Added by Sushil Sarna on October 11, 2014 at 12:26pm — 9 Comments
मातृभक्ति गुंजित स्वर तेरे, सिंहनाद सा करते हैं,,
तेरा साहस शौर्य देख, तेरे भय से शत्रु मरते हैं ।
वेग तेरी आशा का भारी, है आंधी तूफानों पर,,
तेज तेरे चेहरे का भारी, बिजली की मुस्कानों पर ।
शक्ति का अंबार छिपा है, तेरे दृढ़ संकल्पों में,,
जीवन का हर गीत लिखा है, तूने प्रेम के पन्नों में ।
संबल तेरा पाकर ही, निर्बल ने है लड़ना सीखा,,
देख अडिग विश्वास तेरा, पाषाणों ने अड़ना सीखा ।
धीर हो तुम! गंभीर हो…
ContinueAdded by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 11, 2014 at 11:30am — No Comments
देखा असूल मैंने अजब सर जमीन पर
जो ठोकरें लगाते रहे उम्र भर मुझे
शैतानियत ने किस कदर चोला बदल लिया
वे ही जनाजे में मेरी कन्धा लगा रहे I
चप्पल न थी नसीब छाले पाँव में पड़े
मै जिन्दगी में यूँ ही दर्दमंद हो चला
अल्लाह तूने मौत दी तेरे बड़े करम
इक बार आठ पाँव की सवारी तो मिली I
मैंने हयात में न कभी हार थी मानी
हर वक्त …
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 6:00pm — 14 Comments
तुम मेरी मोहब्बत का इम्तिहान न लो,
बस यूँ ख़ामोश रह कर मेरी जान न लो ।
लोग कोसेंगे तुम्हें, तुमसे करेंगे दिल्लगी,
तुम अपने माथे पर, मेरी उजड़ी हुई पहचान न लो ।
बस्तियां खाली पड़ीं, कई लोग देंगे आसरा,
इक रात बसने के लिए, मेरे दिल का सूना मकान न लो ।
बेजुबां बेदम सा होकर, मैं पड़ा तेरी राह में,
मुँह फेर कर गुजरो मगर, मेरी आँखों की जुबान न लो ।
मैं बड़ा नाजुक हूँ, दिल पर बोझ भारी है बहुत ,
न गिरूँ…
ContinueAdded by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 10, 2014 at 11:30am — No Comments
2122 1122 1122 22
तेरे कूंचे से यूं खामोश निकलकर मैंने
तेरे दीदार किये रूप बदलकर मैंने
इक हिमालय की तरह तुमसे मिला था लेकिन
पाँव अब चूम लिए तेरे पिघलकर मैंने
भौरों कलियों कि कभी बात न मुझसे करना
उम्र अब तक तो है काटी यूं बहलकर मैंने
आजमाया है हुनर आज किसी बच्चे का
उनसे दिल मांग लिया उनका मचलकर मैंने
दिल की चाहत तो है इजहारे मुहब्बत करना
बात पर तुझसे…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 4:00pm — 14 Comments
धरती से नीले अम्बर तक
बिना किसी व्यवधान
इठलाती तितली सी चंचल
भरती रहे उड़ान
ना कोई सीमा ना कोई बंद
हो कितनी स्वछन्द
ऐ कविता!
कभी करुण रस से आप्लावित
भीगे आखर से बोझिल
कभी डूब शिंगार झील में
आती नख- शिख तक झिलमिल
कभी गरल तू विरह का पीती
कभी नेह मकरंद
हो कितनी स्वछन्द
ऐ कविता!
