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सफेद खून (लघुकथा )राहिला

"देखा अब्बा !मैं ना कहती थी कि अपना खून कभी सफेद नहीं होता।आखिर इतने सालों बाद,इतने मनमुटाव के बावजूद,जब भाई को मेरी बीमारी का पता चला तो आखिर सब भुला कर वो और भाभी आ ही गये ना।और पिछले एक महीनें से भाभी मेरा कितना ख्याल रख रही हैं । आपने देखा नहीं क्या? अब आप भी बीती बातें भुला दें।"

"तुम कुछ भी कहो बेटी! मैं उसे बहुत अच्छे से जानता हूं।पता नहीं अब उसे कौन सा लालच यहाँ खींच लाया । "

"अब्बा!आप भी कैसी बातें करते है! अच्छा छोड़े ये सब बातें सोचना,मैं जरा स्कूल का चक्कर लगा कर आती… Continue

Added by Rahila on February 23, 2016 at 6:00pm — 8 Comments

तेरे इश्क़ में जब नहा कर चले (ग़ज़ल)

बह्र : १२२ १२२ १२२ १२

 

सभी पैरहन हम भुला कर चले

तेरे इश्क़ में जब नहा कर चले

 

न फिर उम्र भर वो अघा कर चले

जो मज़लूम का हक पचा कर चले

गये खर्चने हम मुहब्बत जहाँ

वहीं से मुहब्बत कमा कर चले

 

अकेले कभी अब से होंगे न हम

वो हमको हमीं से मिला कर चले

 

न जाने क्या हाथी का घट जाएगा

अगर चींटियों को बचा कर चले

 

तरस जाएगा एक बोसे को भी

वो पत्थर जिसे तुम ख़ुदा कर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 23, 2016 at 5:57pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तुम्हे जीतने की अदा चाहती हूँ (ग़ज़ल)...... //डॉ. प्राची

122 122 122 122



कहो तो बता दूँ कि क्या चाहती हूँ।

तुम्हारे लिए हर दुआ चाहती हूँ।



दबी सी रही ज़िन्दगी नीँव जैसी

कि अब आसमां में उठा चाहती हूँ।



निभाओ मेरा साथ या छोड़ जाओ

कहाँ तुमको खुद से बँधा चाहती हूँ।



ज़ुबाँ से मुकरना कोई तुमसे सीखे

मैं सब कागजों पर लिखा चाहती हूँ।



न दिल पर तुम्हारे कोई बोझ आए

कहाँ एक भी वायदा चाहती हूँ।



गँवाया बहुत कुछ तेरी राह चल कर

दुबारा सभी कुछ मिला चाहती हूँ।



सज़ा बिन… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 23, 2016 at 4:30pm — 18 Comments

गूंगी गुड़िया ....



गूंगी गुड़िया ....

कितनी प्रसन्न दिख रही हो

सुनहरे बाल

छोटी सी फ्रॉक

छोटे छोटे पांवों में

लाल रंग की बैली

नटखट आँखें

नृत्य मुद्रा में फ़ैली दोनों बाहें

बिन बोले ही तुम

कितने सुंदर ढंग से

अपने भावों का

सम्प्रेषण कर रही हो

तुम पर

किसी मौसम का

कोई असर नहीं होता

सदैव मुस्कुराती हो

गुड़िया हो न !

शीशे की अलमारी में बंद रह के भी

सदा मुस्कुराती हो//

मैं भी बुल्कुल तुम्हारी तरह…

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Added by Sushil Sarna on February 23, 2016 at 3:38pm — 2 Comments


प्रधान संपादक
जमूरे (लघुकथा)

स्क्रिप्ट के पन्ने पलटते हुए अचानक प्रोड्यूसर के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, पास बैठे युवा स्क्रिप्ट राइटर की ओर मुड़ते हुए वह भड़का:

"ये तुम्हारी अक्ल को हो क्या गया है?"

"क्या हुआ सर जी, कोई गलती हो गई क्या?" स्क्रिप्ट राइटर ने आश्चर्य से पूछाI

"अरे इनको शराब पीते हुए क्यों दिखा दिया?"

"सर जो आदमी ऐसी पार्टी में जाएगा वो शराब तो पिएगा ही न?"

