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कठपुतली (प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा)

रंग बिरंगी पुतलियाँ, नयनन रही लुभाय

चित्त्तेरे भगवान् की, देखो महिमा गाय



पुतलियाँ निष्काम सदा, प्रेम से सराबोर

मानव फिर क्यों बन गया, कपटी लम्पट चोर



कठपुतलियाँ प्राण रहित, मानव में है जान

इनको नचाता मानव, मानव को भगवान



निरख निरख ये पुतलियाँ, मन है भाव विहोर

हाथों मेरे डोर है , मेरी प्रभु की ओर



रंग बिरंगी पुतलियाँ, मन को खूब लुभाय

नशा विहीन समाज हो , नाच नाच कह जाय



कठपुतले बन तो गये, पाकर तेरा रंग …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 4, 2014 at 4:00pm — 10 Comments

वो शख़्स मुनाफिक़ लगता है...

दुश्मन से मिलकर रहता है,

बस मीठी बातें करता है,

वो शख़्स मुनाफिक़* लगता है।



माने तो दिलजोई करना,

रूठे तो मनमानी करना,

है लाज़िम झगड़ा भी करना।



मन में जो आये कह देना,

दिल में पर मैल नहीं रखना,

ये ही मोमिन# का है गहना।



छल, पाप, कपट, मक्कारी है,

माना हर सू बदकारी है,

पर नेकी सब से भारी…

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Added by इमरान खान on August 4, 2014 at 2:04pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - गिरिराज भंडारी - - कभी झेली भी है शर्मिन्दगी क्या

कभी  झेली  भी है शर्मिन्दगी क्या

***************************

 1222      1222       122

कभी खुद से शिकायत भी हुई क्या

कभी  झेली  भी है शर्मिन्दगी क्या

 

बहुत  बाहोश खोजे , मिल न पाये

मिला  देगी  हमें अब  बेखुदी क्या

 

ये क़िस्सा,  दर्द- आँसू  से बना है

समझ  लेगी  इसे आवारगी  क्या

 

अगर सीने में सादा दिल है ज़िन्दा

बनावट  बाहरी क्या, सादगी  क्या

 

ख़ुदा…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 4, 2014 at 1:30pm — 30 Comments

चोका

मेघ निबह

श्याम श्वेत निर्मोही

भ्रम फैलाये

उड़ती घटा छाये

सूर्य आछन्न

दुविधा में फंसाए

काम बढाए

अकस्मात बरखा

बाहर डाले

कपड़े निकालते

फिर डालते

गृहलक्ष्मी दुचित्ता

क्रोध बढ़ाए

उलझौआ पयोद

वक्त कीमती

दुरुपयोग होता

वक्त भागता

सुना था कभी कही

खुद पे बीती

खीझ दुघडिया पे

भुनभुनाती

काम है निपटाने

प्रावृट् बदरा

तुझे सूझे नौटंकी

घुंघट ओढ़

हुई तू तो बावरी|

तंग गृहणी

मेघ निरंग निस्तारा

भ्रान्ति…

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Added by savitamishra on August 4, 2014 at 12:21pm — 19 Comments

ताव नित देते रहे..

ताव नित देते रहे..

ज्ञान के वटराज जिनको छॉंव नित देते रहे।

आरियों के वार से वो घाव नित देते रहे।।

कालिदासों को वही विद्योत्मा कैसे मिले,

पंडितों के ज्ञान को वो दॉंव नित देते रहे।

शब्द मुखरित सोच कुंठित कर्म कौरव का वरे,

धर्म के उत्कर्ष में बस ताव नित देते रहे।

चाहना की झाड़ में फॅस जब मलय वन त्यागते,

वक्त-सौरभ-धैर्य-साहस ठॉव नित देते रहे।

शारदे साहित्य व्यंजन में जगह कब द्वेष की,

मन-विषय-विष वासना…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 4, 2014 at 8:20am — 6 Comments

नज़रिया

बड़ा ख़राब जमाना आ गया है , अब घर में विधर्मी नौकर रख लिया है , कौन खायेगा , पियेगा उसके घर । राधा ऊँचे स्वर में अपने पड़ोसन को बता रही थी ।

