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उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.

"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.

ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा…

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Added by विनय कुमार on October 7, 2019 at 6:42pm — 8 Comments

सुख उसका दुख उसका है - सलीम 'रज़ा' रीवा

22 22 22 22 22 22 22 2

सुख उसका दुख उसका है तो फिर काहे का रोना है

दौलत उसकी शोहरत उसकी क्या पाना क्या खोना है //



चाँद-सितारे उससे रोशन फूल में उससे खुशबू है 

ज़र्रे-ज़र्रे में वो शामिल वो चांदी वो सोना है //



खुशिओं के वो मोती भर दे या ग़म की बरसात करे

उसकी हुकूमत है हर सू वो जो चाहे सो होना है //



सारी दुनिया का वो मालिक हर शय उसके क़ब्ज़े में 

उसके आगे सब कुछ फीका क्या जादू क्या टोना है…

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Added by SALIM RAZA REWA on October 6, 2019 at 8:30pm — 10 Comments

दादाजी का वोट - लघुकथा -

दादाजी का वोट - लघुकथा -

विवेक विलायत से इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा गोल्ड मैडल सहित पास करके लौटा था। उसके पास कई विदेशी और भारतीय कम्पनियों के ऑफर थे।

आज परिवार के सभी सदस्य इसी मुद्दे पर अंतिम फैसला करने के लिये बड़े हॉल में एकत्रित हुए थे। सभी की रॉय भिन्न भिन्न थी। लंबी बहस चली लेकिन कोई अंतिम हल नहीं निकला।

तब दादाजी ने सुझाव दिया कि सब अपनी अपनी सलाह लिख कर पर्ची डालें। सभी पर्चियों को खोल कर बहुमत से फैसला होगा।वह सबको मान्य होगा।सभी इससे सहमत हो गये।

सभी की…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 5, 2019 at 1:32pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तुम आओ तो...

मैंने केसर-केसर मन से रची रंगोली,

मैंने रेशम-रेशम बंधनवार सजाए,

कुछ महके कुछ मीठे से पकवान बना लूँ-

तुम आओ तो उत्सव जैसा तुम्हे मना लूँ...

 

कंगूरों तक रुकी धूप से कर मनुहारें

हर कोना घर-आँगन का मैं रौशन कर लूँ,

माँग हवाओं से लाऊँ खुशबू के झौंके

सावन की आकुलता इन आँखों में भर लूँ,

 

नम कर लूँ मैं दिल का रूठा-रूठा…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 5, 2019 at 1:10am — 5 Comments

नेता (लघुकथा )

 आपने कभी आत्मा की आवाज सुनी  है ?’‘- बाबा ने पूछा I

‘कौन आत्मा  ? ‘

‘वही जो हर मनुष्य के अंतर में रहती है  I ‘

‘बाबा मैं  नेता हूँ , मुझे आत्मा-अंतरात्मा से क्या ?

(मौलिक/अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 4, 2019 at 11:47am — 8 Comments

सयाने लोग

" वो लोग भी कमाल के होते हैं, जो कमाल की बाते करते हैं ।",उनकी मीटिंग खत्म होने के बाद पास बैठे आदमी ने कहा

"पर इन लोगों ने कभी चुप शांत रहने वाले लोगों के बारे भी सोचा है, वो भी कुछ दायरे संभाल रखें हैं ।" , उसने ख़ुद से पूछा

चुप व शांत रहने वालों की भी उन्हें प्रवाह करनी चाहिए, जब वे लोग आपस में बातें कर रहे होते हैं ।

"पर उनके लिए ये जानना भी ज़रूरी है कि इनकी सोच के दायरे से बड़ा भी कोई किसी का दायरा हो सकता है ।"

वहाँ बैठे आदमी ने फिर पूछ ही लिया, " भाई साहिब, आप जो…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 3, 2019 at 3:30pm — 2 Comments

गज़ल

उठाओ नजर रहगुज़र देख लो ।

यहाँ जिन्दगी का सफ़र देख लो ।

 

नियम कायदे तो बने हैं कई

मगर भंग हैं सब जिधर देख लो ।

 

न भय है न चिंता न है शर्म ही

बना है बशर जानवर देख लो ।

 

कहीं लूट है तो कहीं क़त्ल है

किसी भी नगर की ख़बर देख लो ।

 

गले मिल रहे दोस्त खंजर लिए

बदलते समय का असर देख लो ।

 

करें फ़िक्र उनकी जो हैं नापसंद

सियासत का है ये हुनर देख लो ।

 

बिछा हर तरफ सिर्फ कंक्रीट…

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Added by Ashok Kumar Raktale on October 2, 2019 at 10:00pm — 7 Comments

अपना भारत.... (लघु रचना)

अपना भारत.... (लघु रचना)


हार गई
लाठी से
बन्दूक
आख़िर
जीत गई
बापू की अहिंसा
हिंसा से
मुक्ति दिलाई
गुलामी की
बेड़ियों से
तिरंगे को मिला
अपना आसमान
अपना सम्मान
अपना भारत

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 2, 2019 at 9:52pm — 4 Comments

समसामयिक दोहे

समसामयिक दोहे-

अर्थशास्त्र का  ज्ञान ही, सब देशों  का मूल.