कभी परों पर लगा बसंती
रंग अबीर गुलाबी लाल
कहीं बिठाती दीये…
ContinueAdded by rajesh kumari on October 9, 2014 at 12:50pm — 16 Comments
"वाह वाह !! क्या लिखते हैं साहब, एक बार किताब छपने तो दीजिये, देखिये कैसे लोग हाथो हाथ उठा लेते हैं I"
(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => …
Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 9, 2014 at 11:00am — 25 Comments
बचें दृष्टि से दृष्टिदोष फैला हुआ है चहुँ दिश।
निकट या दूर दृष्टि सिंहावलोकन हो चहुँ दिश।
दृष्टि लगे या दृष्टि पड़े जब डिढ्या बने विषैली।
तड़ित सदृश झकझोरे मन जब दृष्टि बने पहेली।
गिद्धदृष्टि से आहत जन-जन वक्र दृष्टि से जनपथ।
जन प्रतिनिधि, सत्ताधीशों के कर्म अनीति से लथपथ।
रखें दृष्टिगत हो जन-जाग्रति, जन-निनाद, जन-क्रांति।…
ContinueAdded by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 9, 2014 at 9:16am — 3 Comments
एक बार फिर आओ न वैदेही
फिर राम की बनो सनेही
इस बार उसके साथ वन में मत जाओ
उसे ले चलो किसी शहर की ओर
जहाँ अनगिनत रावण तुम्हारे
अपहरण का स्वप्न सजाये बैठे हैं.
रावण द्वारा अपहृत हो जाओ,
इन नए राक्षसों के विनाश का
तुम फिर से कारण बनो.
एक नया संसार बसाओ
इनका अब संहार कराओ.
तनिक फिर भृकुटि बनालो
राम को फिर से बुला लो.
मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा
Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 10:30pm — 18 Comments
चित्त की वृत्ति
चंचल है कदाचित,
यह मचलती
सूर्य के प्रकाश जैसी।
तन विषय विष से भरे
घट को पिए जो
खार के सागर
अहं के ज्वार उगले।
रोक दो वृत्ति
तमस को भेद कर -चित्त में
योग - अनुशासन
तुला पर तोलता है।
वृत्ति की आवृत्ति
निश्छल शून्य जब भी
दिव्य अद्भुत योग से
साक्षात मुक्ति।
आत्मा - परमात्मा
चित्त के उपज जो
एक खोली में रहें जीव जैसे-
काष्ठ में अग्नि,
जल में वाष्प…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 8, 2014 at 9:00pm — 14 Comments
पूर्वगाथा
हादसा नया हो न हो
पुरानी चोट से जगह-जगह
दर्द नया
लहर दर्द की, अब दुखी
तब दुखी
कब रुकी
बहती चली गई
मेघ यादों के आँखों में घने
बरसे, बरसे अनमने
तालाब से नदी, सागर
रातों सियाह महासागर बने
कोई नि:सीम अखण्ड विश्वास
तारिकाएँ नभ में कितनी टूटीं
टूटी नहीं किसी के आने की आस
स्नेह की किरणों की उष्मा में बादल
बने फिर घने, फिर बरसे
भीतर सागर…
ContinueAdded by vijay nikore on October 8, 2014 at 8:00pm — 14 Comments
Added by seemahari sharma on October 8, 2014 at 4:35pm — 6 Comments
एक छतरी है जो याद मुझको बहुत आती है|
चुनरी पालने की याद मुझको रोज आती है |।
सुधियों से परिपूर्ण,सुध बचपन की आती है |
अंगने के झूले की,याद उस उपवन की आती है|।
सायबान की छाया में ..पालने की गोदी में.......
हरकतों पर मेरी दूर खड़ी माँ खूब मुस्कुराती है।।
चुटकियों से माँ, मेरे चेहरे पर सरगम सजाती है |
डूबकर मेरी किलकारियों में ,हर गम भूल जाती है|।
माँ मुझे पालना झुलाती है ,कभी गोदी में हिलाती है…
ContinueAdded by anand murthy on October 8, 2014 at 4:30pm — 4 Comments
" बेटा, तुम जब भी शहर से आते हो तो घर में कम और इस पेंड़ के पास ज्यादे समय बिताते हो, घर में मन नही लगता क्या..."
