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शोषण....(लघुकथा)

जवानी की दहलीज़ पार कर चुकी  विनीता ने फिर से लड़के वालों के आने की खबर सुनते ही अपने घर जाने के अरमानों को संजों लिया. अपनी माँ के खटिया पकड़ने के बाद, उसे अपने पिता समान बड़े भाई और माँ के दर्जे वाली भाभी से ही आशायें बंधी हुई है. आज फिर एक कुलीन परिवार का लड़का, अपनी सहमती जताकर लौट गया. मेहमानों के लौटते ही भाभी ने विनीता से कहा..

“बिन्नो!! मैं ऑफिस के लिए बहुत लेट हो गई हूँ. तुम बच्चों को तैयार कर स्कूल भिजवा देना, माँ जी का कमरा और कपडे देख लेना और सुनो.. मैं तुम्हारे लिए आज…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on April 15, 2015 at 10:30am — 20 Comments


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ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है (मिथिलेश वामनकर)

22-22-22-22-22-2

जो रह-रहकर इस सीने में उठता है

तेरा मेरा दर्द पुराना किस्सा है

 

उनकी आँखों से उतरे हर आँसू से

ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on April 15, 2015 at 10:30am — 17 Comments

हादसे --- डॉo विजय शंकर

हादसे होते रहते हैं ,

कवरेज होते रहते हैं,

लोग देखते रहते हैं ,

चि ची ची करते रहते हैं ,

बयान होते रहते हैं ,

बहस के शो होते रहते हैं,

संवेदनाओं के लिए

दौरे होते रहते हैं ,

आंसू पोछे जाते हैं ,

आंसू बहाये जाते हैं ,

आंकड़े दिखाए जाते हैं ,

कितने कम हो रहे हैं ,

बताये , गिनाये जाते हैं ,

कितने गुहार नहीं होते ,

वो , नहीं गिनाये जाते हैं ,

अदालतों में पड़े , बढ़ते केस

कभी नहीं बताये जाते हैं ,

फैसले भी कब होते… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 15, 2015 at 10:24am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मुर्दों जैसा नया सवेरा है सोया ( गिरिराज भंडारी )

22    22    22    22    2

शहर ज़रा सा मुझमें भी तो आया है

यही सोच के गाँव गाँव शर्माया है

 

मुर्दों जैसा नया सवेरा है सोया

किस अँधियारे ने इसको भरमाया है

 

याराना कुह्रों से है क्या मौसम का

आसमान तक देखो कैसे छाया है

 

चौखट चौखट लाशें हैं अरमानों की

किस क़ातिल को गाँव हमारा भाया है

 

सूखी डाली करे शिकायत तो किस को

सूरज आँखें लाल किये फिर आया है

 

छप्पर चुह ते झोपड़ियों का क्या…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 15, 2015 at 8:30am — 27 Comments

अंदर का बनिया

हमारे अंदर का बनिया

सब कुच्छ बेचता है,

राम भी, कृष्ण भी,

धर्म और ईमान भी,

तीर और कमान भी.

अब उसके दुकान में

नये- नये समान हैं,

झूठाई, सपनों की मिठाई,

दंभ के साथ बढ़ती ढिठाई

ईन्हे वो रोज नई नई

जगहों पे सजाता है

ज़ोर से आवाज़ लगाता है

हिंदू हो या मुसलमान,

सिख हो या ख्रिस्तान,

उसके लिए सभी बराबर हैं.

वो बड़ी ईमानदारी से

बेईमानी बेचता हैं

दरअसल जो बिकता है

वही टिकता है.

मौलिक वा…

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Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 15, 2015 at 8:00am — 12 Comments

मनहरण घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी -

इस छन्द का विन्यास 8, 8, 8, 7  वर्णो की आवृति पर अथवा 16-15 वर्णों की यति पर कुल 31 वर्ण से किया जाता हैं।  इसके चरणान्त में ।s लघु गुरू या s।s गुरू लघु गुरू रखने पर लय-गति में निरन्तरता बनी रहती है।

1

अम्ब, अम्ब सत्य ज्ञान, ताल छन्द के विधान,

रास रंग संग में उमंग के प्रमान हैं।

दिव्य शुभ्र शारदे बिसार के कलंक काल,

सूर्य-चन्द्र ज्योति से सजा रही वितान है।।

अखण्ड ब्रह्म तेज में, धरा-व्योम प्रेम करें

सृ-िष्ट रूप में अनादि…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 10:00pm — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : मुक्ति (गणेश जी बागी)

मुख पर स्थाई भाव

न राग न द्वेष

शांत और निच्छल

पूर्णता को प्राप्त



जिन्दगी की भाग-दौड़

बहू की भुन-भुन

बेटे की झिड़की 

पत्नि की देखभाल



और ....



