For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

"बदला"

पुलिस चौकी को कार्यक्रम स्थल मे बदल दिया गया है , सामने  लोगो का मजमा लगा हुआ है | उसे देखने के लिये सब बडे आतुर है । आज वो आत्मसमर्पण करने वाली है प्रदेश के सी.एम के सामने । तभी पीली बत्ती की गाड़ी भांय-भांय कर कार्यक्रम स्थल मे प्रविष्ट होती है । तथाकथित सारे उच्चाधिकारी उन्हे घेरे खड़े है ।

कडे सुरक्षा कवच के बीच अंतत वह अपनी बंदूक उनके चरणों मे रख आत्मसमर्पण कर देती है । अन्य औपचारिकता के बाद कार्यक्रम समाप्ती की घोषणा हो जाती है ।

सभी समाचार पत्रों के कुछ तथाकथित  …

Continue

Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 10, 2015 at 9:26am — 3 Comments

ममता बल (लघु कथा)

सुबह से शाम तक बस काम ही काम।घर में सबसे पहले जागना और सबसे बाद में देर रात गए सो पाना।यही मीना की दिनचर्या थी।काम करने में उसे आनंद ही आता था।दो देवरानियां और एक जेठानी।चारों में अकेली शिक्षित और काम भी सबसे ज्यादा मीना ही करती थी।

इस सबके बावज़ूद जेठानी की हृदय चीरती बातें सुननी पड़ती।उसकी कोई भी बात ऐसी न होती जो ताना न हो।कभी उसके पति को, कभी उसके बच्चों को तो कभी उसे ही ओछे स्तर की बात जेठानी गाहे बगाहे बोलती रहती।

पति को उसके द्वारा कहा जाता कि ऐसी बातें वह नहीं सह पाती।पति बस… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 10, 2015 at 6:36am — 6 Comments

मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

मुझको तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया

तन्हाइयों की भीड़ में खोने नहीं दिया

 

चाहा तो बार बार के हो जाऊँ बेवफ़ा

लेकिन तुम्हारे प्यार ने होने नहीं दिया

 

अब तो धुंवाँ धुंवाँ सी हुई मेरी ज़िंदगी

जलने दिया न, राख़ भी होने नहीं दिया

 

लब पे सजा लिए हैं तवस्सुम की झालरें

एहसास ग़म का दुनिया को होने नहीं दिया

 

आँखों में अश्क आप की आ जाएँ ना कहीं

इस डर से अपने आप को रोने नहीं दिया

 

अपना सका मुझे न…

Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on December 9, 2015 at 11:30pm — 9 Comments

ज़िन्दगी - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

अरकान -  212  212  212  212

हो के मुझसे तू ऐसे खफ़ा ज़िन्दगी |

जा बसी है कहाँ तू बता ज़िन्दगी|

 

जग को ठुकरा दिया मैंने तेरे लिए,

कर न पायी तू मुझसे वफ़ा ज़िन्दगी|

 

तेरी सूरत ही थी मेरा दर्पण सदा,

तू मिले फिर सजूँ इक दफा ज़िन्दगी|

 

तू हंसाती भी है और रुलाती भी है,

तू दिखाती है क्या क्या अदा ज़िन्दगी|

 

पहले इतना बता क्या है मेरी ख़ता,

फिर जो चाहे तू देना सज़ा…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 9, 2015 at 10:33pm — 2 Comments

गरीब जमने लगा उनको अब तपायेगी क्या? ग़ज़ल द्वारा पंकज मिश्र

1212 1122 1212 112
कि जिनके पास नहीं छत उन्हें सतायेगी क्या?
ये सर्द रात भला उनको अब सुलायेगी क्या?

बहुत अगन है सुना है श्मशान घाटों पर।
गरीब जमने लगा उनको अब तपायेगी क्या?

मिला था शाम में जो चीथड़े लपेटे हुए।
उसी को शीत लहर साथ में ले जायेगी क्या?

बहुत ही ऊँचा है रुतबा अगर तुम्हारा तो फिर?
तुम्हारे नाम की बन्दूक उसे बचायेगी क्या?

हमेशा साध रहे स्वार्थ नाम लेके तेरा।
ज़रा तू पूछ दरिंदों को भी उठाएगी क्या?

