सर पर छत थी वो गयी , भीत भीत चहुँ ओर
रक्ष रक्ष मैं रेंकता , चोर मचाये शोर
सबकी चिंता है अलग, सब में थोड़ा फर्क
सब कहते वो पाप है, वो जायेगा नर्क
स्वार्थ सदा रहता छिपा, सब रिश्तों के बीच
लेकिन वह जो बोल दे, कहलाता है नीच
सबकी अपनी व्यस्तता, सब के अपने राग
सर्व समाहित सोच से , तू भी थोड़ा भाग
सब तक सीढ़ी है बना , पायेगा अनुराग
पत्थर को ठोकर मिली , रे मानुष तू…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 8, 2016 at 9:00am — 6 Comments
१२१२२ - १२१२२
हंसी न अश्कों की धार में है ।
वफ़ा फ़क़त एतबार में है ।
लबों पे मुस्कान आँख है नम
ख़िज़ाँ भी शामिल बहार में है ।
लिपटना आता कहाँ है गुल को
ये ख़ास खसलत तो खार में है ।
निकाल दूँ अपने दिल से उनको
कहाँ मेरे अख्तियार में है ।
जो देख ले खोए होश अपना
कशिश वो रूए निगार में है ।
जुनूने दीदारे यार देखो
खड़ा वो कल से कतार में है ।
कहाँ है तस्दीक…
ContinueAdded by Tasdiq Ahmed Khan on July 7, 2016 at 4:00pm — 14 Comments
वह महंगी शॉल ओढ़े, गर्व से चेहरा उठाये, आरामदायक व्हीलचेयर पर बैठा हुआ था, जिसे एक नर्स धकेल रही थी| हस्पताल में एक डॉक्टर के कमरे के बाहर उसने नर्स को रुकने का इशारा किया| नर्स ने कुर्सी रोकी ही थी कि डॉक्टर के कमरे के दरवाज़े पर टंगा सफेद पर्दा हटा कर एक आदमी बाहर निकला| उसने ध्यान से देखा वह उसका पुराना मित्र था, जो वर्षों बाद दिखाई दिया| मित्र ने भी उसे एकदम पहचान लिया, लेकिन उसे व्हीलचेयर पर देखकर मित्र चौंका और उससे पूछा,
"अरे, तुम! कैसे हो? यह क्या हो गया?"
उसने गर्व से…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 7, 2016 at 3:00pm — 4 Comments
Added by रामबली गुप्ता on July 7, 2016 at 8:23am — 4 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 6, 2016 at 11:25pm — 10 Comments
दिलों मेंं लिपटे साये थे ....
दोनों उरों मेंं
हुई थी हलचल
जब दृग से दृग
टकराये थे
दृग स्पर्श से मौन हिया के
स्वप्न सभी मुस्काये थे
अधरों पर था लाज़ पहरा
लब न कुछ कह पाए थे
अवगुण्ठन मेंं वो अलकों के
कुछ सकुचे शरमाये थे
झुकी पलक के देख इशारे
हम मन मेंं मुस्काये थे
मधु पलों को सिंचित करने
स्नेह घन घिर अाये थे
हुअा सामना जब हमसे तो
वो सिमटे घबराये थे
हौले हौले कैद हुए हम
इक दूजे की बाहों मेंं…
Added by Sushil Sarna on July 6, 2016 at 10:24pm — 2 Comments
कैसे कहूँ कि तू मुझे चिट्ठी ही भेज दे,
तू है जहाँ वहां की तू मिट्टी ही भेज दे.
याद आ रही है मुझको तेरी आज इस तरह,
तू प्यार से लिख चिट्ठियां कोरी ही भेज दे.
करता तलाश नौकरी कैसे बता मिले,
चिठ्ठी नहीं तो तू मेरी अर्जी ही भेज दे.
बेज़ार हो चुकी बहुत तनहाइयों से मैं,
बेशक तू कोई याद पुरानी ही भेज दे.
इस जिंदगी की राह में कांटे बिछाये क्यूँ,
तू ज़िंदगी के नाम की रुबाई ही भेज…
ContinueAdded by Abha saxena Doonwi on July 6, 2016 at 5:41pm — 8 Comments
Added by Manan Kumar singh on July 6, 2016 at 12:01pm — 9 Comments
Added by Mahendra Kumar on July 6, 2016 at 11:00am — 10 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2016 at 9:18am — 15 Comments
छाये नभपर घन मगर, सहमी है बरसात |
देख धरा का नग्न तन, उसे लगा आघात ||
उसे लगा आघात, वृक्ष जब कम-कम पाए,
विहगों के वह झूंड, नीड जब नजर न आए,
अब क्या कहे ‘अशोक’, मनुज फिरभी इतराए,
झूठी लेकर आस, देख घन नभ पर छाए ||
कहीं उडी है धूल तो, कहीं उठा तूफ़ान |
देख रहा है या कहीं, सोया है भगवान ||
सोया है भगवान, अगर तो मानव जागे,
हुई कहाँ है भूल , जोड़कर देखे तागे,
जीवन की यह राह, गलत तो नहीं मुड़ी है
देखे क्यों…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on July 6, 2016 at 8:59am — 2 Comments
22 22 22 22 22 22 – बहरे मीर
आज उठाये घूम रहे हैं जिनको सर में
वो सब पटके जाने लायक हैं पत्थर में
अपनी बीमारी को बीमारी कह सकते
इतनी भी ताक़त देखी क्या, ज़ोरावर में ? (ताक़तवर)
फेसबुकी रिश्ते ऐसे भी निभ जाते हैं
वो अपने घर में कायम, हम अपने घर में
रोज उल्टियाँ वैचारिक कर देने वालों
चुप्पी साधे क्यों रहते हो कुछ अवसर में ?
