For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,149)

वीर अब्दुल हमीद

हम मजा लूटते कितने सुख चैन से

कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?

जो शहादत दिए हैं हमारे लिए

याद उनको करो, ना तो धिक्कार है



अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए

फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ

मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की

खो गया आज है जो न जाने कहाँ



वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है

बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है

ऐसे ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ

वीर अब्दुल हमीद की कथा…

Continue

Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 2:30pm — 4 Comments

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी



होठों पर मुस्कान सजाये

बालों में बादल लहराए

गालों पर थी सुबह लालिमा

माथे पर बिंदिया चमकाए

जब तुमको मैंने देखा था

पास खड़ी तुम मुस्काई थी

हाँ तुम सपने में आई थी…

Continue

Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 1:45pm — 10 Comments

रिश्ते--लघुकथा

"तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो", बालों में अंगुलियां फिराते हुए उसने कहा|

"हूँ", कहते हुए वह खड़ी होने लगी|

"थोड़ी देर और बैठो ना", उसने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया| वह वापस बिस्तर पर बैठ गयी|

"सच में तुमको देखे बिना चैन नहीं मिलता", एक बार फिर उसने उसका हाथ पकड़ा|

वह उसको लगभग अनदेखा करते हुए बैठी रही| थोड़ी देर बाद वह फिर से उठने लगी तो उसने कहा "तुम जवाब क्यों नहीं देती, क्या मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता?

"लगते तो हो, लेकिन तुम्हीं नहीं, बाकी सब भी", उसने एक गहरी नजर डाली और…

Continue

Added by विनय कुमार on January 18, 2017 at 9:51pm — 14 Comments

कोई तो मरा है (लघुकथा)

भोजन कक्ष में बैठ कर परिवार के सभी सदस्यों ने भोजन करना प्रारंभ किया ही था कि बाहर से एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आई। घर की सबसे बुजुर्ग महिला यह आवाज़ सुनते ही चौंकी, उसने सभी सदस्यों की तरफ देखा और फिर चुपचाप भोजन करने लगी।

 

उसने मुश्किल से दो कौर ही खाये होंगे और कुत्ते के रोने की आवाज़ फिर आई, अब वह बुजुर्ग महिला चिंताग्रस्त स्वर में बोली, "यह कुत्ता क्यों रो रहा है?"

 

उसके पुत्र ने उत्तर दिया, "चिंता मत करो, होगी कुछ बात।"

 

"नहीं! यह तो अपशगुन…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on January 18, 2017 at 8:59pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
‘खुशबू’ (लघु कथा 'राज')

“भैय्या, जल्दी बस रोकना!!” अचानक पीछे से किसी महिला की तेज आवाज आई|

सभी सवारी मुड़ कर  उस स्त्री को घूरती हुई नजरों से देखने लगी शाम होने को थी सभी को घर पँहुचने की जल्दी थी|

महिला के बुर्के  में शाल में लिपटी एक नन्ही सी बच्ची थी जो सो रही थी |ड्राइवर ने धीरे धीरे बस को एक साइड में रोक दिया| पीछे से वो महिला आगे आई और तुरत फुरत में बच्ची को ड्राईवर की गोद में डाल कर सडक के दूसरी और झाड़ियों में विलुप्त हो गई|

 ड्राईवर हतप्रभ रह गया कभी बच्ची को कभी सवारियों को देख…

Continue

Added by rajesh kumari on January 18, 2017 at 7:16pm — 18 Comments

इंतज़ार ...

इंतज़ार ...



छोड़िये साहिब !

ये तो बेवक़्त

बेवज़ह ही

ज़मीं खराब करते हैं

आप अपनी उँगली के पोर

इनसे क्यूं खराब करते हैं

ज़माने के दर्द हैं

ज़माने की सौगातें हैं

क्योँ अपनी रातें

हमारी तन्हाईयों पे

खराब करते हैं

ज़माने की निगाह में

ये

नमकीन पानी के अतिरिक्त

कुछ भी नहीं

रात की कहानी

ये भोर में गुनगुनायेंगे

आंसू हैं,निर्बल हैं

कुछ दूर तक

आरिजों पे फिसलकर

खुद-ब-खुद ही सूख जायेंगे

हमारे दर्द…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 18, 2017 at 6:34pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -आग किसने लगायी थी घर की-- ( गिरिराज भंडारी )

2122    1212    22

गर वो करता है बात बेपर की ?

क्या ज़रूरत नहीं है पत्थर की

 

क्या हुकूमत लगा रही है अब ?

कीमत उस फतवे से किसी सर की 

 

सिर्फ तहरीर में मिले भाई

सुन कहानी तू दाउ- गिरधर की

 

जिनके अजदाद आज ज़िन्दा हों  

वो करें बात गुज़रे मंज़र की

 

क्या मुहल्ला तुझे बतायेगा ?

