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चेतना का द्वार

चेतना का द्वार

उठते ही सवेरे-सवेरे

चिड़ियों की चहचहाट नहीं

आकुल क्रन्दन... चंय-चंय-चंय

शायद किसी चिड़िया का बीमार बच्चा

साँसे गिनता घोंसले से नीचे गिरा था

वह तड़पा, काँपा…

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Added by vijay nikore on May 4, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

जीवन को नर्क नित किया मीठे से झूठ ने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/२२२/१२१२



भटकन को पाँव की भला कैसे सफर कहें

समझो इसे अगर तो हम लटके अधर कहें।१।

**

गैरों से  जख्म  खायें  तो  अपनों  से बोलते

अपनों के दुख दिये को यूँ बोलो किधर कहें।२।

**

बातें सुधार से  अधिक  भाती  हैं टूट की

दीमक हैं देश धर्म को उन को अगर कहें।३।

**

टूटन  दरो - दीवार  की  करते  रफू  मगर

जाते नहीं हैं छोड़ कर घर को जो घर कहें।४।

**

जाने हुआ है क्या कि सब लगती हैं रात सी

दिखती नहीं है एक भी जिसको सहर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2020 at 7:41am — 7 Comments

ग़ज़ल : एक तन्हा ग़ज़ल रहा हूँ मैं

एक तन्हा ग़ज़ल रहा हूँ मैं

उसकी यादों में चल रहा हूँ मैं (1)

तेरी यादों में ज़िन्दगी जी कर,

ज़िन्दगी को मसल रहा हूँ मैं (2)

कैसी हो ज़िन्दगी बताओ तुम?

तेरे ग़म में उबल रहा हूँ मैं (3) 

प्यार में इक महीन सा काग़ज़,

भीग आँसू से गल रहा हूँ मैं (4) 

तुम मुझे देख मुस्कुराते हो,

सारी दुनिया को खल रहा हूँ मैं (5) 

वो मेरी राह में खड़ी होगी ,

इसलिए तेज चल रहा हूँ…

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Added by सूबे सिंह सुजान on May 3, 2020 at 8:00pm — 4 Comments

आग कैसी जल रही है आजकल

ग़ज़ल:



आग कैसी जल रही है आजकल

क्या वबा ये पल रही है आजकल

हर ख़बर अब क़हर ही बरपा रही

पाँव बिन जो चल रही है आजकल

धैर्य का कब ख़त्म होगा इम्तिहाँ

हर चमक तो ढल रही है आजकल

हो रही है बेअसर हर घोषणा

योजना हर टल रही है आजकल

नफ़रतों की लहलहाती फ़स्ल ही

ज़ह्र बनकर फल रही है आजकल

हाल अपना मैं कभी कहता नहीं

ख़ामुशी पर खल रही है आजकल

फिर 'अमर' गहरा अँधेरा जायेगा

जोर…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on May 3, 2020 at 3:00pm — 3 Comments

संकट दूर कभी होता है संकट संकट कहने से क्या ?(९५)

एक गीत

===========

संकट दूर कभी होता है

संकट संकट कहने से क्या ?

त्राण मिलेगा तभी आप यदि

समाधान ढूंढें संकट का |

**

जीवन में खुशियाँ यदि हैं तो, संकट का भी तय है आना |

गिरगिट जैसे रंग बदलकर ,रूप दिखाता है यह नाना |

धीरज रखकर हिम्मत रखकर , इससे मानव लड़ सकता है

ख़ुद पर संयम रखने से ही , तय होगा संकट का जाना |

पूरा जोर लगा दें अपना , हम भारत के लोग अगर…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 3, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

क्षणिकाएं

1. बड़ी बात ना कर, बड़ी ज़ात ना कर, ना बड़ा गुरूर,
ख़ुदा की नजरे-इनायत हुई, तो आजमाएगा ज़रूर।
.
2 . कभी वक्त का हिसाब, कभी बातों का,
ज्यादा ना माँगा करो, हम गणित के कच्चे हैं।
.
3. मेरे हौसलें भी बेअद्बी,
उसकी बेअद्बी भी हौसलें।
ये दुनियादारी का गणित है,
ज़मीर से नहीं हिसाब से चलता है।
.
4. तर्कों के तीर काट नहीं पाते,
तेरी…
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Added by Dr. Geeta Chaudhary on May 3, 2020 at 2:00am — 4 Comments

मजदूर को समर्पित एक रचना

पास उसके शक्ति श्रम की, पास उसके नूर है

वह जगत निर्माण करता अलहदा मजदूर है।।

घर खुला आकाश उसका औ शयन को है धरा

अस्थि पंजर शेष काया देख लगता अधमरा।।

भूख पीड़ित वो, नहीं कुछ और बातें सोचता

क्लेश चिन्ता दीनता तन रुग्ण यौवन नोचता।।

पास उसके पेट, भोजन चाहिए हर हाल में

ढूंढता जिसको फिरे वो ज़िन्दगी जंजाल में।।

वो बनाया ताज लेकिन नृप हुआ मशहूर है

जात क्या औ धर्म क्या मजदूर तो मजदूर है।।

पाँव…

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Added by नाथ सोनांचली on May 2, 2020 at 7:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1222 1222 1222 122