" अरे हमसे कहा होता , हमने दिला दिया होता नौकर , कोई कमी है इनकी " । पड़ोसन ने भी हाँ में हाँ मिलायी ।

शाम को बेटी से बात करते हुई राधा ने पूछा " अरे कोई काम वाली मिली की नहीं " ।

" हाँ माँ , मिल गयी है , बहुत सफाई से काम करती है फातिमा " ।

" देखना बेटा , संभाल के रखना , आज कल टिकते नहीं ये लोग , समझी "

मौलिक एवम…

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Added by विनय कुमार on August 4, 2014 at 2:30am — 16 Comments

जिन्‍दगी से प्‍यार

कभी तो प्‍यार हमको वो किया होता

वफा के नाम पे धोखा दिया होता

तड़पती रूह को भी चैन आ जाता

कफ़न उसने हमारा गर सिया होता

शिकायत जिन्‍दगी से हम नहीं करते

दवा बन दर्द वो मेरा लिया होता

न मैखाने कभी जाते भुलाने गम

हमारे अश्‍क उसने गर पिया होता

हमें तो जिन्‍दगी से प्‍यार हो जाता

अगर वो साथ दो पल बस जिया होता

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on August 4, 2014 at 12:16am — 6 Comments

दोहे-रमेश चौहान

काम काम दिन रात है, पैसे की दरकार ।

और और की चाह में, हुये सोच बीमार ।।



रूपया ईश्वर है नही, पर सब टेके माथ ।

जीवन समझे धन्य हम, इनको पाकर साथ ।।



मंदिर मस्जिद देव से, करते हम फरियाद ।

अल्ला मेरे जेब भर, पसरा भौतिक वाद ।।



निर्धनता अभिशाप है, निश्चित समझे आप ।

कोष बड़ा संतोष है, मत कर तू संताप ।।



धरे हाथ पर हाथ तू, सपना मत तो देख ।

करो जगत में काम तुम, मिटे हाथ की रेख ।।



बात नही यह दोहरी,  है यही गूढ ज्ञान ।

धन…

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Added by रमेश कुमार चौहान on August 3, 2014 at 10:00pm — 7 Comments

दर्द कुछ और नहीं --डा० विजय शंकर

पूछा किसी ने मुझसे

दर्द क्या है ,

कैसा है ये , इसका

एहसास कैसा है .



दर्द कुछ और नहीं

सिर्फ एक नाम तुम्हारा है

दर्द कुछ और नहीं

सिर्फ एहसास तुम्हारा है .



दर्द टूटने का नहीं है,

दर्द बिखर जाने का है

दर्द कुछ खोने का नहीं है ,

खुद के खो जाने का है .



दर्द उसे खोनेका नहीं

जो अपना था, खो गया .

बल्कि उसके खोने का है ,

जो अपना कभी था ही नहीं .



यूँ तो कुछ था नहीं

जो वो ले गया

एक उम्मीद… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2014 at 7:46pm — 10 Comments

त्रिभंगी छंद

ये रिमझिम सावन, अति मन भावन, करते पावन, रज कण को ।
हर मन को हरती, अपनी धरती, प्रमुदित करती, जन जन को ।
है कलकल करती, नदियां बहती, झर झर झरते, अब झरने ।
सब ताल तलैया, डूबे भैया, लोग लगे हैं, अब डरने ।।
-----------------------------------------------------------

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on August 3, 2014 at 6:30pm — 10 Comments

मनन ...

डरी, सहमी सी लगती है

अंदर जो आवाज है

जिसे अन्तरात्मा कहते हैं

वो चुप है

इस निःशब्द वातावरण मे

वह चीख बनके

निकलेंगे कब ?

जिंदगी, आखिर ....

शुरू होगी कब ?

खुले मन से हँसी

आएगी कब ?

कब खिलखिलाकर

सच सच कहूँ तो

दाँत निपोर कर

आखिर हँसेंगे कब ?

