…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 4, 2015 at 8:02am — 19 Comments

जीत-हार (लघुकथा)

 “बीबी जी, आज के बाद आप की कोठी में  काम नहीं करूंगी” कांता ने काम खत्म करते हुए कहा ।

“क्या सभी घरों का काम छोड़ रही हो। ”

“नहीं” “तो मेरा क्यूँ ?” सरबजीत  ने फिक्रमंदी जाहिर करते हुए कहा ।

“तुम बीच में काम कैसे छोड़ जाओगी, मुझे कोई प्रबंध करने का मौका तो दिया होता ।

” बस हम ने तो फैसला कर लिया है कि हम आप की कोठी में काम नहीं करेंगे”

बात को आगे बड़ाते  हुए कांता ने कहा “हमने सोचा था कि आप पढ़े लिखे हैं, मगर अब पता चला कि पढाई ने तो बस आपकी सुरत ही बदली है,…

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Added by मोहन बेगोवाल on December 3, 2015 at 10:30pm — 4 Comments

भ्रष्टाचार पर कुछ दोहे

धन लालसा नष्ट करे बुद्धि बल व् ज्ञान
निष्ठा के सम्भार से होव चित्त महान l

भ्रष्टाचार में लिपट हुए भूले धर्म का पाठ
पड़ी जो लाठी न्याय की सब कुछ सुन सपाट l

Added by Nikunj Pathak on December 3, 2015 at 4:49pm — 2 Comments

दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है? -- इमरान खान

हुकूमत तुम ग़रीबों के सरों पर हाथ रक्खेगी,

दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

सियासत अपने मंसूबों में तुमको साथ रक्खेगी,

मसाइल से घिरे लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

तुम्हारी आंख से निकले हुए आंसू को वो देखें?

तुम्हारी सिसकियाँ देखें या फॉरेन टूर को देखें?

तुम्हारी फस्ल ना आने के मातम को मनायेगें,

या जाकर वेस्ट कंट्री से वो एफडीआई लायेंगे?

मिटाना चाहते हैं वो दुकानों को बाज़ारों से,

कोई…

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Added by इमरान खान on December 3, 2015 at 3:00pm — 13 Comments

धर्म – -( लघुकथा ) –

तीन दिन से शहर में कर्फ़्यु लगा हुआ था!चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था!सडक पर एक मक्खी भी नहीं दिख रही थी! उसका  पूरा परिवार एक शादी में दिल्ली गया हुआ था!शहर में दंगों के कारण उनका लौटना भी नहीं हो पा रहा था!वह घर पर अकेला ही था!बुढापे और बीमारी के कारण वह शादी में नहीं जा सका था! तीन दिन से दूध वाला,सब्ज़ी वाला ,कामवाली बाई,खाना बनाने वाली बाई आदि भी नहीं आ रहे थे!डाइबिटीज़ और ब्लड प्रैसर की दवा भी खत्म हो गयी थी!जैसे तैसे डबल रोटी के सहारे दिन गुजार रहा था!सुबह से उसे चक्कर आ रहे थे…

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Added by TEJ VEER SINGH on December 3, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान -1222  1222  1222   1222

मुझे सच को कभी भी झूठ बतलाना नहीं आता|

तभी तो मेरे घर भी यार नज़राना नही आता|

 

अगर तुम प्यार से कह दो लुटा दूँ जान भी अपनी,…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 2, 2015 at 11:30pm — 14 Comments

संकल्प (लघुकथा)

अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by नादिर ख़ान on December 2, 2015 at 10:45pm — 16 Comments

साये....

साये....

रहने दो

तुम सायों की खामोशी क्या जानो

तुम सिर्फ खोखले अहसासों के

सूखे शज़र हो

साये का दर्द तो सिर्फ

ज़मीन सहती है

हर जिस्मानी खरोंच को

खामोशी से पी जाती है

उफ़ नहीं करती

रेज़ा रेज़ा बिखरती

तारीक में सिमट जाती है

जब कोई तन्हा शब

किसी परिंदे की तरह

पेड़ पर फड़फड़ाती है

बेतरतीब से सलवटों में

तब वफा भी कराहती है

गुजरे लम्हों के साये

तमाम उम्र

जीने की सजा दे जाते हैं

ज़िस्म की कश्कोल में…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 2, 2015 at 8:02pm — 12 Comments

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