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अस्मिता-बोध (कहानी ) -डा0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

      प्रथम श्रेणी के रिजर्व कोच में अपनी नव परिणीता पत्नी को लाल जोड़े में लिपटी देखकर भी मैं उस एकांत में बहुत खुश नहीं था I नए जीवन की वह काली सर्द रात जो उस रेलवे कम्पार्टमेंट में थोड़ी देर के लिए मानो ठहर सी गयी थी I मेरे लिए नया सुख, नयी अनुभूति और नया रोमांच लेकर आयी थी I फिर भी मैं  उदास, मौन और गंभीर था I ट्रेन की गति के साथ ही सीट के कोने में बैठी वह सहमी-सिकुड़ी, पतली किन्तु स्वस्थ काया धीरे-धीरे हिल रही थी I मैंने एक उचटती निगाह उसकी ओर डाली फिर अपनी वी आई पी अटैची के उस…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2015 at 6:39pm — 13 Comments

सम्बल (लघु कथा) // शुभ्रांशु पाण्डेय

भूख और थकावट से चूर दोनों असहाय भाई-बहन एक-दूसरे से लिपट कर लेट गये.

आज सुबह के भूकम्प में अपने मां-पापा को खो देने के बाद से ये छः वर्षीय भाई ही तो उसका सम्बल था.

दो वर्ष छोटी बहन को ऐसा लग रहा था जैसे अपने भाई के सीने पर सर रख देने से ही उसकी सारी समस्याओं का निदान हो गया हो.

अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?

उसके नन्हे हाथ अनायास भाई के गालों पर फैल गये आँसुओं को साफ़ कर उसके धूल भरे बालों को सहलाने लगे. 

==================

मौलिक…

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Added by Shubhranshu Pandey on May 19, 2015 at 5:18pm — 19 Comments

जब खुशी हो पास आये ग़म पड़े दिल तोड़ जाये |

२१२२ २१२२ २१२२ २१२२ - रमल मुसम्मन सालिम
ज़िंदगी     कैसे चले   जब साथ कोई छोड़ जाये | 
जब खुशी हो पास आये ग़म पड़े दिल तोड़ जाये | 
दूर का जब हो  सफर तब  आसरा  सब  ढूढ़ते हैं…
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Added by Shyam Narain Verma on May 19, 2015 at 3:47pm — 10 Comments

बुला लेते(कविता)

नूरे-नजर से देखिये,फिर नूर आ जाता,
तबीयत से बुला लें,रब हुजूर आ जाता।
रहे आपको बुलाते अरसा गुजर गया,
आप जो बुलाते, बंदा जरूर आ जाता।
ढका रहा चाँद घटाओं में,हटाते गेशू,
पल भर ही,नजर भरपूर आ जाता।
कैसी झिझक यह? देख लेते एक बार,
आपकी नजर बंदा कम दूर आ जाता।
चिलमन-चादर-ए-बेरुखी,ख्वाहिशे-जहाँ,
हटाते,फिजा-ए-प्यार का शुरुर आ जाता।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on May 19, 2015 at 7:17am — 7 Comments

अपने अपने फ़र्ज़--

" पापा , आपने अगर मुझे बेटी माना है तो मुझे इस अधिकार से कभी वंचित मत कीजियेगा ", विदा होते समय वो उनसे लिपट कर रो पड़ी थी और वहाँ मौज़ूद लोगों की आँखें नम हो गयी थीं ।

वो अपने एकलौते पुत्र को खो बैठे थे जिसकी नयी नयी शादी हुई थी , और हर उस आवाज़ के सामने चट्टान बन कर खड़े हो गए थे जो उनकी बहू को इस हादसे के लिए दोषी ठहरा रहे थे । फिर उन्होंने बहू को धीरे धीरे सँभाला और उसे अपनी बेटी का दर्ज़ा दे दिया । उसके अपने माता पिता भी संतुष्ट थे कि वो अब उस घर की बेटी बन गयी थी ।

आजीवन उनका…

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Added by विनय कुमार on May 19, 2015 at 2:47am — 14 Comments

