अचानक उसकी नज़र सड़क पर धीमी बत्तियों में खड़ी एक लड़की पर पड़ी | हाड़ कंपा देने वाली ढंड में भी , जब वो सूट पहने अपने कार में ब्लोअर चला के बैठा था , लड़की अत्यंत अल्प वस्त्रों में खड़ी थी | फिर समझ में आ गया उसे , ये कॉलगर्ल होगी |
उसने कार उसके पास रोकी , लड़की की आँखों में चमक आ गयी | आगे का दरवाज़ा खोलकर उसने अंदर आने को बोला और उसके बैठते ही बोला " देखो , मैं तुम्हे पैसे दे दूंगा , मुझे अपना ग्राहक मत समझना | इस तरह खड़ी थी , क्या तुम्हें ठण्ड नहीं लगती "|
लड़की ने एक बार उसकी ओर देखा और…
Added by विनय कुमार on July 9, 2015 at 8:53pm — 10 Comments
शाम
स्वागतम
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स्वागत तेरा शाम सदा
श्याम सी सदा शाम हो ,
श्वेत श्याम उन यादों की
हर पल सुनहरी शाम हो
चाहत
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दूर होते हम तभी ,
भोर की जब बांग हो .
पास लाती चाहत हमे
नित मिलन की शाम हो
.
जिंदगी
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जिंदगी तू सुबह भी है
जिंदगी तू शाम भी है
बोझिल कभी तू दर्द से
देती कभी आराम भी है
.
हसरत
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हाथ थामे चलते रहें
हसरत मेरी…
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 9, 2015 at 4:30pm — 2 Comments
चेप्टर-२ - विविध दोहे
बिना समर्पण भाव के , प्रीत न सच्ची होय
छल करता जो प्रीत में , दुखी सदा वो होय
ढोंगी या संसार में, मिला न अपना कोय
वर्तमान की प्रीत में, बस धोखा ही होय
न्यून वस्त्र में आ गयी, वर्तमान की नार
लोक लाज बिसराय के, करें नैन तकरार
औछे करमन से भला, कैसे सदगति होय
जैसी संगत साथ हो, वैसी ही मति होय
पुष्प छुअन में शूल से, कैसे दर्द न होय
टूट के डारि से भला,…
Added by Sushil Sarna on July 9, 2015 at 3:30pm — 13 Comments
Added by Pari M Shlok on July 9, 2015 at 3:05pm — 17 Comments
(१)
विधान लोनी का जन्म 26 जनवरी 1950 को बनारस के जिला अस्पताल में हुआ था। उसके पिता निधान लोनी विश्वनाथ मंदिर के पास चाय बेचा करते थे। लोग कहते हैं कि विधान लोनी में उस लोदी वंश का डीएनए है जिसने उत्तर भारत और पंजाब के आसपास के इलाकों में सन 1451 से 1526 तक राज किया था। जब बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगलवंश की स्थापना की तब इब्राहिम लोदी का एक वंशज बनारस भाग आया और मुगलों को धोखा देने के लिए लोदी से लोनी बनकर हिन्दुओं के बीच हिन्दुओं की तरह रहने…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 9, 2015 at 11:18am — 9 Comments
मनुज रूप मैं पा गया,
हुआ स्वप्न साकार
कोमल किरणे भोर की,
बिखराती जब नेह है,
दिखती उल्लासित धरा
आन्दंदित हर देह है.
सचमुच एक सराय सा
लगा मुझे संसार
प्यार भरे व्यवहार से
मिलती देखी जीत है,
बना एक अनजान जब,
मेरे मन का मीत है
सच्ची निष्ठा ने किया,
हरदम बेडा पार
लोभ मोह माया कपट,
सारे लगते काल हैं,
सत्य यहाँ है मौत ही,
बाकी सब…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on July 9, 2015 at 9:07am — 14 Comments
बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२
हों जुल्म बेहिसाब तो लोहा उठाइये
ख़तरे में गर हो आब तो लोहा उठाइये
जिसको चुना है दिन की हिफ़ाजत के हेतु वो
खा जाए आफ़ताब तो लोहा उठाइये
भूखा मरे किसान मगर देश के प्रधान
खाते मिलें कबाब तो लोहा उठाइये
पूँजी के टायरों के तले आ के आपके
कुचले गए हों ख़्वाब तो लोहा उठाइये
फूलों से गढ़ सकेंगे न कुछ भी जहाँ में आप
गढ़ना हो कुछ जनाब तो लोहा…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2015 at 11:00pm — 23 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 10:44pm — 11 Comments
"अपने मज़हब पर मरने का हौसला है कि नहीं?"
