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ग़लतफ़हमी-लघुकथा

"याद पिया की आए" ठुमरी लैपटॉप में मद्दम स्वर में बज रही थी, बाहर बरसती हुई बूंदों का शोर मन में हलचल मचाना चाह रही थी. उसने अपनी चाय की प्याली उठायी और होठों से लगा लिया. चाय कुछ ठंडी हो गई थी लेकिन उसे इसका एहसास नहीं था. उसे तो अधखुली आँखों से खिड़की के बाहर टपकती बारिश की बूंदें दिख रही थी और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली साहब की जादुई आवाज सुनाई दे रही थी.

अक्सर ऐसे मौकों पर, जब वह नितांत अकेले ही रहना चाहता है, फ़ोन को साइलेंट मोड में कर देता है. लेकिन आज न जाने कैसे वह भूल गया था और फोन का…

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Added by विनय कुमार on May 20, 2019 at 8:00pm — 4 Comments

शृंगारिक दोहे :

शृंगारिक दोहे :



नैनों से बरखा बहे, जब से छूटा हाथ।

नींदें दुश्मन हो गईं, कब आओगे नाथ।1।

एक श्वास तुम साथ हो, एक श्वास तुम दूर।

कैसी है ये दिल्लगी, कुछ तो कहो हुज़ूर।2।

कातिल हसीन शोखियाँ, हैं आपकी हुजूर।

नज़र न कर बैठे कहीं , बहका हुआ कुसूर।3।

सावन की बौछार में, भीगा हुआ शबाब।

बहके रिंदों की कहीं, नीयत हो न ख़राब ।4।

तुम तो साजन रात के, तुम क्या जानो पीर।

भोर हुई तुम चल दिए, नैन बहाएँ…

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Added by Sushil Sarna on May 20, 2019 at 4:00pm — 8 Comments

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना------गीत

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

भूख प्यास नींद चैन सब गँवा कर

अवधान में एकल उद्दीपक बसा कर

उस तक पहुँचने का सतत यत्न करना

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

इच्छित के प्रति समर्पण है प्रेम

उद्देश्य के प्रति अभ्यर्पण है प्रेम

लक्ष्य के प्रति अनवरत गतिशील रहना

प्रेम हो जाना अर्थात रात भर जगना।।

प्रेयसी के अंक पाश तक सीमित नहीं

काम जनित आकर्षण तो किंचित नहीं

कामना के केंद्र-बिंदु पर…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 20, 2019 at 1:01pm — No Comments

अथ अभिकल्पित-आचार-संहिता (आलेख)

बच्चों को शुरू से अध्यात्म, आराधना,  वंदना आदि का व्यावहारिक अभ्यास 'लर्न विद़ फ़न, लर्न विद़ कर्म' या 'देखो, करो और सीखो' पद्धति से कराया जा सकता है। प्रवचन, भाषण, गायन, पुस्तकीय पठन-पाठन मात्र से नहीं। इसके लिए तो हर सरकारी दस्तावेज़ जारी या उपलब्ध कराने, विवाह, गर्भधारणा और उपाधियां देने से पहले, नागरिकता, आधार कार्ड, राशनकार्ड, परिचय पत्र, बैंक अकाउंट, सिमकार्ड, मताधिकार, ड्राइविंग लाइसेंस आदि उपलब्ध कराने से पहले भारत में जन्मे हर भारतवासी को भारत की सर्वधर्म समभाव वाली, …
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 19, 2019 at 11:31pm — 3 Comments

दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

दोहे



तरुवर  देते  फूल फल, नदिया  देती  नीर

मानव मानव को मगर देता नित क्यों पीर।१।



ओछा मन हद तोड़ता, ओछी नदिया कूल

जैसे चन्दन  से  अधिक, माथे चढ़ती धूल।२।



जो बोता  है  पेड़  इक, बाँटे सबको छाँव

काटे जो वट रात दिन, जलते उसके पाँव।३।



अर्थी, पूजा, प्रीत को, मिले न आगन फूल

इस युग बोने सब लगे, कैक्टस कैर बबूल।४।



मरने पर जिसको रही, गंगाजल की चाह

उसने  गंगा  ओर  की, हर  नाले की राह।५।



जहाँ पसीना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2019 at 6:03pm — 8 Comments

