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हिताय और सुखाय (संस्मरण)

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 23, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

पानी पर चंद दोहे :

पानी पर चंद दोहे :

प्यासी धरती पर नहीं , जब तक बरसे नीर।

हलधर कैसे खेत की, हरित करे तकदीर।१ ।

पानी जीवन जीव का, पानी ही आधार।

बिन पानी इस सृष्टि का, कैसे हो शृंगार।२ ।

पानी की हर बूँद में, छुपा हुआ है ईश।

अंतिम पल इक बूँद से, मिल जाता जगदीश।३ ।



पानी तो अनमोल है, धरती का परिधान।

जीवन ये हर जीव को, प्रभु का है वरदान।४ ।

बूँद बूँद अनमोल है, इसे न करना व्यर्थ।

अगर न चेते आज तो, होगा बड़ा अनर्थ।५…

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Added by Sushil Sarna on November 22, 2019 at 7:30pm — 12 Comments

रौशन है उसके दम से - सलीम 'रज़ा' रीवा

221 2121 1221 212

 -

रौशन है उसके दम से सितारों की रौशनी 

ख़ुश्बू लुटा रही है बहारों की रौशनी

 -

इक वो है माहताब फक़त आसमान में 

फीकी है जिसके आगे हज़ारों की रौशनी…

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Added by SALIM RAZA REWA on November 21, 2019 at 8:52pm — 6 Comments

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?
सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है?
इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है
बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?

यह सारा किया उसी ने है
ज़हर फैलाया उसी ने है
बेजान इमारतों के ख़ातिर
वृक्षों को गिराया उसी ने है

कितने अपशिष्ट जलाए उसने?
कितने कारखाने चलाए उसने?
क्या उसे नहीं पता ?
इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on November 21, 2019 at 11:30am — 3 Comments

सरस्वती वंदना

(2122 2122 2122 212 )
.
वाग्देवी माँ हमें अपनी शरण में लीजिए | 
ज्ञान के जलने लगें माता हृदय में अब दिए ||  
 …
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Added by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on November 19, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

दो क्षणिकाएँ ...

दो क्षणिकाएँ ...

पुष्प
गिर पड़े रुष्ट होकर
केशों से
शायद अभिसार
अधूरे रहे
रात में

........................

मौन को चीरता रहा
अंतस का हाहाकार
कर गयी
मौन पलों का शृंगार
वो लजीली सी
हार


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 19, 2019 at 4:34pm — 8 Comments

पिशुन/चुगलखोर-एक भेदी

तरीफे उनकी क्यूँ लगती

जहर से भरी मीठी बातें

हर पिशुन/चुगलखोर की

झूठी बातें भी सच्ची लगती||

 

स्वार्थ की तह तक गिर

औछी हरकते करते रहते

भलाई का दामन औढकर  

सहकर्मियों की बुराई वो करते||

 

दूसरों के काम में टांग अड़ाना

आदतों में शुमार उनकी

सहकर्मियों को आपस में भिड़ाकर

फिर निश्छल होने का ढोंग रचाते||

 

लाभ ना हो जाए कहीं किसी को

बुगले के जैसा ध्यान लगाते

एडी चोटी का ज़ोर…

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Added by PHOOL SINGH on November 19, 2019 at 2:56pm — 5 Comments

शाम के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

जले दिवस भर धूप में, चलते - चलते पाँव

क्यों ओ! प्यारी शाम तुम, जा बैठी हो गाँव।१।

रोज शाम को झील पर, आओ प्यारी शाम

गोद तुम्हारी सिर रखूँ, कर लूँ कुछ आराम।२।

जब तक हो यूँ पास में, तुम ओ! प्यारी शाम

थकन भरे हर पाँव को, मिल जाता आराम।३।

बेघर पन्छी डाल पर, बैठा है उस पार

आयी प्यारी शाम है, खोलो कोई द्वार।४।

कितनी प्यारी शाम है, इत उत फैली छाँव

निकले चादर छोड़ कर, जी बहलाने पाँव।५।

आयी प्यारी शाम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2019 at 6:00am — 10 Comments

क्षणिकाएँ

दिन ढलते, शाम चढ़ते,

उसका डर बढ़ने लगता है,

क़िस्मत, दस्तक भी देगी और

भीनी यादें तूफान भी उठायेंगी ,

फिर भी होगा कुछ भी नया नहीं,

बस यह अहसास कराते हुए

कि वो किसी और पर मेहरबान है,

उसके पास से धीरे से सरक जाएगी

और चूम लेगी किसी और को।.............1

अटपटा दीवानापन सा,

महसूस तू करवाता है,

हर नए दिन,

हर नई शाम,

यकीन दिलाकर,

तू सिर्फ उसका है,

बाहों में किसी और की,

चला जाता है ।............…

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Added by Usha on November 18, 2019 at 8:30am — 5 Comments

