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पथ पे शूल

पथ पे शूल बहुत बिखरे है
पग को रखना सम्हल - सम्हल
जीवन में गम बहुत पड़े है
खिल के हंसना मचल -मचल

अब रात बहुत ही काली है
संघर्षो की इक थाली है
कठिन नहीं कुछ भी जग में,
नभ तक जाना सरल - सरल

हे युवा आज मत घबराओ
कुछ देश में एसा कर जाओ
तेरे अतुलित बल से थल पे,
खिल जायेगा कमल - कमल
……………………………
मौलिक तथा अप्रकासित
कवि हिमांशु पाण्डेय

Added by Himanshu pandey on October 12, 2016 at 12:30pm — 1 Comment

दशहरा मिलन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पिछली रात लेखन कर्म में बिताने की वज़ह से आज बस में लम्बा सफ़र करते समय शेख़ साहब को बार-बार नींद आ रही थी। बस स्टॉप पर पहुंचने पर बस से उतरकर टैक्सी में बैठे ही थे कि ज़ेबों में मोबाइलों व पर्स को टटोला। मंहगा वाला मोबाइल ग़ायब था। बस जा चुकी थी। बस का नंबर तक याद नहीं था। कुछ लोगों ने तुरंत पुलिस को ख़बर करने को कहा। कुछ ने मोबाइल की सिमों को तुरंत बंद (लॉक) कराने की सलाह दी। किन्तु इन्सानियत पर भरोसा करने वाले कुछ लोगों की राय थी कि सब्र करो, फोन करते रहो, शायद मोबाइल उठाने वाला बंदा बुरी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2016 at 9:26pm — 5 Comments

शाख़ पर चिड़िया

रोज़ देखतीं हूँ

शाख पर बैठी हुई

चिड़ियाओं को



जो बैठती हैं

एक शाख़ पर

कलरव करती हैं ।



भूख लगने पर

पंखों को फ़ैलाए

उड़ जाती हैं ।

अपने लिए

दाना ढूंढने ।



समय आने पर

बीनती हैं तिनके

अपने लिए

एक घरौंदा बनाती हैं ।





करती हैं परवरिश

विहग-सुवन की ।



करतीं हैं इन्तज़ार

समय का

पंख आ जाने पर

जो कल एक

बच्चा था

उड़ जाता है

ऊँचे गगन में

उड़ जाता है

अपनी… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2016 at 8:30pm — 11 Comments

कविता :"विजयादशमी " - अर्पणा शर्मा, भोपाल

हम सब कठपुतलें हैं,

करते परंपरागत दहन,

रावण के पुतलों का,

मनाते पर्व विजय का,

पर छुपे हुए रावण,

हर जगह फैलें हैं,

ऊपर से उल्लासित हम,

भीतर से त्रस्त और खोखले हैं,

आतंक,दुराचार,विभीषिकाओं के,

भीषण दौर इस विश्व में,

सभी धर्मों, सभ्यताओं,

और समाजों ने झेले हैं,

छुपी हुई दुराचारी,

अहंकारी मनोवृत्ति के,

आतंक और भ्रष्टाचार के,

युद्ध और विनाश के,

अशिक्षा और दरिद्रता के,

इन रावणों का दहन करने,

हे राम…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 11, 2016 at 10:30am — 15 Comments

फोर ईडियट्स (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

असफल प्रेम-विवाह ने और आधुनिक जीवन जीने की ज़िद ने मधु को आज जिस मुकाम पर छोड़ा था, वहां रईस पति और दो सुंदर सन्तानों के बावजूद केवल नीरसता थी, अकेलापन था। उम्र के पाँचवें दशक में उसे महसूस हुआ कि अपने माँ-बाप के अरमानों का गला घोंटना और माँ-बाप बनने पर अपनी सन्तानों के ज़रिये अपने अरमान पूरे करने की कोशिश के दूरगामी परिणाम क्या होते हैं। पति धन-दौलत के पीछे भागता रहा। बेटा बाप के अरमान पूरे करने के लिए अपनी रुचियों के विरुद्ध व्यर्थ की शैक्षणिक डिग्रियां हासिल करके बस जिम जाकर शरीर-सौष्ठव… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2016 at 4:48am — 7 Comments

