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ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला, ग़ज़ल नूर की

गा ल गा गा (ललगागा) / लल गागा/ ललगागा / गा गा (ललगा) 

.

ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला,

मैं बशर मैं ही ख़ुदा मैं ही पयम्बर निकला.

.

ये ज़मीं चाँद सितारे ये ख़ला.... सारा जहान, 

वुसअत-ए-फ़िक्र से मेरी ज़रा कमतर निकला.


.

संग-दिल होता जो मैं आप भी कुछ पा जाते,

क्या मेरी राख़ से पिघला हुआ पत्थर निकला?
 …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 7:00pm — 26 Comments


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सुन्दरी सवैया (राज )

११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ २

सुन्दरी सवैया (मापनीयुक्त वर्णिक)

वर्णिक मापनी - 112 X 8 + 2 



निकले घर से नदिया लहरी शुचि शीतलता पहने गहना है|

चलते रहना मृदु  नीर लिए हर मौसम में उसको बहना है|

कटना छिलना उठना गिरना निज पीर सभी हँसके सहना है|

अधिकार नहीं कुछ बोल सके अनुशासन में उसको रहना है| 

 

खुशबू जिसमे सच की बसती उससे बढ़के इक फूल नहीं है|

जननी रखती निज पाँव जहाँ उससे शुचि पावन धूल नहीं है|

जिसके रहते अरि फूल छुए…

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Added by rajesh kumari on April 11, 2017 at 6:12pm — 7 Comments

गज़ल --आशिको के पास जाकर देखिये

2122 2122 212



मैकदों के पास आकर देखिये ।

तिश्नगी थोड़ी बढ़ाकर देखिये ।।



वह नई उल्फ़त या नागन है कोई ।

गौर से चिलमन हटाकर देखिये ।।



सर फरोसी की तमन्ना है अगर ।

बेवफा से दिल लगाकर देखिये ।।



आपकी जुल्फें सवंर जायेगी खुद ।

आशिकों के पास जाकर देखिये ।।



आस्तीनों में सपोले हैं छुपे ।

हाथ दुश्मन से मिलाकर देखिये ।।



जल न् जाऊँ मैं कहीं फिर इश्क़ में ।

इस तरह मत मुस्कुराकर देखिये ।।



होश खोने का…

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Added by Naveen Mani Tripathi on April 10, 2017 at 5:30pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
खड़े तनकर तुम्हारे सामने दीवार भी हम थे (ग़ज़ल 'राज')

बहा तुमको लिए जाती थी जो वो  धार भी हम थे

हमी साहिल तुम्हारी नाव के  पतवार भी हम थे

निगल जाता सरापा तुमको वो तूफ़ान था जालिम

खड़े तनकर  उसी के  सामने दीवार भी हम थे

मुक़द्दस फूल थे मेरे चमन के इक महकते गर 

छुपे बैठे हिफाज़त को तुम्हारी ख़ार भी हम थे

किया घायल तुम्हारा दिल अगर इल्जाम भी होता 

तुम्हारा  दर्द पीने  को वहाँ गमख्वार भी हम थे

रिवाजों की बनी जंजीर ने गर तुमको बांधा था

वहाँ मौजूद उसको काटने…

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Added by rajesh kumari on April 9, 2017 at 8:30pm — 21 Comments

मनहरण घनाक्षरी...समीक्षार्थ..अबके चुनाव में...//अलका ललित

समीक्षार्थ

मनहरण घनाक्षरी ....(एक प्रयास)

***

भ्रष्टाचारियों से बड़ी

चोट खाई पीढ़ियों ने

चोट ये मिटानी होगी

अबकी चुनाव में  

.

दांव न लगाने देंगे

झूठे वादों का जी अब

हार भी चखानी होगी

अबकी  चुनाव में

.

मतदाता याद आए

पांच साल बाद जिसे

मात उसे खानी होगी

अबकी…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on April 9, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

"मेरे दोस्त"

कई पेड़ों की तरह वह भी एक पेड़ था

शब्दों के खांचों से दूर.............



छुटपन में कभी कोई गुठली फेंक दिया था

प्रकृति ने अपना काम शुरू किया था



समय गुज़रा लाल कोंपल था दिखा

ख़ुशी हुई बच्चे ने बच्चे को देखा



एक पेड़ जो मुझे जन्म से देख रहा था

एक पेड़ जिसको जन्म से मैं देख रहा था



एक अनजान दरख़्त

एक थोड़ा जाना पहचाना ........



मेरे दुआर का पेड़ मेरी ऊँचाई लाँघ गया

ख़ुशी ख़ुशी मैं उसके कंधों पर भाग गया



बहुत से जीव मेरे… Continue

Added by ASHUTOSH JHA on April 9, 2017 at 4:26pm — 8 Comments

गजल(पा लिया , खोया किसीने.....)