आग भड़की थी कैसे उस घर की

 

दीन ओ ईमाँ की बात करता है

क्या हवा लग न पायी बाहर की

 

रोशनी आज…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 18, 2017 at 8:30am — 15 Comments

मेरे कंधे पे अपना सर रक्खो (ग़ज़ल)

2122 1212 22



पूरे करने का जब हुनर रक्खो

ख़्वाब आँखों में तो ही भर रक्खो



इक नज़र ख़ुद पे डाल लो पहले

बाद में दुनिया पर नज़र रक्खो



बच्चे हैं, बचपना दिखाएँगे

चाहे कितना भी डाँटकर रक्खो



चैन की नींद चाहिए जो तुम्हें

ख्वाहिशें अपनी मुख़्तसर रक्खो



मेरा ईमान ही ख़ुदा है मेरा

अपनी दीनारें अपने घर रक्खो



आओ कुछ दर्द बाँट लूँ तुमसे

मेरे कंधे पे अपना सर रक्खो



तीरगी है जो दिल की बस्ती में

एक जलता दिया… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 18, 2017 at 6:56am — 7 Comments

देशभक्ति पर वीर रस की कविता

बुझी राख मत हमे समझना, अंगारो के गोले हैं |

देश आन पर मिटने वाले, हम बारूदी शोले हैं ||



हम सब ख़ौफ़ नही खाते हैं, विध्वंसक हथियारों से |

सीख लिया है लड़ना हमने, तुझ जैसे मक्कारो से ||



पहला वार नही हम करते, पहले हम समझाते हैं |

फिर भी कोई आँख दिखाये, महाकाल बन जाते हैं ||



शेरो के हम वंशज सारे, सुन इक बात बताते हैं |

एक झपट्टे में ही पूरा, खाल खींच हम लाते हैं ||



आन बान की रक्षा में हम, हँस कर शीश चढ़ाते हैं |

जिस देश धरा पर… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 18, 2017 at 4:21am — 12 Comments

गीत (लावणी व कुकुभ मिश्रित)

आधार छन्द : 16+14 लावणी व कुकुभ मिश्रित,,



कोयल कुहुकी मैना बोली,भौंरे गूँजे भोर हुई ।।

आँख चुराये चन्दा भागा,रैन बिचारी चोर हुई ।।

कोयल कुहुकी,,,,



पूरब में ज्यों लाली निकली,सजा आरती धरा खड़ी,

उत्तुंग हिमालय पर लगता,कंचन की हो रही झड़ी,

बर्फ लजाकर लगी पिघलने,हिमनद रस की पोर हुई ।।(1)

कोयल कुहकी मैना बोली,भौंरे,,,,



सात अश्व के रथ पर चढ़कर,आ गए दिवाकर द्वारे,

स्वागत में मुस्काई कलियाँ,भँवरों नें मन्त्र उचारे,

सूर्यमुखी को देख…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2017 at 12:00am — 4 Comments

कविता-एक कविता लिखना चाहता हूँ

धूल , मिट्टी और गारे से सनी

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

मिट्टी की सौंधी महक वाली

गोबर से लीपे आँगन वाली

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

टूटे खाट पर बैठी

जाड़े में धूप सेंकती

सौ बरस की बुढ़िया पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

कुएँ , चौपाल , चरवाहें

खूँटे से बंधे चौपायों पर

एक कविता लिखना चाहता हूँ

इस आपाधापी से बचना चाहता हूँ

आम , इमली , नीम ,…

Continue

Added by Mohammed Arif on January 17, 2017 at 10:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (नया नग्मा कोई गाओ)

1 2 2 2     1 2 2 2

नया नग्मा कोई गाओ

पुराने ग़म चले आओ

तुम्हें उड़ना सिखा दूँगा

मिरे पिंजड़े में आ जाओ

अकेलापन अगर अखड़े

उदासी को बुला लाओ

अरे भँवरे, अरी चिड़िया

ग़ज़ल कोई सुना जाओ

शजर बोला परिंदे से

मुहाजिर लौट भी आओ

हमारा दिल तुम्हारा घर

कभी आओ, कभी जाओ

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

Added by दीपक कुमार on January 17, 2017 at 1:37pm — 9 Comments

वो सवाल...

क्या जवाब दूँ तुम्हे मैं...ये जो सवाल है तुम्हारा...

हर रोज्र हारता हूँ...यहीं तो हाल है हमारा...

 

ये ख्वाब हीं बुरे हैं...

या फिर बुरा सा मैं हूँ...

सौ बार सोचता हुँ...

कुछ तो भला सा कह दूँ..

 

हर वक़्त एक सपना...

हाफीज्र सदा है मेरे...

कुछ पास है हमारे...

कुछ पास में है तेरे...

 

मै वक़्त का मुसाफिर...

