आज अचानक बेटा अपने बीबी बच्चों सहित गांव पंहुचा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । कहाँ तो बुलाने पे भी कोई न कोई बहाना बना देता था और अगर आया भी तो अकेला और उसी दिन वापस ।
" दादा , दादी के पैर छुओ बच्चों" , और बहू ने भी झुक के पैर छुए दोनों के । फिर बहू ने लाड़ दिखाते हुए कहा " क्या बाबूजी , आप कितने दुबले हो गए हैं , लगता है माँ आपका ध्यान नहीं रख पाती , अब आप लोग हमारे साथ ही चल कर रहिये" ।
"हाँ , हाँ , क्यों नहीं , बिलकुल अब आप लोग चलिए हमारे साथ , क्या रखा है अब यहाँ" ,…
ContinueAdded by विनय कुमार on July 27, 2014 at 10:36pm — 10 Comments
मस्त वर्षा ऋतु निराली !
मस्त वर्षा ऋतु निराली, मेघ बरसे साँवरा ।
भीगती है सृष्टि सारी, देख मन हो बाँवरा ।।
झूमता सावन लुभाता, शोर करती है हवा ।
मग्न होकर मोर नाचें, गीत गाते हैं…
ContinueAdded by Satyanarayan Singh on July 27, 2014 at 7:30pm — 10 Comments
प्रतीक्षा
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प्रतीक्षा है
किसकी?
किसे है प्रतीक्षा
मन, मस्तिष्क
या आँखें
विभेद कठिन
आज तक स्मृति में है
वह सब कुछ
विस्मृत हो तो कैसे
क्या उसने भुला दिया होगा
शायद भुला सके
पर मैं नहीं भूल…
ContinueAdded by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 27, 2014 at 5:00pm — 12 Comments
Added by Rana Pratap Singh on July 27, 2014 at 1:30pm — 1 Comment
अवनी अम्बर जीव चराचर
सुख पा सब हर्षाये
वर्षा प्रेम सुधा बरसाये
प्रियतम को आमंत्रित करने
मेघ दूत बन आये
नील गगन के मुख मंडल पर
श्वेत श्याम घन छाये
वर्षा प्रेम सुधा बरसाये
बहे पवन मदमस्त झूम के
पुरवा मन अलसाये
प्रेम मिलन संकेत सरित ने
अर्णव संग जताये
वर्षा प्रेम सुधा बरसाये
छैला दिनकर आज धरा से
छिप छिप नैन लड़ाये
प्रेम जलज बिहँसे इस जग…
ContinueAdded by Satyanarayan Singh on July 27, 2014 at 1:00pm — 12 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on July 27, 2014 at 12:13pm — 6 Comments
मैं शब्दों के भार को तौलता रहा
भाव तो मन से विलुप्त हो गया|
मैं प्रज्ञा की प्रखरता से खेलता रहा
विचारों से प्रकाश लुप्त हो गया|
मस्तिष्क धार की गति तो तीव्र थी,
मन-ईश्वर का समन्वय सुषुप्त हो गया|
...…
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 27, 2014 at 11:20am — 5 Comments
1222/ 1222/ 1222
बहुत सोचा तुम्हें आखिर भुला दूँ मैं
जले लौ तो उसे खुद ही हवा दूँ मैं
उदासी का सबब गर पूछ लें मुझसे
अज़ीयत के निशाँ उनको दिखा दूँ मैं
कभी सागर कभी सहरा कभी जंगल
यूँ क्या-क्या बेख़याली में बना दूँ मैं
हक़ीकत तो बदल सकती नहीं फिर क्यों
गुजश्ता उन पलों को अब सदा दूँ मैं
तुम्हारी कुर्बतों के छाँटकर लम्हे
किताबों का हर इक पन्ना सजा दूँ मैं
इन आँखों से…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on July 27, 2014 at 11:00am — 16 Comments
1222 1222 1222 1222
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दुखों से दोस्ती रख कर सुखों के घर बचाने हैं
मुझे अपनी खुशी के रास्ते खुद ही बनाने हैं
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परिंदों को पता तो है मगर मजबूर हैं वो भी
नजर तूफान की कातिल नजर में आशियाने हैं
**
पलों की कर खताएँ कुछ मिटाना मत जमाने तू
किसी का प्यार पाने में यहाँ लगते जमाने हैं
**
न जाने कौन सी दुनिया बसाकर आज हम बैठे
गलत मन के इरादे हैं गलत तन के निशाने…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2014 at 9:43am — 10 Comments
(कल्पना करे कि यह पत्र छोटे भाई को तब मिला जब बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी थी i
प्रिय जी. एन.