ग़ज़ल _किसी से प्यार किसी से क़रार ख़ैर ख़ुदा

ग़ज़ल

( मफाइलुन_फ इ लातुन_मफाइलुन_फेलुन) 

किसी से प्यार किसी से क़रार ख़ैर ख़ुदा

करे वो तीर से दो दो शिकार ख़ैर ख़ुदा

अलम छुपाने की कोशिश तो हँस के की लेकिन

निगाहे नम ने किया आश कार ख़ैर ख़ुदा

नज़र पे पहरा है दीवाना फ़िर भी कूचे में

सनम को अपने रहा है पुकार ख़ैर ख़ुदा

तवक्को उनसे है फैसल की, कर रहे हैं जो

फरेबियों में हमारा शुमार ख़ैर ख़ुदा

लगा ये देख के उनको उदास महफ़िल में

खिज़ा के साथ…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 18, 2019 at 12:34pm — 4 Comments

बौना आदमी - लघुकथा -

बौना आदमी - लघुकथा -

रहीम ने अपने लंबे कुर्ते की झोली में ढेर सारे गेंहू लेकर जैसे ही घर की देहरी पर क़दम रखा, उसकी अम्मी की तेज़ नज़रों में पकड़ा गया,"रहीम यह क्या है तुम्हारे कुर्ते की झोली में?"

"अम्मीजी, इसमें गेंहू हैं।"

"गेंहू कहाँ से मिले तुम्हें?"

"अम्मीजी,चौधरी काका के खलिहान से उनकी गेंहू की फ़सल बैलगाड़ी से घर लाई जा रही थी।उनकी बोरियों में किसी बोरी में छेद रहा होगा तो उसमें से गेंहू नीचे जमीन पर गिरते जा रहे थे।मैं उस बैलगाड़ी के पीछे आ रहा था।सो मैं वह उठा…

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Added by TEJ VEER SINGH on May 18, 2019 at 10:36am — 10 Comments

गीत

सदानीरा बहे कल - कल , गगन पर चाँद तारे हैं ।

अलौकिक दृश्य वसुधा पर ,सुभग मनहर नजारे हैं ।।

उजालों ने चुगा शशि है , उषा आयी उगा रवि है ।

मही पर पुष्प शुचि कुसुमित,उड़े नभ पर विहग प्रमुदित ।।

झरे सित पुष्प शिउली के ,हवाओं ने बुहारे हैं ।

अलौकिक दृश्य वसुधा पर , सुभग मनहर नजारे हैं ।।

लली वृषभानु की राधा , ढके मुख घूँघटा आधा ।

चली पनघट लिये गागर ,खड़े हैं गैल नटनागर ।।

हुयीं लखि लाज से दुहरी , मदन करते इशारे…

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Added by Anamika singh Ana on May 17, 2019 at 9:30pm — 6 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

भाई भाई के लिए, हो जाता कुर्बान।

रिश्ता है यह खून का, ईश्वर का वरदान।।

ईश्वर का वरदान, नहीं है जिसका सानी।

पाण्डव हों या राम, सभी की यही कहानी।।

सुलझाकर मतभेद, न मन में रखें खटाई।

बुरे वक्त में काम, सिर्फ आता है भाई।।

2-

भाई का रिश्ता अमर, जैसे लक्ष्मण राम।

मगर विभीषण ने किया, इसे बहुत बदनाम।।

इसे बहुत बदनाम, और भेदी कहलाया।

देकर सारे भेद, नाश कुल का करवाया।।

तुलसी ने रच ग्रंथ, इन्हीं की महिमा गाई।

दशरथ नंदन राम, भरत लक्ष्मण…

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Added by Hariom Shrivastava on May 17, 2019 at 9:40am — 4 Comments