" चाचा, यहाँ बड़ा सुकून मिलता है! याद है आपको जब मैं नर्सरी में पढता था! एक बार वहाँ पौधशाला वाले पौधे बाँट रहे थें, ये आम का पेंड़ मैं वहीं से लाया था, पिता जी पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर बहुत खुश हुए थें! इसे उन्होने अपने हाथों से लगाया था और खाद-पानी भी समय-समय से दिया करते थें! इसे वे बहुत प्यार करते थें, इसीलिए कुछ पल इसकी छाया में बिताना, पिता जी के स्नेह की…
ContinueAdded by Pawan Kumar on October 8, 2014 at 12:30pm — 16 Comments
बहुत सुंदर है
मीठा है बहुत,
बिलकुल मिश्री की तरह
मिल जाता है, कहीं भी
कभी भी, हर तरफ
खोखलापन लिए, समा जाये इसमें
कोई भी,कितना भी.
सच! ही तो है
असत्य जो है
कितना आसान है
इसे पाना, स्वीकारना
खुश हो लेना
चलायमान तो इतना
कि रुकता ही नहीं
अनेकों राहें, उनमे भी कई राहें
पूर्ण सामयिक ही बन बैठा है.
और वो देखो !.. सत्य
वहीं खड़ा है, अनंत काल से
न हिलता न…
ContinueAdded by जितेन्द्र पस्टारिया on October 8, 2014 at 10:02am — 18 Comments
थका-हारा-मेहनतकश आदमी
थका-हारा-मेहनतकश आदमी कहीं भी सो सकता है
24 घंटे चिल्लाती पौं-पौं पी-पी पू-पू करती
धूल फांकती धुआं चाटती सड़को के फूटपाथों पे भी |
उसके फेफड़े बहुत मज़बूत होते हैं…
ContinueAdded by somesh kumar on October 8, 2014 at 12:00am — 7 Comments
खुशूबू हैं संगीत हवाएं सरगम हैं
ये आंसू की बूंद नहीं ये शबनम है.
सूरज जब भी ड्यूटी करके घर लौटा
अंधकार में डूबा सारा आलम है,
बडे—बडे तैराक डूबते देखे हैं,
बचकर रहना उसकी आंखें झेलम हैं,
तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,
चौराहों पर पुलिस, लोग सहमे—सहमे
लगता है ये त्योहारों का मौसम है।।
- मौलिक व अप्रकाशित
@ अतुल कुशवाह
Added by atul kushwah on October 7, 2014 at 11:30pm — 5 Comments
Added by seemahari sharma on October 7, 2014 at 7:18pm — 16 Comments
**दीप कोई प्रीत का अंतस जले.
हो चुकी है रात आधी,
घोर तम मावस पले.
इस अमा में दीप कोई,
प्रीत का अंतस जले.
--
हर तरफ खुशियाँ बिछी हैं,
द्वार तोरण से सजे.
आतिशी होते धमाके,
वाद्य मंगल धुन बजे.
कौन देता ध्यान उनपर,
भूख से मरते भले.
--
बाल दे इक दीप कोई,
रौशनी भी हो यहाँ.
झोपड़ी को राह तकते,
घिर चूका है कहकशाँ.
लूटते सारी ख़ुशी वो,
काट सकते जो…
ContinueAdded by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 2:07pm — 13 Comments
चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराये लोग
हमसे, तुमसे, इससे, उससे, सबसे आजिज आये लोग
बड़ी दिलेरी दिखलाते थे बिला वजह हर मौके पर
वक्त पड़ा तो सबसे पहले भागे पूँछ दबाये लोग
भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा
कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग
नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का
सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग
खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर
अपने चारण बने आप ही अपने पर…
Added by Sulabh Agnihotri on October 7, 2014 at 12:00pm — 13 Comments
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