Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 2, 2017 at 1:04pm — 9 Comments
2122 2122 2122
एक क़तरा था समंदर हो गया हूँ।
मैं समय के साथ बेहतर हो गया हूँ।।
कल तलक अपना समझते थे मुझे जो।
उनकी ख़ातिर आज नश्तर हो गया हूँ।।
मैं बयां करता नहीं हूँ दर्द अपना।
सब समझते हैं कि पत्थर हो गया हूँ।।
ज़िन्दगी में हादसे ऐसे हुए कुछ।
मैं जरा सा तल्ख़ तेवर हो गया हूँ।।
जख़्म दिल के तो नहीं अब तक भरे हैं।
हां मगर पहले से बेहतर हो गया हूँ।।
सुरेन्द्र इंसान
मौलिक व अप्रकाशित
Added by surender insan on December 2, 2017 at 1:00pm — 23 Comments
Added by Manoj kumar shrivastava on December 2, 2017 at 8:41am — 8 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2017 at 8:23am — 5 Comments
बेखब़र क्यों हो गया तू? हो गया अनजान क्यों?
ज़िंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुरबान क्यों?
बेबसी कुछ भी नहीं थी, जिंदगी के दरमियाँ,
चार दिन का बन गया फिर, तू मिरा महमान क्यों?
पूछती है हाल …
ContinueAdded by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:30pm — 4 Comments
तुम शब्द हो
और मैं अर्थ
तुम हो तो मैं हुं
शब्द बिन अर्थ बेकार
निशब्द संसार
तुम प्रीत हो
और मैं जोगन…
ContinueAdded by जयति जैन "नूतन" on December 1, 2017 at 7:30pm — 3 Comments
Added by Mohammed Arif on December 1, 2017 at 12:35am — 18 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 30, 2017 at 11:42pm — 16 Comments
Added by Manoj kumar shrivastava on November 30, 2017 at 11:07pm — 5 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 30, 2017 at 5:30pm — 4 Comments
Added by Rahila on November 29, 2017 at 11:49am — 7 Comments
समय के साँचे में कुछ भभका सहसा
गुन्थन-उलझाव व भार वह भीतर का
चिन्ताग्रस्त, तुमने जो किया सो किया
वह प्रासंगिक कदाचित नहीं था
न था वह स्वार्थ न अह्म से उपजा
किसी नए रिश्ते की मोह-निद्रा से प्रसूत
ज़रूर वह तुम्हारी मजबूरी ही होगी
वरना कैसे सह सकती हो तुम
मेरी अकुलाती फैलती पीड़ा का अनुताप
तुम जो मेरे कँधे पर सिर टिकाए
आँखें बन्द, क्षण भर को भी
मेरा उच्छवास तक न सह सकती थी
और अब…
ContinueAdded by vijay nikore on November 29, 2017 at 7:51am — 15 Comments
Added by Ram Awadh VIshwakarma on November 28, 2017 at 10:50pm — 11 Comments
चोर-मन
कमर खुजाती उस स्त्री पर
पंजे मारकर बैठ गई आँख
मदन-मन खुजाने लगा पांख |
अभी उड़ान भरी ही थी कि
पीठ पर पत्नी ने आके ठोका
रसगुल्लामुँह हो गया चोखा |
जवाब में रख दीं बातें इमरती
छत की धूप और सुहानी सरदी
सचेती स्त्री संभल के चल दी |
बहलाने लगा मूंगफली के बहाने
चोर-मन ढूंढता बचने के ठिकाने
भर चिकोटी पत्नी लगी मुस्कुराने |
सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by somesh kumar on November 28, 2017 at 9:36am — 4 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 28, 2017 at 2:00am — 13 Comments
बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
विद्यालय का प्यारा आॅंगन,
साथी-संगियों से वह अनबन,
गुरू के भय का अद्भुत कंपन,
इन्हीं विचारों के घेरे में,
मन को अपने सेंक रहा हूॅं,
बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
निष्छल मन का था सागर,
पर्वत-नदियों में था घर,
उछल-कूद कर जाता था मैं,
गलती पर डर जाता था मैं,
लेकिन आज यहाॅं पर फिर से,
गल्तियों का आलेख रहा हूॅं,
बचपन को फिर देख रहा हॅूं,
चिर लक्ष्य का स्वप्न संजोया,
भावों का मैं हार पिरोया,
मेहनत की फिर कड़ी…
Added by Manoj kumar shrivastava on November 27, 2017 at 9:47pm — 8 Comments
Added by Naveen Mani Tripathi on November 27, 2017 at 9:00pm — 7 Comments
अबोले स्वर ...
कुछ शब्दों को
मौन रहने दो
मौन को भी तो
कुछ कहने दो
कोशिश करके देखना
एकांत पलों में
मौन तुम्हारे कानों में
वो कह जाएगा
जो तुम कह न सके
वो धड़कनों की उलझनें
वो अधरों की सलवटों में छुपी
मिलन के अनुरोध की याचना
वो अंधेरों में
जलती दीपक की लौ में
इकरार से शरमाना
बताओ भला
कैसे शब्दों से व्यक्त कर पाओगी
हाँ मगर
मौन रह कर
तुम सब कह जाओगी
चुप रह कर भी
अपनी साँसों से…
Added by Sushil Sarna on November 27, 2017 at 8:25pm — 6 Comments
Added by डॉ छोटेलाल सिंह on November 27, 2017 at 6:57pm — 7 Comments
Added by नाथ सोनांचली on November 27, 2017 at 6:30pm — 4 Comments
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