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पछतावा (लघुकथा )

"बाबा आप अकेले यहाँ क्यों बैठे हैं, चलिए आपको आपके घर छोड़ दूँ | "

बुजुर्ग बोले:

"बेटा जुग जुग जियो तुम्हारे माँ -बाप का समय बड़ा अच्छा जायेगा | और तुम्हारा समय तो बड़ा सुखमय होगा |"

"आप ज्योतिषी हैं क्या बाबा |"

हंसते हुय बाबा बोले - "समय ज्योतिषी बना देता हैं | गैरों के लिय जो इतनी चिंता रखे वह संस्कारी व्यक्ति दुखित कभी नही होता | " आशीष में दोनों हाथ उठ गये |

"मतलब बाबा ? मैं समझा नहीं | "

"मतलब बेटा मेरा समय आ गया | अपने माँ बाप के समय में मैं समझा नहीं कि…

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Added by savitamishra on May 14, 2015 at 11:30am — 20 Comments

ग़ज़ल -नूर हमनें ये जिस्म पाप का गट्ठर बना दिया.

गागा लगा लगा/ लल/ गागा लगा लगा

आवारगी ने मुझ को क़लन्दर बना दिया

कुछ आईनों ने धोखे से पत्थर बना दिया.

.

जो लज़्ज़तें थीं हार में जाती रहीं सभी  

सब जीतने की लत ने सिकंदर बना दिया.

.

नाज़ुक से उसने हाथ रखे धडकनों पे जब  

तपता सा रेगज़ार समुन्दर बना दिया.

.

एहसास सब समेट लिए रुख्सती के वक़्त

दीवानगी-ए-शौक़ ने शायर बना दिया. 

.

जो उस की राह पे चले मंज़िल उन्हें मिले  

बाक़ी तो बस सफ़र ही…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 14, 2015 at 11:29am — 35 Comments

अपना खून....(लघुकथा)

“ मैंने यह सब कुछ अपनी मजबूरी में किया है, जज साहब. मृतक मेरा सगा भाई ही था, उसने मेरा जीना हराम कर दिया था. धोखे से मेरी जमीन हड़प ली और मैं अपने पत्नी और बच्चों के साथ सड़क पर आ गया था. भूखों मरने की नौबत आ गई थी, साहब..” उसने अपने भाई की हत्या का गुनाह कुबूल करते हुए अदालत में अपना बयान दिया

“ लेकिन, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार तुमने अपने भाई को सुबह ५ बजे ही खेत पर, गला घोंटकर मार डाला फिर तुम दोपहर में उस लाश को खीचकर कहा ले जा रहे थे..” सरकारी वकील ने कटघरे में खड़े,…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 14, 2015 at 10:18am — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत -- पूछता है अब विधाता - ( गिरिराज भंडारी )

रोक नदिया

तोड़ पर्वत

तू धरा को क्या बनाता

पूछता है , अब विधाता

 

देख कुल्हाड़ी चलाता 

कौन अपने पाँव में ही

कंटकों के बीज बोता

रास्तों में , गाँव मे ही

व्यर्थ सपनों के लिये क्यों आज के सच को  गवांता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

 

इक नियम ब्रम्हाण्ड का है

ग्रह सभी जिसमें चले हैं

है धरा की गोद माँ की

खेल जिसमे सब पले हैं

माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता 

तू धरा…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 14, 2015 at 9:21am — 21 Comments

मैं,वह और तुम (अतुकांत कविता)

*मैं वह और तुम*

मैं पुरुष हूँ,

वह स्त्री,

तुम तुम हो--

श्रोता,पाठक, निर्णायक

सबकुछ।

मैंने उसे अपने को कहने

यानी लिखने के लिए 

प्रेरित करना चाहा,

अपना युग-धर्म निबाहा,

बोली-मुझे हिंदी में लिखना

नहीं आता,है मुझे सीखना।

'सीखा दूँगा सब', मैंने कहा,

मामला बस वहीं तक रहा।

एक दिन एक कथा आयी-

'मेरी सहेली ने ड्राइविंग

सीखना चाहा,

उसके बॉस ने हामी भर दी,

कहा, 'सीखा दूँगा सब',

फिर ड्राइविंग शुरू होती

कि…

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Added by Manan Kumar singh on May 14, 2015 at 8:47am — 6 Comments

