For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)

ग़ज़ल :- अपनी बहना के नाम एक ग़ज़ल

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन


अपनी बहना के नाम एक ग़ज़ल
मेरी चाहत का है ये चेक ग़ज़ल

पाक जज़्बात इसमें शामिल हैं
इसलिये कह रहा हूँ नेक ग़ज़ल

एक शाइर की दोनों औलादें
एक व्हाइट है इक ब्लेक ग़ज़ल

इसके जादू से कौन बच पाया
सबके दिल पर करे अटेक ग़ज़ल

ग़म के मारों को मिल रहा है सुकूँ
दर्द पर कर रही है सेक ग़ज़ल

है गुज़ारिश, "समर" सुनाओ हमें
डायरी में करो न पेक ग़ज़ल

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by Samar kabeer on August 28, 2015 at 10:46pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुम्बईया मजाहिया ग़ज़ल -- मिथिलेश वामनकर

1222---1222---1222-1222

 

सटक ले तू अभी मामू किधर खैरात करने का

नहीं है बाटली फिर क्या इधर कू रात करने का

 

पुअर है पण नहीं वाजिब उसे अब चोर बोले तुम…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 28, 2015 at 8:30pm — 32 Comments

भाई (कविता)

भावना के वेग से प्रेम के वाशीभूत हो
नैनो को करके सजल वो रात की रानी सी बहना ।
राम की मूरत निहारे कहे चाहिए भाई सा गहना
मन निकले कुछ स्वर तो बोले खुद ही बोल
मेरे आज से बस राम तेरे उन्ही को तू भाई कहना ।
मांगती हूँ एक वचन बांधकर रेशम की डोरउ
शाम हो या हो सवेरा जेठ की तपती दोपहरी
या शर्द रात्री का हो पहरा
जाऊ जिस भी मोड़ से में जिंदगी के हर मोड़
पर भाई मेरे संग संग ही रहना ।


मौलिक एवम् अप्रकाशित ।

Added by Rajan Sharma on August 28, 2015 at 5:00pm — 2 Comments

चार मित्रों, चार चेलों से मिली क्या वाह वाह (मज़ाहिया ग़ज़ल)

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

 

चार मित्रों, चार चेलों से मिली क्या वाह वाह

मैं समझने लग गया ख़ुद को ग़ज़ल का बादशाह

 

एक चेले की जुबाँ दी काट मैंने इसलिए

बात मेरी काटने का कर दिया उसने गुनाह

 

बात क्या है, क्यूँ है, कैसे है मुझे मतलब नहीं

मंच पर पहुँचूँ तो फिर मैं बोलता धाराप्रवाह

 

अब सिवा मेरे न इसको प्यार कर सकता कोई

हो गया है शाइरी का आजकल मुझसे निकाह

 

चार छः चमचे मिले, माइक मिला, माला…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 10:00pm — 6 Comments

खुद को प्रांजल कैसे लिख दूँ

खुद को शुद्ध नहीं कर पाया, तुझ को कश्मल कैसे लिख दूँ।

मन पर पाप का बादल छाया, खुद को निर्मल कैसे लिख दूँ।।



प्रतिपल भजन लोभ के गाऊँ, हर पल स्वार्थ साधना चाहूँ।

लोभ का दमन नहीं कर पाया, खुद को निश्छल कैसे लिख दूँ।।



भ्रम की पर्त चढ़ी है नैन, कटती नहीं कठिन ये रैन।

तिमिर को दूर नहीं कर पाया, आत्मा उज्जवल कैसे लिख दूँ।।



चलता जाता मैं प्रतिदिन, पकड़नें अपना ही प्रतिबिम्ब।

अब तक प्राप्त नहीं कर पाया, खुद को निश्चल कैसे लिख दूँ।।



कण्ठ तक आ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 9:56pm — 10 Comments

सामन्जस्य की परिभाषा (लघुकथा )

