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जब से पिया गए परदेस ...



जब से पिया गए परदेस ...

प्रेम हीन अब

इस जीवन में

कुछ भी नहीं है शेष

जब से पिया गए परदेस//

नयन घट

सब सूख गए

बिखरे घन से केश

जब से पिया गए परदेस//

दर्पण सूना

हुआ शृंगार से

सूना हिया का देस

जब से पिया गए परदेस//

लगे दंश से

बीते मधुपल

दीप जलें अशेष

जब से पिया गए परदेस//

बिरहन का तो

हर पल सूना

रहे अश्रु न शेष

जब से पिया गए…

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Added by Sushil Sarna on May 2, 2016 at 4:54pm — 14 Comments

सूखा सावन

जेठ तपता आषाढ तपता,

सावन भी तपता जा रहा,

जेठ की लू सावन में चलें,

समय बदलता जा रहा।



सावन में जब वर्षा होती,

कोयल कू-कू गाती थी,

मेंढक टर्र-टर्र करते थे,

बहारें राग सुनाती थी।



शीतल फुहारें झर-झर कर,

माथे से टकराती थी,

नई स्फूर्ति तन-मन में,

एकाएक भर जाती थी।



इंद्रधनुष के सात रंग,

जब याद मुझे वो आते हैं,

तीजों के त्योहार को

ताजा तभी कर जाते हैं।



इस सावन को नजर लग गई,

सावन तपता जा… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 2, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

लोकतंत्र की करवट ( लघु-कथा ) - डॉo विजय शंकर

नेता जी क्षेत्र का दौरा करके लौट रहे थे।
कुछ निराश , कुछ हताश। क्षेत्र वाले अपनी सुना रहे थे , नेता जी अपनी लगाए थे। नेता जी को कोई बात बनती नज़र नहीं आ रही थी।
" फिर आते हैं ", कह कर वापस हो लिए।
कार में बड़बड़ाते हुए निजी स्टाफ से बोले ," ये नहीं सुधरेंगे " . थोड़ा रुक कर फिर बोले ," हमारे सुधरने का इंतज़ार करेंगे " .

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on May 2, 2016 at 8:22am — 14 Comments

मज़दूर दिवस (लघुकथा)

 मज़दूर दिवस  – ( लघुकथा )  -

 कारखाने में  मज़दूर दिवस मनाया जा रहा था!  मंच पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान थे! उनके दायीं ओर प्रदेश के मुख्य मंत्री और बायीं तरफ़ कारखाने के मालिक सेठ धनपति लाल मौज़ूद थे!

 कारखाने के  चुंनिंदा कामगारों  को सम्मानित किया जाना था! सर्वश्रेष्ठ कामगार का पुरुस्कार सुखराम को मिलना था! सेठ जी ने माइक पर जैसे ही संबोधित करना शुरू किया! तभी सेठ जी के सैक्रेटरी ने सेठ जी के कान में बताया  “आपके कार्यालय के ए सी को जांच करते समय…

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Added by TEJ VEER SINGH on May 1, 2016 at 3:00pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उस रोज़ हाल मुझसे बताया नहीं गया- ग़ज़ल

221 2121 1221 212

उस रोज़ हाल मुझसे बताया नहीं गया

और उसके बाद रंज छुपाया नहीं गया



जो दर्द से नजात दिला सकता था मुझे

वो लफ़्ज़ अपने होंठों पे लाया नहीं गया



अश्कों की रोशनाई में लम्हे डुबो-डुबो

दिल के वरक़ पे लिक्खा मिटाया नहीं गया



तू तो ग़लत न था ये जहाँ सरगिराँ सही

सर किसलिये बता कि उठाया नहीं गया



इक बोझ मेरे काँधे पे हालात ने रखा

मजबूर इतना था कि गिराया नहीं गया



(रोशनाई- इंक; सरगिराँ- नाखुश)



मौलिक व… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on May 1, 2016 at 1:00pm — 21 Comments

ग़ज़ल -नूर- कोई चराग़ जला कर खुली हवा में रखो

१२१२ /११२२ /१२१२ /२२ (११२)

.