बरसों से इस जाल मे बंधी

उसी राह पर चलते – चलते

आखिर हम बदलेंगे कब ?

थोड़ी आस,

थोड़ा विश्वास

धीरे धीरे पिघलता…

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Added by Amod Kumar Srivastava on August 3, 2014 at 6:30pm — 7 Comments

दोहा // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

बीच बाजारे हम खड़े , पाप पुण्य ले साथ

पुण्य डगर मैं बढ़ चलूँ , छोड़यो न प्रभु हाथ



पांडव बलहीन सदा, साथ न हो जब भीम

घर सूना कन्या बिना, अंगना बिना नीम



अंगना में लगाइये, तुलसी पौधा नीम

रोग रहित जीवन सदा, राखत दूर हकीम



व्यसन बुरे सब होत हैं, जानत हैं सब कोय

दूर रहें इनसे सदा , जीवन मंगल होय



दुर्दिन कछु दिन ही भले , मिलता जीवन ज्ञान

मित्र शत्रु और नारी की, हो जाती पहचान



बंधन ऐसा हो प्रभू , टूटे न कभी डोर…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 3, 2014 at 5:00pm — 10 Comments

वही साखी पुरानी है...

गजल -  वही साखी पुरानी है...

1222, 1222, 1222, 1222

वही काठी, वही जज्बा, वही लाठी पुरानी है।

हसीं बुत मिल गया जिसमें वही मिट्टी पुरानी है।

अॅंधेरों को मिटाकर रोशनी के साथ जलता जो,

वही सूरज, वही चन्दा, वही भट्टी पुरानी है।

जगा कर देश को जिसने बढाया मान-मर्यादा,

वही पत्रक, वही पोथी, वही रद्दी पुरानी है।

दिला कर मंजिले पर्वत शिखर का कद किया बौना,

वही धागा कलाई का वही रस्सी पुरानी है।

जला कर दीप…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 3, 2014 at 2:14pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेज़ के उपर सब कुछ शांत है , ( अतुकांत ) गिरिराज भंडारी

मेज़ के उपर सब कुछ शांत है

*************************

बड़ी सी मेज , साफ मेजपोश

ताज़े फूलों के गुलदस्तों सजी

करीने से लगी कुर्सियाँ

 

अदब से बैठे हुये अदब की चर्चा मे मशगूल

सभ्यता और संस्कृति की जीती जागती मूर्तियाँ

सामाजिक बुराइयों से लड़ते जो कभी न थके

सामाजिक उन्नति के नये-नये मानक गढ़ते 

सब कुछ कितन भला लग रहा है , मेज के ऊपर

सामान्यतया क़रीब से देखने में

लेकिन ,

जो दूर बैठा है उस मेज से

देख सकता है…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 3, 2014 at 1:30pm — 20 Comments

नव-निर्माण..(लघुकथा)

सुरेश रात-दिन कितनी भी शरीर-तोड़ मेहनत कर ले, अपनी पत्नि रजनी और दोनों बच्चों के खर्च के साथ-साथ मोबाईल, मोटर-साइकिल,मकान का किराया सब कुछ वहन नहीं कर सकता. अब पेट काटकर धीरे-धीरे अपना घर बनाना शुरू तो कर दिया पर कभी सीमेंट ख़त्म, तो कभी लोहा.

लेकिन.. जब से सुरेश से कहीं ज्यादा कमाने वाले मित्र, अशोक का उसके यहाँ आना-जाना शुरू हुआ है, तब से घर का काम दिन दोगुना -रात चौगुना चल रहा है. आजकल तो सुरेश अपने घर के बंद दरवाजे के बाहर अशोक के जूतों को देख, अपने नए बन रहे घर कि ओर चला…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 3, 2014 at 12:30pm — 30 Comments