2122  2122  2122 212 

पा लिया, खोया किसीने,चल रहा यह सिलसिला

ख्वाहिशें अनजान थीं जो कुछ मिला अच्छा मिला।1



गर्दिशों के दौर में अरमान मचले कम नहीं

पर सरे पतझड़ यहाँ उम्मीद का अँखुआ खिला।2



घाव देकर हँस रहे हैं आजकल बेख़ौफ़ वे

कौन अपनों से करेगा बोलिये फिर से गिला?3



डर गये जीते शज़र सब आँधियों के जोर से

सूखता-सा जो खड़ा है कब सका कोई…

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Added by Manan Kumar singh on April 9, 2017 at 10:30am — 18 Comments

एक महान जासूसी लेखक

करार के अनुसार उसने उस महान जासूसी लेखक की चाकू से गोद कर हत्या की और तेजी से घर के बाहर निकल गया।



आज से कुछ दिन पहले हत्यारे के घर में। "तुम अपनी ही हत्या क्यों करवाना चाहते हो? तुम पागल तो नहीं हो?" हत्यारे ने चौंकते हुए कहा।



"नहीं। मैं एक महान जासूसी लेखक हूँ।" उस आदमी ने अपना परिचय दिया।



"पर अपनी हत्या क्यों?" उसने उत्सुकता ज़ाहिर की।



"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी कहानियों की क़द्र करें। मैंने उन्हें रहस्य से भरी हुई अद्भुत और शानदार कहानियाँ… Continue

Added by Mahendra Kumar on April 9, 2017 at 10:05am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -जब ग़लत हो नामवर, तो चुप रहें - ( गिरिराज )

2122    2122    212

धारणायें हों मुखर, तो चुप  रहें

सच न पाये जब डगर, तो चुप  रहें

  

शब्द ज़िद्दी और अड़ियल जब लगें

और ढूँढें, अर्थ अगर तो चुप  रहें

 

जब धरा भी दूर हो आकाश भी

आप लटके हों अधर, तो चुप  रहें

 

कृष्ण हो जाये किशन, स्वीकार हो

शह्र पर जब हो समर तो चुप रहें

 

सीखने वालों पे यारों पिल पड़ें

जब ग़लत हो नामवर, तो चुप  रहें

 

तेल औ’र पानी मिलाने के लिये

कोशिशें देखें…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 8:00am — 24 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-3

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

(मक़्ते में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को नज़र अंदाज़ कर दें)



रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं

तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं



हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े

याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं



हाल वो देखा ग़ज़ल का आज यारो,शर्म से

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की भी रूहें पानी पानी हो गईं



क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें

शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं



जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच… Continue

Added by Samar kabeer on April 9, 2017 at 12:13am — 37 Comments

बीत जाएगा समय तो क्या करेगा आदमी

2122    2122    2122   212

 

सच यहाँ पर कुछ नहीं जब खुद है झूठा आदमी|

जानकर भी आज सब अनजान देखा आदमी|

 

जग पराया देश है अपना यहाँ कुछ भी नहीं

कुछ दिनों के वास्ते इस जग में आया आदमी|

 

लोग अपने वास्ते जीते हैं दुनिया में मगर

जो पराया दर्द समझे है वो आला आदमी

  

ये ख़जाना और दौलत सब यही रह जाएगा 

सिर्फ तेरा कर्म ही बस साथ देगा आदमी|

 

बेवफ़ा सी ज़िन्दगी जिस दिन तुझे ठुकराएगी

आदमी को लाश कहकर…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on April 8, 2017 at 12:00am — 7 Comments

गजल

221   221   212

वह दौर था जो गुजर गया

था इक नशा जो उतर गया

 

देखा था उसने फरेब से

दिल आशिकाना सिहर गया

 

मुफलिस समझ के जनाब वो 

पहचानने से मुकर गया

 

जिस पर भरोसा किया बहुत

वह यार जाने किधर गया

 

जब साथ था तो कमाल था

अब जिन्दगी का हुनर गया

 

इक ठेस ही थी लगी मुझे  

मैं कांच सा था बिखर गया

 

जिस नाग ने था डसा मुझे

मैंने सुना है कि मर…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 7, 2017 at 9:19pm — 10 Comments

हाइकू

लगती प्यारी
मोहे मेरी बिटिया
गोरैया जैसी ।

रोज़ जगाती
नींद से हर दिन
प्यारी बिटिया ।

ठुमक कर
चलती थी नन्हीं सी
मेरी बिटिया ।

बड़ी सयानी
मीठी जिसकी बोली
मेरी बिटिया ।


घर आँगन
महकाती प्यार से
मेरी बिटिया ।

नया घरौंदा
बसाया अपना भी
मेरी बिटिया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 7, 2017 at 4:30pm — 3 Comments

कोई ऐसा मिला प्यार की राह में

कोई ऐसा मिला प्यार की राह में,

इक नज़र में ही उसपर फ़िदा हो लिए..

क्या कशिश थी उन आंखों में, हम क्या कहें?

देखते ही वो मेरे ख़ुदा हो लिए..

-

उनकी सूरत की जो रोशनी मिल गयी

शायरी के लिए, शायरी मिल गयी.

एक पल में न जाने ये क्या हो गया?

हमको ऐसा लगा हर ख़ुशी मिल गयी.