"है, लेकिन मेरे अपने धर्म पर, तुम्हारे नहीं|"
"हमारा धर्म तो एक ही है..."
"तुम्हारे पास वहशत फ़ैलाने का हौसला है, मेरे पास न डरने का हौसला, तो फिर हमारे धर्म अलग हुए न?"
यह सुन तीसरा बोला:
"मेरे पास हर धर्म की लाशें सम्भालने का हौसला है|"
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 8, 2015 at 10:30pm — 4 Comments
122 122 122 122
तुम्हारी समझ से वो सौगात होगी ,मगर मेरी नजरों में खैरात होगी
मुझे चाहिए मेहनतों के निवाले, जिये रहमतों पर तेरी जात होगी.
न जाने कहाँ अब मुलाकात होगी ,जहाँ आमने सामने बात होगी
|
Added by rajesh kumari on July 8, 2015 at 9:14pm — 15 Comments
निशान !
लगभग ५३ वर्ष हुए जब "धर्मयुग" साप्ताहिक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए किसी अदृश्य शक्ति नें अचानक मुझको रोक लिया, और मुझे लगा कि मेरी अंगुलियों में किसी एक पन्ने को पलटने की क्षमता न थी।
आँखें उस एक पन्ने पर देर तक टिकी रहीं, और मात्र ८ पंक्तियों की एक छोटी-सी कविता को छोड़ न सकीं। वह कविता थी "निशान" जो ५३ वर्ष से आज तक मेरे स्मृति-पटल पर छाई रही है, और जिसे मैं अभी भी अपने परम मित्रों से आए-गए साझा करता हूँ .....
…
ContinueAdded by vijay nikore on July 8, 2015 at 9:02pm — 24 Comments
2122 / 2122 / 212 |
|
आजकल जो मित्रवत व्यवहार है |
एक धोखा है नया व्यापार है |
|
सर्जना भी अब कहाँ मौलिक रही |
जो… |
Added by मिथिलेश वामनकर on July 8, 2015 at 5:51pm — 23 Comments
122 122 122 122
जहाँ वाले यूँ तो बताते रहे हैं
हमी अपनी ख़ामी छुपाते रहे हैं
वो अमराई , झूले वो पेड़ों के साये
बहुत देर तक याद आते रहे हैं…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 8, 2015 at 6:12am — 16 Comments
वफ़ाओं का मेरी सिला दीजिये
हूँ बेहोश मुझको जिला दीजिये
हुआ हूँ मैं गुम इस ज़माने में लेकिन
मुझी को मुझी से मिला दीजिये
कुचलते रहे हैं सदा हर कली को
किसी फूल को अब खिला दीजिये
मिला इस ज़माने में हर कोई खारा
ज़रा अब अमिय भी पिला दीजिये
सज़ा तो बहुत मिल गयी है मुझे अब
वो ख़्वाबों की मंज़िल दिला दीजिये
वफ़ाओं का मेरी सिला दीजिये
हूँ बेहोश मुझको जिला दीजिये !!
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on July 8, 2015 at 3:02am — 10 Comments
मनवा गाये, मनवा गाये,
मोरा मनवा गये रे
इक गौरैया घर में आई
चुन-चुन तिनका नीड़ बनायी
किया है उसने प्रियतम संग फिर
प्रेम सगाई रे
मनवा गाये मनवा गाये ................
इत्-उत् मटक-मटक दिखलाती
पिया को अपने खूब रिझाती
नित अठखेलियाँ करते दोनों
ज्यूँ भँवर बौराई रे
मनवा गाये ..................................