प्रतियोगी परीक्षाओं में मिली असफलता से निखिल अवसादग्रस्त हो चला था। पत्नी स्नेहा को मिली नौकरी से गृहस्थी की गाडी सुचारू रूप से चलने लगी थी।लेकिन दोहरी जिम्मेदारी के बोझ तले वह बुरी तरह पीस रही थी। जिसका असर उसके व्यवहार में भी परिलक्षित हो रहा था ।

आज घर में घुसते ही साफ -सुथरा घर , और टेबल पर लगे खाने से आती खुशबू से स्नेहा भौचक्की थी, की निखिल कहने लगा -



"पढ़ते-पढ़ते थक गया था सो खाना बना लिया। शायद तुम्हे पसंद आ जाए। "

पसंद-नापसन्द से परे वह अपने घर में पति-पत्नी के मध्य… Continue

Added by Archana Tripathi on August 27, 2015 at 4:34pm — 9 Comments

हम क्या कर रहे हैं -- डॉo विजय शंकर

देश बड़ा है , महान है ,

कहाँ है ,

हर एक तो अपने परिवेश

से परेशाँ है ,

सब अपनी अपनी पहचान

बता रहे हैं ,

दूसरे का अस्तित्व ही

नकार रहें हैं ,

स्वयं को खुद ढूंढ

नहीं पा रहे हैं ,

न अपने को समझा

पा रहे हैं ,

न दूसरे को समझा

पा रहे हैं ,

भटके हुए दूसरे को

रास्ता दिखा रहे हैं ,

कैसे कैसे टुकड़ों में

बँट रहे हैं ,

टुकड़ा टुकड़ा

लड़ा रहे हैं ,

कह रहे हैं हम

देश बना रहे हैं ॥



मौलिक एवं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on August 27, 2015 at 9:26am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गलीज़ आदत टला-टली है -- (ग़ज़ल) --- मिथिलेश वामनकर

121-22---121-22---121-22---121-22

 

नसीब को जो कभी न रोया, उसी को किस्मत फली-फली है

जो काम आये तुरंत कर लो,  गलीज़ आदत टला-टली है

 

कुछ इस तरह से मुहब्बतों के…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 27, 2015 at 3:30am — 16 Comments

समर्पण

समर्पण

“वाह री मर कर भी तर गईं तिवारिन तो” मिथिला काकी ने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी अपनी सखियों के समूह में सुरसुरी छोड़ी..

“वो कैसे बहन जी ?” उन्ही की समवयस्क जानकी ताई ने उत्सुकुता से पूछा.

“अरे कितनी सेवा की थी बहुरिया उनकी और अब उनके सिधारने के बाद अपनी नौकरी छोड़ ससुर की सेवा में लग गई.” मिथिला काकी ने खुलासा किया.

मुहल्ले भर की बुढियों को ईर्ष्या हो उठी स्वर्ग-सिधारी तिवारिन से, कितनी समर्पित बहू मिली है.

घर आते हुए महिला मंडल की बात चीत-सुन रधिया से रहा ना गया. सीधे… Continue

Added by Seema Singh on August 27, 2015 at 12:23am — 12 Comments

हैसियत ( लघुकथा )

दफ़्तर के गेट के बाहर अपनी स्कूटी निकाल ही रही थी कि एक बूढ़ी भिखारिन ने अपना भीख का कटोरा उसके आगे कर दिया ।वह उसे देखते ही पहचान गई , क्योंकि उसके मौहल्ले में भी अक़्सर वह भीख माँगा करती थी । उसने  चिल्लर कटोरे में डाल कुछ अनुमानते हुए चोर नज़रें उसके पैरों पर टिका दीं ।  



" ये क्या ? फिर नंगे पैर ? वो चप्पल कहाँ हैं , जो परसों ही मैंने पहनने को दी थीं ?



" घर रख दी बाईजी । उसी रोज़ कहा था , पैसा-लत्ता दे दो बस । पर आप मानी ही नहीं । "



" एक तो तुम्हारे बुढ़ापे पे तरस… Continue

Added by shashi bansal goyal on August 26, 2015 at 10:52pm — 19 Comments

चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले

2212 1222 2222 12

...

