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ग़ज़ल - हँसती फ़िजा का जवाब देखिए - पूनम शुक्ला

2212 . 2121. 212





जीवन की ऐसी किताब देखिए

काँटों में खिलता गुलाब देखिए



रोती ज़मी आसमान रो रहा

हँसता रुदन ये जनाब देखिए



सोई सबा पर न सोई ये रज़ा

जलता हुआ आफताब देखिए



जन्नत हुई तिश्नगी है इस कदर

मालिक दिलों के हुबाब देखिए



कीमत हँसी की चुकाई भी तो क्या

हँसती फिज़ा का जवाब देखिए



आँगन मेरा रोशनी से भर गया

ऐसा मेरा माहताब देखिए



दीवानगी घेरती है इस कदर

निखरा है ऐसा शबाब… Continue

Added by Poonam Shukla on November 11, 2013 at 2:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अंतर्मन से भाव निकल कर, गीतों में ढल जाते हैं (गीत )

मुझको पता नहीं यह कैसे,गीत स्वयं लिख जाते हैं 

कुछ भावों के बादल जैसे, उमड़-घुमड़  कर आते हैं 

 

दिल में जन्म लिया शब्दों ने , बूँदें बन कर ज्यों बरसे

अंतर्मन से भाव निकल कर, गीतों  में ढल जाते हैं

 …

Continue

Added by rajesh kumari on November 11, 2013 at 11:00am — 31 Comments

ग़ज़ल-निलेश 'नूर'- चाँद सूरज और सितारे आ गए

२१२२, २१२२, २१२  
चाँद सूरज और सितारे आ गए,
ख्व़ाब में क्या क्या नज़ारे आ गए.    
.

ख़ूब मौका डूबने का था मिला,
और हम फिर भी किनारे आ गए. 
.

जब नज़र की बात नज़रों नें सुनी,  
दरमियाँ क्या कुछ इशारे आ गए.
.

है समाई धडकनों में धडकनें,  
पास वो इतने हमारे आ गए.
.

जब मिला ग़म या ख़ुशी कोई मिली,
आँखों में दो अश्क़ खारे आ गए.   
.
मौलिक व अप्रकाशित 
निलेश 'नूर'

Added by Nilesh Shevgaonkar on November 10, 2013 at 9:30pm — 22 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

देखे भाई दूज में,  रिश्तो का संसार,

प्यारा भाई जा रहा,प्रिय बहना के द्वार  

प्रिय बहना के द्वार,बोला खिलाओ खाना 

भरकर ह्रदया नेह,प्यार से मुझे खिलाना

सदियों का इतिहास,भाई बहन के लेखे

आती भाई दूज, भाई बहन को देखे ||

(4)

सभी देव करते रहे, गौमाता में वास 

खुशहाली मिलती रहे,गाय रखे यदि पास 

गाय रखे यदि पास,न दूध दही का घाटा

बिना दही अरु दूध, शरीर रहे ये नाटा |

संतो का अनुरोध,गौ ह्त्या न करे कभी   

ब्रहमा विष्णु…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 10, 2013 at 7:00pm — 14 Comments

!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!

!!! सत्य खुलकर पारदर्शी हो गई !!!

बह्र - 2122 2122 212

आज कल की धूप हल्की हो गई।

रंग बातें अब चुनावी हो गई।।

आईना तो खुद बड़ा जालिम यहां

सत्य खुल कर पारदर्शी हो गई।

प्यार का अहसास सुन्दर सांवरा,

दर्द बाबुल की कहानी हो गई।

जब कभी उम्मीद मुशिकल से जगे,

आस्था भी दूरदर्शी हो गई।

आईना को तोड़कर बोले खुदा,

श्वेत दाढ़ी आज पानी हो गई।

शोर है कलियुग यहां दानव हुआ,

साधु सन्तों सी…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on November 10, 2013 at 3:13pm — 26 Comments

ग़ज़ल

वो  हमें  कब मिला है खुदा  की तरह ।

जो रहा  है  सदा   बन हवा  की तरह ।

अब  उसे  कैसे  पहचान वो  पायेगा,

जो यहाँ  बदलता है अदा की तरह ।

अब  वही  राह दिखाने आया है मुझे,

जो  मेरा था  कभी  बेवफा की तरह।

वो क्या  भर देगा खुशिय़ा दामन तेरे,

जिन का अपना रहा है खला की तरह।

हम भुलाया जमाने को जिस के लिये ,

साथ वो  फिर क्यूँ  है सज़ा की…

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Added by मोहन बेगोवाल on November 10, 2013 at 1:30pm — 10 Comments

सवैया(मत्तगयन्द )

चाल बड़ी मनमोहक लागत, खेलत खात फिरै इतरावै !

लाल कपोल लगे उसके अरु ,होंठ कली जइसे मुसकावै !!

भाग रहा नवनीत लिये जब, मात पुकारत पास बुलावै !

नेह भरे अपने कर से फिर ,लाल दुलारत जात खिलावै !!

