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March 2017 Blog Posts

हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22



मुझको सच कहने की बीमारी है

इसलिए तो ये संगबारी है



अपने हिस्से में मह्ज़ ख़्वाब हैं,बस!

नींद भी, रात भी तुम्हारी है



एक अरसे की बेक़रारी पर

वस्ल का एक पल ही भारी है



चीरती जाती है मिरे दिल को

याद तेरी है या कि आरी है?



हमने साँसें भी गिरवी रख दी हैं

अब तो ये ज़िन्दगी उधारी है



सब तो वाकिफ़ हैं आखिरी सच से

किसलिए फिर ये मारा-मारी है?



नींद का कुछ अता-पता तो नहीं

रात है, ख़्वाब हैं,… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on March 17, 2017 at 4:51pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

221 2121 1221 212

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया

 

माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी

लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया

 

खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में

किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया

 

शायद ये दुनिया मेरे लिए थी नहीं कभी

फिर शिकवा क्यों करुँ कि खुदा फ़ैज़ उठा गया

 

ख़्वाबों को ज़िन्दा करके भी क्या होता, दोस्तो!

मेरा जो वक्त था…

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Added by शिज्जु "शकूर" on March 17, 2017 at 2:30pm — 9 Comments

ज़ुबाँ पे सख्त पहरा हो रहा है(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 122
बिखरकर फिर इकट्ठा हो रहा है
जवाँ फिर से इरादा हो रहा है।

जिसे अपना समझते थे,न जाने
वही क्यों अब पराया हो रहा है?

समन्दर सी छलकती हैं ये आँखें
कोई तो ज़ख्म गहरा हो रहा है।

किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

भरोसा टूटना लाज़िम हुआ अब
जहाँ का दौर झूठा हो रहा है।

ज़ुबाँ कैसे किसी की अब उठेगी
ज़ुबाँ पे सख़्त पहरा हो रहा है।

मौलिक/अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 16, 2017 at 10:11pm — 12 Comments

मधुमालती छंद ( मात्रा विधान - 7-7 , 7-7)

ऐसा हुआ , बारात में
लड़का नहीँ , आया अभी

बोले पिता , बेटा कहे
पैसा अभी , मिला नहीं

शादी नहीँ , होगी अभी
मिला नहीं , दहेज अभी ।

बेटी कहे , देना नहीं
पैसा बुरा , जले चिता

होती नहीं , बेटी बुरी
चलती नही , चालें कभी

पगड़ी भली , लागे मुझे
पिता बोज़ क्यों , माने मुझे

बेटी कभी , चाहे नहीँ
अपमान नहीँ , करे कभी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 16, 2017 at 4:14pm — 7 Comments

फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)

फुर्सत से कभी मेरी,

ज़िंदगानी देख लेना।

हो सके तो दरिया,

तूफानी देख लेना॥



है मेरी माँ ये,

समझाऊँ तुम्हें कैसे।

भूखा जो रहूँ, मैं

इसकी पेशानी देख लेना॥



आज़ाद परिंदे हो,

तुम उड़ ही जाओगे।

माँ-बाप की कभी खटिया,

पुरानी देख लेना॥



मैं अकेला कब था

मुझ में क़ायनात थी।

किस तरह से हमने, की

बे-ईमानी देख लेना॥



है सहूलियत तो,

मुंह खोलने से पहले।

पिताजी के अपनी,

परेशानी देख लेना॥



पीपल… Continue

Added by SudhenduOjha on March 16, 2017 at 2:35pm — No Comments

दीवार के कान - लघुकथा –

दीवार के कान - लघुकथा –

शंकर सिंह एक अनुशासन प्रिय और जिम्मेवार अधिकारी थे।  कारखाने में और कोलोनी में उनकी अच्छी छवि थी। लेकिन कल कारखाने में उनके साथ जो घटना हुई थी, उसने उनको विचलित कर दिया था। एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से मामूली वार्तालाप ने एक उग्र झड़प का रूप ले लिया।  यूनियन लीडर्स के बीच में आने से मामला कुछ ज्यादा ही तूल पकड़ गया। मि० सिंह से हाथापाई तक हो गयी। मैनेजमेंट ने तुरंत मि० सिंह को घर भेज दिया था। उनके आने के बाद प्रेस वाले, मीडिया वाले भी कारखाने तक आगये…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 16, 2017 at 2:34pm — 4 Comments

चला गया ...

चला गया ...

