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ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

तेरी तस्वीर तसव्वुर से बनाई मैंने



ख़ाक पड़ जाएगी कितने ही हसीं चहरों पर

आईने से जो कभी गर्द हटाई मैंने



मुझको पाबंदियाँ ओरों की गवारा ही नहीं

ख़ुद ही अपने लिये ज़ंजीर बनाई मैंने



अपनी ग़ज़लों से संवारूँगा ये बज़्म-ए-हस्ती

उम्र सारी इसी चक्कर में गँवाई मैंने



अर्श हिलता है ,ज़मीं काँपने लगती है,यही

आह-ए-मज़लूम की तासीर बताई मैंने



वो भी बैज़ार नज़र… Continue

Added by Samar kabeer on May 17, 2015 at 11:19am — 39 Comments

ग्राहक सेवा--

" साहब , पइसा जमा करना है , पर्ची नाहीं दिखत है | मिल ज़ात त बड़ा मेहरबानी होत ", डरते डरते उसने कहा |

" अब केतना पर्ची छपवायें हम लोग , पता नाहीं कहा चुरा ले जाते हैं सब ", बड़बड़ाते और घूरते हुए हरिराम स्टेशनरी रूम में घुसे | थोड़ी देर बाद जमा पर्ची लाकर उसके सामने पटक दिया और बोले " बस एक ही लेना , कुछ भी नहीं छोड़ते लोग यहाँ "|

पूरे गाँव को पता था , हरिराम के व्यवहार के बारे में लेकिन सब झेल जाते थे | एक ही तो शाखा थी बैंक की वहां और सबको वहीँ जाना होता था | एकाध ने मैनेजर से शिकायत की…

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Added by विनय कुमार on May 17, 2015 at 2:48am — 15 Comments

अधूरे गीत(कहन)______________मनोज कुमार अहसास

मन के सारे गीत अधूरे,फिर से तुझ को अर्पण है

तुझको मन की बात कहूँ मैं,ऐसा अब फिरसे मन है



मर्यादा का एक महल है जिसमे विरह का आँगन है

ख़ामोशी की एक चिता है पल पल जलता जीवन है



संबंधो में प्रेम कहाँ है प्रेम की अब वो रीत कहाँ

मित्र नयन से जुदा है काजल और तरसता दर्पण है



दुःख,पीड़ा,अवसाद,तपस्या,करुणा,संयम और साहस

उस जीवन में नैसर्गिक है इस जीवन में आयोजन है



टूट गयी है डोर विरह की कैसे कहन का रूप सजे

जीवन की इस भाग दौड़ में बस बेकार का… Continue

Added by मनोज अहसास on May 16, 2015 at 11:30pm — 8 Comments

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा

हमें ईश से ढेर सारे गिले |

नहीं अब सहारा कहीं पे मिले |

प्रभो शक्ति जितना हमें है दिया |

बड़ी मुश्किलों से सहारा किया ||

 

प्रकृति की पड़ी मार सबने सहा |

महल स्वप्न का देखते ही ढहा |

छिना छत्र माता पिता का कहाँ ?

बची फ़िक्र भूखी बहन का यहाँ ||

 

अभी गति हमारी बड़ी दीन है |

बिना नीर जैसे दिखे मीन है |

प्रकृति के कहर से बहन भी डरी |

बड़ी मुश्किलों से डगर है भरी ||

 

मौलिक व…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on May 16, 2015 at 7:47pm — 2 Comments

कहानी : नफ़रत

(१)

दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते

खाई भी जोड़ती है

-   गीत चतुर्वेदी

 

कोई किसी से कितनी नफ़रत कर सकता है? जब नफ़रत ज़्यादा बढ़ जाती है तो आदमी अपने दुश्मन को मरने भी नहीं देता क्योंकि मौत तो दुश्मन को ख़त्म करने का सबसे आसान विकल्प है। शुरू शुरू में जब मेरी नफ़रत इस स्तर तक नहीं पहुँची थी, मैं अक्सर उसकी मृत्यु की कामना करता था। मंगलवार को मैं नियमित रूप से पिताजी के साथ हनुमान मंदिर में प्रसाद चढ़ाने जाता था। प्रसाद पुजारी को देने के…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 16, 2015 at 6:29pm — 14 Comments

