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लगता है ये त्योहारों का मौसम है..

खुशूबू हैं संगीत हवाएं सरगम हैं

ये आंसू की बूंद नहीं ये शबनम है.

सूरज जब भी ड्यूटी करके घर लौटा
अंधकार में डूबा सारा आलम है,

बडे—बडे तैराक डूबते देखे हैं,
बचकर रहना उसकी आंखें झेलम हैं,

तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,

चौराहों पर पुलिस, लोग सहमे—सहमे
लगता है ये त्योहारों का मौसम है।।


- मौलिक व अप्रकाशित

@ अतुल कुशवाह

Added by atul kushwah on October 7, 2014 at 11:30pm — 5 Comments

दीप जलाएँ....

'दीप जलाएँ....



मावस का तम घना मिटाएँ

आओ सब मिल

दीप जलाएँ।



महकाएँ घर आँगन द्वारे

स्वच्छ करें गलियाँ चौबारे

कटुता के सब महल ढहाएँ

हिलमिलकर यह

पर्व मनाएँ।



अम्बर का तम मिट ना पाया

अनगिन तारे थाल सजाया

तम की शिला भेद जो पाएँ

दीप माल से

धरा सजाएँ।



घर जो उजियारे को तरसे

माँ लक्ष्मी की कृपा यूँ बरसे

दीप पर्व वो सभी मनाएँ

खील बतासे

ना मुरझाएँ।

आओ मिल सब

दीप जलाएँ।

सीमा हरि… Continue

Added by seemahari sharma on October 7, 2014 at 7:18pm — 16 Comments

दीप कोई प्रीत का अंतस जले

**दीप कोई प्रीत का अंतस जले.

 

हो चुकी है रात आधी,

घोर तम मावस पले.

इस अमा में दीप कोई,

प्रीत का अंतस जले.

--

हर तरफ खुशियाँ बिछी हैं,

द्वार तोरण से सजे.

आतिशी होते धमाके,

वाद्य मंगल धुन बजे.

कौन देता ध्यान उनपर,

भूख से मरते भले.

--

बाल दे इक दीप कोई,

रौशनी भी हो यहाँ.

झोपड़ी को राह तकते,

घिर चूका है कहकशाँ.

लूटते सारी ख़ुशी वो,

काट सकते जो…

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Added by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 2:07pm — 13 Comments

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराए लोग --- सुलभ अग्निहोत्री

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराये लोग

हमसे, तुमसे, इससे, उससे, सबसे आजिज आये लोग

बड़ी दिलेरी दिखलाते थे बिला वजह हर मौके पर

वक्त पड़ा तो सबसे पहले भागे पूँछ दबाये लोग

भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा

कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग

नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का

सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग

खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर

अपने चारण बने आप ही अपने पर…

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Added by Sulabh Agnihotri on October 7, 2014 at 12:00pm — 13 Comments

एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़-डा० विजय शंकर

अच्छे काम का प्राइज़ हो न हो

बेईमानी एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़ है .

बेईमानी स्वयं बड़ी ईमानदारी से होती हैं .

सिद्धांतों , आदर्शों में नहीं , व्यवहार में होती है .

इसीलिये लोग किसी को यह सलाह नहीं देते

कि बेईमान बनो, कहते हैं व्यवहारिक बनो .



व्यवहार का नेटवर्क कितना भी गहन क्यों न हो

व्यवस्था का हर अंग अकेला माना जाता है ,

कोई अदना या सरगना कभी पकड़ा भी जाए ,

वह स्वतन्त्र, अकेला इंटरप्रिन्योर माना जाता है .

सजा सिर्फ उसे होती है ,चाहे जितनी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 10:36am — 14 Comments

कविता का आगमन

 दूर किसी स्टेशन से

शहर के ट्रैफिक को चीरते हुए

फुटपाथ पर उनींदे पड़े बच्चे का स्पर्श लिए

चौथे माले पर बेरोजगारों के कमरे तक

तुम्हारा आना

 

उन उखड़ी सड़कों से होते हुए

जहाँ की धूल विकास के नारों पर मुस्कुराती है,

बस की पिछली सीढ़ियों से लटकते हुए

बेटिकट पहुँचना मेरे गाँव

और मुझे छज्जे के कोने पर बैठा देख

यक-ब-यक मुस्कुराना  

 

तुम्हारा आना

छिपकली की तरह दीवार पर

आँधियों की तरह…

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Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on October 6, 2014 at 11:34pm — 2 Comments

ग़ज़ल- वहशतों का असर न हो जाये

वहशतों का असर न हो जाये

आदमी जानवर न हो जाये



शाम के धुंधलके डराने लगे हैं,

हमसे ओझल नगर न हो जाये



अपने रिश्तों को अपने तक रखना,

मीडिया को खबर न हो जाये



ग़म का पत्थर मुझे दबा देगा,

आपकी हाँ अगर न हो जाये...



