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All Blog Posts

चेहरे--

" अंकल " , बस यही आवाज़ निकल पायी थी उसके मुँह से |
पहले भी यही आवाज़ निकलती थी , पर वो आवाज़ ख़ुशी की होती थी |
आज वो अपनी सहेली के घर बिना फोन किये आई , और अब अस्पताल में बेसुध पड़ी थी |
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 9, 2015 at 9:02pm — 16 Comments

मदर्स डे (लघुकथा)

"सुनो जी, कल माँ को वृद्धाश्रम से एक दिन की छुट्टी पर ले आना।"
"क्यों, कल ऐसा क्या है?"
"कल मदर्स डे है।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on May 9, 2015 at 8:29pm — 16 Comments

इंसानियत का रिश्ता

लड़का रोज शाम को कानो में लीड लगाकर सड़क के बीचो बीच बने पार्क में वाकिंग करने पहुंच जाता.! और वो बुजुर्ग दम्पति भी रोज शाम को पार्क के बीचो बीच बने बेन्च पे बैठकर घंटो खेलते हुए बच्चो को एक टक निहारते.! कभी -कभी प्यार से बच्चो को पुचकार भी देते तो कभी थपकियाँ देने के बहाने सहला भर लेते.! ऐसा करके उन्हें एक अलग सा सुकून मिलता था ! लड़का भी पार्क के एक कोने में बैठकर हर पल उन बूढी आँखों में एक ख़ुशी की चमक देख खुश भर हो जाता..! हर रोज वो लड़का सोचता आज मै इनसे बात करुगा, पर किस बारे में उनसे मेरा…

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Added by Jitendra Upadhyay on May 9, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

अपेक्षा का दीप

अपेक्षा का दीप

मैंने अपनी अपेक्षा का दीप जलाया घर में

बुझे दीप न तेज हवा से सुरक्षा बाढ़ लगाया।

लक्ष्य को छूने का दृढ़ संकल्प लिया मन में

त्याग और बलिदान से प्रेरित मंत्र अपनाया ।

छल,कपट,ईर्ष्या कभी टिके नहीं अंतस्थल में

नैतिक मूल्यों के संस्कार का आवृत्त बनाया ।

मैंने अपनी अपेक्षा का दीप जलाया घर में

दया धर्म सद्भाव बढ़े आज सभी के जीवन में

अपेक्षा की आस लिए मैंने एक दीप जलाया।

स्नेह का तेल भरा ज्योति ज्ञान की जीवन में

मन में धीरज…

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Added by Ram Ashery on May 9, 2015 at 9:56am — 4 Comments

ग़ज़ल -उमेश कटारा

2122  2122 2122

--------------------------------------------

मर्ज बढ़ता जा रहा अब क्या रखा है

बेअसर होती दवा अब क्या रखा है



ढ़ूँढ ले अब हम सफर कोई नया तू 

मुस्करादे कब कज़ा अब क्या रखा है



रच रहे हम साजिशें इक दूसरे को 

साथ चलने में बता अब क्या रखा है



साथ आना जाना भी क्यों महफिलों में 

बन्द कर ये सिलसिला अब क्या रखा है



शहर पूरा है, मगर आया नहीं तू

बिन मिले ही मैं चला अब क्या रखा है



उमेश कटारा

मौलिक व…

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Added by umesh katara on May 9, 2015 at 9:52am — 13 Comments

बातों में आ जाता हूँ (गजल)

जब बातों में आ जाता हूँ।

तब मैं धोखा खा जाता हूँ,

तू नैनों में बसती हरदम,

तेरी पलकें छा जाता हूँ।

मेरी जां तू कह देती है,

तुझपे जां लु'टा जाता हूँ।

बज़मे-बेदिल से मैं भी तो,

देखो अब रुठा जाता हूँ।

तुझको सहरा फरमाते लेे

फिर मैं अब बु'झा जाता हूँ।

दीया जलने दे जानेमन,

शब तेरी अब उ'ड़ा जाता हूँ।

जल-जल कर जलता दीया हूँ,

तम पी हर दिश छा जाता हूँ।…

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Added by Manan Kumar singh on May 8, 2015 at 11:00pm — 10 Comments

अपेक्षाएं....