कोई चराग़ जला कर खुली हवा में रखो,

जो कश्तियाँ नहीं लौटीं उन्हें दुआ में रखो.

.

ग़ज़ब सितम है इसे यूँ अलग थलग रखना,

शराब ज़ह’र नहीं है इसे दवा में रखो.

.

इधर हैं बाढ़ के हालात और उधर सूखा,

हमारी दीदएतर अब, उधर फ़ज़ा में रखो.

.

शबाब हुस्न पे आया तो है मगर कम कम,

है मशविरा कि हया भी हर इक अदा में रखो.

.

तमाम फ़ैसले मेरे तुम्हे लगेंगे सही,

अगर जो ख़ुद को कभी तुम मेरी क़बा में रखो.  

.

ज़बां…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2016 at 12:28pm — 20 Comments

ग़ज़ल(उल्फत का रंग है )

ग़ज़ल (उल्फत का रंग है )

------------------------------------

221 --2121 --1221 ---212

ऐसा लगे है चढ़ गया उल्फत का रंग है ।

जो कल मेरे ख़िलाफ़ था वह  आज संग है ।

वह मेरे पास बैठ गए सब को छोड़ के

यूँ हर कोई न देख के महफ़िल में दंग  है ।

तरके वफ़ा का मश्वरा मत दीजिये हमें

सब जानते हैं आपका ये सिर्फ ढंग है ।

जिस दिन से जायदाद गए बाप छोड़ कर

घर तब से बन गया मेरा मैदाने जंग है ।

मैं एक क़दम…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 1, 2016 at 9:37am — 16 Comments

नई राहें

नई-नई राहें होंगी

नए-नए सहारे होंगे।

सूर्योदय से पहले

पक्षी चहचहा रहे होंगे

छोड कर निज नीड

नई तमन्नाओं के साथ

विचरण कर रहे होंगे।

नई-नई राहें होंगी

नए-नए सहारे होंगे।

हम जहाँ भी जाएंगे

तमन्नाओं की राहों पर

कुछ हमसे खुश

कुछ हमसे खफा होंगे

नई तमन्नाओं के साथ

नए इरादे भी बुलन्द होंगे।

नई-नई राहें होंगी

नए-नए सहारे होंगे।

पहाड़ों में-वादियों में

मैदानों में-घाटियों में

कल्याण का ही सहारा होगा

दिलों… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 1, 2016 at 9:02am — 4 Comments

ज़िन्दगी से जो मिला, अच्छा मिला (ग़ज़ल)

2122 2122 212

नेक-नीयत रख के आखिर क्या मिला
हर कदम पर हाँ मगर धोखा मिला

कौन दुश्मन,किसको कहते खैरख्वाह
हर कोई क़ातिल से मेरे था मिला

मांगने वालों की झोली ना भरी
जिसने ना माँगा उसे ज़्यादा मिला

यूं लगा कोई खज़ाना मिल गया
बीस पैसे का जब इक सिक्का मिला

बेवफ़ाई, बेबसी, ग़म, शाइरी
ज़िन्दगी से जो मिला अच्छा मिला
========================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on April 30, 2016 at 9:01pm — 14 Comments

जीवन पथ में, तेज़ धूप, तुम घने पेड़ की छाया माँ-ग़ज़ल

22-22-22-22-----22-22-22-2

जीवन पथ में, तेज़ धूप, तुम घने पेड़ की छाया माँ।

इस मन्दिर सा पावन दूजा, मन्दिर कहीं न पाया माँ।।



जब भी दुख के बादल छाये, मन तूफ़ाँ से घिरा कभी।

इस चेहरे पर दर्द की रेखा, और कौन पढ़ पाया माँ।।



तुम अपने सारे बच्चों  को, कैसे बांधे रखती हो।

जबकी सबके अलग रास्ते, फिर भी एक बनाया माँ।।



विह्वल व्यथित हृदय की धड़कन, ज्यूँ अमृत पा जाती है।

जब भी सर पर कभी स्नेह से, तुमने हाथ फिराया माँ।।



जब भी दर्द यहाँ उट्ठा है, चोट कहीं…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 30, 2016 at 1:30pm — 10 Comments