गजल- लिखा रहे अपनी कहानी और है

वह अलग थी अब कहानी और है 

आज कल की निगहबानी और है 

है जगह तो ठीक वैसी ही मगर 

बह रही जो पवन पानी और है 

वीरता की चरम सीमा है यहाँ

ईश की भी महरबानी और है 

चढ़ रहे मंजिल…

Continue

Added by PRAMOD SRIVASTAVA on October 11, 2016 at 12:00am — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४८

मेरा खूने-क़ल्ब कबतक यूँ ही बार-बार होगा

कभी वो घड़ी भी आए जो तुझे भी प्यार होगा

 

दिलेसरनिगूं में कब तक पशेमानियाँ रहेंगी

तेरी हाँ का मुझको कब तक यूँ ही इंतेज़ार होगा

 

मेरी आशिक़ी पे कब तक यूँ ही तुहमतें लगेंगी

तेरे हाथ इश्क़ कब तक यूँ ही दाग़दार होगा

 

करूँ भी तो मैं करूँ क्या कोई दाफ़िया नहीं है

तेरा ज़िक्र जब भी होगा दिल बेक़रार होगा

 

पसेशाम अपने घर को जो मैं जाऊं फिरसे वापिस

वही इन्दिहाम होगा वही…

Continue

Added by राज़ नवादवी on October 10, 2016 at 10:08pm — 4 Comments

विष - एक क्षणिका

विष  - एक क्षणिका :

मानव
तुम तो
सभ्य हो
फिर
विषधर का विष
कहां से
पाया तुमने
क्या
सभ्य वेश में
विषधर भी
रहने लगे

सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on October 10, 2016 at 8:59pm — 8 Comments

एक एहसास (कविता )

एक एहसास
मीठा सा
इंतज़ार दे गया ।

प्यार का
विश्वाश का
तड़प का
अधिकार का ।


एक एहसास
प्यारा सा
प्यार जता गया

आँखों से आँखों का मिलना
आत्मा की पुकार
एक ख़्वाब जगा गया ।

प्यारा सा चेहरा
अपनी और खींचता है
ग्रीष्म में सावन
का एहसास
तुम्हारा प्यार दे गया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 10, 2016 at 7:51pm — 10 Comments

गजल(लूट का धंधा.....)

2122 2122 2122 212

लूट का धंधा करें जो वे सभी रहबर हुए

जिंस कुछ जिनकी नहीं है आज सौदागर हुए।1



आशियाने जल रहे सब हो रहे बेघर यहाँ,

अब परिंदे क्या उड़ेंगे लग रहा बेपर हुए।2



मिल रही बहकी हवा कातिल बवंडर से अभी,

खरखराते पात सब हर डाल पर अजगर हुए।3



घुल रहा कैसा जहर गमगीन लगती है फिजा,

शब्द वैसे ही धरे हैं अर्थमय आखर हुए।4



है वही अपना गगन भरता गया काला धुआँ,

पूछते पंछी विकल हालात क्यूँ बदतर हुए।5



पत्थरों को फाड़ कर… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 10, 2016 at 7:30pm — 9 Comments

देवी दर्शन--

सब लोग तैयार हो रहे थे, पूरे घर में गहमागहमी मची हुई थी| बच्चों में भी बहुत उत्साह था, आज छुट्टी तो थी ही, साथ में दुर्गा पंडाल देखना और मेले का आनंद भी लेना था| रजनी ने भी अपनी चुनरी वाली साड़ी पहनी और शीशे के सामने खड़ी होकर अपने को निहारने लगी|

"माँ जल्दी चलो, पूजा को देर हो जाएगी", बेटे ने आवाज़ लगायी जो बाहर कार निकाल रहा था|

