जाने कहाँ विलुप्त हो गए बचपन के एहसास
हमसे बहुत दूर हो गए ममता भरे हाथ।
जिस प्यार के तले सीखा था जीने का अंदाज
अकेला छोड़ उड़ गए सुनहरे परवाज़
अपने जज़्बातों का मुकाम पाने को
बेताब है अपना नया घरौदा बनाने को
क्या पता किससे मिले, बिछड़े किसी से
कौन कहेगा तू रहना खुशी से,
जमाने की हाफा-दाफी ने भुला दिया-
अपनों के प्यार की दौलत को
ऊंचा उठने के मनोरथ ने मिटा…
ContinueAdded by kalpna mishra bajpai on July 29, 2014 at 11:30pm — 18 Comments
चाँद की आँख में नमी होगी
लोगों को ईद पर खुशी होगी
चाँद हर रोज देखता है तुम्हें,
आपकी आज बेबसी होगी
जिंदगी रोज खून से लथपथ,
आज कैसे ये जिंदगी होगी
गर्दनें काट कर दिखाते हो,
क्या खुशी फिर भी ईद की होगी
अन्ध-विश्वास से लडाई है,
अब लडाई ये रोकनी होगी
छोड दो अपना-अपना कहना उसे,
इस तरह खत्म दुश्मनी होगी
आज इनसानियत है खतरे में,
क्या वजह है ये सोचनी…
ContinueAdded by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:00pm — 18 Comments
२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२
अवशेष चिनारों के तुमसे आफ़ात पुरानी कह देंगे
हालात वहाँ कैसे बिगड़े खुद अपनी जुबानी कह देंगे
दीवारें धज्जी धज्जी सी हर छत दिखती उधड़ी उधड़ी
आसार लहू के अक्स तुम्हें बेख़ौफ़ कहानी कह देंगे
दिखते पर्वत सहमे-सहमे औ गुम-सुम से झरने नदियाँ
कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे
जो साथ जला करते थे कभी आबाद रहे जिनसे आँगन
वो आज अल्हेदा चूल्हे खुद दिल की…
ContinueAdded by rajesh kumari on July 29, 2014 at 9:48pm — 21 Comments
"अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है ? जल्दी लाओ , यहाँ ख़त्म हो गयी |"
बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए | कई पंगतों में लोग बैठ कर भोजन कर रहे थे , काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर | सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे | थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते , उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था , वो सब उनके बर्तनों में रख लेते थे |
खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे | उसके दिमाग में पिछले कुछ…
Added by विनय कुमार on July 29, 2014 at 5:00pm — 21 Comments
हामिद अब बड़ा हो गया है. अच्छा कमाता है. ग़ल्फ़ में है न आजकल !
इस बार की ईद में हामिद वहीं से ’फूड-प्रोसेसर’ ले आया है, कुछ और बुढिया गयी अपनी दादी अमीना के लिए !
ममता में अघायी पगली की दोनों आँखें रह-रह कर गंगा-जमुना हुई जा रही हैं. बार-बार आशीषों से नवाज़ रही है बुढिया. अमीना को आजभी वो ईद खूब याद है जब हामिद उसके लिए ईदग़ाह के मेले से चिमटा मोल ले आया था. हामिद का वो चिमटा आज भी उसकी ’जान’ है.
".. कितना खयाल रखता है हामिद ! .. अब उसे रसोई के ’बखत’ जियादा जूझना नहीं…
Added by Saurabh Pandey on July 29, 2014 at 3:00pm — 61 Comments
२२ २२ २२ २२
सन्नाटा भी पसरा सा है
उसका कमरा बिखरा सा है
अब तुम पास नहीं हो ,शायद
उसका मुखड़ा उतरा सा है
बुत से कैसा कहना सुनना
हाफ़िज़ भी तो बहरा सा है
जीवन हुआ दिसंबर जैसा
आँखों में क्यों कुहरा सा है
देख के तुझे लगता है ये
चाँद कांच का कतरा सा है
गुमनाम बना लो घर कोई
अब खंजर का खतरा सा है
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on July 29, 2014 at 2:30pm — 5 Comments
बचपन से देवेश को एक तिरष्कार, जो कभी मोहल्ले के दूसरे बच्चों या उनके पालकों द्वारा झिड़की भरे अंदाज से मिलता रहा था. इस वजह से देवेश का बचपन हमेशा एक डर और निरंतर टूटे हुए आत्मबल में गुजरा. इन्ही मापदंडों के अनुसार अपनी पहचान को तरसते, आज वो बड़ा हो चुका है. निकला है एक सामजिक कार्यक्रम में शामिल होने को, अपनी एक पहचान और बहुत सारा आत्मबल लेकर.... भीड़ में जो उसे पहचानते है वो लोग उसे अनदेखा कर रहे थे . और जो उसे नही पहचानते , वो लोग जानने की कोशिश में लगे हुए है.....
