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March 2012 Blog Posts

मोबाइल घर

मोबाइल घर

(दोस्तों हम लोगों की एक जमात से बन गयी है जहाँ एक कवि लिखता है और दूसरा पढता है मंझे हुए कवि मंझी हुई कविता  सब कुछ एकदम प्रोफेशनल मगर कोई स्थिति जिसको आप ने देखा हो और आपके दिल में अन्दर तक उतर गयी हो उस विषय पर जब आप लिखते हैं तो बात कुछ और…

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Added by Mukesh Kumar Saxena on March 14, 2012 at 8:00pm — 5 Comments

कल्पद्रुम

मेरा नीड़ जिस पेड़ पर है

लोग उसे कल्पद्रुम कहते हैं

जनविश्रुत है-

वह सब कुछ देता है

जो उससे मांगा जाता है

क्या यह सच है?

मेरे देखने में तो नहीं।

क्यों?

क्योंकि

वह कल्पद्रुम खामोश सा

खड़ा रहता है

अहर्निश!!!

उसके पत्ते गिर रहे हैं

सड़-सड़ कर

टहनियां सूख रही हैं

जड़ें धीरे-धीरे

ऊपर आ रहीं हैं

वह प्यासा मर रहा है

एक घूंट पानी बिन

कार्बन डाई ऑक्साइड के बजाय

ऑक्सीजन ले रहा है

अब वह खामोश… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2012 at 7:45pm — 6 Comments

ग़ज़ल

हाँ मेरे पास कोई सहारा नहीं,

मगर मैं बेबस बेचारा नहीं;

*

सोचता हूँ कुछ मैं भी कहूँ अब

मगर ज़ुबान को ये गवारा नहीं;

*

वो जिसे हम अपना समझते रहे,

आज जाना के वो हमारा नहीं;

*

थोड़ी सी ज़मीन मुट्ठी भर आसमान,

आज…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 14, 2012 at 12:36pm — 18 Comments

तन्हाई बोली .. ! !

.

मैं

और

तन्हाई

लड़ते रहते हैं

कभी बिखरते

कभी संवरते

रहते हैं.

ओ तन्हाई !

तुम क्यों

दुःख -पीड़ा को

रखती हो अपने साथ

फिरती हो यहाँ वहां

लिये हाथों में हाथ .

तन्हाई मुस्काई

कुछ इठलाई

बोली ...

बचपन की यादें

मोहब्बत के बातें

कहानी कहती नानी

रिमझिम बरसता पानी

पहली मुलाकात

महबूब की बात

उनका इतराना

रूठना मनाना

सब के…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on March 14, 2012 at 11:57am — 6 Comments

दिन फिर गये जो जी रहे अब तक अभाव में

दिन फिर गये जो जी रहे अब तक अभाव में,

वादों से गर्म दाल परोसी चुनाव में.

ढूंढे नहीं  मिला एक भी रहनुमा यहाँ,

सच कहने सुनने की हिम्मत रखे स्वभाव में.

 

तब्दीलियाँ है माँगते यों ही सुझाव में,

फिर भेज दी है मूरतियां डूबे गाँव में,

दिल्ली में बैठ के समझेंगे वो बाढ़ को,

लाशें यहाँ दफ़न होने जाती है नाव में.

 

पूछा क्या रखोगे…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 14, 2012 at 10:00am — 14 Comments

चंद अशआर

अरे शिकवा नहीं कोई,शिकायत क्या करू तुझसे?

वली है तू सनम मेरा,इबादत की इजाजत दे||१||



बहुत अब देख ली दुनिया,नहीं अब देखना कुछ…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 14, 2012 at 8:30am — 19 Comments

मेरे हाइकू

(१)

जागरण की

वेला में सो रही है

सारी दुनिया|

(२)…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 13, 2012 at 11:18pm — 6 Comments

"समय और भाग्य"

"समय और भाग्य"

सब कुछ भले न सही, पर 

कुछ कुछ सबको मिला है ,

और यही कुछ कुछ एहसास कराता है की …

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Added by Monika Jain on March 13, 2012 at 9:20pm — 7 Comments

तेरी याद



ब्रज मां होली खेले मुरारी अवध मां रघुराई

मेरा संदेसा पिया को दे जो जाने पीर पराई

 

 

कोयल को अमराई मिली कीटों को उपवन

मैं अभागिन ऐसी रही आया न मेरा साजन

 

लाल पहनू , नीली पहनू,  हरी हो  या वसंती

पुष्पों की माला भी तन मन शूल ऐसे  चुभती

 …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 13, 2012 at 9:03pm — 20 Comments

दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,,,,,,

दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,

----------------------------------------------------------

 …

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2012 at 6:30pm — 16 Comments

खुशबू के घर

दुआ जिनको सच्चे दिलों से मिले.

ऐसे बन्दे बड़ी मुश्किलों से मिले!
*
रहगुज़र जिनकी बस खार ही खार थी,
उनकी खुशबू के घर मंजिलों पर मिले.
*
क़त्ल करके खुले आम जो छिप गए,
सरे - शाम वो  महफ़िलों  में  मिले.
*
जिनकी बैठक शहर के अखाड़ों में थी, 
वक़्त आया तो  वे  बुजदिलो में मिले.
*
चार पैसे जो मुट्ठी में क्या आ गए,
यार बिछड़े हुये तंगदिलों में…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 13, 2012 at 11:04am — 6 Comments

कविता : - स्नेह अटल है !