"आ रही हूँ, अरे अपने पापा को बोलो जल्दी निकलने के लिए", साड़ी सँभालते हुए रजनी कमरे से बाहर निकली|

"अच्छा किनारे वाला कमरा भी भिड़का देना, आने में तो देर…

Continue

Added by विनय कुमार on October 10, 2016 at 3:23pm — 8 Comments

गजल - अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

221 2121 1221 212*



अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

अपनों ने मुंह को फेर लिया दिन बदल गये।।



कुछ ख्वाब छूटे कुछ हुए पूरे, हुआ सफर

यादो के साथ साल महीने निकल गये।।



शरमा के मुस्कुरा के जो उनकी नजर झुकी

मदहोश हुस्न ने किया बस दिल मचल गये।।



बचपन के मस्त दिन भी हुआ करते थे कभी

बस्तो के बोझ आज वो बचपन कुचल गये।।



ओढे लिबास सादगी का भ्रष्ट तंत्र में

नेता गरीब के भी निवाले निगल गये।।



करते है बेजुबान को वो क़त्ल…

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Added by नाथ सोनांचली on October 10, 2016 at 5:30am — 22 Comments

एक फीलब्दीह/सतविन्द्र कुमार राणा

बह्र:122 122 122 122
-----
नहीं ये किसी को बताया हुआ है
कि इस दिल में तुमको बसाया हुआ है।

रहा जो हमेशा से दुश्मन हमारा
उसे भी गले से लगाया हुआ है।

जमाने को लगने न देंगे खबर भी
खजाना वफ़ा का छुपाया हुआ है।

करम से रहा जो हमेशा ही जालिम
वही अब तो रब का सताया हुआ है।


मुहब्बत वतन से ही ए ‘राणा’ कमायी
तहे दिल से इसको कमाया हुआ है।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 9, 2016 at 10:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जय-जय हिन्दुस्तान (दोहा गीत 'राज ')

दोहा गीत

आज़ादी की राह में ,शत शत वो बलिदान|

याद कहो कितना रहा ,बोलो हिन्दुस्तान||

 

सावरकर की यातना,देखी थी प्रत्यक्ष|

अंडमान की जेल में,काँपे पीपल वृक्ष||

संग्रामी आक्रोश में ,कितने बुझे चिराग|

कितनी टूटी चूड़ियाँ,कितने मिटे सुहाग||

 

कितनी दी कुर्बानियाँ,तब पाया सम्मान|

याद कहो कितना रहा ,बोलो हिन्दुस्तान||

 

रहे सदा जाँ बाज वो,हर सुख से महरूम|

झूल गये जो जान पर,उन फंदों को चूम||

नेहरू गाँधी…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2016 at 8:44pm — 11 Comments

मिट्टी मेरे पीछे थी, है मिट्टी मेरे आगे (ग़ज़ल)

बह्र : २२११ २२११ २२११ २२

 

क्या क्या न करे देखिए पूँजी मेरे आगे

नाचे है मुई रोज़ ही नंगी मेरे आगे

 

डरती है कहीं वक़्त ज़ियादा न हो मेरा

भागे है सुई और भी ज़ल्दी मेरे आगे

 

सब रंग दिखाने लगा जो साफ था पहले

जैसे ही छुआ तेल ने पानी मेरे आगे

 

ख़ुद को भी बचाना है और उसको भी बचाना

हाथी मेरे पीछे है तो चींटी मेरे आगे

 

सदियों मैं चला तब ये परम सत्य मिला है

मिट्टी मेरे पीछे थी, है मिट्टी मेरे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 9, 2016 at 6:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल-बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये-रामबली गुप्ता

वह्र-2122 1122 1122 22



बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये,

हर अँधेरे को' उजाले मे' बदलते रहिये।



जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो साहिब!