महंगी दवाइयों से

मिल गयी मुक्ति

 



चल पड़ा वो

सब कुछ त्याग

महा-यात्रा…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 3:47pm — 23 Comments

बारिश - लघुकथा

कौन हो ? रो क्यों रही हो? - गाँव के बाहर बैठी उस स्त्री से बाल्या ने पूछा 

"शहर शहर घूम आई ..धुवें से काली काली हो गयी..  मैं बरसना चाहती हूँ लेकिन सब ने बहाना कर के भगा दिया ..कहाँ जाऊं" उसने रोते रोते कहा

अरे माई . कितना इंतज़ार करवाया .. पिछले दो साल से तुम नहीं आयीं.. उस साल बापू ने रो रो कर इसी पेड़ से लटक कर जान दे दी .. पिछले साल माँ ने कर्ज लेकर बीज बोये और फिर भूखी ही मर गयी... तू यहाँ बरस खेतों पे... अबकी फसल मैं दोनों का श्राद्ध करूँगा…

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Added by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल - जिंदगी में तुम्हारी लहर मैं पिया

212 212 212 212

 

छोड़ दूँ अब कुंवारा नगर मैं पिया

काट लूँ सँग तुम्हारे सफर मैं पिया

 

मन न माने मगर क्या बताऊँ तुम्हें

साथ दोगे चलूंगी सहर मैं पिया

 

पंखुड़ी खिल गयी राग पाकर कहीं

बेज़ुबां अब न खोलूं अधर मैं पिया

 

मौत का गम नहीं साथ तुम हो मेरे   

मुस्करा के पिउंगी जहर मैं पिया

 

अब तुम्हारे सिवा कुछ न चाहूंगी मैं

दिल मिलाओ मिलाऊं नज़र मैं पिया

 

दूर से देखकर आज रुकना…

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Added by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 2:49pm — 8 Comments

गजल- आत्मा भरपूर सी ....

गजल-  आत्मा भरपूर सी...

बह्र - 2122, 2122, 2122, 212

फिर मुझे वह हूर सी लगने लगी।

दुश्मनी भी नूर सी लगने लगी।

गंग जन - मन को सदा पावन करे,

वास्तव में सूर सी लगने लगी।

तट, नदी का मध्य भी उकता गया,

रेत - पन्नी घूर सी लगने लगी।

आस्था की डुबकियॉं नित स्वर्ग हित,

बेवजह मगरूर सी लगने लगी।

आदमी सर-झील-नदियॉं पाट कर,

हस्तियॉं मशहूर सी लगने लगी।

आपदाएं नित्य घर-मन दाहतीं,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 12:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल -- मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

अरकान : २१२२-११२२-११२२-२२



मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

दिल-ए-रेज़ा से शबो रोज़ धुआँ सा उठ्ठे



ये तो मैं हूँ जो ग़मे जाँ से अभी वाबस्ता

मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे



झूठ ही झूठ अदालत में दिखाई देता

सच की जानिब से भी तो कोई जियाला उठ्ठे



भूख से मौत के आगोश में जो पहुँचा है

अब न मुफ़लिस का वो सोया हुआ बच्चा उठ्ठे



दुख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी

बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे



लोग दाँतों तले… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 14, 2015 at 10:39am — 22 Comments

ग़ज़ल --

2122 2122 2122 212

---------------------------------------------

आँसुओं से भीगता है रोज अपना बिस्तरा

आपको भी दूर जाकर क्या पता है क्या मिला



एक अरसा हो गया है आपसे हमको मिले

पूछते हैं लोग फिर भी हाल हमसे आपका



खार बनकर चुभ रहे हैं फूल यादों के हमें

आपको भी मिल रही है क्या मुहब्बत की सजा



माँगने पर आजकल तो मौत भी मिलती नहीं

फिर मुहब्बत क्या मिलेगी लाजिमी है भूलना



शर्त पर करना मुहब्बत आपकी फितरत रही

खेलना मासूम दिल से…

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Added by umesh katara on April 13, 2015 at 10:00pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बैसाखी की सबको शुभकामनाये (दस माहिया)

 बैसाखी  की  सबको शुभकामनाये

 (दस माहिया)

(१)

कोठे पे वो पाखी

नाच रहा देखो

अज आई बैसाखी 

 

(२)

गेहुओं की बालियाँ

फसल कटी देखो

नच पीट के तालियाँ

 

(३)

नच लें औ गायें हम  

आई बैशाखी

नव वर्ष मनाएँ हम 

 

(४)

करो तन मन चंगा जी

आज धरा पर खुद

उतरी थी गंगा जी

( ५ )

गुरु गोविंद सिंह हुए

बना खालसा…

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Added by rajesh kumari on April 13, 2015 at 11:00am — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे- ग़ज़ल

2122/ 2122/ 2122/ 212

बह गये तूफान में वो जा किनारे से लगे

लड़ने वाले ही मगर सब बेसहारे से लगे

 

हार के बाहर हुये वो चैन की अब साँस लें

जीतने की जो कहें मुझको वो हारे से लगे

 

बारहा मेरे करीब आकर ठहर जाते हैं यूँ

ये हवादिस मेरी किस्मत के इशारे से लगे

 