करेगा दम्भ का यह काल भी अवसान किंचित ।

करें मत आप सत्ता का कहीं अभिमान किंचित ।।

क्षुधा की अग्नि से जलते उदर की वेदना का ।

कदाचित ले रहा होता कोई संज्ञान किंचित ।।

जलधि के उर में देखो अनगिनत ज्वाला मुखी हैं।

असम्भव है अभी से ज्वार का अनुमान किंचित।।

प्रत्यञ्चा पर है घातक तीर शायद मृत्यु का अब ।

मनुजता पर महामारी का ये संधान किंचित ।।

चयन…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 2, 2020 at 4:23pm — 9 Comments

दोस्ती

उन गलियों को छोड़ दिया

उन राहों से मुँह मोड़ लिया

अपनी यारी के किस्से जहां

आज भी गूंजा कराती है

 

अब बची रही कुछ खास नहीं

उन उम्मीदों की प्यास नहीं

तेरे घर के चौबारे पर अब भी

आवाज़ जो गूंजा करती है

 

वो जुते  में चिरकुट रखना

पीछे से यूँ पेपर तकना

हिंदी वाली मिस हमेशा

याद अभी भी करती है

 

वो रातों को पढ़ने जाना

एक दूजे के घर चढ़ आना

किताबे पिली पन्नी के अब भी

हर रात वही पर…

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Added by AMAN SINHA on May 2, 2020 at 2:37pm — 5 Comments

अलग फ़िक्र --लघुकथा

"क्या बहन, कल से बंदी ख़तम हो जायेगी?, एक बाई ने अपने दरवाजे से सामने वाले घर की बाई से पूछा.
"पता नहीं रे, हो सकता हैं ख़तम हो जाए", उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.
"अच्छा तो ये बताओ कि क्या बंदी ख़त्म होते ही दारू की दुकान भी खुल जायेगी?, पहली ने फिर पूछा.
दूसरी ने लगभग घबराते हुए कहा "ख़तम नहीं होता तो अच्छा था".


मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 2, 2020 at 12:52pm — 6 Comments

बरस हुए हैं कई न तुमने  की गुफ़्तगू है न हाल पूछा(९४ )

121 22  121 22  121 22  121 22 

.

बरस हुए हैं कई न तुमने  की गुफ़्तगू है न हाल पूछा

कहाँ हो तुम ये  पता नहीं क्यों न हमने कोई सवाल पूछा

**

सँभाल कर सब रखे जो ख़त हैं उन्हीं को पढ़कर करें गुज़ारा

किताब  के सूखे फूल ने भी है कैसा हुस्न-ओ-जमाल पूछा

**

बिना तुम्हारे फ़ज़ा में ख़ुश्बू   न संदली अब रही है जानाँ

बहार ने तितलियों से इक दिन तुम्हारा भी हाल चाल पूछा

**

तुम्हारा  जायज़ है  रूठना पर तवील इतना कभी नहीं  था

हमारे …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 2, 2020 at 11:30am — No Comments

वंचितों के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

  1. फूलों की नाराजगी, काँटों का मनुहार

    दुखियारों के भाग में, ऐसा ही सन्सार।१।

    **

    नदिया ने  दुत्कार  दी, किया  रेत  ने प्यार

    जिसके दम करते रहे, जीवन का विस्तार।२।

    **

    कौतुक करता दुख रहा, पर सुख रहा उदास

    घावों ने  मन  में  भरी, पीड़ा  निहित मिठास।३।

    **

    यादों  की  चौपाल  में, बिन  घूँघट  के  पीर

    जाने क्या क्या कह गया, आँखों बहता नीर।४।

    **

    मुर्दा दिल की बस्तियाँ, चलती फिरती लाश

    हलचल  कैसी  भी  रहे, जीवन  रहे  हताश।५।

    **

    किस्मत…
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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2020 at 9:41am — 6 Comments

सभ्य कितना चल गया सबको पता -गजल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

२१२२/ २१२२/२१२२



द्वार पर वो  नित्य  आकर  बोलता है

किन्तु अपना सच छुपाकर बोलता है।१।

***

दोस्ती का मान जिसने नित घटाया

दुश्मनों को अब क्षमा कर बोलता है।२।

***

हूँ अहिन्सा का पुजारी सबसे बढ़कर

हाथ  में  खन्जर  उठाकर  बोलता है।३।

***

गूँज घन्टी की न आती रास जिसको

वो अजाँ को नित सुनाकर बोलता है।४।

***

दौड़कर मंजिल को हासिल कर अभी तू

पथ  में  काँटे  वो  बिछा कर  बोलता …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2020 at 10:00pm — 5 Comments