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 9, 2015 at 4:00pm — 4 Comments

सांप मरा और लाठी साजी (लघुकथा )राहिला

विद्यालय में मध्यान्ह भोजन की दाल में असंख्य इल्ली, तिलूले ,देखकर मैं आपे से बाहर हो गई । तुरंत बच्चों की पंगत उठा कर मैं मध्यान्ह भोजन के ठेकेदार से जम कर उलझ पड़ी । लेकिन वो भी कम ना था, हर बात को "इत्तेफाक "कह के टालने लगा । मुझे दुःख इस बात से ज्यादा हो रहा था कि पता नही कितने दिनों से ये मासूम ऐसा खाना खा रहे है । इत्तेफाक तो मेरे साथ हुआ कि मैं आज प्रभार में थी और ये कृत मेरी जानकारी में आ गया । मैंने तुरंत लिखित कार्रवाई शुरू की । अपने खिलाफ कार्रवाई होते देख उसने गिरगिट की तरह रंग…

Continue

Added by Rahila on December 9, 2015 at 12:00pm — 20 Comments

जीवन नमकीन पानी से बनता है (कविता)

भावनाएँ साफ पानी से बनती हैं

तर्क पौष्टिक भोजन से

 

भूखे प्यासे इंसान के पास

न भावनाएँ होती हैं न तर्क

 

कहते हैं जल ही जीवन है

क्योंकि जीवन भावनाओं से बनता है

तर्क से किताबें बनती हैं

 

पत्थर भी पानी पीता है

लेकिन पत्थर रोता बहुत कम है

किन्तु जब पत्थर रोता है तो मीठे पानी के सोते फूट पड़ते हैं

 

प्लास्टिक पानी नहीं पीता

इसलिए प्लास्टिक रो नहीं पाता

हाँ वो ठहाका मारकर हँसता जरूर…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 8, 2015 at 10:07pm — 12 Comments

मर्यादा ....

मर्यादा ....

चक्षु को चक्षु से देखा

करते हमने द्वंद

उलझे करों को

देख इक दूजे में

हम तो रह गये दंग

आँख बचा कर

कब बाला ने

बदला कपोल का रंग

वर्तमान में बेहयाई का

हुआ ये आम प्रसंग

संस्कारों को त्याग जोड़े ने

अधर मिलाये संग

समझ न आये

क्यूँ इस युग में

कपडे हो गये तंग

मृग नयनी का

नशा देख के

फीकी पड़ गयी भंग

बैठ बाईक पर

दौड़ चले फिर

इक दूजे के संग

शर्मो-हया की चिंता किसे अब

सतरंगी है मन…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 8, 2015 at 7:15pm — 2 Comments

पलट गई बाज़ी (लघुकथा)

इलेक्शन के ऐलान के बाद राजनीती का बाज़ार गर्म होने लगा,गाँव में हर पार्टी अपने अपने पर तोलने लगी ।

सभी तरफ  वोटर को लुभाने व उनका धर्म ज़ात व कीमत लगाने की तैयारी चल रही थी।

उस दिन मास्टर बजार में खड़ा कह रहा था “अब तो पहले जैसी राजनीती  नहीं रही” ।

“अब तो साये की तरह साथ रहने वाले पार्टी वर्करों पर भी कोई यकीन नहीं रहा”

पास खड़े आदमी ने कहा “ऐसा क्यूँ”, तुम देखते नहीं रेलियों में भीड़ जितनी  होती है, भीड़ को वोट में तब्दील करना एक टेढ़ी खीर बन गया है” । महिंद्र…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on December 8, 2015 at 6:30pm — 5 Comments


प्रधान संपादक
भारत माता (लघुकथा)

कुछ ही दिन पहले हुई पिता की मृत्यु से वह अभी उबर भी न पाया था कि अचानक शोक संतप्त माँ को दिल का भयंकर दौरा पड़ गयाI डॉक्टरों ने साफ़-साफ़ बता दिया था कि उसकी माँ अब ज़्यादा देर की मेहमान नहींI



कुछ ही समय पहले उसके पिता की गोलियों से छलनी लाश एक सुनसान क्षेत्र में पाई गई थीI पुलिस का कहना था कि यह आतंकवादियों का काम है, जबकि स्थानीय कट्टरपंथी इसे सेना द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ कह कर लगातार विष वमन कर रहे थेI शवयात्रा के दौरान पूरे रास्ते में देश और सेना विरोधी नारे…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on December 8, 2015 at 4:30pm — 12 Comments