मै तुमसे कुछ मन की बाते करना चाहता था i पर तुम नहीं आये I तुम अगर मेरे मन की हालत समझ पाते तो शायद ऐसा नहीं करते I अब तुम्हारे आने की उम्मीद मुझे नहीं जान पड़ती I इसीलिये यह पत्र लिख रहा हूँ I अगर कोई बात अनुचित लगे तो मुझे क्षमा कर देना I
मेरे भाई, आज हम जीवन के उस मोड़ पर पहुँच चुके हैं, जहा से आगे का जीवन उतना भी बाकी नहीं है जितना हम अब तक भोग आये हैं I इस…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 26, 2014 at 5:00pm — 15 Comments
“ अरे! बेटा..तैयार हो रहे हो. अगर बाहर तक जा रहे हो तो अपने पिता कि दवाई ले आओ, कल कि ख़त्म हुई है”
“ अरे! यार मम्मी!! मैं जब भी बाहर निकलता हूँ , आप टोंक देती हो. आपको पता है न, हमारी पूरी एन.जी.ओ. की टीम पिछले हफ्ते से गरीब और असहाय लोगों कि सहायता के लिए गाँव-गाँव घूम रही है. शायद ! आप जानती नही हो, अभी मेरी सबसे बढ़िया प्रोग्रेस है पूरी टीम में ”
जितेन्द्र ‘गीत’
(मौलिक व् अप्रकाशित)
Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 26, 2014 at 1:30pm — 26 Comments
इक ज़माना हो जाता है …
आदमी
कितना छोटा हो जाता है
जब वो पहाड़ की
ऊंचाई को छू जाता है
हर शै उसे
बौनी नज़र आती है
मगर
पाँव से ज़मीं
दूर हो जाती है
उसके कहकहे
तन्हा हो जाते हैं
लफ्ज़ हवाओं में खो जाते हैं
हर अपना बेगाना हो जाता है
ऊंचाई पर उसकी जीत
अक्सर हार जाती है
वो बुलंदी पर होकर भी
खुद से अंजाना हो…
Added by Sushil Sarna on July 26, 2014 at 1:00pm — 12 Comments
कँपकपी
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तुम कौन हो भाई ?
जो शीत से कँपकपाती मेरी देह की कँपकपी को झूठी बता रहे हो
शीत एक सत्य की तरह है
और कंपकपी मेरी देह पर होने वाला असर है
शीत-सत्य पर मेरा अर्जित अनुभव , व्यक्तिगत , सार्वभौमिक तो नहीं न
क्या तुम्हारे माथे पर उभर आयीं पसीने की बून्दें भी झूठी है
क्या मैने ऐसा कहा कभी ?