चाहा जिसे था दिल के बंद दरवाजे ही मिले ,

वो दोस्ती में मुझको बस अजमाते ही मिले |



ज़ब्रो ज़फ़ा गरीबों पर जिस-जिस ने की अगर,  

हर जुर्म खुद खुदा को वो लिखवाते ही मिले |



बदनाम वो शहर में पर, काबे का था मरीज़,

हर चोट भी ख़ुशी से सब बतियाते ही मिले |



वो यार था अजीजों सा, दुश्मन भी था मगर,

हर राज-ए-दिल उसे पर हम बतलाते ही मिले |



इस दौर में जिधर भी देखो गम ही गम हुए,

ऐ ‘हर्ष’ ज़िन्दगी में वो भी आधे ही…

Continue

Added by Harash Mahajan on August 26, 2015 at 10:09pm — 8 Comments

नारी

मैं डरती झिझकती

सहमती नहीं हूँ

बिखरती भटकती

सिहरती नहीं हूँ

हक़ीक़त से रूबरू

होती हूँ रोज़

चमकते परो से

बहकती नहीं हूँ

अपने आसमां

की मल्लिका हूँ मैं

सोने के महलों मे

छिपती नही हूँ

उठती हूँ गिरती हूँ

गिरके सम्भलती हूँ

धधकती हूँ लेकिन

पिधलती नही हूँ

चट्टान सी मैं

खड़ी हूँ शिखर पर

अन्धड़ हो जितना

बिखरती नही हूँ

मुझसे हो जन्मे

डलते मुझी मे

साँसों की लय सी

मैं थमती नही हूँ

आज़मा लो… Continue

Added by S.S Dipu on August 26, 2015 at 9:58am — 1 Comment

बाल श्रमिक (कविता)

हरिया का बेटा हरिलाल

उम्र यही कुछ आठ साल

पढ़ता था तीसरी कक्षा में

आता था प्रथम प्रत्येक साल।।



बापू ने लगा दिया उसको

पास ही के इक भट्ठे पर

भरी जीवन का कुछ बोझा

लाद दिया उसके सर पर।।



वह बालक जिसकी उम्र यही

पढ़ लिख कर कुछ बननें की थी

जिसके जीवन की गिनती

मात्र अभी थी शुरू हुई।।



वह हाथ लिए फरसा झौव्वा

अब नित्य काम पर जाता था

बदले में रोटी की ख़ातिर

कुछ कमा धमा कर लाता था।।



समझाया मैंने हरिया… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 9:57pm — 5 Comments

ग़ज़ल :- महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता

मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन



सभी कहते हैं मुझको भी 'समर' अच्छा नहीं लगता

महल के सामने मिट्टी का घर अच्छा नहीं लगता



ख़ुदा का दीन सबको अम्न का पैग़ाम देता है

हो बे अमनी ख़ुदा के नाम पर अच्छा नहीं लगता



जो हैं नादान वो इसके लिये लड़ते हैं आपस में

जो दाना हैं उन्हें ये माल-ओ-ज़र अच्छा नहीं लगता



मेरी इस बात की यारों दलील-ए-मुस्तनद ये है

वो मेरे साथ क्यों होते अगर अच्छा नहीं लगता



शरारत और शौख़ी ही भली मालूम होती है

किसी भी… Continue

Added by Samar kabeer on August 25, 2015 at 5:18pm — 19 Comments

ख़्वाब :......

ख़्वाब :....

हकीकत के बिछोने पर

हर ख़्वाब ने दम तोड़ा है

नहीं, नहीं

ख़्वाब कहाँ दम तोड़ते हैं

हमेशा इंसान ने ही दम तोड़ा है

हर टूटता ख़्वाब

इक नए ख़्वाब का आगाज़ होता है

हर नया ख़्वाब

फिर इक तड़प दे जाता है

और चलता रहता है

सूखे हुए गुलाबों की

सूखी महक में जीने का सिलसिला

इंसान को शबनमी ख़्वाबों में

फ़ना होने की

आदत सी हो गई है

बस, ख्वाब को मंज़िल समझ

अंधेरों से लिपट कर जीता है

दर्द को साँसों में घोल…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 25, 2015 at 3:57pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दुनिया बिलकुल छोटी है (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

