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शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता-

रुष्ट-त्रिसोता त्रास दी, खोले नेत्र त्रिनेत्र |
बदी सदी से कर गए, सोता पर्वत क्षेत्र |


सोता पर्वत क्षेत्र, बहाना कुचल डालना |
मरघट बनते घाट, शांत पर महाकाल ना |


शिव गंगा का रार, झेल के जग यह रोता |
नहीं किसी की खैर, त्रिलोचन रुष्ट त्रिसोता ||

त्रिसोता= गंगा जी

मौलिक/ अप्रकाशित

Added by रविकर on June 26, 2013 at 12:00pm — 6 Comments

चुनावी साल में नेता जी

आज हर ओर खुदी है सड़क

खड्डों मिट्टी की है भरमार

क्योंकि चुनाव को रह गया है एक साल



इसलिए हरेक नेता जी को

सड़क अब टूटी नज़र आने लगी है

अपनी बेरूख़ी जनता अब भाने लगी है

अब सफाई वाला ,कूड़ा उठाने वाला हाज़िरी लगाने लगे…

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Added by Sarita Bhatia on June 26, 2013 at 10:00am — 22 Comments

क्या विधि लिखूँ सत्य वह …!

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह …!

जिसका विधान न हो!

न अनुनय के शब्द रहे 

तेरी प्रार्थना रिक्त रहे 

और प्रार्थी का तुझ

सम्मुख; कोई मान न हो 

क्या विधि लिखूँ  सत्य वह…

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Added by वेदिका on June 26, 2013 at 2:30am — 26 Comments

कविता--सबको बरसात अच्छी लगती है

सबको बरसात अच्छी लगती है

किन्तु कब तक ये अच्छी लगती है।

कम दिनों के लिये सुहानी है

थोडी-थोडी पडे तो पानी है

ज्यादा तो मौत की कहानी है

इसकी कुछ बात अच्छी लगती है

सबको बरसात अच्छी लगती है .......।

सब नदी-नाले ये चलाती है

रास्ते भी यही बनाती है

हमको चलना यही सिखाती है

हर मुलाक़ात अच्छी लगती है

सबको बरसात अच्छी लगती है........

पेड-पौधों का सबका कहना है

साथ इसके सभी को रहना…

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Added by सूबे सिंह सुजान on June 25, 2013 at 11:30pm — 14 Comments

प्रतीक्षा / कविता

पुष्प से सुन्दर,कोमल हृदय में 

लिए एक मधुर-सी- आकांक्षा।

सुन्दर होंगे क्षण प्रिय-मिलन के ,

 सदा करती हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा।

मेरे इस जीवन का एकमात्र

सुन्दर-मधुर स्वप्न हो तुम।

जिसे अब तक नहीं जानती मैं,

मेरे वो अज्ञात प्रियतम हो तुम।

तुम्हारे दर्शन को व्याकुल आत्मा।

सदा करती हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा। 

तुम स्वप्न हो मेरे जीवन का,

अनुपम आनंद देती ये कल्पना।

पर उस क्षण मैं जाती हूँ काँप,

जब पाती हूँ तुम्हें केवल सपना।

कैसे…

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Added by Savitri Rathore on June 25, 2013 at 9:03pm — 10 Comments

दोहा (हास्य )

खा खाकर मोटी हुई,जैसे मोटी भैंस !

मै दुबला होता गया ,मेरे धन पे ऐश !!

सुबह शाम गाली सुनूँ ,हरदम करती चीट !

धोबी का सोटा उठा ,अक्सर देती पीट !!

मै घर का नौकर बना ,झेलूँ बस उपहास !

रूठ विधाता भी गये,जाऊं किसके पास !!…

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Added by ram shiromani pathak on June 25, 2013 at 8:30pm — 48 Comments

कुंडलिया छंद

सत्ता मद में चाहिए, येन केन बस वोट,

गधे तो कहे बांप तो,उसमे क्या है खोट |                                                                                                                                                              

उसमे क्या है खोट, जो नित भार ही ढोता

सत्ता का वह मीत, बोलता  जैसे  तोता    

जीत पर बदल आँख,बता जनता को धत्ता,

नेता की क्या साख, मिले कैसें भी सत्ता |

(२)

गंगा जल में छुप गये,झट से भोले नाथ,

केदारनाथ धाम में,…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 25, 2013 at 4:00pm — 19 Comments

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई

खानापूरी हो चुकी, गई रसद की खेप ।

खेप गए नेता सकल, बेशर्मी भी झेंप ।

बेशर्मी भी झेंप, उचक्कों की बन आई ।

ज़िंदा लेते लूट, लाश ने जान बचाई ।…

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Added by रविकर on June 25, 2013 at 3:30pm — 13 Comments

!! मेरी लाडो !! एक प्रयास शक्ति को जगाने का

!! मेरी लाडो !!

 “ मेरी लाडो ” समर्पित है उन तमाम बहन बेटियो को जो किसी न किसी हादसो के कारण से अपने वजूद अपने अस्तिव को भुला चुकी है या फिर हार मानके अपनी किस्मत को दोष दे रही है । ये एक प्रयास है…

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Added by बसंत नेमा on June 25, 2013 at 2:30pm — 18 Comments

मन्त्रमुग्ध

मन्त्रमुग्ध

 

जाने हमारे कितने अनुभवों को आँचल में लिए

ममतामय पर्वतीय हवाएँ गाँव से ले आती रहीं

रह-रह कर आज सुगन्धित समृति तुम्हारी...

