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तीन दोहे ...............डॉ० प्राची

प्रेम अगन करती सदा, चेतन का विस्तार

रोम-रोम तप भाव-तन, धरे नवल शृंगार

 

मैं-तुम भेद-विभेद हैं, मायावी मद भ्राम

द्वैत विलित अद्वैत सत, चिदानन्द अविराम

 

सूक्ष्म धार ले स्थूल तन, पराश्रव्य हो श्रव्य

गुह्य सहज प्रत्यक्ष हो, सधें नियत मंतव्य 

डॉ० प्राची 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Dr.Prachi Singh on October 16, 2014 at 11:00pm — 18 Comments

लघुकथा : आस्तीन

"अरे, बड़ा अजीब सा नाम लगा इस बंगले का, आस्तीन भी कोई नाम है !" शहर में नए आये व्यक्ति ने दोस्त से पूछा !

"जी, ये बंगला जिन्होंने बनवाया वो अब वृद्धाश्रम में रहते हैं !"

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Neeles Sharma on October 16, 2014 at 7:00pm — 13 Comments

लघुकथा : उलट गीता

"देखो जी, जवान लड़का है ,गलती हो गयी ! लड़की बेशक बलात्कार कहे, कमी उसमें भी होगी !"

"जान लगा दूंगा ,बेटे को जेल न जाने दूंगा !"

पिता ने ये कहते हुए चिंतातुर माँ को दिलासा दी !

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by Neeles Sharma on October 16, 2014 at 6:30pm — 6 Comments

घर-घर रोशनी-एक मिशन

घर-घर रोशनी

एक नागरिक के रूप में हम सब सरकार से अधिकाधिक सुविधा चाहते हैं परंतु जब कर्तव्य-पालन की बात आती है हममें से अधिक्तर दुसरे की तरफ देखते हैं | जव फला व्यक्ति की ड्यूटी है अगर वो नहीं करता तो हम क्यों सिर-दर्द लें ?भले ही हम ना माने पर यही रवैया हमारे जीवन को प्रभावित करता है |हममे से जो भी लोग टैक्स देते हैं वे सभी सरकार और अन्य एजेंसीयों से आशा रखते हैं की हमे बेहतरीन सुविधा सरकार उपलब्ध कराए |हम सभी चाहते हैं की हमारी गलियाँ-सड़के-मेन-रोड रात्रि को प्रकाशमय रहें |और सरकार इस…

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Added by somesh kumar on October 16, 2014 at 11:30am — 3 Comments

गीत : जीवन चुपके से बीत गया*

*जीवन चुपके से बीत गया*



जीवन का जो पल बीत गया

जो पल जीने से शेष रहा

पहचान नहीं कर पाया मन,

पल धीरे धीरे रीत गया

जीवन .....



ऐसे जी लूँ वैसे जी लूँ

जीवन कैसे कैसे जी लूँ

तैयारी मन करता ही रहा,

रोज लिखूँ कोई गीत नया।

जीवन....



सब अंधी दौड़ के प्रतियोगी

योगी मन भी बनते भोगी

अजब निराली मन की तृष्णा,

जब भी जीती मन भीत गया।

जीवन.....



खुद को जानूँ जग को मानूँ

जीवन रहस्य सब पहचानूँ

जग सृजक…

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Added by seemahari sharma on October 16, 2014 at 10:30am — 18 Comments

ग़ज़ल - धरती दीपक से जगमगानी है - पूनम शुक्ला

2122 2212 22

फिर अमावस की रात आनी है

हमने भी पर लड़ने की ठानी है



है अँधेरा औ चाँद खोया फिर

ये तो पहचानी इक कहानी है



रात आएगी जग छुपा लेगी

धरती दीपक से जगमगानी है



ऐ खुदा तुमने तो सजा दी थी

प्रेम की ये भी इक निशानी है



गम के भीतर ही सुख छुपा होगा

बात ये भी तो जानी मानी है



बीज सूरज के आओ बो दें फिर

खेती आतिश की लहलहानी है



चल अमावस को फिर बना पूनम

ये तो आदत तेरी पुरानी है ।…

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Added by Poonam Shukla on October 16, 2014 at 10:00am — 5 Comments

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ : नीरज नीर

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ,

नापना गगन वितान चाहता हूँ ।

फुनगियों पर अँधेरा है

आसमान में पहरा है।

जवाब है जिसको देना

वो हाकिम ही बहरा है।

तमस मिटे नव विहान चाहता हूँ।

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,

नापना गगन वितान चाहता हूँ।

अंबर कितना पंकील है,

धरा पर लेकिन सूखा है।

दल्लों के घर दूध मलाई,

मेहनत कश पर भूखा है।

पेट भरे ससम्मान चाहता हूँ।

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,

नापना गगन वितान चाहता…

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Added by Neeraj Neer on October 16, 2014 at 9:07am — 14 Comments

मन में लड्डू फूटा (लघुकथा)

"भैया डीजल देना"

"कितना दे दूँ भाईसाब ?"