आप झुक जाएंगी जवानी में,

टहनियों सी कमर हो जाये



आपका इन्तजार जहर बना,

“सब्र वहशत असर…

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Added by सूबे सिंह सुजान on October 6, 2014 at 9:00pm — 2 Comments

कुर्बानी (लघुकथा)

"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? "
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

.

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:00pm — 15 Comments

ग़ज़ल --एक तू क्या मिला मैं ख़दा हो गया

212 212 212 212

----------------------------

इश्क़ मैंने किया दिलज़ला हो गया

उम्र भर के लिये मसख़रा हो गया



कुछ ग़लत फहमियाँ इस क़दर बढ़ गयीं

एक तू क्या मिला मैं ख़ुदा हो गया



चाँद भी सो गया रात तन्हा कटी 

लुट गयी महफ़िलें सब ये क्या हो गया



एक लौ दिख रही थी कहीं दूर फिर

देख़ते देख़ते रतज़गा हो गया



दर्द बढ़ता गया आँख बहती गयीं

आँसुओं का समन्दर ख़ड़ा हो गया



आसमाँ फट पडा जब ये उसने कहा

हाथ छोड़ो मेरा मैं बड़ा हो…

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Added by umesh katara on October 6, 2014 at 5:40pm — 3 Comments

तुम्हारी याद में बरसात का मौसम हुईं आंखें..

लगे हैं जोडने में फिर भी अक्सर टूट जाते हैं,

यहां रिश्ते निभाने में पसीने छूट जाते हैं,

भले रंगीन हैं इनमें हवाएं कैद हों लेकिन

ये गुब्बारे जरा सी देर में ही फूट जाते हैं।।

आपका हाथ थामकर मैं चल ही जाऊंगा,

अगर मना करोगे तो मचल ही जाऊंगा,

मैंने माना कि रेस कातिलों से होनी है,

मुझे यकीन है बचकर निकल ही जाऊंगा।।

आजकल ये मन मेरा जाने कहां खोने लगा

जब कभी भी गम लिखा तो ये हृदय रोने लगा,

हाथ में थामी कलम तो खुद—ब—खुद चलने…

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Added by atul kushwah on October 6, 2014 at 5:30pm — 1 Comment

तो क्या बात हो

अपने जज्बात दिखाओ तो क्या बात हो

खुल के हर बात बताओ तो क्या बात हो

सभी ने दिन में हैं तारे ही दिखाये मुझको

तुम कभी चाँद दिखाओ तो क्या बात हो

वो अकेला ही चल पड़ा राहे-सच्चाई

दो कदम साथ मिलाओ तो क्या बात हो

मेरे…

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Added by Pawan Kumar on October 6, 2014 at 5:30pm — 4 Comments

ये मेरी वाली है (लघुकथा) // --शुभ्रांशु पाण्डेय

 जैऽऽ…….दुर्गामइया की जैऽऽऽ……

नाव के एकबारगी हिचकोले खाने के साथ ही दुर्गा एवं संलग्न प्रतिमाओं का विसर्जन हो गया. माता, माता के शृंगार, शेर के अयाल, महिष के सींग, असुर की फैली भुजायें, सबकुछ एक साथ जल में समाने लगे.  

मूर्ति के साथ साथ मनुआ भी पानी में कूदा. उसे न तो दानव का कोई डर था, न उसे माता के आशीर्वाद चाहिये थे.

“अबे.. ये मेरी वाली है..”, कहता हुआ वो डूबती हुई प्रतिमाओं की ओर तैर चला.

उसे उनके पास बाकियों से पहले पहुँचना था, ताकि आने वाली ठंड में…

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Added by Shubhranshu Pandey on October 6, 2014 at 3:30pm — 17 Comments

सहनशक्ति

सहनशक्ति

उदास मन से ही सही,
ले चलो मुझे अपने
उस नरक के अंदर
जिसमे तुम सदियों से
रह रही हो ,
सब दुःख तुम
स्वयं सह रही हो.
एक बार मैं भी तो जानू
स्त्रियों को इतनी
सहनशक्ति
कहाँ से मिलती है?

विजय प्रकाश शर्मा
अप्रकाशित व मौलिक

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 6, 2014 at 11:50am — 10 Comments

श्वेत बसन शारदे!

"वैभव छन्द" की रचना- एक भगण, एक सगण तथा लघु गुरू अर्थात्- 211, 112, 12 के योग से की जाती है।



श्वेत बसन शारदे!