ज़िद्दी बालक से अश्रु

अश्रु जब बागी हो जाते हैं 
तो  सुनते ही नहीं 
किसी भी बहाने से 
 बहलाने से …
Continue

Added by amita tiwari on April 29, 2016 at 10:00pm — 9 Comments

अनाम ख़त

अनाम ख़त

 

चेरी के फूल जैसे

मुरझाये हुए शब्दों को

जब छु जायेंगी तुम्हारी नफ्स

तो शायद,यह फिर से सब्ज़ हो खिलें

और हाँ, इनके पीछे

छुपे हुए अर्थों की खुश्बू

उड़ने लगे तुम्हारे कमरे में

 

सावन के बादलों-सी बेचैनी

मंडराएगी सिने पे कहीं

और जब तुम्हारी आँखों से बरसेगी झड़ी

होंठ पे उगती इक नन्ही मुस्कान

यूँ ही दब जायेगी दर्द के ओलों से

तब यह मुर्दे शब्द और भी सजीव लगेंगी

 

तो क्या…

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Added by Rajkumar Shrestha on April 29, 2016 at 2:30pm — 3 Comments

जगना कहाँ ज़रूरी है?

22-22-22-22----------2212-1222



सोते रहिये, किसने टोका, जगना कहाँ ज़रूरी है?

ढ़ोते रहिये, जीवन बोझा, रखना कहाँ ज़रूरी है?



क्या मतलब है, और किसी से, अपने रहें सलीके से।

लिखते रहिये, इन पन्नों से, हटना कहाँ ज़रूरी है।।



घर से बाहर, भूले से भी, मेहनत ज़रा न करियेगा।

चिंतन करिये यूँ ही, कुछ भी, करना कहाँ ज़रूरी है।।



राहों में घायल को छोड़ें, व्याकुल पड़े ही रहने दें।

कलयुग में सिद्धार्थ का बुद्धा,बनना कहाँ ज़रूरी है।।



रावण…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 28, 2016 at 8:00pm — 11 Comments

1. रोशनी ..../२. यकीन ....

1. रोशनी ....

क्या ज़मीं

क्या आसमां

हर तरफ

चटख़ धूप है

सहर से सांझ तक

उजालों की बारिश है

बस, तुम आ जाओ

कि मेरी तारीकियों को

रोशनी मिले //

२. यकीन ....

चटख धूप में भी

अब्र चैन नहीं लेते

आधी सी धूप में

आधी सी बारिश है

जैसे अधूरी सी ज़िंदगी की

अधूरी से ख्वाहिश है

सबा भी बेसब्र नज़र आती है

लगता है कोई रूठा पल

मिलन को बेकरार है

शायद कोई वादा

मेरी तन्हाई में

आरज़ू-ऐ-शरर बन के…

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Added by Sushil Sarna on April 28, 2016 at 2:27pm — 6 Comments

इस तरह इक औ नया रिश्ता यहाँ बनता गया

2122  2122  2122  212

इस तरह इक औ नया रिश्ता यहाँ बनता गया

आप हम से ना मिले औ दिल गरां बनता गया

 

दिल से दिल मिलने लगे जब तो जहाँ बनता गया

प्यार से भरपूर रोशन आशियाँ बनता गया

 

मिल फकीरों की दुआ से फायदा ये है हुआ

घर मेरा भी धीरे - धीरे आस्तां बनता गया

 