हवा 

शयन कक्ष के परदों से

खेलती रही

टेबल पर पड़ी मैग्ज़ीन के पन्ने

वायु वेग से

बार बार

फड़फड़ाते रहे

तन्हा से पड़े

काफी के मग

खाली होते हुए भी

अपने में

बहुत कुछ समेटे थे

समेटे थे

अपने अंदर

अकेलेपन से बातें करते

वो क्षण

जो काफी के मग को

अधरों से लगाए

कनखियों से निहारते हुए 

आँखों ने आँखों में

बिताये थे

समेटे थे…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 15, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (निगाहों से आँसू निकलते रहे )

ग़ज़ल

-------

(फऊलन -फऊलन -फऊलन -फअल )

क़ियामत की वो चाल चलते रहे |

निगाहें मिलाकर बदलते रहे |

दिखा कर गया इक झलक क्या कोई

मुसलसल ही हम आँख मलते रहे |

यही तो है गम प्यार के नाम पर

हमें ज़िंदगी भर वो छलते रहे |

मिली हार उलफत के आगे उन्हें

जो ज़हरे तअस्सुब उगलते रहे |

तअस्सुब की आँधी है हैरां न यूँ

वफ़ा के दिए सारे जलते रहे |

असर होगा उनपर यही सोच कर

निगाहों से आँसू…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 15, 2017 at 8:51pm — 16 Comments

गुँथन-उलझन

शंका और विश्वास के दोराहे पर 

मन में पीली धुंधली उदास गहरी

बेमाप वेदना यथार्थों की लिए

स्वीकार कर लेता हूँ सभी झूठ 

कि जाने कब कहाँ किस झूठ में भी

किसी की विवशता दिख जाए, या

मिल जाए उसकी सच्चाई का संकेत

कि जानता हूँ मैं, यह ठंडी पुरवाई

यह फैली हुई धूप नदी-झील-तालाब

सब कहते हैं  ...

वह कभी झूठी नहीं थी

ऊँची उठती है कोई उभरती कराह

स्वपनों के अनदेखे विस्तार में

विद्रोह करते हैं मेरे…

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Added by vijay nikore on March 15, 2017 at 7:32pm — 12 Comments

फटी बिवाई(लघुकथा)राहिला

"सुनैना की माँ!ज़िंदगी में पहली बार आदमी पहचानने में चूक हो गयी ।मैंने बड़ा भला लड़का समझा था उसे ।लेकिन यह तो ,अव्वल दर्जे का पढ़ालिखा गंवार निकला।अगर पता होता ऐसा बज्रमूर्ख होगा ।तो कतई अपनी बच्ची नहीं ब्याहता ऐसे लड़के से।" पछताते हुए ठाकुर बलदेव का गुस्सा अपने आप में नहीं समा रहा था।

"आप शांत हो जाईये ।ऐसे मसले ठंडे दिमाग़ से सुलझाए जाते हैं। आप कुंअर साहब को बुलवा भेजिए ,फिर पूछते,समझाते है क्या बात है?वैसे तो हमने मान पान में कोई कसर नहीं रखी ।फिर बिटिया को इस तरह परेशान और मारपीट करने का… Continue

Added by Rahila on March 15, 2017 at 11:28am — 4 Comments

"नूर" ....कब चुना हमने मुसलमान या हिन्दू होना

२१२२/११२२/११२२/२२

कब चुना हमने मुसलमान या हिन्दू होना

न तो माँ बाप चुनें और न घर ही को चुना

हम ने ये भी न चुना था कि बशर हो जायें.



हम को इंसान बना कर था यहाँ भेजा गया,

कैसे मज़हब के कई ख़ानों में तक्सीम हुए?

क्यूँ सिखाये गए हम को ये सबक नफरत के?

.

हम ने दहशत से परे जा के बुना इक सपना

अपनी दुनिया न सही, काश हो आँगन अपना

ऐसा आँगन कि जहाँ साथ पलें राम-ओ-रहीम.

.

जुर्म ये था कि जलाया था अँधेरों में चराग़

हम ने नफ़रत की हवाओं के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 14, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

धारा के विपरीत (लघु कथा )

दूर से ढोल मजीरे की ताल पर हुरियारों की आवाज आ रही थी – ‘अवध माँ  राना भयो मरदाना कि हाँ--- हाँ -----राना भयो मरदाना ‘

हाथ में पिचकारी लिए एक युवक ने किसी वृद्ध से पूंछा – ये राना कौन है ? कौनो बड़े हुरियार थे का जो इनके नाम की होरी गाई जा रही है.’

बुजुर्ग ने आश्चर्य से युवक की और देखा और कहा –‘तुम का पढ़े हो, तुम्हे अपने बैसवारे का इतिहास भी नहीं मालूम. अरे राना यहीं शंकरपुर के ताल्लुकेदार थे, जिन्होंने सन सत्तावन की क्रान्ति में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और आखिर तक…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 14, 2017 at 9:12pm — No Comments

सार छंद (मात्रिक विधान-16-12/16-12 )

छन्न पकैया छन्न पकैया ,बोले मीठी बोली ।

गाँवों , बाग़ो़ं गलियों छाई , टेसू की रंगोली ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , देखो, खिलता पलाश ।

पागल मतवाले भँवरों को , कलियों की है तलाश ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , टेसू मन को भाया ।

मतवाला, दीवाना, पागल, भँवरा भी इठलाया ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , उड़ता अबीर-गुलाल ।

यारों, संगी-साथी मिलकर ,करते मस्ती धमाल ।।

.