ग़ज़ल - दिल मे भगवान का डर पैदा कर

2122 1122 22

आपने जुमलों में असर पैदा कर ।

कुछ तो जीने का हुनर पैदा कर ।।

दिल जलाने की अगर है ख्वाहिश ।

तू भी आंखों में शरर पैदा कर ।।

गर ज़रूरत है तुझे ख़िदमत की ।

मेरी बस्ती में नफ़र पैदा कर ।।

हर सदफ जिंदगी तो मांगेगी ।

इस तरह तू न गुहर पैदा कर ।।

देखता है वो तेरा जुल्मो सितम।

दिल में भगवान का डर पैदा कर ।।

अब तो सूरज से है तुझे खतरा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 16, 2019 at 1:35pm — 4 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

फासले    बेकरार    करते   हैं ।

और   हम   इतंजार  करते   हैं ।।

इक तबस्सुम को लोग जाने क्यूँ ।

क़ातिलों में सुमार करते हैं ।।

सिर्फ धोखा मिला ज़माने से ।

जब कभी ऐतबार करते हैं ।।

मैं तो इज्ज़त बचा के चलता हूँ ।

और वह तार तार करते हैं ।।

उम्र गुज़री है बस चुकाने में ।

आप जब भी उधार करते हैं।।

उनको गफ़लत हुई यही यारो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 15, 2019 at 3:47pm — 2 Comments

चतुष्पदी -

धरती  से  तो   आसमान   का,  हो   जाता   अनुमान।
किंतु न खुद की छत से दिखता,खुद का कभी मकान।।
जो   जमीन   पर   पैर  जमाकर, करे   लक्ष्य   संधान।
वही   बनाता   है   इस   जग  में, नये-नये    प्रतिमान।।

(मौलिक व अप्रकाशित)
-हरिओम श्रीवास्तव-

Added by Hariom Shrivastava on May 14, 2019 at 2:00pm — 4 Comments

'कौन अनाड़ी, कौन खिलाड़ी?' (कविता)

हुन-हुना रे हुन-हुना

गुण गिना के गुनगुना

ज़ोर लगा के हय्शा

वोट-पथ पर नैया

अनाड़ी-खिलाड़ी खेवैया

मुश्किल में वोटर भैया

हुआ-हुआ जो बहुत हुआ

अपशब्दों का खेल हुआ

जुआ-जुआ सा हो गया

मतदाता खप-बिक गया

जनतंत्र पर क्या मंत्र हुआ

दुआ-दुआ करो, न बददुआ

संविधान का कर दो भला

कर भला , सो सबका भला

टाल सको, तो अब टाल बला

हुन-हुना रे हुन-हुना

गुण गिना के गुनगुना

ज़ोर लगा के हय्शा

वोट-पथ पर नैया

अनाड़ी-खिलाड़ी खेवैया…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 14, 2019 at 9:00am — 3 Comments

सार छंद - (मातृदिवस पर रचित)

1~

बचपन की यादों में जब मैं, मातृ दिवस पर लौटा।

पाया खुद के ही मुखड़े पर, नकली एक मुखौटा।।

लौट गया मैं गाँव अचानक, माँ से करने बातें।

माँ तो वहाँ न थी लेकिन थीं, यादों की बारातें।।

2~

माता माता मन्दिर जाती, रखे हाथ पर लोटा।

सीढ़ी चढ़ने में साड़ी का, लेती सदा कछोटा।।

माँ के पीछे-पीछे चलकर, हम बच्चे भी जाते।

माता को चुपचाप देखते, माता से बतियाते।।

3~

माँ ने अपनी खातिर माँ से, कभी नहीं कुछ माँगा।

उन मधुरिम यादों को हमने, क्योंकर खूँटी…

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Added by Hariom Shrivastava on May 13, 2019 at 11:30am — 2 Comments

तहरी गजल - (एक प्रयास )