आशंका के कगार

आशंका  के  कगार

जानता हूँ

हर पिघलती सचाई में

फीकी सचाई के पार

कुछ झुठाई भी है

तभी तो आशंका की परतों के बीच

किसी भी परिस्थिति को परखते

किसी का झूठ जानते हुए भी

सचाई की लाश को मानो

थपकियाँ देते

कभी खिड़की का शीशा

कभी मन काआईना

कोना-कोना साफ़ करते

खिसक जाते हैं दिन

ज़िन्दगी हाथ फैलाए

मांगती है…

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Added by vijay nikore on November 17, 2019 at 6:12pm — 7 Comments

संघे शक्ति(लघुकथा)

संघे शक्ति

***

पका फल पेड़ पर लटका हुआ था।भालू परेशान था।वह चाहता था कि पका फल उसका रेंगता हुआ बेटा तोड़ लाए जिससे कुल खानदान का यश उजागर हो।पर बेटा वहां तक पहुंचे कैसे,यह यक्ष प्रश्न बना हुआ था। दूसरे भालू,लोमड़ी से बातें हुईं।उम्मीद बंधी।समय मुकर्रर हुआ।भीड़ जुट गई कि स्वर्गवासी भालू काका का पोता आज ऊंचे पेड़ से फल तोड़ लाएगा, भालू भाई और लोमड़ी काकी उसे ऊपर तक पहुंचने में मदद करेंगे। पर यह क्या.....?समय गुजरते निकल गया।न भालू काका आये,न लोमड़ी काकी। बेचारा बाप मन मसोसता रहा। सारे…

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Added by Manan Kumar singh on November 17, 2019 at 10:16am — 1 Comment

ग़ज़ल नूर की - उन  के बंटे जो  खेत तो  कुनबे बिखर गए

उन  के बंटे जो  खेत तो  कुनबे बिखर गए,

पंछी जो उड़ चले तो घरौंदे बिख़र गए.

.

सरहद पे गोलियों ने किया रक्स रात भर,

कितने घरों के नींद में सपने बिखर गए.

.

यादों की आँधियों ने रँगोली बिगाड़ दी

बरसों जमे हुए थे वो चेहरे बिखर गए.

.

समझा था जिस को चोर गदागर था वो कोई

ली जब तलाशी रोटी के टुकड़े बिखर गए.

.

तुम जो सँवार लेते तो मुमकिन था ये बहुत

उतना नहीं बिखरते कि जितने बिखर गए .

.

मुझ में कहीं छुपे थे अँधेरों के क़ाफ़िले…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 16, 2019 at 8:30pm — 14 Comments

उसूल - लघुकथा -

उसूल - लघुकथा -

"क्या बात है सर, आज पहली बार आपको व्हिस्की लेते देख रहा हूँ?"

"हाँ घोष बाबू, आज मैं भी कई साल बाद तनाव मुक्त महसूस कर रहा हूँ।"

"मगर सर मैंने आपको कभी हार्ड ड्रिंक लेते नहीं देखा।"

"आप सही कह रहे हैं। मैंने जिस दिन यह कुर्सी संभाली थी, अपने पिता को वचन दिया था कि मैं सेवा निवृत होने तक ड्रिंक नहीं करूंगा। आज रिटायर होने के साथ ही उस बंधन से मुक्त हो गया।"

"लेकिन सर, खैर छोड़िये...........?"

"क्यूँ छोड़िये, आज सब बंधन तोड़ दो। जो भी मन…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 16, 2019 at 12:42pm — 6 Comments

कबड्डी (लघुकथा)

उसे स्कूल के दिन याद आ रहे हैं,जब क्लास शुरू होने के पहले,टिफिन में और कभी कभी स्कूल छूटने के बाद भी कबड्डी खेलना कितना पसंद था उन्हें। बुढ़िया कबड्डी में दोनों पक्षों की एक एक बूढ़ी गोल यानी गोल खिंचे हुए दायरे में हुआ करती।प्रत्येक बूढ़ी के आगे विरोधी पक्ष के खिलाड़ी होते। बारी बारी से दोनों पक्ष अपनी अपनी बूढ़ी को मुक्त कराने की कोशिश करते,वह सत्ता की प्रतीक होती;रानी भी कह लें।एक पक्ष का कोई खिलाड़ी "कबड्डी कबड्डी...." करते हुए दौड़ता,विपरीत पक्ष के खिलाड़ी भागते कि कहीं वह…

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Added by Manan Kumar singh on November 16, 2019 at 9:30am — 4 Comments

कैसा घर-संसार?

