For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

March 2018 Blog Posts (147)

आना सावन में

सागर जैसी लहर उठी है,

दिल की धड़कन में.

छलकी है पिय याद तुम्हारी,

मेरे नयनन में

 

तोड़े आम साथ में जाकर,

भायी मन अमराई.

पानी पर कागज की कश्ती,…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on March 27, 2018 at 9:22am — 8 Comments

उसकी लाठी आवाज नहीं करती (लघुकथा)

"अरे रमेश ये कैसे हुआ? और बेटे की हालत कैसी है? मुझे तो जैसे ही खबर लगी,भागा-भागा चला आ रहा हूँ"  आई सी यू के बाहर खड़े रमेश से रतन ने पूछा।

रतन को देखते ही रमेश रो पड़ा। फिर अपने को संभालते हुए बोला-"क्या बताऊँ तुम्हें, मेरे घर के पास जो हाई वोल्टेज तार का खम्बा लगा हुआ था, वही कल अचानक गिर गया। और फिर ये…."

बोलते-बोलते वह फफक पड़ा।

रतन ढाँढस देते हुए बोला- "मित्र हिम्मत न हारो। सब कुछ ठीक हो जाएगा। .....डॉक्टर्स क्या कह रहे…

Continue

Added by नाथ सोनांचली on March 27, 2018 at 7:44am — 16 Comments

चलती है रोज फ़िक्र यहां ज़िन्दगी के साथ ।।

221 2121 1221 212

जब से गये हैं आप किसी अजनबी के साथ ।

यूँ ही तमाम उम्र कटी बेखुदी के साथ ।।

कुछ वक्त आप भी तो गुजारो मेरे करीब ।

मत जाइए जनाब अभी बेरुखी के साथ ।।

कहने लगे है लोग उसे माहताब अब ।

मिलता नहीं जो मुझको यहाँ रोशनी के साथ ।।

है मुतमइन ही कौन यहां ख्वाहिशों के बीच ।

लाचारियाँ दिखीं है बहुत आदमी के साथ ।



तन्हाइयों का वक्त तो मिलना मुहाल है ।

चलती है रोज फ़िक्र…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 27, 2018 at 12:00am — 7 Comments

ग़ज़ल नूर की- दूर से इक शख्स जलती बस्तियाँ गिनता रहा

२१२२/ २१२२/ २१२२/ २१२ 

.

दूर से इक शख्स जलती बस्तियाँ गिनता रहा

रह गई थीं कुछ जो बाकी तीलियाँ गिनता रहा.

.

यादों के बिल से निकलती चींटियाँ गिनता रहा

था कोई दीवाना टूटी चूड़ियाँ गिनता रहा.

.

मुझ से मिलता-जुलता लड़का आईने से झाँक-कर

मेरे चेहरे पर उभरती झुर्रियाँ गिनता रहा.

.

होश मेरे गुम थे मैंने जब किया इज़हार-ए-इश्क़   

और वो नादान कच्ची इमलियाँ गिनता रहा.     

.

एक दिन पूछा किसी ने कौन है तेरा यहाँ  

दिल हुआ रुसवा…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 26, 2018 at 4:46pm — 40 Comments

बूढ़ी माँ ...

बूढ़ी माँ ...



अपनी आँखों से

गिरते खारे जल को

अपनी फटी पुरानी साड़ी के

पल्लू से

बार बार पौंछती

फिर पढ़ती

गोद में रखी

रामायण को

बूढ़ी माँ

व्यथित नहीं थी वो

राम के बनवास जाने से

व्यथित थी वो

अपने बिछुड़े बेटे के ग़म से

जिसका ख़त आये

ज़माना बीत गया

चूल्हा रोज जलता

उसके नाम की

रोटी भी रोज बनती

रोज उसे खिलाने की प्रतीक्षा में

रोटी हाथ में लिए लिए

सो जाती

बूढ़ी…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 26, 2018 at 4:10pm — 12 Comments

ग़ज़ल - सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम - अजय तिवारी

फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ेलुन  फ़ा

 22      22      22       22     22      22      22      2

सब में आग थी, लोहा भी था, नेक बहुत थे सारे हम

लेकिन  तन्हा-तन्हा लड़ कर,  तन्हा-तन्हा  हारे हम

 

ज़र्रा-ज़र्रा  बिखरे  है  हम,  चारो ओर खलाओं में

लेकिन जिस दिन होंगे इकठ्ठा, बन जायेंगे सितारे हम

 

कितने दिन वो मूँग दलेंगे, कमजोरों की छाती पर

कितने दिन और चुप  बैठेंगे, बनके यूं बेचारे हम 

 

