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All Blog Posts (19,163)

कह मुकरियाँ (17 से 25)

17)

जी करता है उड़कर जाऊँ।

कुछ पल उसके संग बिताऊँ।

दूर बहुत ही है  उसका घर,

क्या सखि, साजन?

ना सखि, अम्बर!

18)

रातों को जब नींद न आए।

खिड़की खोल, सखी वो आए।

बाग बाग हो जाता मनवा,

क्या सखि प्रियतम?

ना री, पुरवा!

19)

उसको प्यार बहुत करती हूँ।

मगर पास जाते डरती हूँ।

दूर खड़ी देखूँ जी भरकर,

क्या सखि, प्रियतम?

ना सखि सागर!

20)

जब भी मेरा मन भर आए।

आँसू पोंछे…

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Added by कल्पना रामानी on February 22, 2014 at 7:00pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बेटी भी औलाद है- दोहे

पढ़े लिखे कुछ लोग भी, दे हैरत में डाल।

बेटी भी औलाद है, फिर क्यूँ करे बवाल।।

 

इतनी छोटी बात भी, समझे ना इंसान।

बेटी जन्में पुत्र को, रखते कुछ तो मान।।

 

बेटी मेरा खून है, बेटी मेरी जान।

बेटी से ये सृष्टि है, बेटी से इंसान।।

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by शिज्जु "शकूर" on February 22, 2014 at 5:30pm — 14 Comments

जो मुस्का दो खिल जाये मन

जो मुस्का दो खिल जाये मन 

---------------------------------

खिला खिला सा चेहरा  तेरा

जैसे लाल गुलाब

मादक गंध जकड़ मन लेती

जन्नत है आफताब

बल खाती कटि सांप लोटता

हिय! सागर-उन्माद

डूबूं अगर तो पाऊँ मोती

खतरे हैं बेहिसाब

नैन कंटीले भंवर बड़ी है

गहरी झील अथाह

कौन पार पाया मायावी

फंसे मोह के पाश

जुल्फ घनेरे खो जाता मै

बदहवाश वियावान

थाम लो दामन मुझे बचा लो

होके जरा…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 22, 2014 at 4:30pm — 6 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

एनजीओ खूब बने, करे न सेवा ख़ास 

टैक्स बचे इज्जत बढे,धन की करते आस

धन की करते आस,नहीं कुछ सेवा करते 

फैशन बना विशेष, ओट में पीया करते 

करके बन्दर बाट, खूब लूटकर जीओ

धन अर्जन की प्यास लिए बने एनजीओ |

(२)

लोहा मनवाते रहे, करते वे अभिमान 

गर्व रहा नहीं स्थाई,रखे न इसका भान 

रखे न इसका भान,ज्ञान न चक्षु के खोले 

जीवन का है मोल,सोच समझ के न बोले

कहते है कविराय,  शिल्प में सोहे दोहा  

करते जो सम्मान, मान उसका ही लोहा…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 22, 2014 at 11:00am — 4 Comments

मै पागल मेरा मनवा पागल

मै पागल मेरा मनवा पागल

मै पागल  मेरा मनवा  पागल, ढूँढे इंसाँ  गली - गली ।

आज फरिश्ता भी गर कोई

इस  धरती पर  आ  जाए

इंसाँ  को  इंसाँ   से  लड़ते-

देख  देख  वह  शरमाए ।

बेटी  को  बदनाम किया , जो थी नाज़ों के साथ पली

मै  पागल  मेरा मनवा पागल,  ढूँढे इंसाँ  गली - गली ।

दूध दही की नदियां थी तब-

उनमें  गंदा  पानी   बहता

द्वारे – द्वारे, नगरी – नगरी,

विषधर यहाँ  पला  करता ।

कान्हा आकर…

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Added by S. C. Brahmachari on February 22, 2014 at 10:30am — 12 Comments

दीप -शिखा (कल्पना मिश्रा बाजपेई)

आज बता दे दीप -शिखा प्रिय 

मैं तुझ सी बन जाऊँ कैसे ?

दीप तले है नित अँधियारा 

फिर भी तू अँधियारा हरता

पल -पल तू, धुआँ रूप में

हर पल, खुद की व्यथा उगलता

देख रही हूँ ज्योति तेरी,में

तेरा व्याकुल ह्रदय मचलता

पर कालिमा हरने में ही

दीप तेरा यह जीवन जलता

मानवता को रोशन कर के  भी

मैं उजयारा कर पाऊँ कैसे ?

उढ़कर आता जब परवाना

आलिंगन करने तुझको

आखिर वह,जल ही…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 21, 2014 at 10:00pm — 3 Comments

समर शेष !!

