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ग़ज़ल (कौन है हमदर्द यारा )

२१२२ २१२२

घिर गया है मर्द यारा !

कौन है हमदर्द यारा !!

लोग आते बात करते !

दे गये सरदर्द यारा !!

आज गुस्से में है बीवी !

दे दिया है दर्द यारा !!

यार अब तो बात करना !

मत दिखाना फर्द यारा !! (फर्द -सूची )

वो परेशां है बहुत अब !

उसको देना कर्द यारा !!

मत खड़े हो सब यहाँ पर !

लो गिरी है गर्द यारा !!

लो रजाई साथ में भी !

रात होती सर्द यारा…

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Added by Alok Mittal on January 17, 2015 at 2:00pm — 7 Comments

गजल- जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन

212 212 212 212

एक है जान हम टुकडे दो जानेमन!
कैसे समझाए हम आपको जानेमन!!

हो नहीं सकते तुम दूर मुझसे कभी!
जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन!!

तुम दुआ हो मेरी मेरे अरमान हो!
जिन्दगी बन्दगी तुम ही हो जानेमन!!

देख लूं जो तुझे साँस आ जाती है!
जाएँगे मर अगर तू न हो जानेमन!!

तुमको 'राहुल' पे अब भी यकीं गर नहीं!
चीर कर दिल मेरा देख लो जानेमन!!

मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on January 16, 2015 at 10:26pm — 26 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

2122  2122  2122  212

याद करे दुनिया तुझे ऐसी निशानी छोड़ जा,

जोश भर दे जो सभी में वो जवानी छोड़ जा।

नाम पर तेरे कभी कोई उदासी हो नहीं,

प्यार से भरपूर कुछ यादें सुहानी छोड़ जा।

देश की खातिर लुटाओ जान अपनी शान से,

हर किसी की आँख में दो बूँद पानी छोड़ जा।

हो भरोसा हर किसी को तेरी बातों पर सदा,

देश हित की प्रेरणा दे वो बयानी छोड़ जा।

मौत आतीे है सभी को देख ‘‘मेठानी’’ यहां,

गर्व हो अपनाें को कुछ ऐसी…

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Added by Dayaram Methani on January 16, 2015 at 9:55am — 16 Comments

आसमाँ--

" मिल गया चैन तुमको , हो गयी तसल्ली " , उसके पिता खुद को संभाल नहीं पा रहे थे | " कितनी बार मना किया था कि उसे वहां मत भेजो , अब खो दिया न उसको "| बेटी की असमय मौत ने उनको तोड़ दिया था |

टूट तो मैं भी गयी थी लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को उसकी मर्ज़ी की जगह नौकरी करने की वकालत करके मैंने कौन सा गुनाह कर दिया था | उसकी कही बात जेहन में घूम रही थी " जाना तो एक दिन सब को है माँ , तो क्यों न निडर होके अपने तरीके से जिया जाए | अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "| बेहद मुश्किल था अब लेकिन…

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Added by विनय कुमार on January 16, 2015 at 1:00am — 12 Comments

"सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम्"

अखण्ड आर्यावर्त की, उमंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

बुद्ध-कृष्ण-राम की, पुनीत –भूमि पावनी !

सुहार्द सम्पदा अनन्त, श्ष्यता संवारती !

सतार्थ धर्मं युद्ध में, सशक्त श्याम सारथी !

परार्थ में दधीचि ने, स्वदेह भी बिसार दी !!

 

निनाद कर रही उभंग, बंग वंदे मातरम् !

सुना रही है गंग की, तरंग वंदे मातरम् !!

 

धर्मं-जाति-वेश में, जरूर हम अनेक हैं !

परम्परा अनेक और बोलियाँ अनेक हैं…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 12:30am — 20 Comments

मुक्तक- बेटियाँ

      बेटियाँ    

बेटियों की ज़मीन को सींचो

उग रही पौध को नहीं खींचो

ये हमारे समाज की जड हैं,

इन जडों के शरीर मत भींचो।

मौलिक व अप्रकाशित  

Added by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:12pm — 4 Comments

ग़ज़ल: कोई पत्थर और कोई आईने ले के(भुवन निस्तेज)

कोई पत्थर और कोई आईने ले के

आ रहा हर एक अपने दायरे ले के



यूँ चले हो रात को दीपक बुझे ले के

खुद अँधेरा भी परेशाँ है इसे ले के



बस ठिठुरते रह गए दरवाजे बाहर ख्वाब

ये सुबह आई है कितने रतजगे ले के



जिंदगानी तंग गलियां भी न दे पाई

मौत हाजिर हो गई है हाइवे ले के



आपका आना तो कल ही सुर्ख़ियों में था

आज फिर अख़बार आया हादसे ले के



साकिया यूँ बेरुखी से मार मत हमको

रिन्द जायेगा कहाँ ये प्यास ले ले के



कुछ न कुछ…

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Added by भुवन निस्तेज on January 15, 2015 at 7:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल - "हवा के रुख पे चलती किश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं" ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222      1222      1222