प्यार ........इंतज़ार

सुनो ...प्यार बड़ी चीज़ है

सबके काम आता है ये

डूबतों का तिनका

दुखियों का सहारा है ये

रोते हुओं के आँसू पोंछ

टूटे हुए दिलों को जोड़ जाता है ये

रूठों को मना लाता है

रिश्तों को शहद बनाता है ये

'इंतज़ार' कम ही लोगों को

करना आता है ये

इसकी तहज़ीब सीख लीजिये

वर्ना सोने वालों की

नीद उड़ा ले जाता है ये

उमंगों को भड़का

ज़िंदगी का मकसद बन जाता है ये

सुनो ...एहसासों का बुलबुला है ये

कांटा लगा ......तो

हवा हो जाता है ये…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 14, 2015 at 7:18am — 14 Comments

सिन्दूर की लालिमा ( पहला हिस्सा )

मेरी कल्पनाये हर पल सोचतीं है, व्यथित हो विचरतीं हैं

बैचेन हो बदलतीं हैं, दम घुटने तक तेरी बाट जोहती हैं 

लेकिन फिर ना जाने क्यूँ, तुझ तक पहुँच विलीन हो जातीं है

सारी आशाएं पल भर में सिमट के, दूर क्षितिज में समा जातीं है

एक नारी मन की भावनाएं उसकी कल्पनाओं में सजती और संवरती है और उन कपोल कल्पित बातों को एक कवि ही अपनी रचना में व्यक्त कर सकता है मेरे कवी मन ने भी कुछ ऐसा ही लिखने की सोची और फिर शुरू हुई कलम और कल्पना की सुरमई ताल ! लेकिन मन ना लगा तो मैं बाहर निकल आई…

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Added by sunita dohare on May 14, 2015 at 12:30am — 7 Comments

ग़ज़ल :-गले प रख के वो तलवार बोले

बह्र :- मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़ऊलुन



गले प रख के वो तलवार बोले

वही कहना जो ये सरकार बोले



हमें बर्बाद कर देगा तिरा सच

मिरी बस्ती के इज़्ज़तदार बोले



हमारा ख़ानदानी वस्फ़ है ये

हमेशा जानिब-ए-हक़दार बोले



कई नामों से हमको जानते हैं

कोई तूफ़ाँ,कोई मंझधार बोले



बुराई पीठ के पीछे करेगा

मिरे मुँह पर ज़रा इक बार बोले



है मुझ को आरज़ू उस हमसफ़र की

जो वीरानों को भी गुलज़ार बोले



क़ुसूर इन शाईरों का भी नहीं जी

वही… Continue

Added by Samar kabeer on May 13, 2015 at 10:44pm — 22 Comments

एक ताज़ा ग़ज़ल: निर्मल नदीम

ज़िन्दगी की राह में इसके सिवा कुछ भी नहीं।

आदमी को सूझता अच्छा बुरा कुछ भी नहीं।



वो नुमाइश का चला है दौर जिसके सामने

अहल ए दिल कुछ भी नहीं अहले वफ़ा कुछ भी नहीं।



वक़्त यूँ खामोशियों की तर्जुमानी कर गया,

उसने सब कुछ सुन लिया मैंने कहा कुछ भी नहीं।



बेरुखी की हद से आगे की थी उसकी बेरुखी

मैंने पूछा- क्या हुआ, उसने कहा- कुछ भी नहीं।



हर क़दम पर तुमने मेरे इश्क़ को रुस्वा किया

फिर भी मेरे दिल में है शिक़वा गिला कुछ भी… Continue

Added by Nirmal Nadeem on May 13, 2015 at 7:45pm — 13 Comments

चुस्की

चुस्की

मैं आँखे पोंछता हुआ अस्पताल से बाहर आया |कुछ दूर ढूंढने पर मुझे चुस्की वाला दिखा |पर जैसे ही मैं चुस्की लेकर वार्ड में दाखिल हुआ |वो ठंडा पड़ चुका था |मैंने देखा की चुस्की के रंग-बिरंगे शरबत पिघलती बर्फ में घुलकर कुछ अलग ही रंग के हो गए थे |मैंने चुस्की की कुछ बूंदे उसके मुँह में डाली और एक चम्मच अपने मुँह में उसके बाद मैं फूट-फुटकर रो पड़ा |वार्डब्वाय ने उसके शांत-सफ़ेद चेहरे पर साफ़ सफ़ेद चादर डाल दी मानों बर्फ की सफ़ेद सिल्ली पड़ी हो |