"अरे भैया दे दो दस पन्द्रह लिटर, देख ही रहे हो आजकल लाईट कितनी जा रही है|  रोज-रोज दूकान के चक्कर कौन लगाये|"

"हा भाईसाब इस सरकार ने तो हद कर दी है|" जैसे उसके दुःख में खुद शामिल है दूकानदार

शाम को वही दूकानदार आरती करते वक्त- "हे प्रभु अपनी कृपा यूँ ही बनाये रखना| यदि साल भर भी ऐसे ही…

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Added by savitamishra on October 15, 2014 at 10:30pm — 21 Comments

ग़ज़ल

बचो इस से कि ये आफत बुरी है
नशा कैसा भी हो आदत बुरी है


पतन की ओर गर जाने लगे हो
यकीनन आपकी संगत बुरी है


कि सिगरेट मदिरा गुटका या कि खैनी
किसी भी चीज़ की चाहत बुरी है


हमें मालूम है मरना है इक दिन
मगर इस मौत की दहशत बुरी है


कमाया है जिसे इज्ज़त गँवा कर 
अजय अज्ञात वो दौलत बुरी है

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Ajay Agyat on October 15, 2014 at 5:30pm — 3 Comments

तेरी सूरत

तेरी सूरत   बहुत     खूबसूरत  सही

तेरी सूरत  सी कोई भी सूरत नहीं

तेरी सूरत  से  जो     रूबरू हो गया

उसके बचने  की कोई  सूरत नहीं I

 

तेरी सूरत के जलवे फिजाओं में है

तेरी सूरत की   चर्चा  हवाओं   में है

तेरी सूरत में  है जैसी मस्ती भरी

वैसी कोई  अजंता की   मूरत नहीं I

 

तेरी सूरत में  गंगा   की     पाकीजगी

तेरी सूरत में आशिक की आवारगी

तेरी सूरत ही   सूरत   ख्यालों   में है

तुझसे मिलने का कोई महूरत नहीं…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 15, 2014 at 5:00pm — 10 Comments

गज़ल : वो कहानी है नहीं.

हट गया तूफ़ान जुल्मत वो कहानी है नहीं.

हो गये आज़ाद हम सब अब गुलामी है नहीं.

फूट के कारण हमेशा लुट रहा हिन्दोस्तां,

बँट गए टुकड़े अलहदा एकनामी है नहीं.

ये मुसल्माँ वो है हिन्दू धर्म ये किसने गढ़े,

भेद इंसानों में करते धूप पानी है नहीं.

स्वर्ण पंछी देश था ये जानता सारा जहाँ,

आज वो वैभव पुनः पाने की ठानी है नहीं.

मुल्क को नीलाम करते देश के गद्दार ये,

कोई नेता देश सेवक खेजमानी है…

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Added by harivallabh sharma on October 15, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

स्वामी (लघुकथा)

विश्वविख्यात संस्था के दो स्वामी जी मेरे घर पधारे ।

मैने आवभगत के पश्चात प्रश्न किया ; "महाराज आपको स्वामी क्यों कहा जाता है? "

उन्होने कहा; "जो अपने मैं का अर्थात् अहं का स्वामी हो। जिसे संसार के छल-छद्म डिगा न सके। जो गुणातीत हो, भावातीत हो। जिसे आत्मज्ञान हो गया हो वह स्वामी कहलाता है।"

"ओह ! कितने पहुँचे हुये हैं साधु-महाराज हैं।तुरीयावस्था को प्राप्त ।" मैं श्रद्धा से नत-मस्तक ।



थोडे दिन बाद सुना कि उनमें से एक स्वामी जी ने नाराज़ होकर दूसरा आश्रम स्थापित कर…

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Added by Dr.sandhya tiwari on October 15, 2014 at 2:30pm — 7 Comments

गहनों का भार

बहू के बदन पर देख,

'गहनों का भार'... 
छलक उठा ससुराल वालों की आँखों में, सोया हुआ प्यार । 
सास! बलाएँ लेकर, बहू को गले से लगाएँ,
ससुर! मूंछों पर ताव देते, ख़ुशी से फूले न समाएँ,
ननद! भाभी की सुहाग-सेज, फूलों से सजाएँ,
पति! गुलाब-जल छिड़क, पत्नी का घूंघट उठाएँ ॥ 
बहू के बदन पर देख,
'गायब गहनों का भार'... 
छलक उठा ससुराल वालों की आँखों में, हिंसक व्यवहार । 
सास! बद्दुआएँ देकर,…
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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 15, 2014 at 11:27am — 6 Comments

देख ह्रदय के घाव (दोहे)