तुम्हारी रंगीन सुबहों की स्वर्णिम रेखाएँ

बिछ गईं थी तड़के आज आँगन में मेरे

कि जैसे झुक गई थीं पलकें उषा की सम्मानार्थ,

विकसित हुए फूल हँसते-हँसते मन-प्राण में मेरे।

 

खुशी में तुम्हारी मैं फूला नहीं समाता, यह सच है,

सच यह भी, कि मन में मेरे रहती है सोच तुम्हारी…

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Added by vijay nikore on June 25, 2013 at 7:30am — 28 Comments

दोहे : देवभूमि का दर्द !

भक्तों के मुख मलिन हैं ,पूजा-गृह में गर्द ,

प्रभु अपने किससे कहें देव-भूमि का दर्द !



हुई न ऐसी त्रासदी जैसी है इस बार ,

प्रभु ने झेली आपदा बदरी क्या केदार !



बादल,बारिश,मृत्यु के कारण बने पहाड़ ,

धरती काँपी,मनुज के थर-थर काँपे हाड़…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 24, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

छटपटाया बहुत चाँद

छटपटाया बहुत चाँद

-------------------------

रात बारिश बहुत जोर की थी प्रिये

देख चेहरा तेरा चाँद में खो गया…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 24, 2013 at 10:30pm — 19 Comments

"वादा करो"

मै खड़ा हूँ यूँ बांहों को खोले हुए

मेरी बाँहों में आने का वादा करो

मै जहाँ ये भुला दूँगा सुन लो मगर

मुझको दिल में बसाने का वादा करो



मै जो अब तक अकेला हूँ जीता रहा

धुंधले ख्वाबों को आँखों से सीता रहा

ये जो कोरी पड़ी है मेरी जिंदगी

रंग अपना चढ़ाने का वादा करो



मै खड़ा हूँ यूँ बांहों को खोले हुए

मेरी बाँहों में आने का वादा करो



तुम जो रूठी तो तुमको मना लूँगा मै

तुमको पल भर में अपना बना लूँगा मै

मै भी रूठूँगा…

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Added by Anurag Singh "rishi" on June 24, 2013 at 6:30pm — 16 Comments

आल्हा छंद - प्रथम प्रयास

गड़ गड़ करता बादल गर्जा, कड़की बिजली टूटी गाज

सन सन करती चली हवाएं, कुदरत हो बैठी नाराज

पलक झपकते प्रलय हो गई, उजड़े लाखों घर परिवार

पल में साँसे रुकी हजारों, सह ना पाया कोई वार

डगमग डगमग डोली धरती, अम्बर से आई बरसात

घना अँधेरा छाया क्षण में, दिन…

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Added by अरुन 'अनन्त' on June 24, 2013 at 3:00pm — 22 Comments

अचानक ..

क्या हुआ, कैसे हुआ ..

या हुआ अचानक ..

देखते देखते बदल गया..

स्वयं का कथानक ..

परछईओं ने भी छोड़ दिए ...

अब तो अपना दामन…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 24, 2013 at 12:30pm — 8 Comments

मत्तगयन्द सवैया - अरुन शर्मा 'अनन्त'

आदि अनादि अनन्त त्रिलोचन ओम नमः शिव शंकर बोलें
सर्प गले तन भस्म मले शशि शीश धरे करुणा रस घोलें,
भांग धतूर पियें रजके अरु भूत पिशाच नचावत डोलें
रूद्र उमापति दीन दयाल डरें सबहीं नयना जब खोलें

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on June 24, 2013 at 10:59am — 23 Comments

जेठ को दोषी पाया-

तपत तलैया तल तरल, तक सुर ताल मलाल ।

ताल-मेल बिन तमतमा, ताल ठोकता ताल ।

ताल ठोकता ताल, तनिक पड़-ताल कराया ।

अश्रु तली तक सूख, जेठ को दोषी पाया ।…

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Added by रविकर on June 24, 2013 at 9:30am — 6 Comments

हाइकू ज़िंदगी के ~

ज़िंदगी भली 

रुलाती भी है कभी 

करमजली !

~

~…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 23, 2013 at 10:30pm — 7 Comments

बरसात से बर्बादी/ चौपाई एवं दोहों में/ जवाहर

प्रस्तुत रचना केदारनाथ के जलप्रलय को अधार मानकर लिखी गयी है.

चौपाई - सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.

भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.

पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.

बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!

रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई

अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा

पंथ बीच जो कोई आवे. जल धारा सह वो बह जावे.

छिटके पर्वत रेतहि माही,…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 23, 2013 at 6:00pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उत्तराखंड की तबाही (आल्हा छंद पर आधारित )

ऐसी  प्रलय भयंकर आई ,होश मनुज  के दियो उड़ाय   

काल घनों पर उड़ के आया  ,घर के दीपक दियो बुझाय 

पिघली धरा मोम  के जैसे ,पर्वत शीशे से चटकाय 

ध्वस्त हुए सब मंदिर मस्जिद ,धर्म कहाँ कोई बतलाय 

बच्चे बूढ़े युवक युवतियां ,हुए जलमग्न कौन बचाय 

शिव शंकर  आकंठ डूबे  , चमत्कार नाही  दिखलाय 

केदारनाथ शिवालय भीतर,ढेर लाश के दियो लगाय 

मौत से लड़कर बच गए जो ,उनकी पीर कही ना जाय 

नागिन सी फुफकारें नदियाँ ,निर्झर  गए खूब पगलाय 

पर्वत हुए खून…

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Added by rajesh kumari on June 23, 2013 at 3:15pm — 33 Comments

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