लगभग एक सप्ताह पहले

“तुम मुझे पसंद करते… Continue

Added by somesh kumar on May 13, 2015 at 4:44pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शक्ति छंद (नेपाल भूकंप )

शक्ति छंद (नेपाल भूकंप )

  

अभी फूल पूरे खिले भी न थे

नई जिंदगी से मिले भी न थे

चली बेरहम वक़्त की आरियाँ

कटे शीश धड़ से मिटी क्यारियाँ

 

कहर बन फटी थरथराती जमी

जहाँ सांस आई वहीँ पे थमी

दिखाई अजब काल ने क्रूरता

फिरा क्रुद्ध यमराज यूँ घूरता

 

निवाले कई काल के हैं बने

दबे हर जगह जिस्म खूँ से सने

बचा जो यहाँ ढूँढता आसरा

सहारा बना एक का दूसरा

 

बचे काल से एक भाई बहन

सिसकते…

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Added by rajesh kumari on May 13, 2015 at 8:53am — 24 Comments

मुक्ति (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘आज तो लाला ने भी और मोहलत देने से साफ मना कर दिया । समझ नहीं आ रहा अब क्या होगा? बैंक की किश्तें, अगले महीने छोटी की शादी... इस बेमौसमी बरसात ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा ।’ साहूकार की दुकान से बाहर निकलते हुए परेशानी के आलम में वो अपने साथी से बोला
‘सब्र से काम लो भाई ! अब जो भगवान को मंजूर ... अरे ! उधर क्या करने जा रहे हो ... उस तरफ तो बाजार है ?’
‘एक रस्सी लेने...।’

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 13, 2015 at 8:18am — 23 Comments

वक़्त मुसाफिरी का है ,गुजार ले-- डॉo विजय शंकर

ये तू , ये मैं ,

ये साथ , ये अकेलापन,

सब यहीं है ,

यहीं का है,

एक बार यहां से गए ,

तो तू कौन,

मैं कौन,

एक नाम ही है,

सब यहीं रह जाएगा ,

बहती हवा में बह जाएगा ,

द्रव्य, दृश्य,शब्द, स्मृतियाँ, सब,

कुछ मिटटी में , कुछ

वायु में विलीन हो जाएगा ,

नष्ट नहीं होगा ,

पर साथ नहीं जाएगा ,



ये तू, ये मैं , ये साथ ,

ये रिश्ते , ये बंधन ,

ये सब यहीं के हैं ,

यहीं तक हैं ,

यहीं रह जाएंगे ,

समय में खो जाएंगे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on May 13, 2015 at 7:04am — 24 Comments

विसंगति--

" अरे रामू , तुम वापस कब आये , फिर से घर का काम करोगे "?
" क्या करता साहब , बेटा तो अपनी नौकरी पर चला जाता था और रात देर से लौटता था "।
" तो क्या , आराम से घर पर रहते , बहू और बच्चों के साथ समय बिताते "।
" अब क्या कहूँ साहब , आप कम से कम हमें नौकरों जैसा तो समझते हो , पर बहू तो .."!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 13, 2015 at 3:00am — 14 Comments

अकेला-एकान्त

अकेला-एकान्त

असंग आत्म-विश्वास का

गम्भीर भान

अकेला-एकान्त

कभी करी हुई विलीन हुई बातें

अनबूझा विशाद

संसारी गतिविधियों से 

परिवर्तित प्रवृत्तियों से 

बदले व्यवहार से शब्दों की चोट से

कुछ हुआ अचानक

हमारे बीच का बहता वह सुगम प्रवाह

घनिष्ठ अपनत्व

अमृत-सा सुख

सूख गया

खुशियों का हिस्सा जो लगता था मेरा था

अब मेरा न था

असंवेदनाओं के धरातल पर…

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Added by vijay nikore on May 13, 2015 at 12:30am — 18 Comments

गरीबी का फोड़ा (लघुकथा )