छन्न पकैया छन्न पकैया , पलाश के हैं झूमर ।

मौसम, यौवन, कलियाँ…

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Added by Mohammed Arif on March 14, 2017 at 7:00pm — 7 Comments

भाड़ा

 

"साहेब, कोई पुराना चद्दर हो तो दे दीजिये । बहुत ठंढा गिरने लगा है । कोई पुराना चद्दर दे दीजिये ।"

 

यूं तो वर्किंग डे पर रात के किसी भी आयोजनों में जाने का प्रोग्राम कम ही बनता है । लेकिन फिर भी कभी-कभी कुछ ऐसे मौके भी आ ही जाते हैं जब इस तरह के किसी आयोजन में जाना पड़ जाता है । ऐसे ही एक आयोजन को अटेण्ड कर वापस आते-आते रात के साढ़े ग्यारह बज गए । गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन से घर तक जाने के लिए आटो…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 14, 2017 at 4:23pm — 4 Comments

नई शुरुआत----

 नई शुरुआत-----

 

जो हो चुका सो हो चुका,

तुम इक नई शुरुआत करो.

हर चीज बदलती है,

अपनी आखिरी साँस के साथ,

तुम फिर से कोई जुदा बात करो.

उजड़ गया गर शहरे-आलम सारा,

तुम फिर नया अहसास…

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Added by Naval Kishor Soni on March 14, 2017 at 12:15pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सरसी छंद होली के रंग

 सरसी छंद

वृन्दावन की ले पिचकारी,बरसाने का रंग|

अंग अंग धो डालो पीकर ,महादेव की भंग|

राधा जैसी पावनता ले ,कान्हा जैसा प्यार|

बरसाओ पावन रंगों की ,रिमझिम मस्त फुहार| 

 

चन्दा से लेकर कुछ चाँदी ,औ सूरज से स्वर्ण|

केसर की क्यारी से चुनकर ,केसरिया नव पर्ण|

सच्चाई मन की अच्छाई ,साथ मिलाकर घोट|

पावन रंग बनाना  सच्चा ,नहीं मिलाना खोट|

 

द्वेष क्लेश से मैले मुखड़े ,जग में मिलें अनेक|

भूल हरा केसरिया आओ ,हों जाएँ सब…

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Added by rajesh kumari on March 13, 2017 at 7:29pm — 14 Comments

प्रतिशोध - लघुकथा –

 प्रतिशोध  -   लघुकथा –

 "मोहन बाबू, पूरा मोहल्ला बाहर होली खेल रहा है। आप सारे परिवार के साथ घर में ही  हैं"।

" सुखराम जी, हम लोग होली नहीं खेलते"।

"कोई खास कारण"?

"हाँ, कुछ ऐसा ही समझ लीजिये"।

"अगर बुरा ना लगे तो क्या मैं जान सकता हूँ"?

"पूरा मोहल्ला जानता है, आप भी जान जाओगे, अभी नये नये आये हो"।

"क्या आप को बताने में ऐतराज़ है"?

"ऐसी तो कोई बात नहीं है, आइये"।

दोनों पड़ोसी बैठ गये।

"सुखराम जी मेरी तीन बेटियाँ थीं। सबसे…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on March 13, 2017 at 6:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

पानी वाला बादल हो ,
नदियों में फिर हलचल हो ।
गाँवों की पनघट पे अब ,
फिर से बजती पायल हो ।
झूठे वादों से ऊपर ,
कोई तो ऐसा दल हो ।
जिसमें राहत हो सबको ,
आने वाला वो कल हो ।
सारे दुख सह जाऊँ मैं ,
सर पे माँ का आँचल हो ।
साफ़ हवा पानी पायें ,
पेड़ों वाला जंगल हो ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 12, 2017 at 1:30pm — 3 Comments

"होली" सायलीछंद

"होली" सायलीछंद



शिल्प- 1 2 3 2 1 शब्द



(1)

होली

का त्योहार

जीवन में लाया

रंगों की

बौछार।



(2)

होली

में जलते

अत्याचार, कपट, छल

निष्पाप भक्त

बचते।



(3)

होली

लाई रंग

हों सभी लाल

खेलें पलास

संग।



(4)

होली

देती छेद

ऊँच नीच के

मन से

भेद।



(5)

सत्रह

की होली

भाजपा की तूती

देश… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 12, 2017 at 1:22pm — 3 Comments

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