"अरे नहीं नहीं, बदलो इस सीन कोI"

"मगर ये तो स्क्रिप्ट की डिमांड हैI"

"गोली मारो स्क्रिप्ट कोI यह सीन फिल्म में…

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Added by योगराज प्रभाकर on February 23, 2016 at 2:30pm — 27 Comments

कौन किसके साथ (लघुकथा)

"सर, एक छोटा सा प्रार्थना पत्र है, आपकी स्वीकृति चाहिये|" कार्यालय के वरिष्ठ लिपिक ने अपने अधिकारी की तरफ कागज़ और एक कलम बढ़ाते हुए कहा|

अधिकारी ने कलम को छोड़, हाथ से कागज़ लेकर पढ़ना प्रारंभ किया, पढ़ते हुए उसके चेहरे की भंगिमाएं बदल गयीं, आँखों में कुछ तीक्ष्णता भी आ गयी, लेकिन उसने स्वयं को संयत करते हुए कहा, "अभी तीन माह पूर्व ही तो आपके वेतन में असाधारण वृद्धि की थी, अब फिर से...."

"हर संकट में आपका साथ दिया है, इस कुर्सी पर आप बैठे हैं, उसमें कहीं न कहीं मेरा भी तो हाथ…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 23, 2016 at 1:00pm — No Comments

बदजुबानी क्या कहें-ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

2122    2122    2122    212

*********************************

प्यार के  इस  माह  की यारो  कहानी क्या कहें

बिन किसी  के थम  गयी है जिंदगानी क्या कहें /1



यूँ  कभी  खुशियों के मौसम भी छलकती आँख थी

दर्द  से  हट  आँसुओं  के  अब  तो  मानी  क्या कहें /2



आजकल बैसाखियों पर वक्त जाने क्यों हुआ

थी कभी किससे जवाँ वो इक रवानी क्या कहें /3



आप कहते  हो  अकेलापन  सताता  है  बहुत

साथ  अपने  तो सदा  यादें  पुरानी  क्या कहें /4



खुश रहे बस हो …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2016 at 11:27am — 10 Comments

भूख और पेट / लघुकथा / कान्ता राॅय

आज फिर सुबह - सुबह वह सलाम बजाने पहुँच गया उनके घर । साथ में ब्रेड - अंडे का पैकेट भी ले आया था । खाली हाथ कैसे आता भला ! वे अफसर जो ठहरे ! सुना था कि उनको भूख बहुत लगती है ।

लेकिन भूखा तो वह भी था । उसके पेट में भी दिनों दिन भूख की आग बढ़ रही थी ।

लेकिन क्या करें ! नित नये पैंतरे बदलता ,जाने कब किस बात पर वे खुश हो जाये और उसका काम बन जायें !

सरकारी अफसरों का मिजाज़ और उनकी भूख , तो वह जानता था , पर मिटाने का तरीका अभी सीख रहा था ।



शुरू - शुरू में तो काजू की बरफी भी… Continue

Added by kanta roy on February 23, 2016 at 7:00am — 8 Comments

गजल(मनन)

2212 2212 2

मेरी गजल कहती बहुत है

यह घाव भी करती बहुत है।1



मन का कहा करती अकड़कर

चुप भी कभी रहती बहुत है।2



घिरकर रदीफों से भले ही

यह काफिये रचती बहुत है।3



चलती पगों को यह सहेजे

बेजा भले बचती बहुत है।4



गम को बसा अपनी लहर में

बनकर नदी बहती बहुत है।5



कितने चलाते तीर शाइर

बिंधती मगर सजती बहुत है।6



आँसू छिपाकर के बहाती

हर रूक्न में रहती बहुत है।7



कितने उड़ा लेती सपन यह

अशआर भी कहती… Continue

Added by Manan Kumar singh on February 23, 2016 at 6:55am — 4 Comments

मत्तगयन्द सवैया...

[१]

प्यार मुहब्बत संग दया समता,करुणाकर ही रखते हैं.

क्रूर कठोर अघोर सभी जन मे, सदबुद्धि वही फलते हैं.

रावण कौरव कंस बली हिरणाक्ष,सभी पल मे क्षरते हैं.

धर्म सधे जनमानस के हित, सत्यम नित्य कहा करते हैं.

[२]

वक्त बली अति सौम्य तुला रख, नीति सुनीति सदा पगता है.