लुट गया सामां सफर में हर मुसाफिर का यहाँ

लोग भी बेआस बेबस गम के मारे से लगे

 

कागज़ों पर है नुमायाँ हाले दिल मेरा “शकूर”

राख से कुछ हर्फ़ कुछ…

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Added by शिज्जु "शकूर" on April 12, 2015 at 10:16pm — 30 Comments

अभी तुम्हारे दिल में भीड बहुत है

अभी तुम्हारे दिल में 

भीड बहुत है

काफी शोर-शराबा है

नशा -ए -दौलत का  

अदा-ए-हुस्न का 

जोश-ए-जवानी का

आना जाना भी बहुत है

दिल फेंक प्रेमियों का

अभी तुम भी परेशान हो 

सोच-सोचकर 

किसको दिल में रखूँ 

किसे नहीं 

..

मगर 

जब ये भीड छट जाये

दिल हो जाये 

खाली खाली

उस वक्त मुझे कहना 

अपने दिल में रहने को 

मैं रहुंगा तुम्हारे दिल में

क्योंकि

मुझे अकेलापन 

बहुत पसन्द है



उमेश कटारा…

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Added by umesh katara on April 12, 2015 at 2:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल : इक दिन बिकने लग जाएँगे बादल-वादल सब

इक दिन बिकने लग जाएँगे बादल-वादल सब

दरिया-वरिया, पर्वत-सर्वत, जंगल-वंगल सब

 

पूँजी के नौकर भर हैं ये होटल-वोटल सब

फ़ैशन-वैशन, फ़िल्में-विल्में, चैनल-वैनल सब

 

महलों की चमचागीरी में जुटे रहें हरदम

डीयम-वीयम, यसपी-वसपी, जनरल-वनरल सब

 

समय हमारा खाकर मोटे होते जाएँगे

ब्लॉगर-व्लॉगर, याहू-वाहू, गूगल-वूगल सब

 

कंकरीट का राक्षस धीरे धीरे खाएगा

बंजर-वंजर, पोखर-वोखर, दलदल-वलदल सब

 

जो न बिकेंगे…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 12, 2015 at 1:19pm — 18 Comments

बात उतनी कहां पुरानी थी

2122 1212 22

बात उतनी कहां पुरानी थी
मिलते हीं याद तब की आनी थी.

फ़र्क़ इतना दिखा मुझे यारों
अाज पीरी है तब जवानी थी.

वो दिखा हीं न ज़िन्दगी जीते
ज़िन्दगी उसकी बस ज़ुबानी थी.

बेवफ़ा हो के रात भर रोया
बेबसी उसकी क्या कहानी थी.

आज दरिया-ए-चश्म में उसके
थोङे पानी में क्या रवानी थी.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on April 12, 2015 at 11:27am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जिये जा जिये जा (एक बहुत छोटी बह्र पर ग़ज़ल 'राज')

१२२ १२२

भलाई किये जा

बुराई लिये  जा

 

उन्हें बाँट अमृत

जहर खुद पिये जा

 

तेरे पास जो है

दिये जा दिये जा

 

उन्हें तू उठा दे 

मगर खुद निये जा  

 

जवानी लुटा दे

बुढ़ापा सिये जा

 

जमाना ख़रा है

भरोसा किये जा

 

यही जिन्दगी है

जिये जा जिये जा

-------(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by rajesh kumari on April 12, 2015 at 11:09am — 26 Comments

तराना इक सुना देना

जनाजा जब उठे मेरा जरा तुम मुस्‍कुरा देना

दिये थे फूल जो तुमको जनाजे पे चढ़ा देना

गिराओ अश्‍क मत अपने बचा कर तुम इन्हें रख लो

चलो जब लाल जोड़े में इन्‍हें तब तुम बहा देना

वफा मेरीअगर तुमको कभी झूठी लगी हो तो

न आये चैन मर कर भी मुझे वो बद्दुआ देना

गलत खुद को समझना मत वफा मैं ही न कर पाया

न मुझ सा बेवफा कोई जमाने को बता देना

समझ लो प्यार में तुम से यही चाहत बची मेरी

कभी तुम…

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Added by Akhand Gahmari on April 12, 2015 at 11:00am — 13 Comments

ग़ज़ल :- जैसे.मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है

बह्र :- मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुन





सच बोल रहा हूँ तो ये महसूस हुवा है

जैसे मिरे अंदर से ख़ुदा बोल रहा है



समतों क तअय्युन है न मंज़िल का पता है

इंसान मशीनों की तरह भाग रहा है



ठहरे हुए पानी पे कोई नाव रुकी है

इक गीत फ़ज़ाओं में अभी गूंज रहा है



इस हद पे हैं तहज़ीब की मिटती हुई क़दरें

रिश्तों को ज़मीनों की तरह बाँट दिया है



जिस दिन से दरिन्दों की सिफ़त आई है इसमें

इंसान ख़ुद अपना ही लहू चाट रहा है



फैले हुए हाथों पे… Continue

Added by Samar kabeer on April 12, 2015 at 10:52am — 16 Comments

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