इस नज़ाकत से उनकी निगाहें झुकीं,

दिल के अहसास सारे फ़ना हो लिए..

(कोई ऐसा मिला प्यार की राह में,

इक नज़र में ही उसपर फ़िदा हो लिए..)

**

शाम ढल-सी गयी, रात होने… Continue

Added by Zaif on April 7, 2017 at 11:03am — 7 Comments

याद मेरी दिला रही होगी (गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

2122 1212 22
उनको हिचकी सता रही होगी
याद मेरी दिला रही होगी

चैन दिल का खो गया होगा
आँसुओं को बहा रही होगी

फ्रेम कस के पकड़ लिया होगा
प्यार तस्वीर पा रही होगी

हौंसला काम कर गया होगा
पास मंजिल अब आ रही होगी

वक्त के साथ सब बदलते हैं
रुत यही तो सिखा रही होगी

भूख ने दूर कर दिए बच्चे
कैसे माँ मन लगा रही होगी ?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on April 7, 2017 at 7:00am — 19 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

अब दुवाओं के लिए हाथ उठाया जाए ।

तेरे सर से न् कभी इश्क़ का साया जाए ।।



हुस्न मगरूर हुआ है ये सही है यारों ।

आइनॉ को न् उसे और दिखाया जाए ।।



होश खोना भी जरूरी है मुहब्बत के लिए ।

सुर्ख होठों पे कोई जाम सजाया जाए ।।



पूछ मत दर्द से रिश्तों की कहानी मेरी ।

ज़ह्र देना है तो बेख़ौफ़ पिलाया जाए ।।



एक हसरत के लिए जिद भी कहाँ है वाजिब ।

गैर चेहरों को चलो दिल में बसाया जाए ।।



बिक गई आज निशानी भी जो तुमने… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 6, 2017 at 11:14pm — 5 Comments

ग़ज़ल

२१२२/१२१२/२२

हमने अपने ही पाँव काटे हैं,
इस सड़क पर के छाँव काटे हैं।

जो परींदा मजे से रहता था,
उनके तो सारे ठाँव काटे हैं।

दौड़ना चाहती है हर बेवा,
पर ये दुनिया ने पाँव काटे हैं।

वार जिसने भी करना चाहा तो,
उसके तो सारे दाँव काटे हैं।

जानकर जा रहे शहर(१२) तुम भी,
इस शहर(१२)ने ही गाँव काटे हैं।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Hemant kumar on April 6, 2017 at 9:00pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -और हम भी प्यार की जागीर को समझे नहीं - ( गिरिराज )

2122    2122   2122   212

कट गये सर वो मगर शमशीर को समझे नहीं

घर जला, पर आग की तासीर को समझे नहीं

 

ख़्वाब ए आज़ादी कभी ताबीर तक पहुँचे भी क्यूँ 

सबको समझे वो मगर जंजीर को समझे नहीं

 

वो मुसव्विर पर सभी तुहमत लगाने लग गये  

जो उभरते मुल्क़ की तस्वीर को समझे नहीं

 

मजहबों में बाँट, वो नफरत दिलों में बो गये   

और हम भी उनकी इस तदबीर को समझे नहीं

 

उनका दावा है, वो चार: दर्द का करते रहे

हमको शिकवा है…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 6, 2017 at 9:00am — 23 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-2

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन



आज तारीफ़ें मिरी उनकी ज़बानी हो गईं

हासिदों की देख शकलें ज़ाफ़रानी हो गईं



उनके रुख़सारों की गर्मी अलअमाँ सद अलअमाँ

सब चटानें बर्फ़ की यकलख़्त पानी हो गईं



आज हैं मासूम सीता की तरह ये रावणों

क्या करोगे लड़कियाँ गर ये भवानी हो गईं



देखते थे कल हिक़ारत से हमें वो देख लें

किस क़दर नस्लें हमारी आज ज्ञानी हो गईं



मैं तो हूँ ख़ामोश लेकिन लोग कहते हैं "समर"

तेरी ग़ज़लें एह्ल-ए-दिल की तर्जुमानी हो… Continue

Added by Samar kabeer on April 6, 2017 at 12:29am — 31 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘नया मुर्दा’ (लघु कथा 'राज')

 नदी का वो  घाट पर जहाँ दूर-दूर तक मुर्दों के जलने से मांस की सड़ांध फैली रहती थी साँस लेना भी दूभर होता था वहीँ थोड़ी ही दूरी पर एक झोंपड़ी ऐसी भी थी जो चिता की अग्नि से रोशन होती थी|

भैरो सिंह का पूरा परिवार उसमे रहता था दो छोटे छोटे बच्चे झोंपड़ी के बाहर रेत के घरोंदे बनाते हुए अक्सर दिखाई दे जाते थे |

दो दिन से घाट पर कोई चिता नहीं जली थी बाहर बच्चे खेलते-खेलते उचक कर राह देखते- देखते थक गए थे कि अचानक उनको राम नाम सत्य है की आवाजें सुनाई दी सुनते ही बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े…

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Added by rajesh kumari on April 5, 2017 at 9:00pm — 20 Comments

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