22---22---22---2

 

फूलों में सरगोशी है

सच की खुशबू फैली है

 

मुमकिन को भी मायूसी

नामुमकिन कर देती…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on August 25, 2015 at 3:30pm — 19 Comments

मेरा गॉंव

अपने गॉंव पर एक गीत लिखने का प्रयास

बहर 1222   1222    1222   1222 छूट नियमानुसार लेने का प्रयास

कहानी आज गहमर की सुनो सबको सुनाते है

बना तस्‍वीर इक प्‍यारी सभी को हम दिखाते है



बकस बाबा का है मंदिर, लिये बस नाम जो आता ।

न मरता साँप का काटा, खुशी मन से वो घर जाता।

बचाने में गौ माता को, गई थी जान ही जिसकी ।

न उस बरसाल को भूले, करें पूजा सभी उसकी ।।

हमारे गाँव में गंगा, लगे मेला यहाँ हरदम ।

बने हैं घाट सब पक्के, न शहरो से दिखे कुछ…

Continue

Added by Akhand Gahmari on August 25, 2015 at 9:37am — 3 Comments

डस्ट-बिन....(लघुकथा)

“अरे बिटिया यह क्या..? पूरे कमरे में  पैकिंग वाले कागजों का कचरा फैला रखा है..”

“मम्मी!! वो क्या है कि मुझे एक-दो दिन हो गये , मेरा टाईम आये.  आप कहती थी, न. कि ऐसे समय में पति की बहुत जरुरत होती है, हर नवविवाहिता को. तो मैं उनके पास जाने की तैयारी कर रही थी.."

“हाँ..बिटिया ! आदमी को तो रोज औरत चाहिए, और औरत का बस यही टाईम मजबूर करता है . बस! तू एक बार उसे, संयुक्त परिवार से निकाल ले. क्यूंकि मैं अपनी तरह तुझे भी, खुश देखना चाहती हूँ. तू अभी जा, फिर मैं बुला लूंगी किसी…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on August 25, 2015 at 3:30am — 3 Comments

चुनौती /लघुकथा /कान्ता राॅय

आज कोचिंग से निकलने में देर हो गई थी , इसलिए घर जल्दी पहुँचने के लिए उसने मेन रोड छोड़ इसी गली से निकलने का फैसला किया था । हालांकि रात में इस गली से निकलने के लिए मम्मी ने मना किया था लेकिन आज बडी़ ही मजबूरी हो चली थी । कलाई पर बंधी घड़ी की सुई पर नजर पडते ही वो सहम उठी । गली सुनसान -सन्नाटा हुआ जा रहा था । करीब दस फर्लांग ही आगे बढीं होगी कि पीछे से आहट आई । उसे भान हुआ कि कोई पीछे आ रहा है । पलट कर देखा । दो लडके थे । स्थिति को भाँप वो लम्बी - लम्बी डग भरने लगी । पीछे से पदचाप की आवाजें…

Continue

Added by kanta roy on August 24, 2015 at 11:30pm — 17 Comments

बैठे-ठाले

तन्हाई चीखती है कहीं

पगलाई-सी हवा धमक पड़ती है ।

अंधेरे में भी दरवाजे तक पहुँच कर

बेतहाशा कुंडियाँ खटखटाती है।

अकेला सोया पड़ा इंसान अपने ही भीतर हो रहे शोर से

घबड़ा कर उठ बैठता है ।

मोबाइल में चौंक कर देखता है समय

“रात के ढ़ाई ही तो अभी बजे हैं “ बुदबुदाता है।

सन्नाटा उसकी दशा पर मुस्कुराता है।

उधर दुनिया के कहीं कोने में

भीड़ भूख-प्यास से बेकाबू हो कर सड़को पर नहीं निकलती,

सामूहिक आत्महत्याएं कर रही होती…

Continue

Added by MAHIMA SHREE on August 24, 2015 at 8:30pm — 9 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Sunday
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Apr 21
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service