अब वक़्त ढुँढता…

Continue

Added by Aditya lok on January 16, 2017 at 10:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का

2122       2122       212

रोज करता खेल शह औ मात का।

रहनुमा पक्का नहीं अब बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।

कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।

मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।

क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।

अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।

क्या भरोसा…

Continue

Added by डॉ पवन मिश्र on January 16, 2017 at 9:34pm — 17 Comments

गीत-गुलसितां दिल का खिलाते रह गए//(अलका ललित )

2122 2122 212

.

गुलसितां दिल का खिलाते रह गए

फासले दिल के मिटाते रह गए

गुलसितां दिल का........

.

चाहतें अपनी बड़ी नादान थी

इश्क की राहें कहा आसान थी

फिर भी हम कसमें निभाते रह गए

फासले दिल के मिटाते ......

.

हाथ में तेरे मेरा जब हाथ हो

जिंदगी कट जाएगी गर साथ हो

हम भरोसा ही जताते रह गए

फासले दिल के मिटाते ...

.

चाह थी तो छोड़ कर ही क्यूँ गया

वास्ता देकर वफ़ा का क्यूँ भला

बेवजह दामन हि थामे रह…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on January 16, 2017 at 9:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल -- मिसाले-ख़ाक-बदन वक़्त के ग़ुबार में थे ( दिनेश कुमार )

1212--1122--1212--22

~~~~~~~

~~~~~~~

मिसाले-ख़ाक सभी वक़्त के ग़ुबार में थे

न जाने कौन थे हम और किस दयार में थे

~~

न शख़्सियत के सभी रंग इश्तिहार में थे

जो रहनुमा थे.. सियासत के कारो-बार में थे

~~

अँधेरा शह्र में बे-ख़ौफ़ रक़्स करता रहा

चराग़ सारे... हवाओं के इख़्तियार में थे

~~

बताओ मज़िले-मक़सूद किस तरह मिलती

तरह तरह के मनाज़िर जो रहगुज़ार में थे

~~

निशान-ए-आब नहीं था वहाँ पे दूर तलक

हयातो-मर्ग के हम ऐसे रेग-ज़ार… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 16, 2017 at 6:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल (दिल ने धड़कन उधार ले ली है)

2 1 2 2  1 2 1 2   2 2/1 1 2 /2 2 1/1 1 2 1

दिल ने धड़कन उधार ले ली है

कितनी मोटी पगार ले ली है

ख़ूबसूरत लगी तो हमने भी

इक उदासी उधार ले ली है

फिर हवाओं से एक ताइर ने

दुश्मनी बार-बार ले ली है

हमने सुनसान राह में यादों की

इक रिदा ख़ुशगवार ले ली है

हँस-हँसा कर ज़रा संवर जाओ

आँसुओं से निखार ले ली है

 

मौलिक और अप्रकाशित

...दीपक कुमार

Added by दीपक कुमार on January 16, 2017 at 3:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल

बह्र 2122 2122 2122



रंजो ग़म में दिल मेरा उलझा हुआ है।

अश्क़ से तकिया तभी भीगा हुआ है।।



तू समझ पाये भी कैसे ये रवानी।

इश्क़ का दरिया तेरा सूखा हुआ है।।



साथ रहकर साथ वो क्योंकर नही था।

हर ज़ुबां पे ये सवाल आया हुआ है।।



ग़म मुझे दो और तुम हद से ज़ियादा।

क्योंकि ये चेहरा मेरा हँसता हुआ है।।



रास्ते भटकूँगा आख़िर क्यों भला मैं।

वक़्त का पहलू मेरा देखा हुआ है।।



पी के सब कड़वाहटें इस ज़िन्दगी की।

दोस्तों लहजा मेरा…

Continue

Added by gaurav kumar pandey on January 16, 2017 at 12:30pm — 10 Comments

तुम...

हर रोज कहानी तेरी...

हर रोज तेरा अफसाना...

हम गूंथ रहे ख्वाबों में...

इस दिल का ताना बाना...

बस एक वो तेरी …

Continue

Added by Aditya lok on January 16, 2017 at 12:30pm — 3 Comments

सब क़ुबूल अब तो बेवफा के सिवा (तरही गजल)

बह्र 2122 1212 22



ज़िन्दगी क्या है इक खता के सिवा

कुछ करो यार कल्पना के सिवा ||



सोचता हूँ ग़ज़ल कहूँ कैसे

जानकारी न काफ़िया के सिवा||



जो भी चाहो कहो मुझे यारो

सब क़ुबूल अब तो बेवफा के सिवा ||



अब समझना मुझे नही आसाँ

कोई समझे न दिलरुबा के सिवा ||



तुम कभी रूठ जाते हो मुझसे

बात बनती न इल्तिज़ा के सिवा||



आज भी मुल्क में गरीबी है

क्या मिला हमको योजना के सिवा||



दर सभी आजमा लिए हमने

*कोई… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 16, 2017 at 8:38am — 10 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Sunday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Jan 18
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Jan 17
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Jan 17
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Jan 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service