कबतक और ये…

Continue

Added by Ajay Tiwari on March 26, 2018 at 11:49am — 22 Comments

ग़ज़ल...कभी तो दिल को करार आये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

121 22 121 22 121 22 121 22

कभी जरा सा मैं मुस्कुरा लूँ कभी तो दिल को करार आये

कभी तो भूले से इस चमन में उतर के फ़स्ल-ए-बहार आये

कि इससे पहले ये साँस टूटे सफ़ीना डूबे ये ज़िन्दगी का

चले भी आओ सनम कहीं से कहाँ कहाँ हम पुकार आये

बड़ी अदा से नजर झुकाये वो पूछते हैं कहाँ थे अब तक

सुनाये कैसे वो आपबीती वो ज़िन्दगी जो गुजार आये

हजार लम्हे हजार बातें जिन्हें तड़पता ही छोड़ आया

वो शाम वो गेसुओं के साये वो याद फिर बेशुमार…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 26, 2018 at 10:00am — 24 Comments

समझ

मंदिर के भीतर भीड़ उमड़ रही थी। तिल धरने की जगह नहीं बची थी। सभी को अपनी धुन लगी थी। सभी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे और चाहते थे कि उनका जल मूर्ति पर चढ़ जाय जिससे उन्हें बाहर निकलने का मौका मिले। औरतों का रास्ता दूसरी तरफ से था। औरते उसी तरफ से आ कर मूर्ति का दर्शन पूजन कर रही थीं। मरछही भी उन्हीं महिलाओं में शामिल थी। आगे बढ़ रही थी पीछे से धक्का लग रहा था। वह जब मूर्ति के सामने आई और उसने अपना जल गिराया। उसके बाद सिर नवाकर आशीष मांगा। मरछही ने जब सिर उठाकर मूर्ति के अलावा पहली बार देखा तो… Continue

Added by indravidyavachaspatitiwari on March 26, 2018 at 6:14am — 2 Comments

गौरैया (ताटंक छन्द)

गौरैया की चीं चीं बोली, सबको बड़ी सुहाती है

प्रातः काल मधुर बेला में, गीत मनोहर गाती है

फुदक फुदक कर दाने चुगती, मन को बड़ी लुभाती है

खिड़की और झरोखों से नित, हर पल आती जाती है ll

खेत बाग वन घर आँगन को, गौरैया चहकाती है

घरों और चौबारों में नित, अपना नीड़ बनाती है

घर की शोभा उजड़ गयी है, गौरैया के जाने से

नव युग का मानव वंचित है, गौरैया के गानें से ll

विकास की अंधी दुनिया मे, पंछी गुम हो जाते हैं

बढ़ा…

Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on March 25, 2018 at 4:48pm — 5 Comments

इश्क ने हाल पूछा

रात भर महकती रही यादें

लुत्फ़ आया बहुत जुदाई का

विरह से उठा रोग दबा हुआ

पता लेता हूँ अब दवाई का |

 

सिक्के जेब को काटने लगे

खर्च ने हाल पूछा कमाई का

नमक-मिर्च से मुँह जलाकर

पूछा भाव फिर से मिठाई का |

 

हर रात सिराहन से शिकायतें

ढिंढोरा कब तलक ढिठाई का

हथेलियाँ-हथेलियों के लिए तड़पी

इश्क ने हाल पूछा रुसवाई का  |

 

सोमेश कुमार(मौलिक एवं अमुद्रित )

 

 

Added by somesh kumar on March 25, 2018 at 2:30pm — No Comments

राम सरीखे बन पाये क्या-गीत

कब निकले बाहर महलों से,

वन में गीत कभी गाये क्या

पूजा करते रहे राम की,

राम सरीखे बन पाये क्या

 

भाई को कब भाई समझा,

हर विपदा में किया किनारा

दीवारों पर दीवारें…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:03am — 13 Comments

लघुकथा--अपील



" आप समस्त शहरवासियों से हाथ जोड़कर विनम्र अपील करता हूँ कि इस बार होने जा रहे 'स्वच्छता सर्वेक्षण ' में बढ़ चढ़कर भाग लें , अपना सकारात्मक फीडबेक देकर शहर को स्वच्छता की सूची में नंबर-वन बनाएँ ।यह शहर आपका है , इसे अपने घर की भाँति साफ-सुथरा और सुंदर बनाएँ। यह सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है । शहर का नाम पूरे देश में रोशन करें । अपने आसपास गंदगी को फटकने न दें , घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अलग-अलग डस्टबिन में डालें । मुझे उम्मीद है इस बार हमारा शहर स्वच्छता में पूरे देश में नंबर-वन…

