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ऊर्ध्वारोहण

एक सत्यान्वेषी ,

मुक्ति का अभिलाषी

था उर्ध्वारोही।

कर रहा था आरोहण

पर्वत की दुर्लंघ्य ऊचाईयां का।

पर्वत से उतरती नदी ने कहा :

मैदानों में तो जीवन कितना सरल , सुगम है,

यहाँ जीवन है कितना दुष्कर।

अविचलित रहकर इसपर

दिया उसने उत्तर

मैंने भीतर जाकर देखा है,

वाह्य सौंदर्य तो धोखा है।

मैदानों में जीवन सरल है,

पर राह लक्ष्य की वक्र है।

जीवन रथ मे लगे

कर्म फल के दुष्चक्र हैं।

मैं राह सीधी लेना चाहता हूँ।

इसलिए नीचे…

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Added by Neeraj Neer on February 24, 2015 at 8:48am — 12 Comments

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

तुम्हारा मुझसे मिलना 

मिलते ही धूप का ठण्डा हो जाना

ये बडा ही अनौखा विज्ञान था मेरे लिये 

जिसे मैं आज तक नहीं समझा हूँ

.

काँटों से भरे रास्तों पर

तुम्हारे साथ साथ दूर तक चले जाना

तलवों में बने काँटों के निशान

एक असीम आनन्द देते थे

ये कैसा विज्ञान था पता नहीं 

.

क्या तुम्हें याद है 

जब साथ साथ की थी हमने नदी की सैर

छेद हुयी टूटी नौका में बैठकर

और लिया था डूबने का आनन्द

ये कैसे सम्भव हुआ था 

इस विज्ञान से भी…

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Added by umesh katara on February 24, 2015 at 6:00am — 10 Comments

आम आदमी हूँ , रोज़ गिरता संभलता हूँ , क्या करूँ ..............

मैं रोज़ ढलता हूँ पर , निकलता हूँ , क्या करूँ

सूरज हूँ ,  मगर रोज़ जलता हूँ , क्या करूँ //

मैं मिट्टी नहीं , न हि पानी न कोई खुश्बू

मैं हवा का इक झोंखा हूँ , आँख मल्ता हूँ , क्या करूँ //

मैं बचपन भी कहाँ अब , जवानी भी नहीं हूँ मैं

बुढ़ापा हूँ मैं , इसीलिए खलता हूँ , क्या करूँ//

न कोई सफ़र हूँ मैं , न कोई पड़ाव न सराय कोई

मील का पत्थर हूँ मैं , बस टलता हूँ , क्या करूँ //

कहाँ खुद्दार हूँ मैं , अना वाला भी नहीं हूँ…

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Added by ajay sharma on February 24, 2015 at 12:29am — 8 Comments

संसार की समस्त सम्भावनाओं का क्षेत्र......हरि प्रकाश दुबे

क्यों

घबराते हो

परिवर्तन से ?

परिवर्तन तो होगा  

होता रहा है, होगा बार- बार

किसी के लिए अच्छा भी हो सकता है  

किसी के लिए अवांछनीय भी हो सकता है 

पर सृष्टी का नियम है, बदल सकते हो क्या ?

पर एक बात जान लो, परिवर्तन से ही इंसान लड़ता है

आगे बढता है ,परिवर्तन से ही इंसान सड़ जाने से बचता है !!

क्यों

घबराते हो

समस्याओं से ?

समस्यायें तो आयेंगी

आती रही है, आयेंगी बार – बार

जीवन ऐसे ही चलता है…

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Added by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 10:30pm — 15 Comments

ग्रहण

सुना सहसा उसने

और दिल बैठ गया

तड़प रहे अंतस में  

नया डर पैठ गया

 

तकिये पर सिर छिपा

विवश वह लेट गया

आंसुओं की परतें अनगिन

दर्द में समेट गया

 

अगले रविवार फिर  

वही मंजर आयेगा

मौन-प्रेम सिसकेगा

तडपकर मर जाएगा

 

एक कन्या बेमन से अनचाहा वर वरेगी

प्यार के शव पर ही मांग वह भरेगी

अभी उसके व्याह का…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 23, 2015 at 7:38pm — 24 Comments

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं.....