हमारी बात भारी हो रही है।
ये देखो इश्तेहारी हो रही है।


खफा हो मुझसे तुम ये लग रहा है ,
की मीठी शय भी खारी हो रही है।


तरसती है ख़ुशी को जिन्दगानी ,
ये अब तो गम की मारी हो रही है।


तपन हरगिज ना इसको आंकना कम ,
बुलंदी पर ये नारी हो रही है।

- मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Tapan Dubey on May 12, 2019 at 12:30pm — No Comments

इक ही दिन काफ़ी नही है - ग़ज़ल

मातृ-दिवस विशेष

-----------------------------

2122/ 2122/2122/212

इक ही दिन काफ़ी नही है ममता के सम्मान को

कम पड़ेंगे सौ जनम भी, माँ तेरे गुणगान को

जो बना देती है क़ाबिल एक नन्हीं जान को

है ज़रूरत माँ कि ममता की बहुत इंसान को

लाख लानत भेजिए उस सरफिरे नादान को

माँ को खुद से दूर करके ढूँढे जो भगवान को

माँ का दिल इससे बड़ा है जिसमें तुम रहते मियाँ

नाज़ से देखो न अपने बंग्ले आलीशान…

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Added by Gajendra shrotriya on May 12, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

महाभुजंगप्रयात सवैया में मेरी पंचम रचना

गरीबी मिटे औ कटे विघ्न बाधा, तमन्ना! बने स्वर्ग सा देश प्यारा
पले विश्व बंधुत्व की भावना औ, बने आदमी आदमी का सहारा
यहाँ सत्य का ही रहे बोलबाला, सदा के लिये झूठ से हो किनारा
निरोगी प्रतापी प्रभावी सभी हों, बने स्वाभिमानी लगे एक नारा।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by नाथ सोनांचली on May 10, 2019 at 6:30pm — 5 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

22 22 22 22 22 22 22 2

तुम ही बताओ साधु फकीरों तुमने तो देखा होगा ।

इस झूठी दुनिया का वो सच्चा मालिक कैसा होगा ।

जिसकी सोच के हर कतरे में मौत का खौफ समाया हो ,

सोच के देखो दुनिया वालों कैसे वो जीता होगा ।

जिस रास्ते पर चलते चलते मैं तुझको भी भूल गया ,

वो रस्ता तू समझ ले दिलबर कितना पथरीला होगा।

पल पल अपने जीवन का बस इस चिंता में घुलता है ,

बीते कल में ऐसा क्यों था ,आते कल में क्या होगा ।

धोखे ने सौ शक्लें…

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Added by मनोज अहसास on May 10, 2019 at 4:00pm — No Comments

स्वप्न के सीवान में----------गीत

स्वप्न के सीवान में ज़ुल्फ़ों के बादल छा गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

चूम कर नज़रों से नज़रें, गुदगुदा कर मन गई

रूपसी जादू भरी थी मन की अभिहर* बन गई                      

तन सुरभि का यूँ असर खुद को भुला कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

मन्द सी मुस्कान उसके होठों पर जैसे खिली

इस हृदय की बन्द साँकल खुद अचानक से खुली

हम मनस में रूप उसका लो सजा कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2019 at 9:00am — 4 Comments

माँ और मैं (चोका)

माँ बहुरूपी

मौजूद इर्द-गिर्द

पहचाना मैं!

ममता बरसाती

नि:स्वार्थ वामा

प्रकृति महायोगी

रोगी-भोगी मैं!

है त्यागी, चिकित्सक

सहनशील

सामंजस्य-शिक्षिका

शिष्य, लोभी मैं!

व्यक्तित्व बहुमुखी

चरित्रवान

परोक्ष-अपरोक्ष

लाभान्वित मैं!

विवादित-शोषित

कोमलांगिनी

अग्निपथ गमन

स्वाभिमानी माँ

यामिनी या दामिनी

अभियुक्त मैं!

बहुजन सुखाय

आत्म-दुखाय

उर्वीजा देवी तुल्य

है पूज्यनीय

पाता माता में…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 10, 2019 at 3:00am — 1 Comment

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