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2 लघु रचनाएँ : इंतज़ार

2 लघु रचनाएँ : इंतज़ार
1.
कितने अज़ाब हैं
उल्फ़त के सफ़हात में
मिलता नहीं
क्यूँ चैन
फाड़ के भी
इंतज़ार के सफ़हात को

..................................
2
आंखें
कर बैठीं
इंतज़ार से
बग़ावत
अश्क
कर बैठे
चश्म से अदावत
उल्फत करती रही
इंतज़ार
ख़ारी लकीरों में

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 19, 2019 at 5:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22



जब  मुलाकात में सौ बार  बहाना आया ।।

कैसे कह दूँ मैं तुझे प्यार निभाना आया ।।

क़ातिले इश्क़ का इल्ज़ाम लगा जब तुम पर ।

पैरवी करने यहां सारा ज़माना आया ।।

आज की शाम तेरी बज़्म में हंगामा है।

मुद्दतों बाद जो मौसम ये सुहाना आया ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 19, 2019 at 1:09am — No Comments

उम्मीद का पेड़  (लघुकथा )

बूढ़े ने आँखें बंद किये-किये ही करवट ली I उसका ध्यान किचन से आती आवाज की ओर चला गया I

‘कैसा बना है ?’– बहू ने पूछा I

‘बहुत बढ़िया‘- बेटे ने कहा –‘थोड़ा चटनी और डालो I हाँ बस--बस I’

‘अच्छा लगा---? नमक ठीक पड़ा है न ?’

‘हाँ, बहुत मजेदार है I थोडा और कुरकुरा करो I’

‘जल जायेंगे ---‘

‘जलेंगे नहीं, बस थोड़ा लाल हो जाय I ‘- लडके ने उकसाया  I फिर जैसे उसे कुछ याद आया –‘पापा कहाँ हैं ?’

बूढ़े की आँखों में चमक आयी I कम से कम बेटे को तो उसकी फ़िक्र है I उसके…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 18, 2019 at 2:30pm — 7 Comments

कोई ऐसे रूठता है क्या

122-1212-22

.

कोई रोकने लगा है क्या  ?

कोई राज दरमियां है क्या?

तेरा फोन अब नहीं आता!!

कोई और मिल गया है क्या ?

मुझे गैर कह दिया तुमने!!

मेरा वास्ता बुरा है क्या ?

मेरे रूबरू नहीं रहते!!

मेरा साथ बददुआ है क्या?

तू ही खैरख्वाह बस मेरा!!

तू भी आजकल खफा है क्या?…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 17, 2019 at 9:00pm — 1 Comment

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने------पंकज मिश्र

1212 1222 1212 22

.

अदा में शोखियाँ मस्ती गुलाबी रंग धरे

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने

ये हुस्न है या कोई दरिया ही चला आया

है दिल डुबोने को गालों पे इक भँवर ले के

ठुमकने लगते हैं सपने सलोने सरगम पर

वो खिलखिला के हँसे तो लगे सितार बजे

नज़र उसी पे ही सबकी टिकी है महफ़िल में

ये बात और है उसकी निगाहें बस मुझ पे

ज़रा सा छू ने पे छुई मुई समेटे ज्यूँ खुद को

नज़र पड़े तो वो खुद को समेटती…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 17, 2019 at 7:30pm — 4 Comments

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं ..

2122-2122-2122

वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।।

मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।

अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)

जीस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।

उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।

श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।

बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।

पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।

मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।

सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा,…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 16, 2019 at 1:21pm — 4 Comments

चलो मुद्दों की बात करते हैं

चलो मुद्दों की बात करते हैं

वही मुद्दे जिनसे वो डरते हैं



वादे जितने भी उनको करने हों

बेहिचक वो तो किया करते हैं



बात जो पूछ लो गरीबों की

वो अमीरों की बात करते हैं



आपने प्रश्न उनसे जो पूछे

देशद्रोही करार करते हैं



है कहाँ रोजगार गर पूछो

बैंड बाजे की बात करते हैं



क्या किसानों की करेंगे ये मदद

सोना, आलू से पैदा करते हैं



इनकी नज़रों में जनता उल्लू है

उल्लू ये सीधा किया करते…

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Added by विनय कुमार on March 15, 2019 at 4:05pm — 6 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो

दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो

हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं

मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो

जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो

आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो

हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही 

लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो

जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो

तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…

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Added by Dayaram Methani on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

कुण्डलिया छंद -

1-

होते आम चुनाव से, नेता सत्तासीन।

वोटों की खातिर सभी, खूब बजाते बीन।।

खूब बजाते बीन, करें बढ़चढ़कर वादे।

बन जाते हैं मूर्ख, लोग जो सीधे-सादे।।

चुनकर स्वयं अयोग्य,बाद में खुद ही रोते।

लोकतंत्र की रीढ़, यही मतदाता होते।।

2-

आए हैं अब देश में, फिर से आम चुनाव।

इसीलिए गिरने लगे, नेताओं के भाव।।

नेताओं के भाव, फिरें घर-घर रिरियाते।

चुन जाने के बाद, न जो सुधि लेने आते।।

करिए सही चुनाव, वोट यह व्यर्थ न जाए।

पाँच वर्ष पश्चात्, चुनाव…

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Added by Hariom Shrivastava on March 15, 2019 at 9:32am — 5 Comments

ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)

ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)

(फ ऊलन _फ ऊलन _फ ऊलन _फ अल)

यूँ ही तो न मायूस हम हो गएl

अचानक सितम उनके कम हो गए l

ज़माने की नाकाम साज़िश हुई

वो मेरे हुए उनके हम हो गए l

खिलाफे सितम क्या सुखनवर लिखें

बिकाऊ जब उनके क़लम हो गए l

हुकूमत बचा ज़ुल्‍म की संग दिल

सभी अब खिलाफे सितम हो गए l

कोई आ गया आख़री वक़्त क्या

सभी खत्म दिल के अलम हो गए l

यूँ ही तो न यारों को हैरत हुई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 14, 2019 at 5:23pm — 6 Comments

जब तुम थीं माँ

खुशबू से भरा रहता…

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Added by Neelam Upadhyaya on March 14, 2019 at 3:00pm — 6 Comments

समान सवैया या सवाई छंद

इसमें 32 मात्राऐं व 16'16 पर यति तथा अंत में भगण अर्थात् (211) अनिवार्य है।

【इस छंद में नया प्रयोग करने का प्रयास। अंत में भगण की अनिवार्यता के कारण ‘दीर्घ’ मात्रा प्रयुक्त, अन्यथा सम्पूर्ण छंद में लघु वर्ण】

----------------------------------------

झटपट सजधजकर लचक-धचक, डगमग चलकर पथ महकाकर।

तन झटक-मटक नटखट कर-कर, नयनन सयनन मन बहकाकर।।

फिर घट कर गहकर सरपट चल, पनघट पर झट अलि सँग जाकर।

जल भरकर सर पर घट रखकर, पग-पग चलकर खुश घर आकर।।

(मौलिक व…

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Added by Hariom Shrivastava on March 13, 2019 at 7:31pm — 5 Comments

ख़्वाब ....

ख़्वाब ....

चोट लगते ही
छैनी की
शिला से आह निकली
जान होती है
पत्थर में भी
ये अहसास हुआ आज
छीलता रहा पत्थर को
निकालना था एक ख़्वाब
बुत की शक्ल में
उसके गर्भ से
रो दी शिला
जब
ख़्वाब
बुत में
धड़कने लगा
क्या हुआ
जो रिस रहा था खून
बुतगर के हाथ से

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 12, 2019 at 5:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल : आईना उसे सच का दिखा क्यों नहीं देते



221 1221 1221 122

बातिल को नज़र से ही गिरा क्यों नहीं देते

आईना उसे सच का दिखा क्यों नहीं देते//1

अब ऐब तुम्हारा तो नज़र आने लगा है

अफ़वाह नई कोई उड़ा क्यों नहीं देते//2

क्या बेच नहीं पा रहा अपनी अना को वो

अख़बार कोई उसको पढ़ा क्यों नहीं देते//3

महफ़िल में तमाशा न करो ऐ मेरे मुंसिफ़

क़ातिल तो वहीं पर है सज़ा क्यों नहीं देते//4

क्या प्यार सभी क़ौम से है उसको अभी तक

टीवी पे नई बहस दिखा क्यों नहीं…

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Added by क़मर जौनपुरी on March 12, 2019 at 1:13pm — 8 Comments

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन ..गीत



शीत जैसी चुभन, आग जैसी जलन।।

जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन।।

इक कशिश पल रही है हृदय में कहीं।

कश्मकश चल रही , साथ मेरे कोई।।

डुबकियां ले रहा ही मेरा आज मन।।

इस कदर है अधर से अधर का मिलन।।

जैसे पुरवा पवन छू रही हो बदन।।..१

जाने क्या कह रहा है .....