( 1 ) 

दो पुष्प खिले 

हर्षित हृदय 

लीं बलैयां 

( 2 )

धीरे धीरे 

बढ़ चले राह 

पकड़ी बचपन डगर 

( 3 )

मार्ग दुर्गम 

वे थामे अंगुली 

आशित जीवन 

( 4 )

हुये बड़े 

बीता बचपन 

डाले गलबहियाँ 

( 5 )

संस्कार भरे 

करते मान सम्मान 

न कभी अपमान 

( 6 )

जीवन बदला 

खुशियाँ…

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Added by annapurna bajpai on February 21, 2014 at 9:15pm — 5 Comments

मध्य मार्ग : कविता : नीरज कुमार नीर

आज सुबह से ही ठहरा हुआ है,

कुहरा भरा वक्त.

न जाने क्यों,

बीते पल को

याद करता.

डायरी के पलटते पन्ने सा,

कुछ अपूर्ण पंक्तियाँ,

कुछ अधूरे ख्वाब,

गवाक्ष से झांकता पीपल,

कुछ ज्यादा ही सघन लग रहा है.

नहीं उड़े है विहग कुल

भोजन की तलाश में.

कर रहे वहीँ कलरव,

मानो देखना चाहते हैं,

सिद्धार्थ को बुद्ध बनते हुए.

बुने हुए स्वेटर से

पकड़कर ऊन का एक छोर

खींच रहा हूँ,

बना रहा हूँ स्वेटर को

वापस ऊन का गोला.

बादल उतर आया…

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Added by Neeraj Neer on February 21, 2014 at 8:16pm — 12 Comments

झंडे

सामने से गुज़र रही है

भीड़

हाथों में हैं झंडे

केसरिया

हरे

 

शोर बढ़ता जा रहा है

झंडे

हथियार बन गए हैं

जमीन लाल हो रही है

 

यह अजीब बात है

झंडे चाहे जिस रंग के हों

जमीन लाल ही होती है

      -  बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on February 21, 2014 at 8:00pm — 12 Comments

कह मुकरियाँ [6 से 10]

6.

जीवन मेरा रोशन करता

सूरज जैसे तम को हरता

उस बिन धड़के मेरा जिया

क्या सखि साजन ? ना सखि दीया

7.

चले संग वो धड़कन जैसे

उस बिन कटे बताऊँ कैसे

रखे हिसाब हर पल हर कड़ी

क्या सखि साजन ? नहीं सखि घड़ी

8.

पलकें मीचूं सपने लाता

कोमलता से फिर सहलाता

छोड़े ना वो पूरी रतिया

क्या सखि साजन? ना सखि तकिया

9..

नया रूप ले रात को आता

दिन चढ़ते वैरी छुप जाता

छिपता जाने कौनसी मांद

क्या सखि साजन ? ना सखि चाँद…

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Added by Sarita Bhatia on February 21, 2014 at 7:35pm — 15 Comments

ग़ज़ल - दिले-ग़ालिब कहाँ से लाओगे

आज मजलूम को सताओगे

बददुआ सात जन्म पाओगे

 

बह्र ग़ालिब की खूब लिख डालो

दिले-ग़ालिब कहाँ से लाओगे

 

खुद को भगवान मान  बैठेगा

हद से ज्यादा जो सिर झुकाओगे

 

आज साहब बने हो रैली…

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Added by अमित वागर्थ on February 21, 2014 at 7:02pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत कोई गा रहा है आज मेरे मौन में ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122    2122    2122    212

कौन चुपके आ रहा है आज मेरे मौन में

गीत कोई गा रहा है  आज मेरे  मौन में

 

वाक़िया जिसकी वज़ह से दूरियाँ बढ़ने लगीं 

बस वही समझा रहा है ,आज मेरे मौन में

 

ख़्वाब कोई अब पुराना टूट जाने के…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 21, 2014 at 6:30pm — 20 Comments

मन बौराया

   मन बौराया

कंगना खनका

मन बौराया

ऐसा लगता फागुन आया ।

रूप चंपयी

पीत बसन

फैली खुशबू

ऐसा लगता

यंही कंही  है चन्दन वन ।

पागल मन

उद्वेलित करने

अरे कौन चुपके से आया ?

पनघट पर

छम छम कैसा यह !

कौन वहाँ रह – रह बल खाता ?

मृगनयनी वह परीलोक की

या है वह  –

सोलहवां सावन !