अनचाहा पलायन ( लघुकथा )

' सब तैयारी हो गयी बेटा ? ' पिता ने कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा I पीछे पीछे माँ भी थी ,छोटी -छोटी पोटलियों से लदी-फदी I बहू ये सब ठीक से रख लो ! कोने में खड़ी बहू के हाथ में पोटलियों को थमाते हुए बोली I

' जी अम्मा I '

' सब अच्छे से सहेज लेना ,कुछ छूट न जाए I नयी जगह है परेशानी होगी I '

' जी बाबूजी ! ' इतना ही बोल पाया वह I हालाँकि कहना तो ये चाहता था I ' सब कुछ तो छूट ही रहा है ,आप माँ संगी साथी .......I पर आवाज़ जैसे हलक में ही कही गुम होती  लग रही थी I

कुछ पल…

Continue

Added by meena pandey on December 8, 2015 at 3:30pm — 10 Comments

गुजारिश रिश्ते की

कैलेंडर  का पन्ना पलटते ही उसकी नजर तारीख़ पर थम गई। विवाह का दिन उसके आँखो के आगे चलचित्र सा घूम रहा था।.सुशिक्षित खुबसुरत नेहा और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक नीरज की जोडी को देख सब सिर्फ़ वाह-वाह करते रह गये थे.वक्त तेजी से गुज़र रहा था।.

जल्द ही नेहा की झोली मे प्यारे से दो जुडवा बच्चे बेटा नीरव और बेटी निशीता के रुप मे आ गये।.तभी --

वक्त ने अचानक करवट बदली बच्चों के पालन-पोषण मे व्यस्त नेहा खुद  पर व रिश्ते पर इतना ध्यान ना दे पाई । उसके  के हाथ से नीरज मुट्ठी से रेत की तरह फ़िसलता…

Continue

Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 8, 2015 at 1:00pm — No Comments

लड़ाई आज सत्ता की -(ग़ज़ल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222    1222    1222    1222



भला सच यार कब  वैसे  चुनावी  आस को होना

चुराकर आम के सपने  सदा गुम खास को होना /1



हकीकत  लोकराजों  की  जो नौकर है तो नौकर है

भले कागज की बातों में है मालिक दास को होना /2



लड़ाई आज सत्ता की  बदलती रंग गिरगिट ज्यों

बहाना  फिर  फसादों  का  वही  इतिहास को होना /3



कहाँ  तक  हम  करें  बातें  बना  सौहार्द्र  जीने की

खपा इतिहास  में माथा  खतम विश्वास को होना /4



सुना कल शीत की बरखा बहाकर ले गई सबकुछ

मगर …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2015 at 10:51am — 2 Comments

हवा का झोंका (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (42)

"बगल में दूसरी झुग्गी का इन्तज़ाम कर दिया, फिर भी तुम हमरे बेटे को ही हमसे से दूर करके सुखी रह सकती हो किराये के मकान में, तो जाओ, हम दोनों तो यहीं अपनी झुग्गी झोपड़ी में ही बाक़ी ज़िन्दगी बिता देंगे ! " - सावित्री ने बड़े उदास मन से बहू से कहा।



"देखो, मांजी, हमारे बच्चे बड़े हो गए हैं, अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ेंगे, तो हमारा इस टिन- टप्पड़ वाली झुग्गी में रहना उन्हें और उनके दोस्तों को कैसा लगेगा ? मेरे मायके वाले भी यहाँ आना पसंद नहीं करते !"



"अगर तुम दोनों इतना कमा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 8, 2015 at 9:52am — 6 Comments

वंचित जमाअ़त

अभी जो देखकर गुज़रा हूँ रास्ते से

वो एक प्रतिछाया भर थी... वंचित जमाअ़त की.



एक दलित की बेटी

जो नहा रही थी

सड़क के किनारे गडे़ चापानल पर.



मुश्किल से गिरते पानी

और नहाने की शीघ्रता.

एक कुढ़न झेलती...