गर हूँ तन्हा मेरे साथ तन्हाई है।

भीड़ के साथ हूँ तो ये रूसवाई है।

दौड़कर पास आना लिपटना तेरा।।

मेरे आगोश में यूँ सिमटना तेरा।।

यूँ लगे जैसे मिलतें हो धरती…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 10:48am — 2 Comments

माँ (कविता)

माँ! तुम हो शक्ति स्वरूपा

न पाया तुमसा कोई दूजा

समय से भी तुमने की लड़ाई

हर बार समय को आँख दिखाई

नन्हीं नन्हीं क्यारियों में तुमने

प्यार-मुहब्बत के बीज जो बोये

अपने प्यार से सींचा है तुमने

घर-आँगन महकाया है तुमने

माँ तुमसा और न कोई देखा

हर दुःख को तुमने हँसते हुए फेंका

हर बार जब भी मैं घबरायी

सामने तुम ही तुम नज़र आई

कैसा डर! यह पूछा जब तुमने

नारी शक्ति से परिचय करवाया तुमने

आज जो भी कुछ है मैंने पाया

संग मेरे रहा तुम्हारा… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 12, 2019 at 9:52am — 5 Comments

माँ भारती पुकारती

भारत के नौजवानों ,माँ भारती पुकारती ,

देश के सपूत तुम ,फर्ज तो निभाइए |

मुश्किल घड़ी है आज,दाव पे लगी है लाज,

सिंग सा दहाड़ कर देश को जगाइए |

वीरता रगों में भर ,शौर्य की कहानी गढ़ ,

प्रचंड चंड रूप तो शत्रु को दिखाइए |

पावन मन गंगा हो ,ले हाथ में तिरंगा हो ,

वन्दे मातरम् गीत ,गाते सब जाइए |

        ***********

मौलिक और अप्रकाशित रचना 

महेश्वरी कनेरी 

 

Added by Maheshwari Kaneri on March 11, 2019 at 5:30pm — 5 Comments

मन भी कितना आतुर है ..

22-22-22-2

मन भी कितना आतुर है।।

ज्यूँ सबकुछ जीवन भर है।।

पशुओं  कि यह हालत भी।

इंसानों से बेहतर है।।

लोक समीक्षा इतनी ही।

जितना चिड़िया का पर है।।

मेरा मेरा मुझको ही।

छाया है सब छप्पर है।।

कितना तुम अब भागोगे ।

तीन-कदम* पर ही घर है।।(बचपन जवानी बुढ़ापा)

खूब बड़े बन जाओ क्या…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 11, 2019 at 2:49pm — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-

बेटा-बेटी  में  किया, जिसने   कोई  भेद।
उसने मानो कर लिया, स्वयं नाव में छेद।।
स्वयं नाव में छेद, भेद  की  खोदी  खाई।
बहिना से ही दूर, कर दिया उसका भाई।।
कोई  श्रेष्ठ न तुच्छ, लगें  दोनों  ही  प्रेटी।
ईश्वर  का   वरदान,  मानिये   बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on March 11, 2019 at 10:30am — 7 Comments

फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ

दर्द आहों में बदलने क्यूँ लगी कुर्वानियाँ

जान लेने को खड़े तैयार सारे आदमी

हर जगह बढ़ने लगी है आज कल विरानियाँ

घूमते थे रात दिन हम आपकी ही चाह में

जब समझ आया खुदा तो हो गईं आसानियाँ

जोड़ तिनके है बनाया आशियाँ तुम सोच लो

आबरू इस में छुपी है मत करो नादानियाँ

गंध आने है लगी क्यूँ फिर यहाँ बारूद की

याद कर तू बस खुदा को छोड़ बेईमानियाँ

आदमी मजबूर देखो हो गया इस दौर में

खून में शामिल…

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Added by munish tanha on March 10, 2019 at 8:00pm — 3 Comments

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