मन का संयम

टूटा जाये

देख देख यौवन गदराया ।

कंगना खनका

मन…

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Added by S. C. Brahmachari on February 21, 2014 at 6:22pm — 16 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ कह-मुकरियाँ ..............डॉ० प्राची

क़दमों में दे बहकी थिरकन

महकी नम सी चंचल सिहरन  

बाँहों भर ले, रच कर साजिश 

क्या सखि साजन? न सखि बारिश 

हर पल उसने साथ निभाया 

संग चले बन कर हम साया 

रंग रसिक नें उमर लजाई 

क्या सखि साजन? न सखि डाई

चाहे मीठे चाहे खारे 

राज़ पता हैं उसको सारे 

खोल न डाले राज़, हाय री ! 

क्या सखि साजन? न सखि डायरी 

उसने सारे बंध…

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Added by Dr.Prachi Singh on February 21, 2014 at 6:00pm — 44 Comments

एक कतरा रोशनी है एक कतरा जाम है

2122        2122    2122      212 

एक कतरा रोशनी है एक कतरा जाम है 

दिल जलों का दिल जलाने आ गयी फिर शाम है 

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है 

उनके क़दमों के नहीं नामों निशा भी अब कहीं 

ख्वाब में पर क़दमों की आहट को सुनना आम है

 

जुगनुओं की रोशनी से हर चमन आबाद था 

रोशनी क्या आज तो…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on February 21, 2014 at 1:02pm — 9 Comments

क्षणिकाएं

1-विवशता

मुश्किल वक्त मैं उसकी मदद नहीं कर पाया

पता है क्यों?

वह डरे व् फसे जानवर की तरह खूँखार हो गया था//

२-लौट आया

मैं वहाँ से लौट तो आया 

लेकिन खुद को अधूरा छोड़कर//

३-विवादित विचार 

 

उनका सम्बन्ध इसलिए टूटा

क्यूंकि वे 

विवादित विचारों तक ही सिमटे रहे//

 

४-अकेलापन

बाज़ार के अकेलेपन से इतना ऊब गया हूँ…

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Added by ram shiromani pathak on February 21, 2014 at 1:00pm — 13 Comments

क्षणिका

कुछ तो मजबूरी की हद रही होगी ,

या निर्लज्जता की इंतेहा रही होगी ,

वो सम्भावित प्रधान मंत्री के पिता थे,

उनकी पत्नी ने प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति

बनाये और अपनी उंगलियों पर नचाये होंगे ,  

कुछ तो हुआ  होगा की 11 साल तक

कई असहाय राष्ट्रपतियों के ज़मीर को…

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Added by Dr Dilip Mittal on February 21, 2014 at 8:17am — 4 Comments

चले जायेगें गीत

तड़पता छोड़  हमको जो चले जायेगें

दिल का दर्द हम तो अब किसे दिखायेगे

 

कभी प्यार से मिला करती मुझसे वो तो

हवा में अपना आंचल लहराती वो तो

बन गये जो सपने वह किसे बतायेगे

दर्द दिल का हम तो अब किसे दिखायेगे

तड़पता छोड़  हमको जो चले जायेगें

 

रोज सपने में मेरे वो तो आती थी

बंद ओठो से हमको गीत सुनाती थी

यादो को उसके कैसे हम भुलायेगें

दर्द दिल का हम तो अब किसे दिखायेगें

तड़पता छोड़  हमको जो चले जायेगें

 

वेवफाई का जो…

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Added by Akhand Gahmari on February 20, 2014 at 8:44pm — 4 Comments

ग़ज़ल : सत्य लेकिन हजम नहीं होता

बह्र : २१२२ १२१२ २२

 

झूठ में कोई दम नहीं होता

सत्य लेकिन हजम नहीं होता

 

अश्क बहना ही कम नहीं होता

दर्द, माँ की कसम नहीं होता

 

मैं अदम* से अगर न टकराता

आज खुद भी अदम नहीं होता

 

दर्द-ए-दिल की दवा जो रखते हैं

उनके दिल में रहम नहीं होता

 

शे’र में बात अपनी कह देते

आपका सर कलम नहीं होता

 

*अदम = शून्य, अदम गोंडवी

-------

(मौलिक एवं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 20, 2014 at 8:37pm — 16 Comments


प्रधान संपादक
केक्टस (लघुकथा)

"भई वाह, तुम्हारे हरे भरे केक्टस देख कर तो मज़ा ही आ गया."
"बहुत बहुत शुक्रिया."
"लेकिन पिछले महीने तक तो ये मुरझाए और बेजान से लग रहे थे"
"बेजान क्या, बस मरने ही वाले थे."
"तो क्या जादू कर दिया इन पर ?"
"घर के पिछवाड़े जो बड़ा सा पेड़ था वो पूरी धूप रोक लेता था,  उसे कटवाकर दफा किया, तब कहीं जाकर बेचारे केक्टस हरे हुए."

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by योगराज प्रभाकर on February 20, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

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