“अरे..!…
ContinueAdded by जितेन्द्र पस्टारिया on July 29, 2014 at 11:16am — 24 Comments
ईद मनाये हम सभी गले मिले सब आज
सर्व धर्म सद्भाव के अकबर थे सरताज |
अकबर थे सरताज, सभी का मान बढाया
नवरत्नों के साथ, गर्व से राज चलाया
सभी तीज त्यौहार सुखद अनुभूति कराये
बढे ह्रदय सद्भाव सभी अब ईद मनाये |…
ContinueAdded by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments
दिनकर मनमाना हुआ, गई धरा जब ऊब।
सूर्य रश्मियाँ रोक के, ......मेघा बरसे खूब।
त्राही दुनियां में मची, संकट में सब जीव।
बरखा रानी आ गई, .....कहे पपीहा पीव।
झूम रहे पत्ते सभी, पवन गा रही गीत।
वन्दन बरखा का करें, निभा रहें हैं रीत।
रंग धरा के खिल गए, शीतल पड़ी फुहार।
वन कानन नन्दन हुए , झूम उठा संसार।
पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।
भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार।
जल निमग्न धरती हुई, जन जीवन फिर…
Added by seemahari sharma on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on July 29, 2014 at 10:09am — 12 Comments
याद आता है
वो अपना दो कमरे का घर
जो दिन मे
पहला वाला कमरा
बन जाता था
बैठक ....
बड़े करीने से लगा होता था
तख़्ता, लकड़ी वाली कुर्सी
और टूटे हुये स्टूल पर रखा
होता था उषा का पंखा
आलमारी मे होता था
बड़ा सा मरफ़ी का
रेडियो ...
वही हमारे लिए टी0वी0 था
सी0डी0 था और था होम थियेटर
कूदते फुदकते हुये
कभी कुर्सी पर बैठना
कभी तख्ते पर चढ़ना
पापा की गोद मे मचलना…
ContinueAdded by Amod Kumar Srivastava on July 28, 2014 at 10:06pm — 11 Comments
गजल- रंग पानी सा....
बह्र - 2122, 2122, 2122
नारि ही जब शक्ति की दुर्गा-सती है।
आज कल हालात की मारी हुयी है।।
काल बन भस्मासुरों को भस्म कर दें,
निर्भया बन वह सड़क पर लुट रही है।
विष्णु-शिव-ब्रह्मा हुआ है आदमी अब,
सृ-िष्ट - नारी की कहानी त्रासदी है।
नित गरीबी आग में पकती रही पर,
भूख, बच्चों की पढायी सालती है।
रक्त नर का पी कपाली बन लड़ी जो,
खून में लथपथ शिवानी सो रही है।…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2014 at 9:00pm — 9 Comments
1
न्याय पर जनतंत्र जन कल्याण पर,
अर्थ अवसरवाद का चेहरा लगा है/
रोशनी सर्वत्र जाने में विवश है,
बादलोँ का सूर्य पर पहरा लगा है/
2
तुम अँधेरे पंथ पर क्यों चल रहे,
रोशनी के जाल हमने तिर दिये हैं/
रह गई जो कालिमा दीपक तले,
उन अँधेरोँ से तो दीपक पल रहे हैं/
3
नीँद उड़ती जा रही है,रात रिसती रह गई/
धार में नौका ना जाने किस दिशा को गह गई/
उड़ गये बादल छलक पाताल का पानी गया,
फिर बिगड़ते सन्तुलन की बात धरती कह गई/
4
कहीं…
Added by पं. प्रेम नारायण दीक्षित "प्रेम" on July 28, 2014 at 8:30pm — 4 Comments
"अरे वाह आज तो मजा आ गया", रमेश घर में घुसते ही चहकते हुये बोला, ".. दुकानदार ने सामान का बिल बनाते समय साढ़े पाँच सौ रुपये कम जोड़े !"
“पापा, फ़िर तो आपको वो लौटा देना था न !”, बेटी नेहा ने अपनी आँखो को और बडा़ करते हुये कहा.
