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ऊंचे चमकदार आदर्श -- डॉo विजय शंकर

ऊंचे आदर्श ,

बहुत ऊंचे , पहुँच से ऊपर ,

झाड़फानूस की तरफ ,

रौशन भी होते हैं , चमक के साथ ,

बिजली आती रहे तब ,

और हैं भी केवल उन घरों में

जो इतने बड़े हैं कि

झाड़फानूस लगवा सके।

पर वे भी बस उसकी चमक से

उपकृत , चमत्कृत होते रहते हैं ,

अधिकांशतः किसी के आने पर

उसे रौशन करते हैं , दिखाने के लिए।

सामान्यतः तो आदमी मामूली चप्पलों में ही

चलता है , उसका जीवन तो उन्हीं में बीतता हैं ।

उनमें से बहुतों ने तो झाड़फानूस देखे भी नहीं हैं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 23, 2015 at 1:20pm — 8 Comments

नवगीत : बूँद बूँद बरसो

बूँद बूँद बरसो

मत धार धार बरसो

 

करते हो

यूँ तो तुम

बारिश कितनी सारी

सागर से

मिल जुलकर

हो जाती सब खारी

 

जितना सोखे धरती

उतना ही बरसो पर

कभी कभी मत बरसो

बार बार बरसो

 

गागर है

जीवन की

बूँद बूँद से भरती

बरसें गर

धाराएँ

टूट फूट कर बहती

 

जब तक मन करता हो

तब तक बरसो लेकिन

ढेर ढेर मत बरसो

सार सार…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 23, 2015 at 12:08pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तरही गज़ल - ( फिल बदीह मे दिये मिसरे पर )तुम्हारे हाथ में ख़ंजर दिखाई देता है ( गिरिराज़ भंडारी )

1212    1122    1212   22 /112

फ़लक पे जो मुझे अक्सर दिखाई देता है

वो आम लोगों में तनकर दिखाई देता है

 

अभी हैं बदलियाँ चारों तरफ से घेरी हुईं  

तभी तो चाँद भी बदतर दिखाई देता है

 

जो तोप ले के चले साथ अपनें , वो हमको

कहें हैं हाथ में ख़ंजर दिखाई देता है…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 23, 2015 at 9:00am — 22 Comments

विरह-हंसिनी

विरह-हंसिनी हवा के झोंके

श्वेत पंख लहराए रे !

आज हंसिनी निठुर, सयानी

निधड़क उड़ती जाए रे !

 

अब तो हंसिनी, नाम बिकेगा

नाम जो सँग बल खाए रे !

होके बावरी चली अकेली

लाज-शरम ना आए रे !

 

धौराहर चढ़ राज-हंसनी,

किससे नेह लगाए रे !

कोटर आग जले धू-धूकर  

क्यों न उसे बुझाए रे !

 

ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से

कहाँ तू नयन उठाए रे !

जिस हंसा के फाँस-फँसी

कोई उसका सच ना पाए रे…

Continue

Added by Santlal Karun on June 22, 2015 at 7:00pm — 11 Comments

योग दिवस की शुभ प्राची में

विश्व पटल पर अगणित होकर

कोटि कोटि नव योगी बनकर

वसुधैव कुटुंबकम रूपम

स्वप्न हमारा योग दिवस की

शुभ प्राची में सच सा ही प्रतीत होता है ।

भारत स्वयं ही जनक योग का

करे निवारण रोग रोग का

निज संस्कृति घोतक स्वरुप

आरोग्य प्रदायक विश्व शांति के हित

अर्पण करने का श्रेय लेने को मनोनीत होता है

विश्व गुरु वाली वह संज्ञा

केवल संज्ञा भर न रह कर

ज्ञान ज्योति जवाजल्यमान हो

पुनः विश्व तम को हरने का दम भरकर

भारत अपना परचम…

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Added by Aditya Kumar on June 22, 2015 at 12:50pm — 9 Comments

मक्खन जैसा हाथ (लघुकथा )

मक्खन जैसा हाथ (लघुकथा )





नई -नवेली दुल्हन सी वो आज भी लगती थी । आँखों में उसके जैसे शहद भरा हो । पिता की गरीबी नें उसे उम्रदराज़ की पत्नी होने का अभिशाप दिया था ।





उसका रूप उसके ऊपर लगी समस्त बंदिशों का कारण बना । उम्रदराज और शक्की पति की पत्नी अपने जीवन में कई समझौते करने के कारण कुंठित मन जीती है ।





आज चूड़ी वाले ने फिर से आवाज लगाई तो उसका दिल धक्क से धडक गया । वो हमेशा की ही तरह पर्दे की ओट से धीरे से उसे पुकार बैठी , " ओ , चूड़ी वाले !… Continue

Added by kanta roy on June 22, 2015 at 10:00am — 24 Comments

मरासिम.............."जान" गोरखपुरी

२२१  २१२१     १२२१   २१२

 

ये हैं मरासिम उसकी मेरी ही निगाह के

तामीरे-कायनात है जिसका ग़वाह के

..