जब समाचार में गंग-जमन का राग लगे, तुम
मन्दिर-मस्ज़िद खेल…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 6, 2016 at 8:27am — 8 Comments
जैसे ही वो भिखारी उनके दरवाज़े पर पहुंचा और आवाज़ लगायी "भगवान के नाम पर कुछ दे दो बाबा", पंडितजी ने डपट कर कहा "यहाँ क्यों आये माँगने, वहीँ से ले लिया करो"|
भिखारी ऐसी झिड़कियों का आदी था, कुछ देर सोच में पड़ा रहा फिर बोल "हम तो मांग के खाने वाले हैं, जहाँ मिल जाए, ले लेते हैं"|
"फिर भी, सोचते नहीं हो कि कहाँ माँगना है और कहाँ नहीं", कहते हुए पंडितजी की नज़र किनारे वाले घर की ओर चली गयी|
भिखारी ने भी गर्दन उस तरफ किया, किनारे वाला घर अहमद भाई का था जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने…
Added by विनय कुमार on July 5, 2016 at 10:30pm — 8 Comments
ऑफ़िस से आकर सब काम निपटाते -निपटाते थक कर चूर हो गई थी वह. बस! बर्तन जमा कर दूध मे जामन लगाना शेष था. उसके हाथ तेजी से प्लेटफार्म साफ़ कर रहे थे.पसीने से …
ContinueAdded by नयना(आरती)कानिटकर on July 5, 2016 at 7:00pm — 8 Comments
Added by जयनित कुमार मेहता on July 5, 2016 at 7:00pm — 5 Comments
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 5, 2016 at 5:25pm — 8 Comments
अम्बर के दरीचों से फ़रिश्ते अब नहीं आते
न परियाँ आबशारों में नहाने को उतरती हैं
न बच्चों की हथेली पर कोई तितली ठहरती है
न बारिश की फुआरों में वो खुशियाँ अब बरसती हैं
सभी लम्हे सभी मंज़र बड़े बेनूर से हैं सब
मगर हाँ एक मंज़र है
जहां फूलों के हंसने की अदा महफूज़ है अब भी
जहाँ कलियों ने खिलने का सलीक़ा याद रखा है
जहां मासूमियत के रंग अभी मौजूद हैं सारे
वो मंज़र है मेरे हमदम
तुम्हारे मुस्कुराने का
- शेख…
ContinueAdded by saalim sheikh on July 5, 2016 at 4:21pm — 4 Comments
165
भावजड़ता
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अहंमन्यता की तलैया में
मूर्खता की कीचड़ से जन्म ले
ए भावजड़ता !
तू कमल की तरह खिलती है।
अपने आकर्षण के भ्रमजाल में
उलझाती है ऐसे,
कि सारी जनता
लहरों पर सवार हो बस तेरे गले मिलती है।
झूठ सच के विश्लेषण की क्षमता हरण कर
आडम्बर ओढ़े, गढ़ती है नए रूप।
धनी हों या मानी, गुणी हों या ज्ञानी
तेरे कटाक्ष से सब होते हैं घायल
क्या साधू क्या फक्कड़ , बड़े बड़े भूप।
भू , समाज और भूसमाज भावना…
Added by Dr T R Sukul on July 5, 2016 at 11:23am — 10 Comments
मुझे पूर्ण कर जाएगा.....
न जाने कितनी बार
मैं स्वयं को
दर्पण मेंं निहारती हूँ
बार बार
इस अास पर
खुद को संवारती हूँ
कि शायद
अाज कोई मुझे
अपना कह के पुकरेगा !
मेरी इस सोच से
मेरा विश्वास
डगमगाता क्यूँ है ?
क्या मैं दैहिक सोन्दर्य से
अपूर्ण हूँ ?
क्या मेरा वर्ण बोध
मे्रे भाव बोध के अागे बौना है ?
फिर स्वयं के प्रश्न का उत्तर
अपने प्रतिबिंब से पूछ लेती हूँ …
Added by Sushil Sarna on July 4, 2016 at 9:30pm — 8 Comments
Added by shree suneel on July 4, 2016 at 8:36pm — 4 Comments
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