दोनों पति-पत्नि अपने लव-कुश के साथ खुश थे। माताजी और पिताजी इस छोटे से परिवार में खुश तो थे लेकिन और पैसा कमाने के लिए बेटे समीर को दिन-रात औरों के बेटों की कहानियाँ सुना-सुना ताना देते रहते। रोज़ सुबह और शाम डायनिंग टेबल पर बैठ, एक बयौरा सा देते हुए बताया करते कि फलां के बेटे की तनख़्वाह इतनी हो गयी, फलां के बेटे ने फलैट बुक करवा दिया और फलाने ने तो कैश पेमैंट पर बड़ी गाड़ी खरीद ली।

ये सब सुन-सुनकर समीर परेशान हो गया और अपने ही घर में बेइज्जत होने से थककर बाहर जाने की तैयारी करने…

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Added by Usha on November 15, 2019 at 9:00am — 4 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

न जाने किधर जा रही ये डगर है ।

सुना है मुहब्बत का लम्बा सफर है ।।

मेरी चाहतों का हुआ ये असर है ।

झुकी बाद मुद्दत के उनकी नज़र है ।।

नहीं यूँ ही दीवाने आए हरम तक ।

इशारा तेरा भी हुआ मुख़्तसर है ।।

यहाँ राजे दिल मत सुनाओ किसी को ।

ज़माना कहाँ रह गया मोतबर है ।।

है साहिल से मिलने का उसका इरादा ।

उठी जो समंदर में ऊंची लहर है ।।

है मकतल सा मंजर हटा जब से चिलमन…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 14, 2019 at 5:30pm — 3 Comments

क्षणिकाएँ।

करके वादा,
किसी से न कहेंगे,
दिल का दर्द मेरे जान लिया।
ढोंग था सब,
तब समझे हम कि,
महफ़िल में सरे-आम बदनाम हो गए।...........1

पहली नज़र में ही उनपर,
हम दिल अपना हार बैठे,
कहना कुछ चाहा था,
कह कुछ और गए।.......... 2

अक्सर देखा है हमने,
उनको रंग बदलते हुए,
पर हैरान हैं कि,
कोई तो पक्का होता।.......... 3


मौलिक व् अप्रकाशित।

Added by Usha on November 13, 2019 at 7:09pm — 13 Comments

जिम्मेदारियाँ--लघुकथा

आज वह सोचकर आया था कि पापा से नई घडी और पैंट शर्ट के लिए कह ही देगा. अब तो स्कूल के बच्चे भी कभी कभी चिढ़ाने लगे थे. लेकिन घर की हालत देखकर उसकी कहने की इच्छा नहीं होती थी. जैसे ही वह पापा के कमरे में पहुंचा, पीछे पीछे उसका चचेरा भाई भी आ गया. अभी वह कुछ कहता तभी उसके चचेरे भाई ने अपनी फरमाईस रख दी "बड़े पापा, मेरी साइकिल बिलकुल खचड़ा हो गयी है, इस महीने नई दिला दीजिये".

पापा ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा "ठीक है, इस बार बोनस मिलना है, जरूर खरीद दूंगा. लेकिन संभाल कर चलाना, गिरना…

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Added by विनय कुमार on November 13, 2019 at 5:55pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
प्रेम: विविध आयाम

प्रेम : विविध आयाम

प्रेम

ठहरा था

बन के ओस

तेरी पलकों पर...

उफ़ तेरी ज़िद

कि बन के झील

वो तुझे मिलता...

प्रेम 

काल कोठरी के

मजबूत दरवाजों की

झिर्रियों से झांकती

सुबह की

पहली सुनहरी…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 13, 2019 at 2:00pm — 3 Comments

उजला अन्धकार..

उजला अन्धकार ...

होता है अपना
सिर्फ़
अन्धकार
मुखरित होता है
जहाँ
स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार


होता है जिसके गर्भ से

भानु का
अवतार


नोच लेता है जो
झूठ के परिधान का
तार तार


सच में
न जाने
कितने उजालों के
जालों को समेटे
जीता है
समंदर सा
उजला अन्धकार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 13, 2019 at 1:41pm — 8 Comments

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