इक दूजे रंग रंगने लगे थे
प्रणय निवेदन करने लगे थे
आने को थी संतति उनकी
हुए सुखारे रे…
Added by Meena Pathak on July 7, 2015 at 10:05pm — 7 Comments
अनुष्ठान में पंडितों का जमावड़ा , हवन और मंत्रों के जाप से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र और सुवासित हो उठा था । प्राँगण में महिलाओं का समूह बैठकर बडे उत्साह से ढोल मंजीरे लिये भजन गा रहा था ।
एक पंडित ने अनुष्ठान के आमदनी पर सवाल उठाये कि मंदिर कार्यकर्ताओं में खलबली मच गई ।
पल भर में ही देव सारे विलुप्त हो गये अनुष्ठान में सिर्फ दानवों का अधिपत्य हो गया ।
कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित
Added by kanta roy on July 7, 2015 at 9:30pm — 10 Comments
हमें भी न आया
तू ऐसा बीज थी
जिसे न मिली धूप
न हवा, न पानी
और न कोई खाद
फिर भी तू पनपी
पनपी ही नही
बन गयी एक पेड़
बरगद सी छाया
फिर तूने बसाया
अपना संसार
और कहलाई माँ
फिर बांटी तेजस धूप
पवन में भरी गंध
दूध से सींचे पौधे
हृदय को मथकर
लाई खाद
हुए तेरे
लख-लख पूत आबाद…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 7, 2015 at 8:38pm — 15 Comments
सिर्फ देखा है जी भर के …
सिर्फ देखा है जी भर के हमने तुम्हें
इस ख़ता पे न इतनी सज़ा दीजिये
ज़िंदगी भर हम ग़ुलामी करेंगे मगर
रुख़ से चिलमन ज़रा ये हटा दीजिये
सिर्फ देखा है जी भर के हमने तुम्हें
इस ख़ता पे न इतनी सज़ा दीजिये
हम फ़कीरों का दर कोई होता नहीं
हर दर पे फ़कीर कभी सोता नहीं
अब खुदा आपको हम बना बैठे हैं
अब पनाह दीजिये या मिटा दीजिये
सिर्फ देखा है जी भर के हमने तुम्हें
इस ख़ता पे न…
Added by Sushil Sarna on July 7, 2015 at 4:15pm — 18 Comments
पुलिस के सिपाही अकसर चौराहे से नदारद रहते, । सरकारी ड्यूटी बीच में छोड़ किसी अपने निजी काम से निकल जाते। किन्तु उनके जाते ही एक वृद्ध हाथ में तख्ती लिये वहां खड़ा हो जाता, जिस पर लिखा होता:
"जिंंदगी ज़्यादा ज़रूरी है, जल्दबाज़ी न करें'
कुछ लोग रूक कर पूछ लेते
'बरसों से देख रहे है बाबा, क्यों इतनी परेशानी उठाते हो ? इस काम के लिए पुलिस है न यहाँ।"
"हाँ बेटा, पर पुलिस क्या जाने दर्द क्या होता है।"
"उनको तो सरकार तनख्वाह देती है, तुम सारा दिन क्यों खपते रहते हो…
ContinueAdded by Nita Kasar on July 7, 2015 at 1:30pm — 9 Comments
बरसाती नदी सी क्यूँ हो तुम ?
किसी और की मनोदशा
निर्धारित करती है तुम्हारा बहाव
किसी की मेहेरबानी से चल पड़ती हो
तो कभी सूख जाती हो
कभी सोचा है
मेरा हाल उस मछली की तरहाँ होता है
जो बचे-खुचे कीचड़ में
तड़पती है सिर्फ़ भीगने के लिये
जिंदा रहने के लिये
और जब सैलाब आता है
तो बहुत दूर बह जाती है बेकाबू
तुम कब एक प्रवाह में स्वतन्त्र बहोगी
नदी हो... पहाड़ों से टक्कर ले जीत चुकी हो
अब कोई कैसे स्वार्थ के बांध बना
रोक सकता है तुम्हारा…
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 7, 2015 at 7:59am — 14 Comments
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