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चलो कि ज़िन्दगी को दें हम एक नाम नया -ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

सफर ये राहगुज़र और ये मुकाम नया

हयात देती है अक्सर मुझे यूँ काम नया

 

अगर नसीब से बच पाये तो गनीमत है

यहाँ हर एक कदम पर है एक दाम नया         (दाम=जाल)

 

न जी सके अभी तक चलिये कोई बात नहीं                                               

करें अब के कोई जीने का एहतमाम नया

 

ये ज़िन्दगी हो फ़ना रोज़ और रोज़ शुरू

ग़ुरूबे शम्स हो तो चाँद निकले शाम नया

 

बहुत हुये गमे दौराँ की…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 12, 2014 at 10:22am — 12 Comments

घर मेरे सावन का..............................

आज मौसम   ....बड़ा आशिकाना है

शब्द के मोतियों से  उन्हें सजाना है

 

हर्फ़ में ही सही  तस्वीर बनाई बहुत

कहीं और    जिनका अब ठिकाना है

 

जिसकी खातिर यहाँ रातें बिताई बहुत

उनका इधर से यूँ रोज आना जाना है

 

ख्वाब में डाल पर झूले झूलेंगे हम

घर मेरे सावन का यूँ आना जाना है

 

स्वप्न में आकर फ़िर से लुभाओ प्रिय

जहाँ  न मेरा न तेरा कोई  बहाना है

 

कैसे कह दूँ उन्हें प्यार करता नहीं

पहले दीदार…

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Added by anand murthy on October 11, 2014 at 11:58pm — 3 Comments

कर्मठ (लघुकथा)

कर्मठ

जैसे ही पता चलता है कि नेताजी स्कूल प्रांगण में आ चुके हैं |कर्मवीर जी सक्रिय हो जाते हैं और दिनेश से माईक लेकर स्वागत कि घोषणा करते हैं |फिर कार्यक्रम के समापन तक सभी जगह सभी के साथ कर्मठ कर्मवीर जी कैमरे में कैद हो जाते हैं |मंच से कुछ दूर कुर्सी पर बैठा दिनेश अपनी निष्क्रियता पर गहरी सांस लेता है और कर्मठ कैमरे और कर्मठ कर्मवीर जी के चेहरे पर बार-बार आ रहे फ़्लैश को देखता रहता है |

 C-@-सोमेश कुमार

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on October 11, 2014 at 7:00pm — 7 Comments

अब तू ही बता !!

ऐ चाँद !

पूजा तुझे वर्षों

हल्दी,कुमकुम,

अक्षत,रोली,पुष्प,

धूप दीप, नैवेद्य,

करती रही अर्पण

आस ये कि तू

अभिसिंचित करेगा

अपनी शीतल रश्मियों से

प्रेम की अनुभूतियों से

दूर कर देगा मेरे

प्रणय की प्रत्येक विसंगतियों से

पर यह क्या किया .....

सब कुछ बदल दिया !

तू उगलता रहा

अपनी चाँदनी में अदृश्य अंगारे

सुलगती रही जीवन की लहरें

झुलसा- झुलसा तन-मन  

अंतरमन का हाहाकार लिए

अब तू ही बता

तुझे कैसे पूजूँ अब…

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Added by Meena Pathak on October 11, 2014 at 1:00pm — 10 Comments

सच, ओर कोई नहीं.....

सच, ओर कोई नहीं.....

तन्हा बरसातों में
हिज़्र की रातों में
सुलगते जज़्बातों में
खामोश बातों में
आंसू की सौगातों में
साँसों की कफ़स में
मेरी नस नस में
चांदनी बन कसमसाती
धड़कनों से बतियाती
सच, ओर कोई नहीं
सिर्फ, तुम ही तुम हो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 11, 2014 at 12:26pm — 9 Comments

हिन्द-सपूत

मातृभक्ति गुंजित स्वर तेरे, सिंहनाद सा करते हैं,,

तेरा साहस शौर्य देख, तेरे भय से शत्रु मरते हैं । 

वेग तेरी आशा का भारी, है आंधी तूफानों पर,,

तेज तेरे चेहरे का भारी,  बिजली की मुस्कानों पर । 

शक्ति का अंबार छिपा है, तेरे दृढ़ संकल्पों में,,

जीवन का हर गीत लिखा है, तूने प्रेम के पन्नों में । 

संबल तेरा पाकर ही, निर्बल ने है लड़ना सीखा,,

देख अडिग विश्वास तेरा, पाषाणों ने अड़ना सीखा । 

धीर हो तुम! गंभीर हो…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 11, 2014 at 11:30am — No Comments

मौत

देखा   असूल    मैंने    अजब   सर जमीन पर

जो    ठोकरें     लगाते   रहे    उम्र    भर    मुझे

शैतानियत ने किस कदर चोला बदल लिया

वे   ही   जनाजे    में    मेरी    कन्धा   लगा  रहे  I

 