सजदा करूँ मैं दर पे तेरी गाह गाह के

पाया खुदा को मैंने तो तुमको ही चाह के

 ..

हाँ इस फ़कीरी में भी है रुतबा-ए-शाह के

यारब मै तो हूँ साए में तेरी निगाह के

 ..

जो वो फ़रिश्ता गुजरे तो पा खुद-ब-खुद लें चूम

बिखरे पडे हैं फूल से हम उसकी राह के

 ..

छूटा चुराके दिलको…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 22, 2015 at 9:13am — 40 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वास्ता बीच अब कुछ रहा भी नहीं (फिल बदीह ग़ज़ल(राज)

कुछ कहा भी नहीं कुछ सुना भी नहीं

 वास्ता बीच अब कुछ रहा भी नहीं

 

वक्त मेरा समझिये हुआ है फ़िजूल,

प्यार उनकी नज़र में दिखा भी नहीं

 

कौन कहता यहाँ लोग मासूम हैं,

बात करते नहीं कायदा भी नहीं

 

है पड़ोसी मगर हाल तो देखिये

,बोलता भी नहीं जानता भी नहीं

 

फ़लसफ़े जिन्दगी के अजीबो गरीब,

अब कहो क्या लिखें कुछ नया भी नहीं

 

मुफ़लिसी से हुआ बेअसर ये सबू ,

जाम पर जाम पीकर नशा भी…

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Added by rajesh kumari on June 21, 2015 at 10:00am — 12 Comments

जीवन का रहस्य

समय छिपा जा सूर्य चक्र में ,जहां दुनिया  सारी डोले

धरती से लेकर आसमान में ,नित नये रहस्य को खोले !

कली के अंदर छिपे फूल  में, अपना नाना रूप छिपाये

घूम- घूम कर मधुकर उपवन में, सुंदर राग सुनाये !

फूल के अंदर छिपे सुगंध में , अमृत के कण घोले…

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Added by Ram Ashery on June 21, 2015 at 10:00am — 1 Comment

योग साधना

 

योग भगाये तन के सब रोग,

मन में सच्चा विस्वास जगाए।   

जो नित करे जीवन में योग,

भव बाधा जीवन से मिट जाएँ ॥  

मन मस्तिष्क का सुंदर संयोग

चुस्त और तंदुरुस्त शरीर बनाए…

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Added by Ram Ashery on June 21, 2015 at 9:47am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर विशेष // --सौरभ

योग वस्तुतः है क्या ?

===============

इस संदर्भ में आज मनोवैज्ञानिक, भौतिकवैज्ञानिक और विद्वान से लेकर सामान्य जन तक अपनी-अपनी समझ से बातें करते दिख जायेंगे. इस पर चर्चा के पूर्व यह समझना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति किसी विन्दु पर अपनी समझ बनाता कैसे है…

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Added by Saurabh Pandey on June 21, 2015 at 3:30am — 26 Comments

सरनेम ( लघुकथा )

" भाईसाहब , आपका शुभनाम ?
" जी , राजेश कुमार "।
" और आगे ?
" बस इतना ही , क्यों ?
" मेरा मतलब था कि कोई टाइटल नहीं लगाते आप "।
" जरुरी है क्या ", लहज़ा तल्ख़ हो गया ।
" अब लोगों को पहचाने भी तो कैसे ", अजीब सी नज़रों से देखते हुए वो आगे बढ़ गया ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 21, 2015 at 1:00am — 16 Comments

आज का समाचार (लघु कथा) // शुभ्रांशु पाण्डेय

“अरे, पेपर कहाँ है ?” - राजेश ने पूछा.

“तुम्हे भी नहीं पता ? मुझे लगा हमेशा की तरह ले कर चले गये होगे फ़्रेश होने. कितनी बार कहा है सबसे बाद में पढा करो. तुम्हारे बाद कोई छूना नहीं चाहता है उसे.” 

“कान्ता बाईऽऽऽ.. पेपर आया था आज ?” - संगीता चीखी.

“हां, मैने पेपर ले कर बेड पर रख दिया है..” 



उधर बेड पर नन्हा चुन्नू पेपर ’पढ़ने’ में लगा था.