कभी बढाता शक्ति यह, कभी हिला दे चूल.१

राजनीति परमार्थ को, लिया स्वार्थ में ढाल.

खुद सुख सुविधा भोगते, सौंप दुःख जंजाल.२

राजनीति के  शास्त्र में, कूटनीति के मन्त्र.

दलदल कीचड़ वासना, फलते पाप कुतंत्र.३ 

जीवन  में  संवेदना,  बहुत काम  की चीज.

कभी विफल होती नहीं, मिलें श्रेष्ठ या नीच.४

द्वेष भावना में किये, गए…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 2, 2019 at 8:00pm — 6 Comments

चलो भी...(गजल)

122  122  122  12

चलो भी जला के दिखा दें दिये

चले जा रहे वे अँधेरा किये।1

बहुत दिन गये चोट खाते हुए

रहेंगे कहाँ तक कहो मुँह सिये।2

किये जा रहे मौज मस्ती बड़ी

भुलाते हमें,जो हमारे हिये।3

चले पाँव नंगे, मिलीं कुर्सियाँ

लगा आजकल हैं नशा वे पिये।4

उड़ीं जो पतंगें, हुईं बेवफा

पिटे लोग लगता है' अपने किये।5 

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 2, 2019 at 7:28am — 3 Comments

गहन अँधेरे में

रात-अँधेरे सारी रात

टटोलते कोई एक शब्द

स्वयं में स्माविष्ट कर ले 

जो तुम्हारे आने का उल्लास

चले जाने का विषाद

कभी बूँद-बूँद में लुप्त होती

खिलखिलाती रंग-बिरंगी हँसी

और प्यारी हिचकियाँ तुम्हारी

आँसू ढुलकाती, मेरी ओर ताकती

दीप-माला-सी तुम्हारी आँखें

कि मोहनिद्रा में जैसे

मेरे ओठों पर तुम

अपने शब्दों को खोज रही हो

यह प्रासंगकि नहीं है क्या

कि मैं रात-अँधेरे सारी रात

टटोल रहा…

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Added by vijay nikore on October 1, 2019 at 3:30pm — 8 Comments

जीवन की संध्या

जहाँ बुजुर्गों की सेवा हो, जीवन सुखमय होता है।
जो ठोकर देता बूढ़ों को, भार दुखों का ढोता है।।
अभिवादन नित करने वाले,सौम्य शील गुण पाते हैं।
वृद्ध अनादर करने वाले, खुद पीछे रह जाते हैं।।
रोदन करता जहाँ बुढ़ापा, घर आँगन भी रोते हैं।
इज्जत तार-तार होती जब, बूढ़े भूखे सोते हैं।।
कोमल किसलय को आँचल में, ढँककर दूध पिलाई थी।
अस्थिशेष असहाय निबल तन, झुकी कमर माँ ताई थी।।
पिचके गाल कराल हाल में, खाँस रहे बूढ़े…
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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 1, 2019 at 1:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल-कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के-बृजेश कुमार 'ब्रज'

बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख़न्नक मक़्सूर

मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन



ये वक़्त के फ़साने सब पैतरे हैं छल के

तुम भी बिखर न जाना यूँ मेरे साथ चल के

उस डायरी में तुमको कुछ भी नहीं मिलेगा

कुछ बन्द गीत के हैं कुछ शे'र हैं ग़ज़ल के

ये याद भी नही है शोला थ याकि शबनम

हालाँकि उस बला ने देखा तो था मचल के

अब क्या तुम्हें बताएं किस बात का गुमां है

कल रात चाँद मेरी छत पे गया टहल के

किस बात से…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 1, 2019 at 12:00pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही ग़ज़ल ' बड़े दिल का'

बड़े दिल का तो वो कद में बड़ा होने से पहले था

जमीं से राब्ता उसका ख़ुदा होने से पहले था

करें मत फ़िक्र अब मेरी सभी एहबाब घर जाएँ

मुझे एहसास-ए-तन्हाई नशा होने से पहले था

हुनर आया तपिश सहकर हजारों चोट खाकर ही

फ़कत माटी का लोंदा वो घड़ा होने से पहले था

बुरी सुहबत ने ही उसको मियाँ ऎसा बनाया है़

वगरना नेक बच्चा वो बुरा होने से पहले था

मुखौटे में निहाँ कितना घिनौना रूप था उसका

मसीहा वेश में ढोंगी सज़ा होने से पहले…

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Added by rajesh kumari on October 1, 2019 at 12:00pm — 7 Comments