नित्य नमन राम को।

प्रेम रमन श्याम को।।

सूर्य प्रखर तेज है।

कंट असर सेज है।।1



रात दिन विचारता।

आर्त जन पुकारता।।

कष्ट तम हरो प्रभू।

ज्योति बल तुम्ही विभू।।2



विश्व सकल आप से।

सृ-िष्ट विकल ताप से।।

पाप-पतित तारना।

सत्य शिवम कामना।।3



जीव जड़…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 6, 2014 at 11:35am — 6 Comments

प्रेम-कर्तव्य और सदाबहार

प्रेम-कर्तव्य और सदाबहार

संकर-जाती के दो सदाबहार

एक कर्तव्य-बोध दूसरा प्रतीक-प्यार

रोप थे इस बार/देशी के मुरझाने के बाद

उम्मीद थी दोनों बढ़ेंगे-खिलेंगे

मेरे जीवन में नव-रंग भरेंगे

लाएँगे फिर मधुमास

पूरा था विश्वास/मन में था उल्लास |

मगर प्रेम-प्रतीक कुम्हला गया है

उसके अस्तित्व पे संकट आ गया है

बरसात के पानी ने उसकी जड़े गला दी

उसके होने कि प्रासंगिकता घटा दी हैं |

यूँ तो वो शुरु से कमज़ोर था

और यदा-कदा…

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Added by somesh kumar on October 6, 2014 at 9:30am — No Comments

चार घनाक्षरी छंद (रमेश कुमार चौहान)

मां भारती की शान को, अस्मिता स्वाभिमान को,

अक्षुण सदा रखते, सिपाही कलम के ।

सीमा पर छाती तान, हथेली में रखे प्राण,

चैकस हो सदा डटे, प्रहरी वतन के ।

चांद पग धर कर, माॅस यान भेज कर,

जय हिन्द गान लिखे, विज्ञानी वतन के ।

खेल के मैदान पर, राष्ट्र ध्वज धर कर,

लहराये नभ पर, खिलाड़ी वतन के ।



हाथ में कुदाल लिये, श्रम-स्वेद भाल लिये,

श्रम के गीत गा रहे, श्रमिक वतन के…

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Added by रमेश कुमार चौहान on October 5, 2014 at 2:00pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दियालिया उजास दे (नवगीत) // --सौरभ

आँक दूँ ललाट पर

मैं चुम्बनों के दीप, आ..

रात भर विभोर तू

दियालिया उजास दे..



संयमी बना रहा

ये मौन भी विचित्र है

शब्द-शब्द पी

करे निनाद-ब्रह्म का वरण..…

Continue

Added by Saurabh Pandey on October 5, 2014 at 11:30am — 34 Comments

आटा या नमक....(लघुकथा)

“नमस्कार बाबू जी..! मुझे इस खसरे की नकल जल्द से जल्द निकलवाना है, यह रहा मेरा आवेदन”   रमेश ने सरकारी दफ्तर में फाइलों के बीच सिर दिए बाबू से कहा

“ अरे भाईसाहब..! जिसे देखो उसे जल्दी है. यहाँ इतना काम फैला पड़ा है और स्टाफ भी कम है, अपना आवेदन दे जाइए और आप १५ दिनों के बाद आइयेगा. आपको नकल मिल जायेगी. हाँ..!  अगर जरुरी काम हो ,जल्दी चाहिए तो थोड़ा सेवा-शुल्क कर दीजिये. कल ले जाना अपनी नकल” बाबू ने रमेश का आवेदन लेकर फ़ाइल कवर में रखते हुए कहा

“ अरे बाबू जी..! कैसी…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2014 at 11:59am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चाक दिल सिलता नहीं देखो दुबारा (ग़ज़ल 'राज')

२१२२   २१२२   २१२२ 

ढूँढती इक मौज तूफां में किनारा

क्यूँ समझता ही नहीं सागर ईशारा

 

तिश्नगी उसको कहाँ तक ले गई है

अक्स अपना झील में उसने उतारा

 

फ़र्क क्या पड़ता चमकती चाँदनी को

छटपटाता फिर कहीं टूटा सितारा

 

फट गया जो पैरहन तो ग़म नहीं है

चाक दिल सिलता नहीं देखो दुबारा

 

डोलती किश्ती बढ़ाती हाथ अपना

उस तरफ़ तुम मोड़ लो अपना शिकारा

 

खोल दो गर तुम लटकती उस पतंग को

लोग…

Continue

Added by rajesh kumari on October 4, 2014 at 10:30am — 27 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -गैर कोई है छिपा सा देखता हूँ ( गिरिराज भंडारी )

गैर  कोई  है  छिपा  सा  देखता हूँ

***********************************

2122     2122     2122  

जब  अंधेरों  में  उजाला  देखता  हूँ

सच में रोशन भी हुआ क्या, देखता हूँ

 

मैंने कल  काँटा चुभा तो, फूल माना  

कुछ असर उसपे हुआ क्या, देखता हूँ

 

लोग  इंसानों  की भाषा बोल लें पर

गैर  कोई  है  छिपा  सा  देखता हूँ

 

अश्क़  कोई  देख  लेता  है निहानी

तब  ख़ुदाई,  मैं  ख़ुदाया  देखता हूँ

 

ख्वाब सारे  थे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on October 3, 2014 at 8:30pm — 9 Comments

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