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं.....

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं

प्रेम धरा है प्रेम गगन है

प्रेम मिलन है प्रेम विरह है

श्वास श्वास का प्रेम बंधन है

प्रेम ईश है प्रेम है पूजा

स्मृति घाट का प्रेम मधुबन है

पावन गंगा सा प्रेम समेटे

लिप्त बूंदों में प्रेम नयन है

मौन अधरों में गुन गुन करता

प्रेम में डूबा प्रेम कम्पन है

आत्मसात का भाव समेटे

प्रेम हकीकत प्रेम स्वप्न है

प्रेम अलौकिक अपरिभाषित

हृदय नयन का प्रेम अंजन…

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Added by Sushil Sarna on February 23, 2015 at 7:30pm — 16 Comments

इक दुआ ~ गज़ल

212 212 212 2

इक दुआ हमने उम्र भर माँगी ।
अपने दिल मेँ तेरी बसर माँगी ।

पंछी नदियाँ जमीँ फलक तारे ,
हमने सबसे तेरी खबर माँगी ।

बात काँटोँ ने क्या गलत कर दी ,
इक कली गर जो शाख पर माँगी ।

हर तरफ तू ही तू नजर आये ,
देने वाले से वो नजर माँगी ।

कोई पूछे जो गर सफर अपना ,
तेरी जानिब मेँ हर डगर माँगी ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

Added by Neeraj Nishchal on February 23, 2015 at 12:36pm — 10 Comments

सत्य की लम्बी उमर हो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122     2122

***************

पाप   का  अवसान  मागूँ

पुण्य  का  उत्थान   मागूँ

**

सत्य  की  लम्बी उमर हो

झूठ  को  विषपान   मागूँ

**

व्यर्थ   है  आकाश  होना

सिर्फ  लधु  पहचान  मागूँ

**

राजपथ  की   राह   नीरस

पथ  सदा  अनजान  मागूँ

**

स्वर्ण   देने   की  न  सोचो

मैं तो  बस  खलिहान मागूँ

**

कोयलों   का   वंश   फूले

आज  यह  वरदान   मागूँ

**

साथ ही पर  काक के हित

इक  मधुर  सा गान मागूँ

**

मिल गए  नवरात …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2015 at 11:31am — 26 Comments

ग़ज़ल---१२-२२ १२-२२ १२-२२ आ रहा है अब

ग़ज़ल में दर्द ढल कर आ रहा है अब

कोई दरिया मचल कर आ रहा है अब

 

बड़े साहब ने इक साँचा बनाया है

जिसे देखो पिघल कर आ रहा है अब

 

ज़रा सा होश खोते ही हुआ जादू

जुबां पर सच निकल कर आ रहा है अब

 

चलो अच्छा हुआ जो ठोकरें खायी

गिरा लेकिन सँभल कर आ रहा है अब

 

बनाया मोम से पत्थर जिसे मैंने

मेरी जानिब उछल कर आ रहा है अब

 

गरज़ ढुलते ही रस्ता हो गया चिकना

मेरे घर वो फिसल कर आ रहा है…

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Added by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:23am — 21 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो ( 2 )--डॉo विजय शंकर

भरा पड़ा है साहित्य ,

ऐसा साहित्य जो,

कभी जुड़ नहीं पाया लोगों से ,

आम आदमी से , सीमित रह गया एक

अत्यंत सूक्ष्म तथाकथित उच्च सभ्रांत वर्ग में |

वेद , गीता , पुराण , भरा-बिखरा पड़ा है ज्ञान ही ज्ञान ,

मिल जाएगा , ढेरों मिल जाएगा , इनसे , उनसे ,

ऋचाओं से , श्रुतियों से , स्मृतियों से , संहिताओं से ,

बस , जुड़ नहीं पाया कभी दाल रोटी की समस्याओं से |

वह सर्वस्व है , वह यहां है , वहां है ,

अन्न अन्न के दाने दाने में है , सर्वत्र है वह ,

वह… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 23, 2015 at 10:08am — 14 Comments