क्योंकि वह थी अर्द्धनग्न

चुभ रही थीं उसे आते-जाते

किशोरवय,अर्द्धवय लोगों की दृष्टियाँ.



बांस दो बांस की दूरी पे

उन दलितों के घर.

घर क्या...

आँगन और कोठरियाँ कुछ कुछ एक से

कहीं कहीं से फूस की धँसती… Continue

Added by shree suneel on December 8, 2015 at 1:40am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं तमन्ना नहीं करता हूँ कभी पोखर की--(ग़ज़ल)--मिथिलेश वामनकर

2122—1122—1122—22

मैं तमन्ना नहीं करता हूँ कभी पोखर की

मेरी गंगा भी हमेशा से रही सागर की



रूठने के लिए आतुर है दिवारें घर की

सिलवटें देखिये कितनी है ख़फा बिस्तर की



एक पौधा भी लगाया न कहीं पर जिसने

बात करता है जमाने से वही नेचर की



अम्न के वासिते मंदिर तो गया श्रद्धा से

बात होंठों पे मगर सिर्फ़ वही बाबर की



आसमां का भी कहीं अंत भला होता है

ज़िंदगी कितनी है मत पूछ मुझे शायर की



ये सहर क्या है, सबा क्या है,…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on December 8, 2015 at 1:30am — 30 Comments

नस्री नज़्म :- "आख़री सिगरेट"

ज़िन्दगी को,
अपनी सानवी हैसियत
का अहसास,
शिद्दत से हो रहा है,
लाओ,
ये बची हुई ,
आख़री सिगरेट भी जला लूँ,
ताकि क़िस्सा ख़त्म हो ।

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on December 7, 2015 at 10:48pm — 8 Comments

अधूरे हर्फ़ :..........

अधूरे हर्फ़ :..........

हंसी आती है

अपने ख्यालों पर

मेरे तसव्वुर में

तुम जब भी आती हो

इक अधूरी ग़ज़ल की तरह आती हो

नज़र से नज़र मिलती ही

एक अजीब सी सिहरन होती है

तुम किताब के रूठे हर्फों की तरह

किसी कोने में सिमटी रहती हो

मैं अपने अधूरे हर्फों को

इक मुकम्मल शक्ल देने की कोशिश में

तमाम शब चरागों में झिलमिलाते

तुम्हारे अक्स के साथ

गुज़ार देता हूँ

सहर होने के साथ

हम अधूरे लफ़्ज़ों के तरह

मुकम्मल होने के लिए…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 7, 2015 at 8:04pm — 2 Comments

दो घड़ी करके तो सुहबत देखना (ग़ज़ल)

2122 2122 212



लाएगी इक दिन क़यामत,देखना..

जानलेवा है सियासत, देखना..



काम मुश्किल है बहुत संसार में,

दुसरे इंसाँ की बरकत देखना..



देख लेना खूँ-पसीना भी, अगर

आलिशाँ कोई इमारत देखना..



झाँक कर मेरी निगाहों में कभी,

आपसे कितनी है चाहत, देखना..



देखना हो गर खुदा का अक्स,तो

छोटे बच्चे की शरारत देखना..



'जय' न सिखला दे मुहब्बत,फिर कहो

दो घड़ी करके तो सुहबत देखना..

______________________________…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on December 7, 2015 at 2:30pm — 12 Comments

गुरूमंत्र (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (41)

"डॉक्टर साहब, मैं तो आपके भरोसे ही हूँ। अपनी तरह एक बार मेरा निःशुल्क चिकित्सा शिविर सफल करा दो, तो मेरी क्लीनिक भी चल पड़े ! " - डॉ. वर्मा ने वरिष्ठ प्राइवेट डॉक्टर से विनम्र निवेदन किया।



"परेशान मत हो, जैसा मैं कह रहा हूँ, करते जाओ, बस !"



"आपके कहे अनुसार उस गांव के दो लोकप्रिय आर.एम.पी. डॉक्टर सेट कर लिये हैं, उन्होंने क़रीब सवा सौ मरीज़ों के पंजीयन कर लिए हैं, मेडिकल जांच के लिये बन्दों की व्यवस्था भी हो गई है, लाइसेंसधारी तो बड़े नखरे दिखा रहे थे, सो बिना लाइसेंस वाले… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 7, 2015 at 1:18pm — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Tuesday
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service