पहन रख पैरहन, उरियानियाँ अच्छी नहीं लगतीं

कि बद को भी, कभी बदनामियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

फसादी हो अगर, तो बोलियाँ अच्छी नहीं लगतीं

वहीं बेवक़्त की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके 

कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं

 

भरम रख़्ख़ें वे मौसम का , कहे कोई उन्हें जा कर

कभी बे वक़्त छाई बदलियाँ, अच्छी नहीं लगतीं 

चला आया है जुगनू…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 5:30pm — 23 Comments

ग़म मौत के .......(एक रचना )

ग़म मौत के ......(.एक रचना )

ग़म  मौत  के  कहाँ  जिन्दगी भर साथ चलते हैं

चराग़  भी  कुछ  देर  ही किसी के लिए जलते हैं



इतने  अपनों  में  कोई  अपना नज़र नहीं आता

अब  तो  रिश्ते  स्वार्थ  की कड़वाहट में पलते हैं



दोस्ती  राहों  की  अब राह में ही दम तोड़ देती है

अब किसी के लिए कहाँ दर्द आंसुओं में ढलते हैं



मिट  जाते  हैं  गीली  रेत पे मुहब्बत भरे निशाँ

फिर  भी  क्यूँ  लोग  गीली रेत पे साथ चलते हैं



सच  को छुपा कर लोग…

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Added by Sushil Sarna on January 15, 2015 at 4:10pm — 10 Comments

कुछ बदला है क्या?

सचमुच,कुछ बदला है क्या?

हाँ ...

बदली हैं सरकारें, लेकर लुभावने वादे,

खाऊँगा न खाने दूंगा,

साफ़ करूंगा, साफ़ रखूंगा,

मेक इन इण्डिया

मेड इन इण्डिया

‘सायनिंग इण्डिया’ का नया…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on January 15, 2015 at 10:39am — 17 Comments

प्‍यार के इक पल



हुई क्‍यों दूर दिल से मैं मिले फुरसत बता देना

बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना



बनी दुल्‍हन चली आई सजन मैं साथ में तेरे

करोगे प्‍यार मुझको तुम यही अरमान थे मेरे

मगर टूटे सभी अरमा जला दिल मैं दिखाऊँ क्‍या

नजर के पास रह कर भी बढी दूरी बताऊँ क्‍या

न आना पास अब मेरे सभी सपने जला देना

बनाना इक कहानी तुम मुझे फिर वो सुना देना

हुई क्‍यों दूर दिल से तुम मिले फुरसत बता देना



मिला है तन तुझे मेरा नहीं क्‍यों मन लिया तुमने

कभी भी प्‍यार के इक…

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Added by Akhand Gahmari on January 15, 2015 at 10:29am — 8 Comments

ग़ज़ल--बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को

बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

..

कोई सोये कहीं भूख़ा ,ज़लाये मुल्क़ भी कोई

इन्हें बस वोट लेने हैं, मज़े  सरक़ार करने को

..

कोई मौजूद था मेरा ,मेरे दुश्मन की महफ़िल में

रची साजि़श उसी ने थी, मुझे गद्दार करने को

..

तुम्हारे इक इशारे पर , मेरी ये ज़ान जानीं है

मग़र ज़िन्दा जो रक़्खा हैं,गुनाह स्वीकार करने को

..

चली आयी तसव्वुर में , तेरी तस्वीर धुँधली सी

मेरी ये जान बाक़ी है ,फ़क़त दीदार…

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Added by umesh katara on January 15, 2015 at 8:58am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुट्ठी भर सैलाब

मेरा जीवन पी  गया, तेरी कैसी प्यास ।

पनघट से पूछे नदी, क्यों तोड़ा विश्वास ।१।

                 

मन में तम सा छा गया, रात करे फिर शोर।

दिनकर जो अपना नहीं, क्या संध्या क्या भोर ।२।…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 14, 2015 at 10:30pm — 33 Comments

पंचायती अल्ट्रासाउंड (लघुकथा)

"सरपंच साहब, रमेश नंबरदार की लड़की ने अपने ही गांव के लड़के के साथ भागकर शादी कर ली है। इससे पूरे गांव की नाक कट गई है। अब कानून भी इन लड़कियों का ही साथ देता है अपनी इज्जत बचाने के लिए इसका समाधान किया जाना जरूरी हो गया है।"
"ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। एक काम करते हैं पंचायती अल्ट्रासाउंड मशीन ले आते हैं।"


मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on January 14, 2015 at 9:33pm — 7 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

212 212 22

ज़िन्दगी अपनी छोटी है

बस जरा सी ये खोटी है

हादसों को बुरा मत कह

यार  मेरा  लंगोटी  है

चाँद कहते महल वाले

झोपड़ी कहती रोटी है

इस सियासत की चौपड़ में

स्वार्थ की फैली गोटी है

झूठ की सत्य की देखो /p>

हो गई बोटी बोटी है

मौलिक व अप्रकाशित

 गुमनाम पिथौरागगढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on January 14, 2015 at 6:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल -८-८-८ दुनिया

दादीसा के भजनों जैसी मीठी दुनिया 

पहले जैसी कहाँ रही अब अच्छी दुनिया 

प्यार मुहब्बत , भाईचारे  ,मानवता की

नहीं समझती बातें सीधी सादी ,दुनिया

दिन सी उजली रातें भी हो  जाये यारों

अँधियारे में रहे भला क्यूं आधी दुनिया

घर से ऑफिस ऑफिस से घर  फिर कुछ ग़ज़लें  

सिमट गई है इतने में ही मेरी दुनिया 

नटखट बच्चे घर की खटपट मेरी बाँहें 

कितनी छोटी सी है यारों उसकी दुनिया 

शहरों में है झूठे दर्पण…

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Added by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 1:26pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत - आपसी ताप से जलती टहनियाँ ( गिरिराज भंडारी )

आपसी ताप से जलती टहनियाँ

************************

आँधियों की छोड़िये

हवा थोड़ी भी तेज़ बहे, स्वाभाविक गति से

टहनियाँ रगड़ खाने लगतीं हैं

एक ही वृक्ष की

आपस में ही

पत्तियाँ और फूल न चाहते हुये भी

कुसमय झड़ जाने के लिये मजबूर हो जाते हैं

 

टहननियों की अपनी समझ है ,

परिभाषायें हैं खुशियों की ,

गमों की

फूल और पत्तियाँ असहाय

जड़ें हैरान हैं , परेशान हैं 

वो जड़ें ,

जिन्होनें सब टहनियों के लिये…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 14, 2015 at 1:16pm — 17 Comments

कुछ माह पहले

 

कुछ माह पहले

 

पैरों में लिपटते थे सांप

कीचड में सनते थे

पैर और वाहन

पसीने से चुभते थे वपुष में कांटे

धुप में झुलसी जाती थी देह

कुछ माह पहले  

 

नभ से बरसता था

थका-थका मेह

पुरवा से ऐठती थी ठाकुर की देह

क्वार की धूप में हांफता था बैल   

कुछ माह पहले

 

हवा में नमी थी

चलता न वात 

पंखा हांकने से सूखता न गात

बरगद के नीचे भी ठंढी…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 14, 2015 at 12:05pm — 13 Comments

एक बूढ़ी माँ अकेली रह गई - लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर '

2122    2122    212

*********************

बस गया है लाल बाहर क्या करे

हो  गया है  खेत  बंजर क्या करे

***

एक बूढ़ी माँ  अकेली  रह  गई

काटने को  दौड़ता घर क्या करे

***

चाँद  लौटेगा  नहीं   अब,  है  पता

रात भर रोकर भी अम्बर क्या करे

***

ठोकरें  खाना  खिलाना भाग्य में

राह  का  टूटा वो पत्थर क्या करे

***

रीत  तो थी, जिंदगी भर साथ की

दे गया धोखा जो सहचर क्या करे

***

हाथ   आयी   करवटों  की  बेबसी

मखमली…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2015 at 11:26am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल- कोई सूरत तो हो कि तुझपे ऐ’तबार आये

2122- 1212- 1212- 22 /112

कोई सूरत तो हो कि तुझपे ऐ’तबार आये

क्या पता दिलफ़रेब बन के ग़मग़ुसार आये

 

मैं तुझे भूलने की कोशिशों में हूँ बेचैन

पर मुझे तेरा ही खयाल बार-बार आये

 

ज़ीस्त गुज़री ख़मोशियों के दरमियान मगर

ये हुआ वक़्ते मर्ग लोग बेशुमार आये

 

दिल नज़ारा ए रंगो गुल को कब से तरसे है

ऐ खुशी काश तू मिसाले नौबहार आये

 

कौन सा दह्र है ये कौन सी जगह है जहाँ

दूर तक बस नज़र गुबार ही गुबार…

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Added by शिज्जु "शकूर" on January 14, 2015 at 9:02am — 33 Comments

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