चप्पल न  थी   नसीब   छाले   पाँव   में पड़े

मै   जिन्दगी  में   यूँ   ही   दर्दमंद  हो चला

अल्लाह   तूने   मौत   दी   तेरे   बड़े  करम

इक बार  आठ  पाँव   की सवारी तो मिली  I

 

मैंने    हयात   में    न    कभी    हार   थी  मानी

हर  वक्त   …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 6:00pm — 14 Comments

तुम मेरी मोहब्बत का इम्तिहान न लो

तुम मेरी मोहब्बत का इम्तिहान न लो,

बस यूँ ख़ामोश रह कर मेरी जान न लो । 

लोग कोसेंगे तुम्हें, तुमसे करेंगे दिल्लगी,

तुम अपने माथे पर, मेरी उजड़ी हुई पहचान न लो । 

बस्तियां खाली पड़ीं, कई लोग देंगे आसरा,

इक रात बसने के लिए, मेरे दिल का सूना मकान न लो । 

बेजुबां बेदम सा होकर, मैं पड़ा तेरी राह में,

मुँह फेर कर गुजरो मगर, मेरी आँखों की जुबान न लो । 

मैं बड़ा नाजुक हूँ, दिल पर बोझ भारी है बहुत ,

न गिरूँ…

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Added by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 10, 2014 at 11:30am — No Comments

तेरे कूंचे से यूं खामोश गुजरकर मैंने

2122   1122   1122  22

तेरे कूंचे से यूं खामोश निकलकर  मैंने 

तेरे दीदार किये रूप बदलकर मैंने 

इक हिमालय  की तरह तुमसे मिला था लेकिन

 पाँव  अब चूम लिए तेरे पिघलकर मैंने 

 भौरों कलियों कि कभी  बात न मुझसे करना 

उम्र अब तक तो है काटी यूं बहलकर मैंने 

आजमाया है हुनर आज किसी बच्चे का

उनसे दिल मांग लिया उनका मचलकर मैंने  

दिल की चाहत तो है इजहारे मुहब्बत करना 

बात पर तुझसे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हो कितनी स्वछन्द ऐ कविता! (नवगीत 'राज')

धरती से नीले अम्बर तक

बिना किसी व्यवधान

इठलाती तितली सी चंचल

भरती रहे  उड़ान 

ना कोई सीमा ना कोई बंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी करुण रस से आप्लावित   

भीगे आखर से बोझिल   

कभी डूब शिंगार झील में

आती नख- शिख तक झिलमिल  

कभी गरल तू विरह का  पीती  

कभी नेह  मकरंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी परों पर लगा बसंती

रंग अबीर गुलाबी लाल

कहीं बिठाती दीये…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2014 at 12:50pm — 16 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : गुब्बारा (गणेश जी बागी)

"वाह वाह !! क्या लिखते हैं साहब, एक बार किताब छपने तो दीजिये, देखिये कैसे लोग हाथो हाथ उठा लेते हैं I"

पाण्डुलिपि पलटते हुए प्रकाशक ने "कवि जी" से कहा । खैर, जीवन भर की कमाई और कुछ मित्रों से उधार लेकर किताब छप गयी। 
प्रकाशक ने पाँच सौ प्रतियां "कवि जी" के पास भिजवा दीं । 
झाड़ू लगाते समय पत्नी का भुनभुनाना अब रोज की बात हो गयी ।
.

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => …

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 9, 2014 at 11:00am — 25 Comments

विश्‍वदृष्टि दिवस पर रचना

बचें दृष्टि से दृष्टिदोष फैला हुआ है चहुँ दिश।

निकट या दूर दृष्टि सिंहावलोकन हो चहुँ दिश।

दृष्टि लगे या दृष्टि पड़े जब डिढ्या बने विषैली।

तड़ित सदृश झकझोरे मन जब दृष्टि बने पहेली।

गिद्धदृष्टि से आहत जन-जन वक्र दृष्टि से जनपथ।

जन प्रतिनिधि, सत्‍ताधीशों के कर्म अनीति से लथपथ।

रखें दृष्टिगत हो जन-जाग्रति, जन-निनाद, जन-क्रांति।…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 9, 2014 at 9:16am — 3 Comments

वैदेही

एक बार फिर आओ न वैदेही
फिर राम की बनो सनेही
इस बार उसके साथ वन में मत जाओ
उसे ले चलो किसी शहर की ओर
जहाँ अनगिनत रावण तुम्हारे
अपहरण का स्वप्न सजाये बैठे हैं.
रावण द्वारा अपहृत हो जाओ,
इन नए राक्षसों के विनाश का
तुम फिर से कारण बनो.
एक नया संसार बसाओ
इनका अब संहार कराओ.

तनिक फिर भृकुटि बनालो
राम को फिर से बुला लो.

मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 10:30pm — 18 Comments

चित्त की वृत्ति

चित्त की वृत्ति

चंचल है कदाचित,

यह मचलती

सूर्य के प्रकाश जैसी।



तन विषय विष से भरे

घट को पिए जो

खार के सागर

अहं के ज्वार उगले।



रोक दो वृत्ति

तमस को भेद कर -चित्त में

योग - अनुशासन

तुला पर तोलता है।



वृत्ति की आवृत्ति

निश्छल शून्य जब भी

दिव्य अद्भुत योग से

साक्षात मुक्ति।



आत्मा - परमात्मा

चित्त के उपज जो

एक खोली में रहें जीव जैसे-

काष्ठ में अग्नि,

जल में वाष्प…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 8, 2014 at 9:00pm — 14 Comments

पूर्वगाथा ....(विजय निकोर)

पूर्वगाथा

हादसा नया हो न हो

पुरानी चोट से जगह-जगह

दर्द नया

लहर दर्द की, अब दुखी

तब दुखी

कब रुकी

बहती चली गई

मेघ यादों के आँखों में घने

बरसे, बरसे अनमने

तालाब से नदी, सागर

रातों सियाह महासागर बने

कोई नि:सीम अखण्ड विश्वास

तारिकाएँ नभ में कितनी टूटीं

टूटी नहीं किसी के आने की आस

स्नेह की किरणों की उष्मा में बादल

बने फिर घने, फिर बरसे

भीतर सागर…

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Added by vijay nikore on October 8, 2014 at 8:00pm — 14 Comments

गाँव आ गया.....

* गाँव आ गया*



उबड़ खाबड़ सड़कें,गाड़ी

हिचकोले खाती।

सड़क किनारे लगीं सब्जियाँ

मन में बस जातीं

शुद्ध हवा साँस खिल आए।

गाँव आ गया।



पानी लेने ललनाएँ भी

दूर दूर आती।

सिर काँधें पर धरी गगरियाँ

छलक छलक जाती।

गागर कटि संग लचकी जाये।

गाँव आ गया।



लिपे पुते हैं सजे धजे से

आँगन दालानें।

भोली भाली सरल सहज सी

निश्छल मुस्कानें।

आँगन को तुलसी महकाये।

गाँव आ गया।



आम नीम जामुन कनेर के

पग… Continue

Added by seemahari sharma on October 8, 2014 at 4:35pm — 6 Comments

चुटकियों से माँ...................

एक छतरी है जो याद मुझको बहुत आती है|

चुनरी पालने की याद मुझको रोज आती है |।

 

सुधियों से परिपूर्ण,सुध बचपन की आती है |

अंगने के झूले की,याद उस उपवन की आती है|।

 

सायबान की छाया में ..पालने की गोदी में.......

हरकतों पर मेरी दूर खड़ी माँ खूब  मुस्कुराती है।।

 

चुटकियों से माँ, मेरे चेहरे पर सरगम सजाती है |

डूबकर मेरी किलकारियों में ,हर गम भूल जाती है|।

 

माँ मुझे पालना झुलाती है ,कभी गोदी में हिलाती है…

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Added by anand murthy on October 8, 2014 at 4:30pm — 4 Comments

स्नेह की छाँव (लघुकथा)

" बेटा, तुम जब भी शहर से आते हो तो घर में कम और इस पेंड़ के पास ज्यादे समय बिताते हो, घर में मन नही लगता क्या..."

" चाचा, यहाँ बड़ा सुकून मिलता है! याद है आपको जब मैं नर्सरी में पढता था! एक बार वहाँ पौधशाला वाले पौधे बाँट रहे थें, ये आम का पेंड़ मैं वहीं से लाया था, पिता जी पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर बहुत खुश हुए थें!  इसे उन्होने अपने हाथों से लगाया था और खाद-पानी भी समय-समय से दिया करते थें! इसे वे बहुत प्यार करते थें,  इसीलिए कुछ पल इसकी छाया में बिताना, पिता जी के स्नेह की…

Continue

Added by Pawan Kumar on October 8, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

सच! में..आज बहुत बदसूरत है

बहुत सुंदर है

मीठा है बहुत,

बिलकुल मिश्री की तरह

मिल जाता है, कहीं भी

कभी भी, हर तरफ

खोखलापन लिए, समा जाये इसमें

कोई भी,कितना भी.

सच! ही तो है

असत्य जो है

कितना आसान है

इसे पाना, स्वीकारना

खुश हो लेना

चलायमान तो इतना

कि रुकता ही नहीं

अनेकों राहें, उनमे भी कई राहें

पूर्ण सामयिक ही बन बैठा  है.

और वो देखो !.. सत्य

वहीं खड़ा है, अनंत काल से

न हिलता न…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on October 8, 2014 at 10:02am — 18 Comments

थका-हारा-मेहनतकश आदमी

थका-हारा-मेहनतकश आदमी

थका-हारा-मेहनतकश आदमी कहीं भी सो सकता है

24 घंटे चिल्लाती पौं-पौं पी-पी पू-पू करती

धूल फांकती धुआं चाटती सड़को के फूटपाथों पे भी |

उसके फेफड़े बहुत मज़बूत होते हैं…

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Added by somesh kumar on October 8, 2014 at 12:00am — 7 Comments

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