पहला पन्ना फ़्लिपकार्ट का ऐड था, जो बिस्तर के एक कोने में पडा़ था. हेड लाइन.. . सरकार ने भ्रष्टाचारियों पर… इसके आगे सुबह…

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Added by Shubhranshu Pandey on June 20, 2015 at 10:30pm — 17 Comments

रात रानी

रात रानी क्यों नहीं खिलती हो तुम

भरी दुपहरी में

जब किसान बोता है

मिट्टी में स्वेद बूंद और

धरा ठहरती है उम्मीद से

जब श्रमिक बोझ उठाये

एक होता है

ईट और गारों के साथ

शहर की अंधी गलियों में

जहां हवा भी भूल जाती है रास्ता ।

तुम्हारी ताजा महक

भर सकती है उनमें उमंग

मिटा सकती है उनकी थकान

दे सकती है उत्साह के कुछ पल

कड़ी धूप का अहसास कम हो सकता है ।

पर तुम महकते हो रात में

जब किसान और श्रमिक

अंधेरे की चादर ओढ़े…

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Added by Neeraj Neer on June 20, 2015 at 8:11pm — 8 Comments

हौसलों का पंछी -2(कहानी,सोमेश कुमार |

हौसलों का पंछी -2(गतांक से आगे )

उनके बैठने के बाद मैं फिर पूछता हूँ-सारी कहानी क्या है ?और बस प्रकाश के नाम से ?

“उस समय काम अच्छा चल रहा था |उसे नासिक पढ़ने के लिए भेज दिए |सोचा कुछ बन जाएगा |पर- - - -वो साला चार साल तक पढ़ाई के नाम पर ऐययासी  करता रहा |फिर सुधारने के लिए शादी कर दी |पर साला कुत्ता का पोंछ | सब चौपट करता गया |हम खून जला-जलाकर जोड़ते रहे वो दारू और रंडीबाजी में उड़ाता रहा | ”

“इसका मतलब आप ने अन्धविश्वास किया ?”

“बड़ा था मैं तो अपना फर्ज़ समझकर…

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Added by somesh kumar on June 20, 2015 at 7:30pm — 3 Comments

गजल //// उसे मुमताज देखेंगे

        हजज मुसम्मन सालिम     

       1222 1222 1222 1222

तुम्हारी आँख का जादू    ज़रा हमराज देखेंगे

भरा कैसा है सम्मोहन   यही तो आज देखेंगे

 

कभी मैंने तुम्हें चाहा  अभी तक दर्द है उसका

रहेगी कोशिशें मेरी      तेरे सब काज देखेंगे

 

नहीं आसां मुहब्बत ये कलेजा मुख को आता है

यहाँ पर वश न था  मेरा  गिरेगी गाज देखेंगे …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 20, 2015 at 1:30pm — 5 Comments

खेल और उसका खेला

 शाम हो रही है 

सूरज का तेज अब 

मध्यम होता जा रहा है 

शाम और खेल 

का बड़ा अनूठा 

सायोंग है 

अब बस याद ही है 

खेल और उसका खेला की 

एक खेल था 

ऊंच-नीच 

समान्यतः यह खेल घर

के आँगन मे ही 

खेलते थे, चबूतरे पर 

नाली की पगडंडियों पर 

हम सब ऊपर रहते थे 

और चोर नीचे 

हमे अपनी जगह बदलनी होती थी

और चोर को हमे छूना होता था 

अगर छु लिया तो 

चोर हमे बनना होता था 

बड़ा…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 19, 2015 at 8:43pm — 4 Comments

हौंसलों का पंछी-1

हौसलों का पंछी(कहानी,सोमेश कुमार )

“हवा भी साथ देगी देख हौसला मेरा

मैं परिंदा ऊँचे आसमान का हूँ |”

कुछ ऐसे ही ख्यालों से लबरेज़ था उनसे बात करने के बाद |ये उनसे दूसरी मुलाकात थी|पहली मुलाक़ात दर्शन मात्र थी |सो जैसे ही बनारस कैंट उतरा तेज़ कदमों से कैंट बस डिपो के निकट स्थित उनके कोलड्रिंक के ठेले पर जा पहुँचा |जाने कौन सी प्रेणना थी कि 4 घंटे की विलंब यात्रा और बदन-तोड़ थकावट के बावजूद मैंने उनसे मिलने का प्रण नहीं छोड़ा |

“दादा,एक छोटा कोलड्रिंक दीजिए|” मैंने…

Continue

Added by somesh kumar on June 19, 2015 at 7:52pm — 1 Comment

एक पल ( लघुकथा )

अचानक भड़का दंगा और ऑटो की पिछली सीट पर बैठी बेहद भयभीत युवती । दूर - दूर तक कोई सूरत नहीं बच निकलने की ।अजीब सी कशमकश थी ऑटो छोड़ भागूँ या युवती की मदद करूँ ? जो कि कहीं से भी संभव नहीं दिख रही थी ।लोग और पास , और पास आते जा रहे थे ।सहसा लड़की ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया । उसकी आँखों में मृत्यु का उतना डर नहीं था जितना अपनी होने वाली दुर्गति का ।बस सिर्फ एक पल था मेरे पास निर्णय लेने को , और उस एक पल में ही मैंने माचिस की तीली सुलगा दी ।ऑटो धू-धू कर जलने लगा । ऊपर उठती लपटें राहत महसूस कर रही थीं ,… Continue

Added by shashi bansal goyal on June 19, 2015 at 5:00pm — 8 Comments

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