विकासवाद का चरित्र---

विकासवाद का चरित्र

सड़क, गली, कूचों व मैदानों में

उन्मादी संक्रमण मस्ती करते

विकल, प्राण पखेरू

समूहों में फड़फडाते- गिड़गिडाते

गगन, हवा, दीवारों में सिर मार कर डूब जाते

सागर, सरोवर, ताल, नदी, झीलों में

बजबजाता विकासवाद

अशिष्ट पन्नियों से ।

दलदल में कमलदल, दलगत उन्मुक्त पर

स्थिर, मूक, भावहीन संज्ञाएं

क्रियाशील भौंरे सब हवा हो गए

गुम गयीं - तितलियॉं

सौन्दर्य निगलती- वादियॉं

दिशाएं- दिशाहाीन, पूर्णत: शुष्क पछुवा पर निर्भर…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 18, 2015 at 9:08pm — 16 Comments

परम्परा:लघुकथा :हरि प्रकाश दुबे

“सुनो ! अमर से बात हुई क्या  ?”

“नहीं, क्या बात करूँ , कुछ सुनता ही नहीं ,अब तो लगता है दिन में भी पीने लगा है ?”

“पर अमर की माँ मैं तो समझ ही नहीं पा रहा की वो ऐसा क्यों करने लग गया ? बाहर तो लोग उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते !”

“अरे आप भी ना , जानकर भी अनजान क्यों बन जातें हैं ? वही उस लड़की का चक्कर है सारा, मैं कहे देती हूँ, ये लड़का हमारी परम्परा को संस्कारों को मिट्टी में मिला देगा एक दिन, इकलौता ना होता तो कसम से इसका गला दबा देती !”

“कौन, अरे वो बेबी ,…

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Added by Hari Prakash Dubey on May 18, 2015 at 8:44pm — 9 Comments

कुँवारी देवी ( लघुकथा)

वो कहना चाहती थी कि वो देवी नही है वो तो मुन्नी है । उसे रानो और शन्नो के साथ खेलने जाना था बाहर ।
"ये लोग चुनरी ओढाय उसे कहाँ बिठाय दिये हैं । माँ , मै देवी नही रे , तेरी मुन्नी हूँ .. काहे ना चिन्हत मोरा के । "
दर्शन की रेलम पेल , मां -बापू चढावे के रकम की खनक समेटने में लगे हैं । गाँव के माइक वाले ,पंडित ,हलवाई सबके भाग सँवर गये ।
"अब तो देवी का समाधिस्थ होना परम जरूरी हो गया है ।" -बिसेसर गहरी सोच में डूबा हुआ था ।

मौलिक और अप्रकाशित

कान्ता राॅय
भोपाल

Added by kanta roy on May 18, 2015 at 5:30pm — 2 Comments

फ्लेक्सिबिलिटी....(लघुकथा)

“ओय! रितु.. अब बता कैसी लग रही हूँ...?” सोनिया ने पूरा ट्रडिशनल श्रृंगार करके, अपनी फ्रेंड से पूछा

“अरे! सोनिया. तू तो बिलकुल अबला लग रही है यार. भारतीय नारी..हा हा हा हा”

“हाँ! यार..अबला ही तो दिखना होगा. ऐसा मेरे वकील का कहना है, ताकि कल कोर्ट में जज सहानुभूति के तौर पर जल्दी से मेंटेनेंस बना देगा तो  मुझे अपने हसबेंड के घिसे-पिटे विचारों और बूढ़े सास-ससुर की खांसी-खुजली से छुटकारा मिल जाएगा.”

"उफ्फ!! बड़ी दूर की सोच होती है यार, वकीलों की.. अब चल ये पकड़ तेरे जींस-टॉप,…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 18, 2015 at 9:30am — 26 Comments

मुझे अच्छा लगा ....इंतज़ार

तेरी चाहत में

सारी उम्र गलाना अच्छा लगा !

ना पा कर भी

तुझे चाहना अच्छा लगा ! 

लिख लिख के अशआर

तुझे सुनाना अच्छा लगा !

सच कहूँ तो मुझे

ये जीने का बहाना अच्छा लगा !! 



दुप्पट्टा खिसका कर 

चाँद की झलक दिखाना अच्छा लगा !

पास से निकली तो

हलके से मुड़ के तेरा मुस्कुराना अच्छा लगा !

बदली से निकल कर आज

चाँद का सामने आना अच्छा लगा !!



मिलने नहीं आयी मगर

रात सपनों में तेरा आना अच्छा लगा !