Continue

Added by Mohammed Arif on March 25, 2018 at 9:13am — 10 Comments

ख़ामोशी की ज़ुबान (लघुकथा)

कभी देखा है खुद को आईने में? तुम्हारी सहेली शीला को देखो,खुद को कितना मेन्टेन किया हुआ है उसने| और तुम! तुम्हारी शकल पर हमेंशा  बारह बजते है| तंग आ गया हूँ तुम्हारी मनहूस शकल देखते देखते|" ऑफिस से घर आये शेखर के ऐसे विचार जानकार शीला खुद को न रोक पायी, उसने कुछ कहने को मुँह खोला ही था कि उसकी जेठानी ने कहा," अरे देवर जी! गर यह ऐसा न करेगी तो लोगों को पता कैसे चलेगा कि हमलोग इसको परेशान करते हैं| यह सब इसकी नौटंकी है, मुझे देखो दिन भर काम करती हूँ पर आपके भैया! मजाल है अब तक उन्होंने कुछ कहा…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 25, 2018 at 8:30am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है - शिज्जु शकूर

221 1222 22 221 1222 22

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है

आवाज़ के पीछे चुपके से, रस्ते से यूँ भी भटकाता है

 

तुम बाँच रहे हो जो इतना, अज्दाद के किस्से मंचों से

उन किस्सों को सुनने वाला अब, पत्थर पे जबीं टकराता है

 

इंसान फ़कत है इक ज़र्रा, मिट जाएगा खुद इक झटके में

आकाश को छूती मीनारें, बेकार ही तू बनवाता है

 

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 25, 2018 at 8:13am — 19 Comments

ग़ज़ल नूर की -जलने लगे जो ख्व़ाब सब नैन धुआँ धुआँ रहे

अरकान: नामालूम 

लय: दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त ... या ...आप को भूल जाएं हम इतने तो बेवाफ़ा नहीं ...की तरह 

.

 

जलने लगे जो ख्व़ाब सब नैन धुआँ धुआँ रहे

दिल से तेरे निकल के हम जानें कहाँ कहाँ रहे.

.

रब से दुआ है ये मेरी दिल की सदा है आख़िरी

लब पे उसी का नाम हो जिस्म में गर ये जाँ रहे.   

.

लगते हों आलिशान हम कहने को क़ामयाब हों

खो के तुझे तेरी कसम अस्ल में रायगाँ रहे.

.

तेरी तलब में जाने जाँ ख़ाक हुए वगर्ना हम  …

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 24, 2018 at 9:37pm — 24 Comments

ग़ज़ल

221 1222 22 221 1222 22

हालात बदलते जाते हैं यह वक्त उसे उलझाता है ।

इंसान हक़ीक़त से अक्सर अब रब्त कहाँ रख पाता है ।।

जो ज़ख्म छुपा कर रखते हैं ईमान बचाकर चलते हैं ।

हिस्से में उन्हीं के ही अक्सर कुदरत का वजीफ़ा आता है ।।

कुछ राज बताने लगतीं हैं माथे की शिकन आंखों की चमक ।

चेहरे से पता चल जाता है जब खाब कोई मुरझाता है ।।

जब लूट गया कोई सपना तब होश में आकर क्या होगा ।

जालिम है अभी कितनी दुनिया यह वक्त हमें समझाता है…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 24, 2018 at 6:57pm — 3 Comments

रोटी की मजदूर

यहाँ रोटी के चक्कर में फिरता

गाँव से शहर काम नहीं मिलता

रात को थका हुआ घर लौटता

मजदूर दुखी मन से यह कहता ।

अब घर का राशन बच्चे की फीस

बड़ी मुश्किल से कटेगें दिन तीस ।

विकास की गति है पंद्रह से बीस

चली है दिल्ली से ले शुभ अशीष ।

सड़क पर बना पुल जब गया टूट

किस्मत की गाड़ी को लिया लूट

प्रतिपक्ष कहते रहे सभी एक जुट

विपक्षी एकता में डाल दी फूट ।

संसद से सड़क तक झूठ ही झूठ

जंगल में बचे सिर्फ ठूठ ही ठूठ

मानवता गई इस जहां से… Continue

Added by Ram Ashery on March 24, 2018 at 4:42pm — 5 Comments

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो

...