मोती  सी बूंदे सजल, प्रकट करे मन भाव, 
अश्क छलकते कह रहे, देख ह्रदय के घाव |
 
अश्को में पानी भरा, समझो इसका मोल  
जिसके नैनन जल दिखे,उसका ह्रदय टटोल, 
 
देखों शिशु के पास में, आँसू ही हथियार 
देख बिलगता भूख से, दूध मिले हर बार   
 
पानी पानी वह हुई, आयी जब भी लाज
पानी से ही लाज है, पानी से ही साज |
 
पनघट सब खाली हुए, खाली गगरी हाथ 
मेघ बरसते है…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 15, 2014 at 10:30am — 9 Comments

बेकरारी इश्क की

इश्क बेक़रार करता,खूब बेक़रार करता,
कहते मर जायेंगे,न कोई बेक़रार मरता।


तौबा करेंगे, हद हो गयी राह तकने की,
मुरीद-ए-इश्क,बे-इंतहा इन्तजार करता?

हुआ-सो-हुआ,न करेंगे इश्क,खूब अकड़ता,

क्या पता फिर क्यूँ इश्क बार-बार करता?

मरने की ख़्वाहिश कहीं पालता है कोई?

कैसे कहें क्यूँ इश्क पर बार-बार मरता?

इश्क का कायल,कह देते,टूट जाता आदमी,

पर,दिखता खुद से लड़ता,सरहदों पे मरता।

*"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 15, 2014 at 8:30am — 4 Comments

होनी--

अभी हांथों की मेहँदी भी नहीं सूखी थी और ये हादसा |
" भगवान को यही मंजूर था " , लोग दिलासा दे रहे थे |
" लेकिन जिस भगवान को ये मंजूर था वो भगवान हमें मंजूर नहीं ", और उसके मन के भाव दृढ हो गए |

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on October 14, 2014 at 9:55pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शुरूआत

जीते जी जिन्दगी खत्म नहीं होती

सिर्फ एक अध्याय खत्म होता है

जब तक एक भी साँस है

हौसले हैं

तब तक रास्ते हैं

कहीं भी, किसी पल

किसी भी मोड़ पर

नई शुरूआत हो सकती है

 

मिटा देता है वक्त गुज़रते-गुज़रते

पुरानी लिखावट को

और एक कोरा पन्ना छोड़ जाता है

आते-आते

वही वक्त एक और मौका देता है

कि उसी कोरे पन्ने पर

फिर अपनी ज़िन्दगी लिखें

फिर शुरूआत करें

 

(मौलिक व…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 14, 2014 at 9:33pm — 12 Comments

वो पल **

वाहनों से भरी सडक पर एक बाबा पैदल चले जा रहा था .. उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था की वो थक गया है और सहायता  चाहता है , थके होने की वजह से वो बार बार मुड के पीछे देख रहा था ! 

आगे का रास्ता किसी वाहन पर करने की उम्मीद लिए जिसको भी हाथ देता वो उसको अनदेखा कर आगे निकल जाता ..मायूसी चेहरे पर थी पर  बिना रुके चल भी रहा था ...

इस आपा धापी की जिंदगी में सबको जल्दी है पर कुछ दूर अगर छोड़ा जाता तो कुछ जाता नहीं उल्टा हमें जो आशीर्वाद मिलता वो जरूर फलता....जो शायद मेरे भाग्य में…

Continue

Added by Alok Mittal on October 14, 2014 at 6:00pm — 7 Comments

निष्पक्षता -- डॉo विजय शंकर

कोई कितना भी काबिले तारीफ़ हो ,

हमें दिखाई देता नहीं ,

दुनिया उसे इनाम इकराम दे दे

तो हम भी फोटो ओटो

छपवा देते हैं उसकी ,

क़ि देखो एक देसी

कैसा नाम किया है देश का ॥

दो चार दिन ,बस ,ज्यादा नहीं ॥

बात पक्षपात की नहीं है ,

ऐसा न सोचियेगा , न कहियेगा ॥

क्योंकि जो अपराधी हैं ,

जो विदेशों में काला धन जमा किये हैं ,

वो भी तो हमें नहीं दिखाई देते ॥

हम अच्छे बुरे से ऊपर हैं,

सिर्फ अपना मतलब देखते हैं , बस ॥



मौलिक एवं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 14, 2014 at 3:27pm — 14 Comments

लघुकथा : पुण्य (डाॅ संध्या तिवारी)

"क्या बताऊँ मेरा कुत्ता टाॅमी दो दिन से बीमार है, बचा हुआ सारा खाना फेंकना पडता है "
"अरे बो मेरी बर्तन चौका बाली महरी को दे देना वह बासा कूसा सब खा लेती है। दुआ देगी, तुम्हे पुण्य लाभ होगा।"
पडोस की भाभी ने गम्भीरता से कहा ।

डाॅ संध्या तिवारी

Added by Dr.sandhya tiwari on October 14, 2014 at 1:00pm — 10 Comments

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