काल अकाल विधी विधना, सबके सब मूक बयां करता है.

मीन - नदी अति व्यग्र रहें, बगुला - तट शांत मजा चखता है.

वक्त समग्र विकास करे, पर मानव सत्य नहीं गहता…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 23, 2016 at 12:00am — 2 Comments

बस दृष्टा बने रहो

तोड़ कर आरोपित बन्धन 
जब जब
बंधना चाहा जी चाहे बंधन में
पूरी तरह असफलता केवल मिली
न कल न आज
सम्भव ही नहीं स्वंय का स्वंय से मुक्त होना
कभी दलील ने
कभी दहलीज़ ने
कभी सीखी सिखाई
नसों में दौड़ती तहज़ीब ने
रोक लिए कदम
बस केवल हो पाया  इंतज़ार
तारों के जागने का
धूप के भागने का
कि  एक मैं  रहूँ एक मेरा संसार
मेरा आकाश…
Continue

Added by amita tiwari on February 22, 2016 at 10:30pm — 4 Comments

चुप हो जाते हैं ...

चुप हो जाते हैं.....

मन ही मन

हम कितना बतियाते हैं

जब अक्सर

हम चुप हो जाते हैं//

कभी आँखें बोलती हैं

कभी लब थरथराते हैं

रुके हुए पाँव

मील का पत्थर हो जाते है

जब अचानक

हम चुप हो जाते हैं//

तारीकियों के कैनवास पे

रिश्तों की सिसकती रेखाओं से

अपनी तूलिका में

दर्द का रंग भरकर

उसमें सिमट जाते हैं

अक्सर जब

हम चुप हो जाते हैं//

तपती राहों पर

सूखे होते शज़र से लिपट…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 22, 2016 at 9:37pm — 2 Comments

पी.एच.डी. (एक कथा)

आज मेरी "दुष्कर्म" पर हो रही शोध को पुरे तीन साल हो गएI बस अब तो पर्यवेक्षक का फाइनल वेरिफिकेशन बाकि हैI उसी काम के लिए आज उन्होंने मुझे अपने घर पर बुलाया हैI

"गुड मॉर्निंग सर" - में घर में घुसते ही बोलीI

"आओ दामिनी किसी हो"

"ठीक हुँ सर"

घर में सन्नाटा था, में सोफे पर बैठ गईI "मेडम नहीं दिख रहे" कहाँ है?

वो मायके गई हैI, तपाक से जवाब मिलाI ये सुन में थोड़ी डर गई, वो मेरे पास आकर बैठ गए, मुझे अजीब सी घुटन होने लगीI मेरी धड़कने तेज हो गई, न जाने क्यों मुझे कुछ अनहोनी का…

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Added by harikishan ojha on February 22, 2016 at 8:46pm — No Comments

ग़ज़ल

हर कोई लालायित कितना, कैसे भी हों कालजयी

इस चक्कर में ठेला-ठाली, धक्का-मुक्की मची रही

नदी वही है, लहर वही है, और खिवईया रहे वही

लेकिन अपनी नाव अकेली बीच भंवर में फंसी रही

बार-बार समझाते उनको हम भी हैं तुम जैसे ही

बार-बार उनके भेजे में बात हमारी नहीं घुसी

छोडो तंज़-मिजाज़ी बातें, आओ बैठो गीत बुनें

खींचा-तानी करते-करते बात वहीं पे रुकी रही

(अप्रकाशित मौलिक) 

Added by anwar suhail on February 22, 2016 at 8:30pm — No Comments

अभिनय की महता(लघुकथा)/सतविंदर कुमार

अपनी मांग को लेकर एक समुदाय के लोग शांति से आंदोलन कर रहे थे। अचानक आंदोलन ने उग्र रूप लिया। अन्य समुदायों से झड़पें हुई। मारा-मारी हुई। छोटी-बड़ी सड़कें बन्द। लूट-पाट शुरू। यह सब ऎसे चला की मारा-मारी में हुई झड़पों में कइयों की जानें भी गई।

एक पत्रकार मांग को लेकर आंदोलन कर रहे समुदाय के बड़े नेता से

-यह जो हो रहा है, क्या यह सब ठीक है?