ग़ज़ल -- तू मेरे लिए है न अजनबी ( बराए इस्लाह )

न तो मंज़िलों की तलाश है, न ही रास्तों की तलाश है

जो सँवार दें मेरी रहगुज़र , उन्हीं रहबरों की तलाश है



तू मुआफ़ करना मुझे ख़ुदा, मुझे मस्जिदों से न वास्ता

मेरे ज़ेहन में तो हैं तितलियाँ, मुझे ख़ुशबुओं की तलाश है



मेरी ख़्वाहिशें हैं दबी दबी, मेरी ज़िन्दगी है बुझी बुझी

मेरा इश्क़ आब-ए-हयात अब, मुझे जन्नतों की तलाश है



तू मेरे लिए है न अजनबी, मैं तेरे लिए हूँ न अजनबी

है हमारे बीच जो राब्ता, उसे क़ुर्बतों की तलाश है



कोई पास मेरे भी बैठता, मेरे… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 23, 2015 at 6:30am — 17 Comments

वर्दी नंबर १२ : लघुकथा (हरि प्रकाश दुबे)

“हर बार, वह उस आखिरी ‘समोसे’ की तरह मन मसोस कर रह जाता, जिसे कोई नहीं खाता था, आखिर वह अपने डिग्री कॉलेज की क्रिकेट टीम का ‘१२ वाँ खिलाड़ी जो था’ पर आज उसने हिम्मत जुटाकर ‘कप्तान’ से कहा ‘सर’ एक बार मुझे भी खेलने का मौका चाहिए!”

“अरे यार, तुम तो टीम के अभिन्न अंग हो, तुम तो बस मैच का आनन्द लो, हां बस बीच –बीच में चाय, पानी, समोसा, कोल्डड्रिंक, जूस –वूस ले आया करो !”

“समय बदला और फाइनल मैच से ठीक एक दिन पहले कप्तान और उसका प्रिय खिलाड़ी कार दुर्घटना में जख्मीं हो गए, और उस दिन…

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Added by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 2:48am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल :: इक परिन्दा पागल-सा (मिथिलेश वामनकर)

212 / 1222 / 212 / 1222

 

वाकिया हुआ  कैसे   बाद   ये  जमानों  के

मस्ज़िदी भजन  गाये  मंदिरी अजानों के

 

हौसला  चराग़ों  का  यूं चला  तबीयत…

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Added by मिथिलेश वामनकर on February 22, 2015 at 11:30pm — 31 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122 2122 212

पढ़ चुके जब से किताबें चार हम

भूल बैठे आपसी सब प्यार हम

बादलों ने ढक लिया सूरज अगर

मान लें सूरज की कैसे हार हम

उम्र भर कागज़ किये काले मगर

कह न पाए शेर भी दो चार हम

है भरोसा तेरे झूठे वादे पे 

यार दिल के हाथ हैं लाचार हम

जीतना तो चाहते हैं दिल मगर

फिर जमा क्यों कर रहे हथियार हम

बस डकैती लूट हत्या अपहरण 

देखते डरने लगे अखबार हम

मौलिक व…

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Added by gumnaam pithoragarhi on February 22, 2015 at 5:53pm — 5 Comments

ग़ज़ल -- आया था जो भी ज़ेहन में काग़ज़ पे लिख दिया ( बराए इस्लाह )