ये तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है , इस मौसमी सच की आपकी अपनी अनुभूति
तुम्हारी देह की प्रतिक्रिया पसीना है , तो है , इसमे…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 26, 2014 at 12:00pm — 9 Comments
खेती - किसानी -दोहे //प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //
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मौसम फसल खरीफ का पानी की दरकार
खेतों में पानी नही सोती है सरकार
खेती खुद करना भली जानत है सब कोय
बटाई में जबहि दिये फल मीठा नहि होय
फसल समय से बोइये ध्यान से सुने बात
बढ़िया फसल होय सदा सुखी रहो दिन रात
खाद संतुलित डालिये मिट्टी जाँच कराय
बंजर भूमि नही बने इसका यही उपाय
खेत सुरक्षित रहे सदा चिंता करें न…
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 25, 2014 at 1:30pm — 4 Comments
गाड़ी रुकते ही सामने से एक छोटी बच्ची अपने पीठ पर भाई को टांगे हुए लपकी । "बाबूजी , कुछ दे दो ना , भाई को भूख लगी है" , सुनते ही एक पल को तो दया आई लेकिन फिर न जाने क्यों क्रोध आ गया । "तुम लोग भी , इतनी कम उम्र में भीख मांगने लगते हो , पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो पैदा करके इनको सड़क पर छोड़ देते हैं"।
" चल बाबू , ये साहब भी भाषण ही देंगे , कुछ और नहीं दे सकते" और वो दूसरे गाड़ी की ओर बढ़ गयी ।
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on July 25, 2014 at 1:41am — 5 Comments
ये तो गूंगों की नगरी है भैया जी
सरकार हमारी बहरी है भैया जी
दंगों में दोस्त दोस्त क्यों मरते हैं
प्यार मुहब्बत भी बकरी है भैया जी
राजा को वनवास कहाँ अब मिलता है
आस लगाये अब शबरी है भैया जी
दिखावटी का अफ़सोस जताता है वो
वो शख्स बड़ा ही शहरी है भैया जी
कुछ खत जले कहीं जब शहनाई गूँजी
आशिक की डूबी गगरी है भैया जी
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on July 24, 2014 at 10:00pm — 8 Comments
क्यों होती बेटियाँ
थोड़ी पराईं सी ?
होती हैं बेटियाँ
माँ की परछाईं सी।
घर से वो निकलें जब
थोड़ा सा सहम-सहम
करती वो गलती बुरे
लोगों पर रहम कर
क्यों होती बेटियाँ
थोड़ी पछताईं सी?
जग करता मुश्किल
उनकी हर राहें
करतीं हैं पीछा शातिर निगाहें
क्यों होतीं बेटियाँ
तोड़ीं घबराईं सी ?
पैरों में उनके रिश्तों की पायल
तानें देके सभी करते हैं घायल
क्यों होती…
ContinueAdded by kalpna mishra bajpai on July 24, 2014 at 8:30pm — 4 Comments
धूप
जिधर देखो आज
धुन्धलाइ सी है धूप.
न जाने आज क्यों?
कुम्हलाई सी है धूप.
आसमाँ के बादलों से
भरमाई सी है धूप.
पखेरूओं की चहचाहट से
क्यों बौराई सी है धूप?
पेड़ों की छाँव तले
क्यों अलसाई सी है धूप?
चैत के माह में भी
बेहद तमतामाई सी है धूप.
हवाओं की कश्ती पर सवार
क्यों आज लरज़ाई सी है धूप?
"मौलिक व…
ContinueAdded by Veena Sethi on July 24, 2014 at 5:30pm — 8 Comments
11212 11212 11212 11212
न तो आँधियाँ ही डरा सकीं , न ही ज़लजलों का वो डर रहा
तेरे नाम का लिये आसरा , सभी मुश्किलों से गुजर रहा
न तो एक सा रहा वक़्त ही , न ही एक सी रही क़िस्मतें
कभी कहकहे मिले राह में , कभी दोश अश्कों से तर रहा
कोई अर्श पे जिये शान से , कहीं फर्श भी न नसीब हो
कहीं फूल फूल हैं पाँव में , कोई आग से है गुज़र रहा
तेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी , हुआ मौत से जहाँ सामना
हुआ हासिलों…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 24, 2014 at 2:30pm — 22 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2014 at 10:55am — 14 Comments
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