‘रेप’ को जोकर सरीखों ने कहा जब बचपना - ग़ज़ल

2122    2122    2122    212

*******************************

एक   सरकस   सी   हमारी   आज  संसद  हो गयी

लोक हित की इक नदी जम आज हिमनद हो गयी

**

जुगनुओं से  खो  गये  लीडर  न  जाने फिर कहाँ

मसखरों  की आज  इसमें  खूब  आमद  हो गयी

**

‘रेप’ को  जोकर  सरीखों ने  कहा  जब  बचपना

जुल्म  की  जननी खुशी से  और गदगद हो गयी

**

दे  रहे  ऐसे  बयाँ,  जो   जुल्म   की   तारीफ  है

क्योंकि  सुर्खी  लीडरों का आज मकसद हो गयी

**

जुल्म  की  सरहद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 3, 2014 at 9:00am — 26 Comments

कुक्कुर

" बाऊ , आज त पेट भर खाए के मिली न " लखुआ बहुत खुश था । आज ठकुराने में एक शादी थी और लखुआ का पूरा परिवार पहुँच गया था । पूरा दुआर बिजली बत्ती से जगमग कर रहा था और चारो तरफ पकवानों की सुगंध फैली हुई थी ।

" दुर , दुर , अरे भगावा ए कुक्कुर के इहाँ से " , चच्चा चिल्लाये और दो तीन आदमी कुत्ते को भगाने दौड़ पड़े । लखुआ भी डर के किनारे दुबक गया । तब तक उन लोगों की नज़र पड़ गयी इन पर " ऐ , चल भाग इहाँ से , अबहीं त घराती , बराती खईहैं , बाद में एहर अईहा तू लोगन " । फिर याद आया कि पत्तल भी तो उठवाना…

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Added by विनय कुमार on August 3, 2014 at 3:34am — 28 Comments

मेरी अमरनाथ यात्रा के 2014

यात्रा का प्रथम चरण---गहमर से वाराणसी

मैं बाबा बरफानी की यात्रा का मन बना चुका था। परिवार से इजाजत और दोस्‍तो की सलाह के बाद यह इच्‍छा और बलवती हो गयी। मैने मन की सुनते हुए 23 जुलाई की तिथी निश्‍चित किया और अपने काम में लग गया। घर से महज 200 मीटर की दूरी पर भी अारक्षण केन्‍द्र होने के वावजूद मैं आरक्षण नहीं करा पाया आैर न ही किसी प्रकार की तैयारी कर रहा था।धीरे धीरे 18 जुलाई आ गया तब जा कर मैने अपना आरक्षण कराया, इस दौरान गहमर…

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Added by Akhand Gahmari on August 2, 2014 at 10:00pm — 12 Comments

नवगीत : जैसे कोई नन्हा बच्चा छूता है पानी

मेरी नज़रें तुमको छूतीं

जैसे कोई नन्हा बच्चा

छूता है पानी

 

रंग रूप से मुग्ध हुआ मन

सोच रहा है कितना अद्भुत

रेशम जैसा तन है

जो तुमको छूकर उड़ती हैं

कितना मादक उन प्रकाश की

बूँदों का यौवन है

 

रूप नदी में छप छप करते

चंचल मन को सूझ रही है

केवल शैतानी

 

पोथी पढ़कर सुख की दुख की

धीरे धीरे मन का बच्चा

ज्ञानी हो जाएगा

तन का आधे से भी ज्यादा

हिस्सा होता केवल…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 2, 2014 at 8:58pm — 26 Comments

तकदीर

कभी कभी

सोचती हूँ मैं

जब हाथ भरा है लकीरों से

कुछ तो मतलब होगा इसका 

हरेक के कोई मायने होंगे

कौन कौन सी लकीर किस किस तक़दीर के नाम

यह तो बताये कोई

मुझे समझाए कोई

सुना था...

हाथों की चंद लकीरों का

यह खेल है बस तकदीरों का

अपने हाथ में लकीरें तो बहुत हैं

पर तक़दीर शायद रूठ गई है

आप ठीक कहते थे

बदल जाती हैं तकदीरें

अगर मेहनत से हाथ की लकीरें बदल दी जाएँ

इसीलिए करती हूँ…

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Added by Sarita Bhatia on August 2, 2014 at 5:00pm — 14 Comments

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