तरतीब से सजे दर-ओ- दीवार घर नहीं

सुख दुख में जब कि साथ तेरे हमसफ़र नहीं



ऐसा नहीं कि राहे सफ़र में शजर नहीं

आसान फिर भी जिन्दगी की रहगुज़र नहीं



उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे

खुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं



रिश्तों की भीड़ में कहीं गुम हो गये सभी

अब रौनकें वो पहले सी, चौपाल पर नहीं



जीवन की भागदौड़, चकाचौंध में बशर

खोया है इस कदर उसे खुद की खबर नहीं



गुटका शराब पीते हैं अब सब के सामने

आया अजीब दौर है बच्चों को ड़र… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

घास उगने लगी है मेरी कब्र पर

212 212 212 212

---------------------------------------

जिन्दगी थी बहुत ही सुहानी मेरी

मौज मस्ती कभी थी निशानी मेरी

------

एक ज़लसा हुआ था मेरे गाँव में

मिल गयी उसमें परियों की रानी मेरी

------

सिलसिला चल पडा फिर मुलाकात का

मुझको लगने लगी जिन्दगानी मेरी

------

बात अबकी नहीं है मेरे दोस्तो

ये कहानी बहुत ही पुरानी मेरी

------

एक साज़िश रची थी रक़ीबों ने फिर

और साज़िश में शामिल दिवानी मेरी

------

मैं तो मरने लगा…

Continue

Added by umesh katara on February 22, 2015 at 10:30am — 16 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो (1)--डॉo विजय शंकर

क्या करते हो,

कौन सा साहित्य रचते हो,

क्यों रचते हो ,

किसके लिए रचते हो ?

स्वान्तः सुखाय ,

कोई पढ़ता है ,

ऐसा लिख देते हो ,

अर्थ ढूंढना पड़ता है ,

जो है ही नहीं वो

निकालना पड़ता है ,

गाय है , घास है,

गाय घास खा चुकी ,

गाय जा चुकी ,

अब कुछ नहीं ,

सब अदृश्य है, पर है ,

समझ से परे है, पर है ,

क्योंकि लिखा है तुमने ,

जिनको दिख जाए , चक्षुवान।

बाकी ,

बाकी के लिए कहाँ लिखते हो तुम ,

तुम तो अपने लिए… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 9:52am — 17 Comments

कौन कब किसको रोक पाता है -- डॉo उषा चौधरी साहनी

 
न जाने ऐसा क्यों लगता है , 
किसी एक पल कि सबकुछ 
अपना है, अपने हाथों में है, 
बस , हाथ उठाऊं और ले लूँ , 
समेट लूँ , अपनी बाँहों  में ,
रख लूँ ,सहेज कर अपने पास । 
कितनी खुशियाँ हैं दुनियाँ में , 
सब मेरे लिए , कितनी अपनी हैं ,
पर, दूसरे ही क्षण लगता है…
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Added by Usha Choudhary Sawhney on February 22, 2015 at 9:35am — 9 Comments

टिकट (लघु कथा )

‘दो टिकट बछरावां के लिए’ –मैंने सौ का नोट देते हुए बस कंडक्टर से कहा I

‘टूटे दीजिये, मेरे पास चेंज नहीं है I’

‘कितने दूं ?’

‘बीस रुपये ‘

   मैंने उसे बीस रूपए दे दिये और पर्स सँभालने में व्यस्त हो गया I वह रुपये लेकर आगे बढ़ गया I

-'क्या कंडक्टर ने टिकट दिया ?'- सहसा मैंने पत्नी से पूछा i

‘नहीं तो ‘ उसने चौंक कर कहा I  तभी बगल की सीट पर बैठा एक अधेड़ बोल उठा –‘टिकट भूल जाइये साहेब , बछरावां के दो टिकट तीस रुपये के हुए उसने आपसे बीस ही तो लिए i दस का…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 21, 2015 at 8:39pm — 19 Comments

ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है

हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है



अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं

दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है



आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं

तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है



पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को

तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है



कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में

कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है



हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से

महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments

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