कविता : - स्नेह अटल है !
 …

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Added by Abhinav Arun on March 13, 2012 at 9:58am — 23 Comments

प्यार का आल्हा

चढ़ल जवानी कै उदल जब,देहिया गढ़ के ऊपर नाय।

नैना यकटक देखन लागे,पुरवा चले देह घहराय॥

चन्द्रमुखी जब तिरछा ताकै,तन के आरपार होइ जाय।

मारै मुस्की जब धीरे से,दिल कै टूक-टूक उड़ि जाय॥

उड़ै दुप्ट्टा जब कान्हे से,मानौ दुइ गिरिवर बिलगाय।

देख के गोरिक भरी जवानी,लरिके मंद-मंद मुस्काय॥

आओ पंचो प्यार कै आल्हा,सुनि लौ आपन कान लगाय।

अइसन मौका फिर जिन्गी में,शायद मिलै न कब्भो आय॥

जेका यह जिन्गी में कब्भो,प्यार के रोग लगा है नाय।

मानों वै मानो कै जोनी,आपन विरथा दिहिन… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 13, 2012 at 7:01am — 25 Comments

आगाज़...

मैनें कहा

कुछ और नहीं

सिर्फ वो ही

जो युगों से

सहा था...

सहा था फूलों नें

ख्वाबों में लहराते

सावन के झूलों नें

उन शब्दों नें

जो आ न पाए

लबों पर तुम्हारे ही

ज़ुल्मों से ...

सहा था उस प्यासे नें...

जो दम तोड़ गया

समंदर में रह कर

पर छू न पाया

पानी को जुबान से कभी.

सहा था उन पलकों नें...

जो युगों से भरी हैं

अनमोल मोतियों से

आतुर हैं

छलकने को

पर…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on March 12, 2012 at 11:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल



आँखों में भरे खूँ लिए तलवार खड़ा है 

करने को मुझे कत्ल मेरा यार खडा है

.

दे दे तु मुझे अपनी दुआओँ का सहारा

चोखट पे तेरी आज ये बीमार खडा है

.

जाने दे मुझे मौत की आगोश मे हमदम

क्योँ बनके मेरी राह मे दीवार खडा है

.

मरकर ही सही  आज ये एजाज मिला तो 

करने को मेरा आज वो दीदार खडा है

.

गर मुझको मिटाने का वो रखते हें इरादा

हसरत भी फना होने को तय्यार खडा…

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Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on March 12, 2012 at 11:30pm — 18 Comments

चेहरे.....

चेहरे के पीछे

चेहरे है

उन पे कसे नकाब

बड़े तगड़े है..

मीठे बोलो के भीतर

तीखेपन का खंजर है..

घावों पे मरहम तो है

पर दाग बने गहरे है

लोग बने मदारी है.. और

समझे हमे जमूरा

मतलब की यारी है और

जमकर सीनाजोरी है

संभल संभल के हँसना है और

नाप तोल के कहना

मन के दुखड़े खोले तो

कहते है रोना धोना

खुल के जीने का

दम भर लो कितना भी

पर बच बच के है रहना

दुनिया गर…

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Added by MAHIMA SHREE on March 12, 2012 at 5:30pm — 16 Comments

नज़्म - निमिष भर को उथल है !

नज़्म - निमिष भर को उथल है !

 

सफ़र कटने में अंदेशा नहीं है

मगर सोचा हुआ होता नहीं है

कई लोगों को छूकर जी चुका हूँ

नहीं…

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Added by Abhinav Arun on March 12, 2012 at 4:39pm — 14 Comments

मैंने जीना चाहा था

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था,

चाक कलेजे के ज़ख्मों को मैंने सीना चाहा था;

जो भी आया उसने ही कुछ दुखते छाले फोड़ दिए,

वहशत की आग बुझाने को मेरे सब सपने तोड़ दिए;

तेरे आँचल के धागों से रिसना ढकना चाहा था,

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी- मैंने जीना चाहा था |

अपनी ही रुसवाई…

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Added by Chaatak on March 12, 2012 at 11:31am — 22 Comments

तेरी याद

सोचा था

तेरी याद के सहारे

जिंदगी बीता लूंगा

अब न तेरी याद आती है

न ही जिंदगी के दिन ही बचे

जो बचे भी उनमें क्या तेरे मेरे

क्या सुबह, क्या शाम

बस एक ही तमन्ना है

जहां भी रहो मुझे याद करना

क्योंकि तुम याद करोगे तो

दुनिया से जाते वक्त गम न होगा

क्योंकि तुम, तुम हो और हम, हम

राहें जुदा हो गई तो क्या

कभी मिलकर चले थे मंजिल की ओर

अब तो सोच कर भी सोचता हूं

क्यों मिले थे हम और क्यों बिछड़े

सोचता हूं

तेरी याद को ही…

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Added by Harish Bhatt on March 12, 2012 at 2:49am — 6 Comments

"कशमकश"

"कशमकश"

क्यों वक़्त से पहले ये वक़्त भागता सा लगे है मुझे. 

फिर भी क्यों ये ज़िन्दगी थमी सी लगे है मुझे ?

एक अजीब सी कशमकश है! क्या? मालूम नहीं.

पर कभी सब पास तो कभी सब दूर सा लगे है मुझे.…

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Added by Monika Jain on March 12, 2012 at 2:18am — 4 Comments

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