****************************************************** 

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 10, 2013 at 1:30pm — 28 Comments

ग़ज़ल - चाँदनी छिटकी हुई पर मन मेरा खामोश है

चाँदनी छिटकी हुई पर मन मेरा खामोश है।

बेखबर इस रात में सारा जहाँ मदहोश है।

वक्त आगे भागता, जम से गये मेरे कदम,

हाँ, सहारा दे रहा तन्हाई का आगोश है।

हँस रहा चेह्रा मेरा तुम तो बस इतना जानते,

क्योंकि गम दिल संग सीने में ही परदापोश है।

माँगता मैं रह गया, दे दो बहारों कुछ मुझे,

अनसुना कर बढ़ गईं, इसका बड़ा आक्रोश है।

अब कहाँ रौनक बची "गौरव" उमंगों की यहाँ,

घट रहा साँसों सहित धड़कन का पल-पल जोश…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 10, 2013 at 9:30am — 28 Comments

स्वप्न विलक्षण: ( विजय निकोर )

स्वप्न  विलक्षण:   

 

  स्मृतिओं की सुखद फुहारें

   झिलमिलाती चाँदनी

   की किरणों की झालरें

   अनन्त तारिकाएँ

   सपने में ... और सपने में साक्षात

   तुम ... कब से

 

   पूनों में, अमावस में, मध्य-रात्रि के सूने में

   इस एक सपने से तुमने, मुझसे

   रखा है अविरल अटूट संबंध

   वरना स्मृति-पटल पर चन्द्र-किरण-सा

   कभी प्रकाश-दीप-सा तैरता

   यूँ लौट-लौट न आता ...

 

  …

Continue

Added by vijay nikore on November 10, 2013 at 6:30am — 34 Comments

पियें मोरी अखियाँ श्याम रूप रस को

पियें मोरी अखियाँ श्याम रूप रस को ।

कण कण में देखें अपने सरबस को ।

शीश मोर मुकुट गले पुष्प माला ।

बड़ो प्यारो लागे मेरा नन्द लाला ।

ललचाये दिल मेरा उनके दरस को |

पियें मोरी अखियाँ श्याम रूप रस को ।

रेशम सी बालों कि लट प्यारी प्यारी ।

चन्दा से मुखड़े पे घटा कारी कारी ।

होंठ छलकाते हैं मधुर मय रस को ।

पियें मोरी अखियाँ श्याम रूप रस को ।

एक हाथ वंशी है तो दूजे लकुटिया ।

मोहताज़ उनकी…

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Added by Neeraj Nishchal on November 9, 2013 at 10:51pm — 22 Comments

प्रिये तुम तो प्राण समान हो

अंतस मन में विद्यमान हो,

तुम भविष्य हो वर्तमान हो,

मधुरिम प्रातः संध्या बेला,

प्रिये तुम तो प्राण समान हो....



अधर खिली मुस्कान तुम्हीं हो,

खुशियों का खलिहान तुम्हीं हो,

तुम ही ऋतु हो, तुम्हीं पर्व हो,

सरस सहज आसान तुम्हीं हो.



तुम्हीं समस्या का निदान हो,

प्रिये तुम तो प्राण समान हो....



पीड़ाहारी प्रेम बाम हो,

तुम्हीं चैन हो तुम्हीं अराम हो,

शब्दकोष तुम तुम्हीं व्याकरण,…

Continue

Added by अरुन 'अनन्त' on November 9, 2013 at 12:30pm — 28 Comments


प्रधान संपादक
विषैला सत्य (लघुकथा)

"शादी के दस साल बाद भी ऐसी हरकत ?"

"……………"

"क्या ये सच है क़ि तेरे पेट में मालिक का बच्चा है ?"

"हाँ, ये बात बिलकुल सच है." 

"अरी छिनाल, लोगों को पता चलेगा तो वो क्या कहेंगे ?"


"और तो कुछ पता नहीं, लेकिन अब तुम्हे
कोई नामर्द नहीं…
Continue

Added by योगराज प्रभाकर on November 9, 2013 at 12:00pm — 23 Comments

बताशा लगती हो तुम

बताशा लगती हो तुम

.

हिंदी के समान प्यारी, कोमल, सुरीली, मृदु,

घोले जो मिठास ऐसी भाषा लगती हो तुम,

जीवन में नीरसता, जैसे चहुँ ओर फैले,

तिमिर निराशाओं में आशा लगती हो तुम,…

Continue

Added by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:30am — 34 Comments

"ग़ज़ल के फ़लक पर - १" संपादक - राणा प्रताप सिंह - प्रविष्टि आमंत्रित

अंजुमन प्रकाशन की नई पेशकश "ग़ज़ल के फ़लक पर - १"

(२०० युवा शाइरों का साझा ग़ज़ल संकलन)



पुस्तक परिचय



पुस्तक – ग़ज़ल के फ़लक पर - १

संपादक – राणा प्रताप सिंह

२०० शाइरों की ३-३ ग़ज़लें…

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Added by वीनस केसरी on November 9, 2013 at 12:00am — 22 Comments

नव युवा हे ! चिर युवा .................. . (अन्नपूर्णा बाजपेई )

नव युवा हे ! चिर युवा तुम

उठो ! नव युग का निर्माण करो ।

जड़ अचेतन हो चुका जग,

तुम नव चेतन विस्तार करो ।

पथ भ्रष्ट लक्ष्य विहीन होकर

न स्व यौवन संहार करो ।

उठो ! नव युग का निर्माण करो ...............