उतरान ........इंतज़ार

तुम चढ़ान हो जीवन की

मैं उतरान पे आ गया हूँ

चलो मिलकर समतल बना लें

हर अनुभूति

हर तत्व की

मिलकर औसत निकालें

कहीं तुम में उछाल होगा

कहीं मुझमें गहन बहाव होगा

चलो जीवन के चिंतन को

मिलकर माध्य सार बनालें

कभी तुम पर्वत शिखर पर हिम होगी

मैं ढलता सूरज होकर भी

तुम्हें जल जल कर जाऊँगा

चलो मिलकर जीवन को

अमृत धार बनालें

कभी तुम भैरवी सा राग होगी

मैं तुम्हारे सुर के पृष्ठाधार में ताल दूंगा 

चलो मिलकर जीवन काया को

समझौतों का एक मधुर…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 16, 2015 at 5:50pm — 6 Comments

चुने कंट........

चुने कंट............शक्ति छंद

दिये से दिये को जलाते चलें।

बढी आग दिल की बुझाते चलें।।

रहे प्रेम का जोश-जज्बा सदा।

चुने कंट सत्यम गहें सर्वदा।।1



नहीं दीन कोई न मजबूर हों।

सभी शाह मन के बड़े शूर हों।।

न कामी न मत्सर सहज प्यार हो।

बहन-भ्रात जैसा मिलन सार हो।।2



यहां सिंधु भव का बड़ा क्रूर है।

लिए तेज सूरज मगर सूर है।। 

यहाँ तम मिटा कर खड़ा नूर जो।

बुलाता उन्हे पास,  हैं दूर जो।।3



भिगोते रहे अश्रु…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 16, 2015 at 5:00pm — 2 Comments

गम नही मुझको............'जान' गोरखपुरी

   २१२  २१२२   १२२२

गम नही मुझको तो फ़र्द होने पर               (फ़र्द = अकेला)

दिल का पर क्या करूं मर्ज होने पर

 

उनको है नाज गर बर्क होने पर

मुझको भी है गुमां गर्द होने पर

चारगर तुम नहीं ना सही माना

जह्र ही दो पिला दर्द होने पर

 

अपनी हस्ती में है गम शराबाना

जायगा जिस्म के सर्द होने पर

 

डायरी दिल की ना रख खुली हरदम

शेर लिख जाऊँगा तर्ज होने पर

 

तान रक्खी है जिसने तेरी…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 16, 2015 at 10:30am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - लगी धूप सी मुझे ज़िन्दगी ( गिरिराज भंडारी )

11212   11212  11212   11212 

 

कभी इक तवील सी राह में लगी धूप सी  मुझे ज़िन्दगी

कभी शबनमी सी मिली सहर जिसे देख के मिली ताज़गी

 

कभी शब मिली सजी चाँदनी , रहा चाँद का भी उजास,  पर  

कभी एक बेवा की ज़िन्दगी सी रही है रात में सादगी

 

कभी हसरतों के महल बने, कभी ख़ंडरों का था सिलसिला  

कभी मंज़िलें मिली सामने , कभी चार सू मिली ख़स्तगी

 

कभी यार भी लगे गैर से , कभी दुश्मनों से वफ़ा मिली

कभी रोशनी चुभी बे क़दर , तो दवा बनी…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 16, 2015 at 9:30am — 17 Comments

सिंदूर की लालिमा (अंतिम भाग )...

सिंदूर की लालिमा (अंतिम भाग )........                                         गतांक से आगे.......