हर कदम आप मेरे साथ जो' चलते रहिये।।



दिल के' मन्दिर में उजाले की' वज़ह आप सनम,

अब तो इस दिल मे' सदा ज्योति सा' जलते रहिये।



दिल की बगिया में बहारों के सुमन मुस्काएं,

इसमें गर रोज सनम आप टहलते रहिये।



मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा?

हो के मायूस न यूं शाम से ढलते… Continue

Added by रामबली गुप्ता on October 9, 2016 at 12:56pm — 10 Comments


प्रधान संपादक
दिल (लघुकथा)

घर का माहौल ग़मगीन था, डॉक्टर ने दोपहर को ही बता गया था कि माँ बस कुछ देर की ही की मेहमान हैI माँ की साँसें रह रह उखड रही थीं, धड़कन शिथिल पड़ती जा रही थी किन्तु फिर भी वह अप्रत्याशित तरीके से संयत दिखाई दे रही थीI ज़मीन पर बैठा पोता भगवत गीता पढ़ कर सुना रहा था, अश्रुपूरित नेत्र लिए बहू और बेटा माँ के पाँवों की तरफ बैठे सुबक रहे थेI

“तुम्हें कुछ नहीं होगा माँ जी, तुम अच्छी हो जाओगीI” सास के मुँह में गँगाजल डालते हुए बहू की रुलाई फूट पड़ीI…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on October 9, 2016 at 10:00am — 25 Comments

ग़ज़ल -- ज़ख़्म हँसते हैं लब नहीं हँसते ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

2122--1212--22



ज़ख़्म हँसते हैं लब नहीं हँसते

लोग यूँ बे-सबब नहीं हँसते



ख़ुद में ही खोये खोये रहते हैं

महफ़िलों में भी सब नहीं हँसते



दर्दो-ग़म ने हमें ये सिखलाया

कब नहीं रोते कब नहीं हँसते



इस हँसी के भी कुछ म'आनी हैं

मसखरे रोज़ो-शब नहीं हँसते



पुर-तकल्लुफ़ है मेरा लहजा अब

वो भी अब ज़ेरे-लब नहीं हँसते



कैसे कह दूँ बहार आई है

फूल बाग़ों में जब नहीं हँसते



हम हैं इल्मो-अदब के राहनुमा

हम कभी… Continue

Added by दिनेश कुमार on October 9, 2016 at 8:50am — 7 Comments

गज़ल - कनखियों से एक वादा फिर हुआ

2122  2122  212

कनखियों से एक वादा फिर हुआ

हाँ, मुहब्बत का तकाजा फिर हुआ

 

हम तो समझे थे बहारें आ गयीं  

मौत का सामान ताजा फिर हुआ

 

उल्फतें बढ़ती रहीं यह देखकर  

इश्क का दुश्मन ज़माना फिर हुआ

 

रास बर्बादी मेरी आयी उन्हें

बाद मुद्दत मुस्कराना फिर हुआ

 

लौट आयेंगे सुना था एक दिन

किन्तु जीते जी न आना फिर हुआ

 

रूह रुखसत हो वहां उनसे मिली

और मंजर आशिकाना फिर…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 8, 2016 at 6:30pm — 22 Comments

कठपुतले (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

हमेशा की तरह इस बार भी विजयादशमी मनाने के लिए बड़े से मैदान पर परम्परागत तरीके से बड़े परिश्रम और तन-मन-धन से व श्रद्धा भाव से बनाए गए तीन बड़े-बड़े से पुतले बड़े जन-समूह के बीच खड़े रामलीला प्रसंग के साथ ही अपने परम्परागत दहन की प्रतीक्षा में थे । मंच पर परम्परागत गतिविधियाँ चल रहीं थीं। मैदान में परम्परागत तरीके से लगभग हर धर्म-सम्प्रदाय के हर आयु वर्ग लोग परम्परागत क्रियाकलाप करते हुए परम्परागत रामलीला देखते हुए पुतलों के दहन की प्रतीक्षा में थे।



एक पुतले ने दूसरे से कहा- "मानव ने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2016 at 4:10pm — 4 Comments

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