ला इलाज ही सही मगर

प्रेम का ये…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 18, 2015 at 8:04am — 13 Comments

फ़िक्र--

" हेलो , पापा , आप समय से अपनी दवा खा लेना "| बेटी के शब्द सुनकर उन्होंने सुकून की सांस ली | अभी कल ही उसने फोन नहीं किया तो एकदम परेशान हो गए और वापस आते ही पूरा लेक्चर दे डाला |
आज भी हड़बड़ी में वो भूल ही गयी थी पर एक बुज़ुर्ग को सामने देखते ही याद आ गया | पता तो उसको भी है और पापा को भी है , फोन तो सिर्फ बहाना है ये बताने के लिए कि आज भी वो सकुशल पहुँच गयी है |
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 18, 2015 at 2:04am — 20 Comments

मन का गुबार (लघुकथा) // --शुभ्रांशु

 “हैलो माँ ! कैसी हो ? खाना खा लिया ? भाभी का क्या हाल है?” माला ने फ़ोन पर अपनी माँ से सवालों की झड़ी लगा दी.

“कहाँ खाया है बेटा? एक तू है जो रोज़ फ़ोन करके आधा-एक घंटा बात कर मन हल्का कर देती है. वर्ना तेरी भाभी को तो हमसे कोई मतलब ही नहीं. बस लगी रहती है अपने कमरे में.. फ़ोन पर.. जब खाना बन जायेगा तो खा ही लूँगी..”, माँ का शिकायत भरे लहजे में जबाब आया.

“ऐसे थोडे ही चलेगा, माँ !“

तभी अन्दर के कमरे से माला की सास की आवाज आयी, “ बहूऽऽ, दोपहर होने को आयी, सुबह का नाश्ता भी…

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Added by Shubhranshu Pandey on May 17, 2015 at 11:30pm — 27 Comments

ग़ज़ल -- मुझको सुकून-ए-दिल किसी दर पर नहीं मिला ( बराए इस्लाह )

२२१-२१२१-१२२१-२१२



दिल जिस से आशना हो वो मन्ज़र नहीं मिला

मैं तिश्नालब ही रह गया, सागर नहीं मिला



पथरीले रास्तों पे ही चलता रहा हूँ मैं

सफ़रे हयात में मुझे रहबर नहीं मिला



अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी

मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला



बुझते दियों को शब्दों से रोशन जो कर सके

महफ़िल में ऐसा कोई सुखनवर नहीं मिला



साहिल पे ही तू बैठ के क्या सोचे ए बशर

मेहनत बिना किसी को भी गौहर नहीं मिला



इसकी तलाश में… Continue

Added by दिनेश कुमार on May 17, 2015 at 9:34pm — 22 Comments

पहचान लघुकथा

पहचान

"दादू दादू क्या कर रहे हो ।"

"कुछ नही बेटा झंडा सिल रहा हूँ।"

इतने सारे ?

"हाँ बेटा परसो 15 अगस्त है न सिलकर देना है।"

"क्यों दादू? इतने झंडे का क्या करेंगे वो !"

" बेटा !!स्कूल कॉलेज और सभी जगह लहराएंगे ।"

ओह !"और ये काला निशान क्या है?"

ओहो !!"बेटा बैठ मेरे पास सब बताता हूँ ।"

"ये हरा कपड़ा है न, इसका मतलब होता है हरयाली ,दूसरा है सफ़ेद इसका मतलब है पवित्रता, तीसरा है केसरिया इसका मतलब है शौर्य, और ये काला निशान अशोक चक्र है।यह झंडा भारत की… Continue

Added by babita choubey shakti on May 17, 2015 at 5:54pm — 3 Comments

ग़ज़ल -नूर : ये दुआ है फ़क़त दुआ निकले

२१२२/१२१२/२२ (११२)



जब भी लफ़्ज़ों का काफ़िला निकले

ये दुआ है, फ़कत दुआ निकले.

.

कोई ऐसा भी फ़लसफ़ा निकले

ख़ामुशी का भी तर्जुमा निकले.

.

सुब’ह ने फिर से खोल ली आँखें  

देखिये आज क्या नया निकले.

.

हम कि मंज़िल जिसे समझते हैं  

क्या पता वो भी रास्ता निकले.

.

लुत्फ़ जीने का कुछ रहा ही नहीं

क्या हो गर मौत बे-मज़ा निकले?     