-जब चारों तरफ आगजनी हो, मारा-मारी हो, सब अपने ही लोग अपनों को मारने पर तुले हों, जनता हालातों से तंग आ गई हो तो कुछ ठीक कहा जा सकता है? यह…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2016 at 3:00pm — 5 Comments

दोहे-पंकज का प्रयास

राजनीति के खेल में, दाँव लग गया देश।
घूम रहे गद्दार भी, धर नेता का वेष।।

बच कर रहिये दोस्तों, करिये सोच विचार।
उकसावे में अन्य के, न करिये व्यवहार।।

चञ्चल मन को रोकिये, हिंसा तो है पाप।
संविधान की बात को, प्रथम मानिये आप।।

यहाँ वहां मत फेंकिये, कूड़ा कचरा यार।
आएगा उड़ कर वही, पुनः आपके द्वार।।

पंकज का तो नीर से, जीवन का सम्बन्ध।
जिसकी आँख में है नहीं, कैसे हो अनुबंध।।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 22, 2016 at 12:45pm — 6 Comments

लाल कलम :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

आख़िरकार आज पिछले सत्रह सालों की साधना रंग ला ही गई, कसम से क्या–क्या पापड़ बेलने पड़े इस सचिवालय तक पहुँचने के लिए... नए सचिव साहब, मन ही मन सोचते हुए, कभी अपने खूबसूरत दफ्तर और कभी अपने स्वागत में प्रस्तुत फूलों के अम्बार को देख–देख कर मुस्करा रहे थे कि तभी, दरवाजे की घंटी बज उठी, एक आवाज आयी “क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ ? “जी, फ़रमाइए।”

“जय हिन्द सर, मै आपका ‘वैयक्तिक सहायक’ हूँ, आपका इस नए कार्य क्षेत्र में स्वागत है, मेरी तरफ से ये तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये साहब।”

“ओह ! धन्यवाद आपका,…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on February 22, 2016 at 10:06am — 6 Comments

एक छायावादी , एक छातावादी -डॉo विजय शंकर

वह जो

तपती दुपहरी मे

चिलमिलाती धूप में ,

जी तोड़ परिश्रम कर रहा है ,

पसीने में नहाया ,

कमा रहा है अपने लिए ,

अपने निजी सुख के लिए ,

वह सुख जो एक कल्पना है ,

तपती दुपहरी में भी वह एक

अदृश्य छाया का सुख भोग रहा है ,

कैसा छायावादी है वह ,

घोर अन्धकार में भी

रौशनी के मजे ले रहा है।

कठोर कष्ट में भी कैसा सुखद

काल्पनिक सुख भोग रहा है I

वह एक छायावादी है।

वह एक छायावादी है।



और एक वह है जो ,

विभिन्न सुरक्षा… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2016 at 8:00am — 4 Comments

मेरी प्यारी व्यथा

115

मेरी प्यारी व्यथा

===========

खपरैल से निर्विघ्न आती

वर्षा की अनुपम फुहारों से,

आर्द्रशीत अनिल ने, भिगोया था तनमन अपना।

मेंढकों की सी जिंदगी में उस दिन...

अपनी 'भुजा की तकिये' के नीचे से आता,

बड़े चाव से, तुम्हारा--- स्वर सुना।



गुंजरित बसंत कहीं पल्लवित वसुंधरा

स्वतंत्र कामना समूह के अनोखे जाल में

बटोरे थी, आकर्षक संन्निधि अपनी,

'बक मीन दर्शन' की दशा को ,

चित्त दे, सौरभ विखेरते शशांक में,

भूख प्यास भूल, तुझे पल पल…

Continue

Added by Dr T R Sukul on February 21, 2016 at 4:49pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
सूखे होठों की चलो प्यास बुझाई जाए (एक ग़ज़ल)......//डॉ.प्राची

2122 1122 1122 22



सारे धर्मों की सही बात उठाई जाए,

उसकी इक बूँद हर इन्साँ को पिलाई जाए।



है समंदर ही समंदर मगर इन्साँ प्यासा

सूखे होठों की चलो कहाँ प्यास बुझाई जाए।



आज तक माफ़ किया जिनको समझ कर नादाँ

अब जरूरत है उन्हें आँख दिखाई जाए।



जेठ की गर्म हवाओं में भी बरसे सावन

मेहंदी प्यार की प्यार की मेहंदी जो हाथों में रचाई जाए।…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 21, 2016 at 2:30pm — 40 Comments

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