(डॉ 0 अनिल मिश्र की अंग्रेजी कविता का हिन्दी रूपांतरण )
सभी जो निरीह हैं वो भ्रूण हों या वयोवृद्ध
सब के सब जीवित शताधिक जला दिये
गोलियों से भूने गए कितने हजार और
कितने सहस्र को निराश्रित बना दिये
और कई पारावार आंसुओं के बार-बार
बाढ़ की तरह नित्य सहसा उफना दिये …
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 26, 2017 at 8:30pm — 3 Comments
1.
उतारिए चश्मा
पोछिये धूल
चीज़ें खुदबखुद... साफ़ हो जाएँगी ।
2.
ज़रूरी है… सफाई अभियान
शुरुआत कीजिये
दिल से ....
3.
गंदगी सिर्फ मुझमे ही नहीं
तुम में भी है मित्र
ज़रा अंदर तो झाँको ....
4.
जब ईमान गिरवी हो
ज़मीर बिक चुका हो
कौन उठायेगा बीड़ा
समाज की सफाई का ....
5.
साफ़ नहीं होती गंदगी
बार बार उंगली दिखाने…
ContinueAdded by नादिर ख़ान on November 26, 2017 at 8:00pm — 10 Comments
ब
“सर, दरवाजा खोलिए” प्रोफेसर राघव की शोध छात्रा नूर ने दरवाजे पर दस्तक देते हुए आवाज दी
“अरे! नूर तुम, दोपहर में अचानक, कैसे?” दरवाजा खोलते हुए प्रोफेसर राघव ने आने की वजह जाननी चाही
“ हाँ सर, एक रिसर्च पेपर में करेक्शन के लिए आई थी”
“ पर अभी तो मैडम घर पर नहीं हैं,और बाज़ार से कब तक लौटें इसका भी अंदाज नहीं है,आखिर तुम कब तक इस धूप में बाहर इंतज़ार करोगी” प्रोफेसर राघव् ने त्वरित जवाब दिया
“ बाहर क्यों सर ?” नूर ने कौतूहल से…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2017 at 2:30pm — 11 Comments
Added by जयति जैन "नूतन" on November 26, 2017 at 2:30pm — 2 Comments
काफिया ;इल ; रदीफ़ : में है
बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२
क्या कहूँ उनकी नज़ाकत, जो दिवाने दिल में’ है
किन्तु का ज़िक्र दिल से दूगुना महफ़िल में’ है |१|
जानती है वह कि गलती की सही व्याख्या कहाँ
पंख बिन भरती उड़ाने, भूल इस गाफिल में’ है |२|
राम रब कृष्ण और गुरु अल्लाह सब तो एक हैं
बोलकर नेता खुदा पर, पड़ गए मुश्किल में है |३|
गर सफलता चाहिए तुमको करो दृढ मन अभी
जज़्बा’ विद्यार्थी में’ हो वैसा…
ContinueAdded by Kalipad Prasad Mandal on November 26, 2017 at 9:00am — 7 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 26, 2017 at 1:30am — 9 Comments
सागर जैसी आॅंखों में,
बहते हुए हीरे मेरी माॅं के हैं,
होठों के चमन में,
झड़ते हुए फूल, मेरी माॅं के हैं,
काॅंटों की पगडंडियों में,
दामन के सहारे मेरी माॅं के हैं,
गोदी के बिस्तर में,
प्यार की चादर मेरी माॅं की हैं,
प्यासे कपोलों,
पर छलकते ये चुंबन मेरी माॅं के हैं,
ईश्वर से मेरी,
कुशलता की कामना मेरी माॅं की हैं,
इतराता हूॅं इतना,
पाकर यह जीवन,
मेरी माॅं का है।
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Manoj kumar shrivastava on November 25, 2017 at 9:30pm — 10 Comments
Added by Manoj kumar shrivastava on November 25, 2017 at 12:18pm — 10 Comments
क्यों मरते हो हे ! आतंकी
कीट पतंगों के मानिंद
हत्यारे तुम-हमे बुलाते
जागें प्रहरी नहीं है नींद…
ContinueAdded by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on November 25, 2017 at 11:00am — 8 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 25, 2017 at 7:16am — 7 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 25, 2017 at 12:00am — 9 Comments
22 22 22 22 22 2
आंखों में आबाद समंदर देखा है ।
हाँ मैंने उल्फ़त का मंजर देखा है ।।
कुछ चाहत में जलते हैं सब रोज यहां ।
चाँद जला तो जलता अम्बर देखा है ।।
आज अना से हार गया कोई पोरस ।
तुझमें पलता एक सिकन्दर देखा है ।।
एक तबस्सुम बदल गई फरमान मेरा ।
मैंने तेरे साथ मुकद्दर देखा है ।।
कुछ दिन से रहता है वह उलझा उलझा ।
शायद उसने मन के अंदर देखा है ।।
बिन बरसे क्यूँ बादल सारे गुज़र गए ।
मैंने उसकी जमीं को बंजर…
Added by Naveen Mani Tripathi on November 24, 2017 at 6:30pm — 5 Comments
तेरे मेरे दोहे :
पथ को दोष न दीजिये , पथ के रंग हज़ार
प्रीत कभी पनपे यहां ,कभी विरह शृंगार!!१!!