.

रोज़ चलता हूँ मैं, मेरी जानिब

रोज़ ख़ुद से ही फ़ासला निकले.

.

गर है कामिल^,…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 17, 2015 at 5:42pm — 25 Comments

तृषा जीवन की …

न स्याम भई न श्वेत भयी …


न स्याम भई न श्वेत भयी
जब काया मिट के रेत भयी
लौ मिली जब ईश की लौ से
भौतिक आशा निस्तेज भयी
यूँ रंग बिरंगे सारे रिश्ते
जीवन में सौ बार मिले
मोल जीव ने तब समझा
जब सुख छाया निर्मूल भयी
सब थे साथी इस काया के
पर मन बृंदाबन सूना था
अंश मिला जब अपने अंश से
तब तृषा जीवन की तृप्त भयी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 17, 2015 at 12:30pm — 16 Comments

ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

तेरी तस्वीर तसव्वुर से बनाई मैंने



ख़ाक पड़ जाएगी कितने ही हसीं चहरों पर

आईने से जो कभी गर्द हटाई मैंने



मुझको पाबंदियाँ ओरों की गवारा ही नहीं

ख़ुद ही अपने लिये ज़ंजीर बनाई मैंने



अपनी ग़ज़लों से संवारूँगा ये बज़्म-ए-हस्ती

उम्र सारी इसी चक्कर में गँवाई मैंने



अर्श हिलता है ,ज़मीं काँपने लगती है,यही

आह-ए-मज़लूम की तासीर बताई मैंने



वो भी बैज़ार नज़र… Continue

Added by Samar kabeer on May 17, 2015 at 11:19am — 39 Comments

ग्राहक सेवा--

" साहब , पइसा जमा करना है , पर्ची नाहीं दिखत है | मिल ज़ात त बड़ा मेहरबानी होत ", डरते डरते उसने कहा |

" अब केतना पर्ची छपवायें हम लोग , पता नाहीं कहा चुरा ले जाते हैं सब ", बड़बड़ाते और घूरते हुए हरिराम स्टेशनरी रूम में घुसे | थोड़ी देर बाद जमा पर्ची लाकर उसके सामने पटक दिया और बोले " बस एक ही लेना , कुछ भी नहीं छोड़ते लोग यहाँ "|

पूरे गाँव को पता था , हरिराम के व्यवहार के बारे में लेकिन सब झेल जाते थे | एक ही तो शाखा थी बैंक की वहां और सबको वहीँ जाना होता था | एकाध ने मैनेजर से शिकायत की…

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Added by विनय कुमार on May 17, 2015 at 2:48am — 15 Comments

अधूरे गीत(कहन)______________मनोज कुमार अहसास

मन के सारे गीत अधूरे,फिर से तुझ को अर्पण है

तुझको मन की बात कहूँ मैं,ऐसा अब फिरसे मन है



मर्यादा का एक महल है जिसमे विरह का आँगन है

ख़ामोशी की एक चिता है पल पल जलता जीवन है



संबंधो में प्रेम कहाँ है प्रेम की अब वो रीत कहाँ

मित्र नयन से जुदा है काजल और तरसता दर्पण है



दुःख,पीड़ा,अवसाद,तपस्या,करुणा,संयम और साहस

उस जीवन में नैसर्गिक है इस जीवन में आयोजन है



टूट गयी है डोर विरह की कैसे कहन का रूप सजे

जीवन की इस भाग दौड़ में बस बेकार का… Continue

Added by मनोज अहसास on May 16, 2015 at 11:30pm — 8 Comments

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा

हमें ईश से ढेर सारे गिले |

नहीं अब सहारा कहीं पे मिले |

प्रभो शक्ति जितना हमें है दिया |

बड़ी मुश्किलों से सहारा किया ||

 

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा |

महल स्वप्न का देखते ही ढहा |

छिना छत्र माता पिता का कहाँ ?

बची फ़िक्र भूखी बहन का यहाँ ||

 

अभी गति हमारी बड़ी दीन है |

बिना नीर जैसे दिखे मीन है |

प्रकृति के कहर से बहन भी डरी |

बड़ी मुश्किलों से डगर है भरी ||

 

मौलिक व…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on May 16, 2015 at 7:47pm — 2 Comments

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