दुश्मन भी अगर दोस्त हों तो नाज़ क्यूँ न हो,

महफ़िल भी हो ग़ज़लें भी हों फिर साज़ क्यूँ न हो ।

है प्यार अगर जुर्म मुहब्बत क्यूँ बनाई,

गर है खुदा तुझमें तो वो, हमराज़ क्यूँ न हो ।

रखते हैं नकाबों में अगर राज़-ए-मुहब्बत,

जो हो गई बे-पर्दा तो आवाज़ क्यूँ न हो ।

दुश्मन की कोई चोट न होती है गँवारा,

गर ज़ख्म देगा दोस्त तो नाराज़ क्यूँ न हो ।

संगीत की तरतीब में तालीम बहुत है,

फिर गीत ग़ज़ल में सही अल्फ़ाज़ क्यूँ न…

Continue

Added by Harash Mahajan on March 24, 2018 at 3:30pm — 15 Comments

फिर मैं बचपन दोहराना चाहता हूँ

बह्र ,2122-2122-2122

फिर मैं बचपन दोहराना चाहता हूँ।।
ता -उमर मैं मुस्कुराना चाहता हूँ ।।

जिसमें पाटी कलम के संग दवाइत।
मैं वो फिर लम्हा पुराना चाहता हूँ ।।

कोयलों की कूह के संग कूह कर के ।
मौसमी इक गीत गाना चाहता हूँ ।।

टाटपट्टी ,चाक डस्टर, और कब्बडी।
दाखिला कक्षा में पाना चाहता हूँ।।

ए बी सी डी, का ख् गा और वर्ण आक्षर।
खिलखिलाकर गुनगुनाना चाहता हूँ ।।

आमोद बिन्दौरी / मौलिक /अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 24, 2018 at 11:23am — 5 Comments

गर बनाना चाहते हो विकसित

गर बनाना चाहते हो विकसित

वतन तो करनी होगी मेहनत ।

धरम जाति की दूर करो नफरत

सब आज मिलकर संवार लो किस्मत ।

मजदूर गरीब की किस्मत खोटी

प्रजातन्त्र में भी मिलती न रोटी ।

मरता किसान फसल हुई खोटी

घर में न अन्न कैसे बने रोटी ।

कर्ज में कृषक सरकार है सोती

ललित विदेश में चुन रहा मोती ।

अज्ञान है मिटाना करो सुनिश्चित

हर बालक हो आज करो सुशिक्षित ।

बज गया बिगुल जंग होना बाकी

खत्म हुइ रात सुबह होना बाकी ।

समता समाज में आना बाकी…

Continue

Added by Ram Ashery on March 23, 2018 at 4:00pm — 6 Comments

Monthly Archives

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post कुंडलिया. . . . .
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post भादों की बारिश
"आदरणीय सुरेश कल्याण जी, आपकी लघुकविता का मामला समझ में नहीं आ रहा. आपकी पिछ्ली रचना पर भी मैंने…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय गिरिराज भाईजी, आपकी प्रस्तुति का यह लिहाज इसलिए पसंद नहीं आया कि यह रचना आपकी प्रिया विधा…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post कुंडलिया. . . . .
"आदरणीय सुशील सरनाजी, आपकी कुण्डलिया छंद की विषयवस्तु रोचक ही नहीं, व्यापक भी है. यह आयुबोध अक्सर…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Aazi Tamaam's blog post तरही ग़ज़ल: इस 'अदालत में ये क़ातिल सच ही फ़रमावेंगे क्या
"आदरणीय आजी तमाम भाई, आपकी प्रस्तुति पर आ कर पुरानी हिंदी से आवेंगे-जावेंगे वाले क्रिया-विषेषण से…"
10 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post कापुरुष है, जता रही गाली// सौरभ
"आदरणीय सुशील सरनाजी, आपके अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार"
11 hours ago
Sushil Sarna commented on Saurabh Pandey's blog post कापुरुष है, जता रही गाली// सौरभ
"वाह आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी एक अलग विषय पर बेहतरीन सार्थक ग़ज़ल का सृजन हुआ है । हार्दिक बधाई…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey posted a blog post

कापुरुष है, जता रही गाली// सौरभ

२१२२ १२१२ २२/११२तमतमा कर बकी हुई गालीकापुरुष है, जता रही गाली मार कर माँ-बहन व रिश्तों को कोई देता…See More
yesterday
Chetan Prakash commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post भादों की बारिश
"यह लघु कविता नहींहै। हाँ, क्षणिका हो सकती थी, जो नहीं हो पाई !"
Tuesday
सुरेश कुमार 'कल्याण' posted a blog post

भादों की बारिश

भादों की बारिश(लघु कविता)***************लाँघ कर पर्वतमालाएं पार करसागर की सर्पीली लहरेंमैदानों में…See More
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . . विविध

मंजिल हर सोपान की, केवल है  अवसान ।मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।। छोटी-छोटी बात पर, होने लगे…See More
Monday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय चेतन प्रकाश भाई ग़ज़ल पर उपस्थित हो उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक …"
Monday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service