दर्पण झूठ न बोलता ,वो बोले हर बार
पिया नहीं हैं पास तो, काहे करे सिँगार!!२!!
शर्म न आए चूड़ियाँ ,शोर करें घनघोर
राज रात के कह गई, पुष्प गंध हर ओर!!३!!
जर्ज़र तन ने देखिये, ये पायी सौग़ात
निर्झर नैनों से गिरे,दर्द भरी बरसात!! ४!!
बन कर लहरों पर रहें, श्वास श्वास इक जान।
मिट कर भी संसार में ,हो अपनी…
Added by Sushil Sarna on November 24, 2017 at 5:00pm — 8 Comments
Added by रक्षिता सिंह on November 24, 2017 at 5:34am — 8 Comments
हुआ होगा कुछ आज ही के दिन
भयानक सनसनी अभी अचानक
थम गई
हवा आदतन अंधेरे आसमान में
कहाँ से कहाँ का लम्बा सफ़र तय कर
थक गई
पत्तों की पत्तों पर थपथपी
अब नहीं
रुकी हुई है पत्तों पर कोई अचेत अवस्था
या, असन्तुलनात्मक ख़ामोशी से उपजी
है आज भीतर अनायास उदास अनवस्था
बातों बातों में हम भी
तो रूठ जाते थे कभी
फिर भी हृदय सुनते थे स्वर
कुछ ही पल, आँखों से आँखों में देख
दुलारते
हँस…
ContinueAdded by vijay nikore on November 23, 2017 at 6:31pm — 11 Comments
Added by रामबली गुप्ता on November 23, 2017 at 6:30am — 5 Comments
Added by Mohammed Arif on November 23, 2017 at 12:02am — 23 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 23, 2017 at 12:00am — 4 Comments
ओ साहब!!!
क्या तुम आधुनिक लोकतंत्र को
लूटने वाले नेता हो!
या रईसी के दम पर बिकने वाले
अभिनेता हो!
क्या तुम वास्तविकता से अंजान
बड़े पद पर बैठे अधिकारी हो!
या मानवता की दलाली करने वाले
शिकारी हो!
क्या तुम भ्रष्टाचार में सिंके हुए
गुर्दे हो!
या विधानालय में वास करने वाले
मुर्दे हो!
तुम जो भी हो !!
मेरा प्रश्न है कि
अपनी बेटी की आबरू लूटने वाले के प्रति
तुम क्या सोचते?
तुम मौन हो!
पर मुझे मालूम है…
Added by Manoj kumar shrivastava on November 22, 2017 at 10:30pm — 8 Comments
अजल की हो जाती है....
ज़िंदगी
साँसों के महीन रेशों से
गुंथी हुई
बिना सिरों वाली
एक रस्सी ही तो है
जिसकी उत्पत्ति भी अंधेरों से
और विलय भी अंधेरों में होता है
ज़िंदगी
लम्हों के पायदानों पर
आबगीनों सी ख़्वाहिशों को
छूने के लिए
सांस दर सांस
चढ़ती जाती है
मौसम
अपने ज़िस्म के
इक इक लिबास को उतारते
ज़िंदगी को
हकीकत के आफ़ताब की
तपिश से रूबरू करवाने की
हर मुमकिन कोशिश करते हैं
मगर अफ़सोस…
Added by Sushil Sarna on November 22, 2017 at 12:00pm — 12 Comments
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