औरत : दर ब दर (लघुकथा )

विभाग की तरफ से सर्वेक्षण का काम पूरा होने के बाद, जूनियर स्टॉफ सदस्यों को विश्लेषण का काम दिया गया। जो टीम इस काम में लगाई गई, उस में एक पुरुष और महिला को चुना गया। विश्लेषण कर रहे जूनियर स्टॉफ के मन में परिणाम देख कर कुछ सवाल पैदा हो गए थे। जिन के बारे वह वरिष्ठ सदस्यों से पूछना चाहते थे। दो दिन के बाद वरिष्ठ स्टॉफ सदस्यों के सामने जब सर्वेक्षण का परिणाम रखा गया। तब पहला सवाल जो उन्होंने पूछा कि "एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं में पुरुषों की तुलना महिला शिशुओं की संख्या अधिक कैसे हो गई और वह…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 1, 2019 at 10:39am — 1 Comment

जान ले लेगा किसी रोज़ बहाना तेरा - सलीम 'रज़ा' रीवा

2122 1122 1122 22 

मेरी आँखों में हुआ जब से ठिकाना तेरा 

लोग कहते हैं सरे आम दिवाना तेरा



रोज़ मिलने की तसल्ली न दिया कर मुझको 

जान ले लेगा किसी रोज़ बहाना तेरा



छीन लेगा ये मेरा होश यकीनन इक दिन …

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Added by SALIM RAZA REWA on October 1, 2019 at 8:00am — 10 Comments

अहसास की ग़ज़ल

2×15

चंद मुकम्मल ग़ज़लों से हम दुनिया को बहला देंगे,

और अधूरे मिसरे तेरी यादों का पहरा देंगे.

जो कुछ तेरी इच्छा है वो ही तुझको दिखला देंगे,

हम खुद को धोखे में रखकर प्यार का मोल चुका देंगे.

ऐसे वो अपने चेहरे के सारे दाग छुपा देंगे,

कंप्यूटर से बनी हुई उम्दा तस्वीर दिखा देंगे.

जब तक तेरी आंखों से बरसेगी करुणा की धारा,

तब तक ये दुनिया वाले मेरे अहसास जला देंगे.

कीमत जिन फूलों की दाता के दर पर भी नहीं…

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Added by मनोज अहसास on October 1, 2019 at 12:24am — 4 Comments

आत्मा की आहट

कितने "अपने"

पहचाने थे यही रास्ते

पेड़ों की छाँह ओढ़े

कुहनी टेक

सरक जाते थे कितने

अच्छे-बुरे तजुर्बे

अचानक

चौंक जाती थी शाम

"मुझको घर जाना है"

तुम्हारे अरुणिम ललाट पर

अकस्मात चिंता की छायाएँ

और फिर ...

और फिर देख 

मेरी आँखों में अपनी आँखों की चमक

तुम्हारा ही मन नहीं करता था 

हाथ छोड़ चले जाने को

कि मानो जाते-जाते रुक जाती थी शाम

एक "और" आज के प्रेम-पत्र…

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Added by vijay nikore on September 30, 2019 at 10:22pm — 6 Comments

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

जहाँ ये कर दिखाना होगाl

हमारे  दिल   बताना होगा l

करोगे  बात जैसी  तुम भी  ,

सवालों को उठाना होगा l

सुनी  जो  भीड़ तूने   गाती  ,

मिरे दिल का फ़साना होगा l

ख़बर जाती  कहानी…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 30, 2019 at 7:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल (तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ)

212*

तीर नज़रों का उनका चलाना हुआ,

और दिल का इधर छटपटाना हुआ।

हाल नादान दिल का न पूछे कोई,

वो तो खोया पड़ा आशिक़ाना हुआ।

ये शब-ओ-रोज़, आब-ओ-हवा आसमाँ,

शय अज़ब इश्क़ है सब सुहाना हुआ।

अब नहीं बाक़ी उसमें किसी की जगह,

जिनकी यादों का दिल आशियाना हुआ।

क्या यही इश्क़ है, रूठा दिलवर उधर,

और दुश्मन इधर ये जमाना हुआ।

जो परिंदा महब्बत का दिल में बसा,

बाग़ उजड़ा तो वो बेठिकाना…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 30, 2019 at 5:49pm — 4 Comments

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