मजदूरी करके जितना भी कमाता , आधी से ज्यादा बेटे के पढ़ाई के लिये लगाता । पिता के फर्ज़ से वह उरिन होना चाहता था । गरीबी सदा जिंदगी को जटिल बनाने के लिये अपना मोर्चा संभाले रहती है । बेटे का मन आस पडोस के लडकों में रमा रहता । फिर भी पिता अपनी आस को रबड़ के भाँति खींच कर पकडे़ हुए था ... कि एकदिन बेटा बडा होकर उसका मर्म जान पायेगा । आज दसवीं का रिजल्ट आने वाला था । पूजा घर में माँ बेटे के लिए प्रार्थना में लगी रही सुबह से । रिजल्ट आते ही घर में सब जकड़न टुट गई । विजय ने अपनी हार का ठीकरा पिता…

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Added by kanta roy on May 12, 2015 at 8:30pm — 26 Comments

जीवन .......इंतज़ार

ज़िंदगी है तो

जीने से डरना क्या !

ख़वाब रंगीन होते हैं

देखने से डरना क्या !

जाम जब होंठों को छू जाये

तो फिर पीने से डरना क्या !

प्यार हो जाये

तो इकरार से डरना क्या !

ज़िंदगी एक सफ़र ही तो है

फिर रास्तों से डरना क्या !

सफ़र में कई हमसफ़र होंगे

मिलना क्या बिछुड़ना क्या !

हर मंजिल एक पड़ाव ही तो है

पाना क्या और खोना क्या !

जीवन सिर्फ़ एक आवागमन ही तो है

फिर आना क्या और जाना क्या…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 12, 2015 at 6:00pm — 4 Comments

खो गई इंसानियत

यूँ तो दिखते ,

कितने ही चेहरे ,

मिलते-जुलते इंसानोँ से ।

पर , जब उनकी

फितरत देखी,

तो लगी हैवानोँ सी !!

करते हैँ शर्मसार ,

इंसानियत को ।

देख कर इनकी करतूतेँ ,

सवाल करते हैँ जानवर भी ,

कि क्योँ हैँ हम बदनाम !

जब कि इतना ज्यादा ,

गिर चुका है इंसान ।

खुदा ने उसे ज़हानत दी ,

कुछ भी करने की ताकत दी ,

फिर भी वह ,इतना गिर गया ?

कि लाश का कफ़न भी ,

नोँच कर ले गया !

घायल को देख कर ,

नहीँ पसीजा ,

उसका…

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Added by jyotsna Kapil on May 12, 2015 at 4:30pm — 11 Comments

फौजी की डायरी

फौजी की डायरी

दिनांक

१२-जून

सचमुच अगर आज ये फार्मल-मीट न होती तो मै कभी जान ही ना पाता आखिर वो भी तो हमारे जैसे ही हैं.. उनका दिल भी अपने देश के लिए धडकता है.. उनके लिए भी फ़र्ज़ जान से बढ़ कर है. मगर... उनका भी परिवार है हमारी ही तरह... माँ है. बहन है.. पत्नी है बच्चे हैं घर है वो भी अपने परिवार से बहुत प्यार करते हैं..बिलकुल हमारी तरह... वो भी देश के लिए मरना चाहतें है और परिवार के लिए जीना चाहते हैं बेवजह लडनें की चाह उनको भी नही है मगर मातृभूमि पर किसी की बुरी नज़र वो भी सहन नही… Continue

Added by Seema Singh on May 12, 2015 at 4:04pm — 5 Comments

गुब्बारे

मेरी बेटी

तेरी खातिर ,

गुब्बारे लाने थे मुझको,

नीले, पीले,लाल,गुलाबी,

हरे,बैंगनी,खूब सजीले

बहुत सुनहरे और चमकीले

गुब्बारों के दाम बहुत थे

पास मेरे पैसे कुछ कम थे

पर

तेरे हिस्से का समय बहुत था....

दूर कहीं परदेस मे बेटी

तेरे जैसे बहुत से बच्चे

अँधियारो से जूझ रहे है

चमक रहे है,बुझ भी रहे है

तेरे हिस्से का समय मै गुड़िया

इन बच्चों में बाँट रहा हूँ

जिससे इनको रंग मिले

समता समानता स्वतंत्रता के

और खिल जाये इनका… Continue

Added by मनोज अहसास on May 12, 2015 at 3:36pm — 11 Comments

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