“पागल हो क्या ?”, मानों उसकी नादानी पर हँसते हुये रमेश ने कहा, “.... आज हम पार्टी करेंगे…”
नेहा के मन में टीचर की बतायी बातें कौंध गयीं, “गंगा में तमाम नदियाँ ही नहीं मिलतीं, शहरों के गंदे नाले भी गिरते हैं.”
उसे लगा, वो गंगा में…
ContinueAdded by Shubhranshu Pandey on July 28, 2014 at 8:00pm — 12 Comments
२१२२ ११२२ २१२
तेरी बातों से बड़ा हैरान हूँ
जिन्दगी मेरी बड़ा परेशान हूँ
क्या खता है, है सही क्या, क्या गलत
बेखबर इन से अभी नादान हूँ
मेरी खातिर है नहीं इक पल उन्हें
जो कहा करते थे उनकी जान हूँ
इश्क करना भी हुनर इक हो गया
इस हुनर से तो अभी अनजान हूँ
सांस चलती है तो जिंदा कहते सब
पर खबर मुझको कि मैं बेजान हूँ
है न चाहत का सबब मुझको पता
धड़कने कहती हैं बस कुरवान…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 3:25pm — 10 Comments
दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //
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ये मात्र दोहे हैं. चिकित्सा सलाह नहीं .
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मानस चरचा हो रही सुनो लगा कर ध्यान
भव सागर तरिहो सभी इसको पक्का जान
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मटर पराठा खा गये बैठे जितने लोग
लौकी सेवन नित करें भागें सगरे रोग
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लौकी रस इक्कीस दिन प्रातः पी लें…
ContinueAdded by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 28, 2014 at 1:45pm — 14 Comments
मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ !
क्योकि -
युद्ध जीत कर लौटा राजा भूल जाता है -
कि अनाथ और विधवाएँ भी हैं उसके युद्ध का परिणाम !
लोहा गलाने वाली आग की जरुरत चूल्हों में है अब !
एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ !
क्योंकि -
नई माँ रसोई खुली छोड़ असमय सो जाती है अक्सर !
कहीं आदत न बन जाए दुधमुहें की भूख भूल जाना !
कच्ची नींद टूट सकती है बर्तनों की आवाज से भी ,
दाईत्वबोध पैदा कर सकता…
ContinueAdded by Arun Sri on July 28, 2014 at 10:47am — 24 Comments
२२/२२/२२/२
.
रावण को तू राम बता,
और सहाफ़त काम बता. ...सहाफ़त-पत्रकारिता
.
बिकने को तैयार हैं सब,
तू भी अपने दाम बता.
.
सीख ज़माने वाला फ़न,
धूप कड़ी हो, शाम बता.
.
झूठ भी सच हो जाएगा,
बस तू सुब्हो शाम बता.
.
चाहे काट हमारा सर,
पर पहले इल्ज़ाम बता.
.
क़ातिल ख़ुद मर जाएगा,
बस मक़्तूल का नाम बता.
.
निलेश "नूर"
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Nilesh Shevgaonkar on July 28, 2014 at 9:00am — 11 Comments
थर्राहट
कुछ अजीब-सा एहसास ...
बेपहचाने कोई अनजाने
किसी के पास
इतना पास क्यूँ चला आता है
विश्वास के तथ्यों के तत्वों के पार
जीवन-स्थिति की मिट्टी के ढेर के
चट्टानी कण-कण को तोड़
निपुण मूर्तिकार-सा मिट्टी से मुग्ध
संभावनाओं की कल्पनाओं के परिदृश्य में
दे देता है परिपूर्णता का आभास ...
उस अंजित पल के तारुण्य में
सारा अंबर अपना-सा
स्नेहसिक्त ओंठ नींदों में…
ContinueAdded by vijay nikore on July 28, 2014 at 1:30am — 15 Comments
आज यों निर्लज्जता सरिता सी बहती जा रही है
द्वेष इर्षा और घृणा ले साथ बढती जा रही है
बिन परों के आसमाँ की सैर के सपने संजोते
पा रहे पंछी नए आयाम सब कुछ खोते खोते
लालसा भी कोयले पर स्वर्ण मढ़ती जा रही है
दिन गए वो खेल के जब खेलते थे सोते सोते
अब गुजरता है लडकपन पुस्तकों का बोझ ढोते
दौड़ है बस होड़ की जो क्या क्या गढ़ती जा रही है
काश के पंछी ही होते लौट आते शाम होते
कोसते भगवान् को…
ContinueAdded by SANDEEP KUMAR PATEL on July 28, 2014 at 1:00am — 3 Comments
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