मैं पलटने जब चला किस्मत तो खाली हाथ था

मेहनत के साथ फिर तो कारवां बनता गया

 

रोज कुछ बाजार से लाने की आदत बन गयी

और फिर तो घर में मेरे…

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Added by munish tanha on April 28, 2016 at 9:00am — 5 Comments

ग़ज़ल : इसलिए ख़ाकसार टेढ़ा है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

 

ये दिमागी बुखार टेढ़ा है

यही सच है कि प्यार टेढ़ा है

 

स्वाद इसका है लाजवाब मियाँ

क्या हुआ गर अचार टेढ़ा है

 

जिनकी मुट्ठी हो बंद लालच से

उन्हें लगता है जार टेढ़ा है

 

खार होता है एकदम सीधा

फूल है मेरा यार, टेढ़ा है

 

यूकिलिप्टस कहीं न बन जाये

इसलिए ख़ाकसार टेढ़ा है

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 27, 2016 at 10:43pm — 15 Comments

हौले हौले-(ग़ज़ल - एक प्रयास)

हौले हौले-(ग़ज़ल - एक प्रयास)

बहर -२२ २२ २२ २

हौले हौले रात चली

हौले हौले बात चली !!१!!

हौले हौले  होंठ  हिले

हौले से बरसात चली !!२!!

हौले  हौले   आँखों    में

प्यासी प्यासी रात चली !!३!!

हौले   हौले   जीत   हुई

आलिंगन की बात चली !!४!!

हौले  हौले  ख़्वाबों की

आँखों से बरसात चली !!५!!

हौले  हौले  आँखों   से

जागी जागी रात चली !!६!!

हौले  हौले  वो  महकी

जुगनू की बारात चली !!७!!



सुशील सरना…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 27, 2016 at 4:40pm — 15 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए... ग़ज़ल//डॉ. प्राची

1222,1222,1222,1222



अभी है वक्त हाथों में, कहीं ना ये निकल जाए

जरा लहज़ा बदल लें तो, जो बिगड़ा है सम्हल जाए



नज़र भर कर हमें देखो, फिर अपने दिल से सच पूछो

बहुत मुमकिन है दिल की उलझनों का रुख बदल जाए



हमें भी दिल की सब बातें तुम्हें खुल कर बतानी हैं

अभी ठहरो उजाला है ज़रा सी साँझ ढल जाए



लहर से तट का हर पत्थर किया करता है अठखेली

यहाँ डग सोच कर भरना, कहीं ना पग फिसल जाए



तुम्हें अपना समझ बैठेगा इसमें अक्स मत देखो

बहुत मासूम… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 27, 2016 at 2:15pm — 7 Comments

सुधि आँगन ....

सुधि आँगन ....

याद  आये  वो   बैन   तुम्हारे

तृषित नयनों का सिंगार हुआ

संग समीर के

उलझी अलकें

स्मृति कलश से फिर

छलकी पलकें

याद  आये  वो  अधर तुम्हारे

फिर मूक पल हरसिंगार हुआ



स्मृति मेघों की

निर्मम गर्जन

देह कम्पन्न का

करती अभिनन्दन



याद आये वो स्पर्श तुम्हारे

आलिंगन क्षण अंगार हुआ



जब देह से देह की

गंध मिली

तब स्वप्निल पवन

मकरंद चली

याद आये…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 26, 2016 at 9:41pm — 8 Comments

जिन्दगी का सफर

जिन्दगी के सफर पर
बढते रहो, मगर
किसी की राह मत देखो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।
उन्हीं कदमचिन्हों पर
बन जाएगा कारवां
एक दिन।
गमों की परवाह
मत करो, मगर
अधिक खुशियों से
तुम जरूर डरना।
खुशियों के साथ
गम
याद करते चलो।
अपने कदमों के निशां
छोडते चलो।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on April 26, 2016 at 8:29pm — 4 Comments

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