मेरा मन सिर्फ मनु को सोचता था हर पल सिर्फ मनु की ख़ुशी देखता था हर घड़ी अन्जान थी मैं उन दर्द की राहों से जिन राहों से मेरा प्यार चलकर मुझ तक आया था ! मेरे लिये तो मनु का प्यार और मेरा मनु पर अटूट विस्वास ही कभी भोर की निद्रा, साँझ का आलस और रात्रि का सूरज, तो कभी एक नायिका का प्रेमी, जो उसे हँसाता है, रिझाता है और इश्क़ फरमाता है, कभी दुनियाभर की समझदारी की बातें कर दुनिया को अपने…

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Added by sunita dohare on May 16, 2015 at 1:30am — 2 Comments

भगवान की तलाश :लघु कथा: हरि प्रकाश दुबे

“वो देख सामने जहां सूरज निकल रहा है , वहीँ अपना घर है, बेकार में भटका मैं दर –दर, सबने कितना समझाया था, मां - पिता और पत्नी कितना रोई थी, पर मुझे तो भगवान की तलाश करनी थी, पर कहीं नहीं मिला बल्कि लोगों ने कभी भिखारी तो कभी ढोंगी समझा, अरे भगवान् कहीं होगा तो घर में भी मिल जाएगा, अब चल वहीँ काम और ध्यान करेंगे ,चल बेटा अब घर चलें ,तूने भी बड़ा साथ निभाया , वो देख सामने नाव भी आ रही है चल तेज़ चल, और आज ही ये गेरुआ वस्त्र इसी गंगा माँ को समर्पित कर दूंगा !”

“इतना सुनते ही उस साधु का…

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Added by Hari Prakash Dubey on May 15, 2015 at 9:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल ; यकायक चराग़ों को क्या हो गया है

122 122 122 122

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

चलो और दिन तो है बाकी, रूकें क्यों
शजर पे अभी नूर देखो झुका है.

इसी आरज़ू में कटी ज़िन्दगी ये
पता तो चले क्या हमारा हुआ है.

अभी छू नहीं सर्द हांथों से ऐ शब
अभी तो मुझे उसने मन से छुअा है.

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.

- श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on May 15, 2015 at 5:02pm — 35 Comments

प्यासी देह .....

प्यासी देह .....

मन की कंदराओं में किसने .......

अभिलाषाओं को स्वर दे डाले .......

किसकी सुधि ने रक्ताभ अधरों को ......

प्रणय कंपन के सुर दे डाले//

मधुर पलों का मुख मंडल पर ........

मधुर स्पंदन होने लगा .........

मधुर पलों के सुधीपाश में ........

मन चन्दन वन होने लगा//

नयन घटों के जल पर किसकी .......

स्मृति से हलचल होने लगी ........

भाव समर्पण का लेकर काया .......

मधु क्षणों में खोने लगी//

किसको…

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Added by Sushil Sarna on May 15, 2015 at 9:53am — 26 Comments

आ दुआ करें (कविता)

आ दुआ करें 

आ दुआ करें मिलजुल,

निःस्वार्थ हो बिलकुल,

प्रभु!रचना तेरी चुलबुल,

हँसने दे अभी खुलखुल।…

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Added by Manan Kumar singh on May 15, 2015 at 8:30am — 3 Comments

आउट आफ़ सिलेबस

“पापा, मुझे ज्वाइंट और न्युक्लियर फ़ैमिली के मेरिट्स-डिमेरिट्स के बारे में पढ़ना है.”  राजू ने अपने पापा से कहा.

फिर, चहकते हुये पूछा, "पापा, ज्वाइंट फ़ैमिली में बडा मजा आता होगा न.. सब एक साथ रहते होंगे. खेलने को बाहर भी नहीं जाना पड़ता होगा”, 

“हाँ, बेटा मजा तो बहुत आता था. तेरे दादा-दादी, चाचा-चाची, हमसभी एक साथ रहते थे.. हरतरह से सुख-दुःख में एक साथ.. पर तेरे जन्म के बाद से हम भी न्युक्लियर फ़ैमिली हो गये.”