दीन हीन संस्कार क्षीण अब

तुम संस्कारित युग संचार करो ।

अभिशप्त हो चला है भारत !!

उठो ! नव भारत निर्माण करो ।

नव युवा हे ! चिर युवा ..............................

गर्जन तर्जन  ढोंगियों का

कर रहा मानव मन…

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Added by annapurna bajpai on November 8, 2013 at 7:00pm — 31 Comments

सवाल --गजल --उमेश कटारा

2122 2121 222

आप तो सचमुच कमाल करते हो
बेवफा होकर सवाल करते हो

जंग में तो हार जीत जायज है 
हारने का क्यों मलाल करते हो

क्या हुआ जो बेवफा मुहब्बत थी
मुद्दतों से ही बवाल करते हो

.

पत्थरों के शह्र में बसर है तो
क्यों बिखरने का ख़याल करते हो

.

आदमी तो मर गया कभी से था

आत्मा को भी हलाल करते हो

उमेश कटारा

मौलिक एंव अप्रकाशित रचना

Added by umesh katara on November 8, 2013 at 7:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल - समुन्दर को डगर कर दूँ - पूनम शुक्ला

1222. 1222

सबा हाजिर अगर कर दूँ
कहानी इक अमर कर दूँ

अँधेरा घेरता फिर से
सितारों को खबर कर दूँ

हवा थोड़ी तुफानी है
इसे मैं बेअसर कर दूँ

कलम की रोशनाई से
फलक रंगीं अगर कर दूँ

ख़ला की हिकमती कैसी
अगर थोड़ी सहर कर दूँ

जरा सा वक्त तुम दे दो
जहन्नुम को न घर कर दूँ

चलूँगी राह जब अपनी
समुन्दर को डगर कर दूँ

हिकमती - उपाय

पूनम शुक्ला

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on November 8, 2013 at 3:20pm — 17 Comments

ग़ज़ल : सूखते नल के आँसू टपकने लगे

बह्र : २१२ २१२ २१२ २१२

 

सूखते नल के आँसू टपकने लगे

देख छागल के आँसू टपकने लगे

 

भूख से चूक पत्थर गिरे याँ वहाँ

देखकर फल के आँसू टपकने लगे

 

था हवा की नज़र में तो बरसा नहीं

किंतु बादल के आँसू टपकने लगे

 

आइने ने कहा कुछ नहीं इसलिए

रात काजल के आँसू टपकने लगे

 

घास कुहरे से शब भर निहत्थे लड़ी

देख जंगल के आँसू टपकने लगे

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 8, 2013 at 12:30pm — 15 Comments

शिक्षा..( संस्मरण)

आसमान पर, बादलों की बेहद घनघोर काली घटा छाई हुयी थी, न जाने इतना पानी बरश के कहाँ समायेगा, जमीन की पूरी गर्मी, बादलों को अपने ऊपर, मेहरबान होने का पूरा जोर लगाकर निमंत्रण दे रही थी..

....तभी एक शानदार चौपहिया वाहन आकर रुका, शायद उसमे कुछ खराबी आ गयी थी, चालक सीट पर बैठे साहब, ने अपनी आखों पर से तपती दुपहरी को, शीतल शाम करने वाला कत्थई पारदर्शी पर्दा उतारा और दरवाजा खोल के बाहर निकले, ऊपर आसमान की तरफ देखते हुए, वास्तविकता की जमींन पर कदम रखकर,सर्वप्रथम अपने छोटे से जेब से, बड़ा…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on November 8, 2013 at 12:21pm — 22 Comments

आशियाने दिल में आख़िर आजकल ठहरा है कौन

आशियाने दिल में आख़िर आजकल ठहरा है कौन।

रात दिन मेरे ख़यालो-ख़्वाब में रहता है कौन॥

 

किसके आने से हुई गुलज़ार दिल की वादियाँ,

हर तरफ मंज़र बहारों का लिए बैठा है कौन॥

 

चेहरे पे चेहरा लगाए फिर रहा है आदमी,

है बहुत मुश्किल बताना सच्चा है झूठा है कौन॥

 

कुछ न कुछ तो ख़ामियाँ मुझमें भी हैं तुझमें में भी हैं,

सबकी नज़रों में यहाँ तुम ही कहो अच्छा है कौन॥

 

है यकीं उसको यहाँ पे आने वाली है बहार,

वरना वीराने चमन…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 8, 2013 at 8:00am — 16 Comments

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