ज़िंदगी का हिसाब हो जाऊँ - ग़ज़ल - बसंत

मापनी 2122 1212 22/112

गर कहो तो जनाब हो जाऊँ

तुम जो देखो वो ख़्वाब हो जाऊँ

 

रोज पढ़ने का गर करो वादा

प्रेम की मैं क़िताब हो जाऊँ 

 

मुझको काँटों से डर नहीं लगता 

चाहता हूँ गुलाब हो…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on May 1, 2020 at 12:30pm — 6 Comments

श्रमजीवी

श्रमिक दिवस पर श्रमजीवी को आओ शीश झुकाएँ।

बलाक्रान्त शोषित निर्बल को मिलकर सभी बचाएँ।

दुरित दैन्य दुख झेल रहे हैं

सदा मौत से खेल रहे हैं।

तृषा तपन पावस तुसार सह

जीवन नौका ठेल रहे हैं।

हर सुख से जो सदा विमुख हो उस पर बलि-बलि जाएँ।

निर्मित जो करता नवयुग तन,उसे नहीं ठुकराएँ।

आजीवन कटु गरल पी रहे

दुर्धर जीवन सभी जी रहे।

हाँफ-हाँफ कर विदीर्ण दामन

जीने के हित सदा सी रहे।

कर्म निरत गुरु गहन श्रमिक…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on May 1, 2020 at 11:30am — 8 Comments

तू यार हवा गर है तो मानन्द-ए-सबा रह(९३ )

221 1221 1221 122 

तू यार हवा गर है तो मानन्द-ए-सबा रह

तू है दुआ तो एक असर वाली  दुआ रह

**

तू अब्र है तो बर्क़ से झगड़ा न किया कर

हर हाल में पाबंद-ए-रह-ए-रस्म-ए-वफ़ा रह

**

तू शम'अ है तो ताक़  में रह कर ही  जला कर

तूफ़ान है तो दिल में मेरे यार उठा रह

**

तू याद किसी की है तो हिचकी में समा जा

तू ज़ख़्म अगर दिल का है दिन रात हरा रह

**

आज़ाद तेरे इश्क़ से हो पाऊँ न…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 30, 2020 at 3:30pm — 6 Comments

शहर शर्म के चलते

कौन कहता  है कि

मन तभी  …

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Added by amita tiwari on April 30, 2020 at 3:00am — 5 Comments

आहट .....

आहट .....

दिल

हर आहट को

पहचानता है

आहट

बेशक्ल नहीं होती

होती हैं उसमें

हज़ारों ख़्वाहिशें

जिनके इंतज़ार में

ज़िंदगी

रहती है ज़िंदा

फ़ना होने के बाद भी

सहर होती है साँझ होती है

वक़्त मगर

ठहरा ही रहता है

किसी आहट के इंतज़ार में

नज़रें

अपनी ख़्वाहिशों के अक़्स

देखने को बेताब रहती हैं



तसव्वुर में

ज़िंदा रहती हैं

आहटें

मगर

मिलता है धोख़ा

सायों…

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Added by Sushil Sarna on April 29, 2020 at 8:04pm — 6 Comments

ज़मीँ पर हल चलाता है इसी उम्मीद में कोई(९२ )

एक ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल  (1222 *4 )

.

ज़मीँ पर हल चलाता है इसी उम्मीद में कोई

कभी तो जाग जाएगी मेरी क़िस्मत अगर सोई

**

मेरे किरदार की दौलत रहे महफूज़, काफ़ी है

मुझे कुछ ग़म नहीं होगा मेरी दौलत अगर खोई

**

भले इल्ज़ाम मुझ पर बेवफ़ा होने का लग जाये

मगर बर्दाश्त कैसे हो उसे रुस्वा करे कोई

**

अभी भी रोक दो सब क़ह्र क़ुदरत पे न बरपाओ

अरे बर्बाद कर देगी कभी क़ुदरत अगर रोई

**

मेरा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 29, 2020 at 12:00pm — 6 Comments

आत्मावलंबन

आत्मावलंबन

बाहरी दबाव और आंतरिक आदर्श 

असीम उलझन और तीव्रतम संघर्ष

ऐसा भी तो होता है कभी

कि मन का सारा संघर्ष मानो

किसी एक बिंदु पर केंद्रित हो उठा हो

और पीड़ा ... जहाँ कहीं से भी उभरी

सारी की सारी द्रवित हो कर

उस एक बिंदु के इर्द-गिर्द

ठहर-सी गई हो

बह कर कहीं और चले जाने का

उस पीड़ा का

कोई साधन न हो

वाष्प-सा उसका उड़…

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Added by vijay nikore on April 28, 2020 at 6:52am — 6 Comments

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