तभी किचेन से राजू की…

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Added by Shubhranshu Pandey on May 14, 2015 at 10:30pm — 23 Comments

यूँ ही

यूँही दिन तमाम गुजर गए, यूँही शामें ख़ाली निकल गयी

तेरे फैसले ना बदल सके, मेरी आरज़ू ही बदल गयी



कभी बदगुमानी ने डस लिया,कभी बेबसी ने तबाह किया

कभी फ़र्ज़ ओ रिश्तों की बंदिशे,मेरी ख्वाइशो को कुचल गयी



यहाँ कुछ नहीं है वफ़ा हया,ये हवस का भूख का सिलसिला

तेरे साथ मैंने जो की कभी,मुझे नेकियां वो निगल गयी



मेरे झुकते कांधे भी मुझमेँ है,तेरे हौसलो का जुनून भी

कोई बात शेरों में ढल गयी,कोई बात आँखों में जल गयी



यही फैसला ना हुआ कभी,के वो कल था सच… Continue

Added by मनोज अहसास on May 14, 2015 at 6:00pm — 5 Comments

ईश्वर तुम हो क्या ?

ईश्वर तुम हो कि नहीं हो

इस विवाद में मन उलझाये बैठी हूँ

‘हाँ’ ‘ना’ के दो पाटों के बीच पिसी

कुछ प्रश्न उठाए बैठी हूँ

कि अगर तुम हो तो इतने

अगम, अगोचर और अकथ्य क्यों हो

विचारों के पार मस्तिष्क से परे

‘पुहुप बास तै पातरे’ क्यों हो

तुम्हें खोजने की विकलता ने

जब प्राप्य ज्ञान खँगाला 

तो द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत ने

मुझको पूरा उलझा डाला

तुम सुनते हो यदि

या कि मुझे तुम सुन पाओ

एक प्रार्थना…

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Added by Tanuja Upreti on May 14, 2015 at 4:35pm — 9 Comments

तमाम मोती हैं सागर में मगर मुझको क्या

१२१२    ११२२   ११२२   २२ 

तमाम मोती हैं सागर में मगर मुझको क्या 

घिरा जो तम में मेरा घर तो सहर मुझको क्या 

हमें वो हीन कहें दींन  कहें या मुफलिस 

बशर तमाम जुदा सब कि नजर मुझको क्या 

बहार आयी चमन में है ये तो तुम देखो

खिजाँ नसीब है; मैं हूँ वो शजर, मुझको क्या 

जो नंगे पाँव ही चलना है मुकद्दर मेरा 

बिछे हों गुल या हो खारों की डगर मुझको क्या 

मेरा नसीब तो फुटपाथ जमाने से रहे 

नसीब उन को महल हैं…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2015 at 3:33pm — 10 Comments

रूतबा मंत्रालय का ( लघुकथा )

"समीर जी , क्या रूतबा है भई आपका ...!!! जहाँ भी जाते हो ..यार , छा जाते हो ! " --- अजय को गर्व था अपने दोस्त पर । समीर का जलवा तो उसके हर अंदाज़ से ही झलकता था। उसकी बातों से ही मंत्रालय में उसकी पद प्रतिष्ठा का अनुमान चल जाता है। जब साले साहब को मंत्रालय में जरूरी काम करवाने की जरूरत आन पडी तो अजय बडे गर्वित हो साले साहब के साथ मंत्रालय की ओर निकल लिए ।आजतक मंत्रालय के दर्शन भी नही किये थे उसने । दोस्त की मेहरबानी से यहाँ तक आने का अवसर भी प्राप्त हुआ । मन गदगद हुआ जा रहा था । मंत्रालय के…

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Added by kanta roy on May 14, 2015 at 12:30pm — 20 Comments

घूँघट

“सुन री छोटी ! सीख कुछ मुझसे. जब देखो मुंह उघारे घूमती रहे है, घूँघट काढ़ा कर |” “ना जीजी हम नही बन सके तुम्हारे जैसे पर्देदार ! देखी हैं हम तुम्हारी नजर.. घूँघट के पीछे से घूरे है छुटके देवर जी का शरीर जब देखो तब |” “का फायदा ऐसे घूँघट का..?” देवरानी ने पलट जवाब दे मारा जेठानी पर |

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sudhir Dwivedi on May 14, 2015 at 11:39am — 19 Comments

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