दृढ़ता में

भूखे श्रमिकों के श्रम रखते

विकास की नींव

सफलता के केतु आकाश को ढक देते

धरा से गगन को चूमती अट्टालिकाएं उकेरतीं,

झुग्गियों का दर्द

आलसी, धुंध चढ़ जाता ऊपरी मंजिल तक

धूल में लिपटे श्रमिक झाड़ देते

लोभ, इच्छा और आवश्यकताएं भी

श्रम, अटल सत्य-

तनिक भी अपेक्षा नहीं रखती।

टेढ़ी-मेढ़ी सकरी पगड-िण्डयां

स्वयं राजपथ होने का दंभ भरतीं

हुंकारती, अहं के आकार-प्रकार

बहुआयामी अपेक्षाएं- लक्ष्य से कोसों आगे,

दूर की सोच सदैव…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 8, 2015 at 9:25pm — 11 Comments

अर्जी (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘जी अब तो पेन्शन की अर्जी पास हो जाएगी ना ?’

अपने कपड़ों को ठीक करते हुए कमरे से बाहर निकलती हुई शहीद फौजी की विधवा ने मंत्री जी के पी.ए. से पूछा
‘अब तो काम हुआ ही समझो ! बस यह अर्जी कल एक बार डाॅयरेक्टर साहिब के पास भी ले जानी होगी'।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 8, 2015 at 11:00am — 19 Comments

मेरा अस्तित्व कहाँ है // रवि प्रकाश

एक समन्दर भी है अन्दर

थोड़ा उथला,थोड़ा गहरा

और लहर पे लहर चढ़ी है

पहले भी मालूम था लेकिन-

जब से तेरा नाम लिखा है

धाराएँ कुछ और हो गईं

सभी किनारे छूट गए हैं।

कब सूरज ने दम तोड़ा था

तड़प-तड़प के हिमशिखरों पर

टूटे तारे कौन गली में

आस जगा कर रहे बिखरते

प्रोषितपतिका रात बनी कब

दरके थे तटबंध हृदय के

कब मैंने आलाप किया था

वेदमंत्र सा राग तुम्हारा

कब उतरा मेरे अधरों पे

कुछ भी तो अब याद नहीं है।

वो छोटा सा एक अकेला

पल,जब… Continue

Added by Ravi Prakash on May 8, 2015 at 7:01am — 14 Comments

माहौल

माहौल"

गुप्ता जी की बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया। ये खबर आग की तरह पूरे आस पड़ोस मे फैल गयी। गुप्ता जी के नाम और प्रतिष्ठा से जलने वालो को तो मानो मौका मिल गया था। कई रोज़ तक ये खबर लोगो के मनोरंजन का विषय बनी रही, पर इन सबके बावजूद गुप्ता जी के चेहरे पर शिकन तक ना थी उनके चेहरे मे पहले सी मुस्कान देखकर पडोसियों की ख़ुशी खिसियाहट मे बदल गयी थी।

ये खबर जानकर गांव से आए उनके पिता ने बड़ी नाराजगी में अपने बेटे-बहु को ड़ांटते हुए कहा- यह जो हुआ इसका जिम्मेदार तुम्हारे घर का माहौल है जो… Continue

Added by Priya mishra on May 7, 2015 at 10:06pm — 7 Comments

बाँझ माँ

उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी लोग उसे बाँझ कहते थे ! उसने (बाँझ) दरवाजे में कुण्डी लगाया ही था, की तभी किसी बच्चे की रोने की आवाज सुन वो वही ठिठक भर गयी ! दरवाजे की कुण्डी खोल हाथ में लालटेन लिए वो आवाज के दिशा में चल पड़ी ! थोड़ी दूर पहुंची ही थी की अचानक सामने का दृश्य देख चौक पड़ी, छोटे से कपडे में लिपटा वो बच्चा भूख से बुरी तरह बिलबिला रहा था ! उसने बच्चे को उठा कर सीने से लगा लिया,बच्चा ममतामयी स्पर्श पा शांत होकर सो गया ! सुबह लोगो ने उसके झोपडी से बच्चे की आवाज सुनी सुनकर सब चौक गए ! सच से…

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Added by Jitendra Upadhyay on May 7, 2015 at 4:58pm — 9 Comments

एक पर्वत की व्यथा - कविता

गर्व से सर उठाये

पर्वत की शिखरोँ को

सूर्य की किरण, सर्वप्रथम

व अंतिम किरण, अंत तक

निज दिन चूमती है

परंतु चकित हूँ

यह फिर भी हरित नहीँ होती

हरित होती हैँ घाटियाँ

जीवन वहीँ विचरता है

किँचित यह ओट देने का श्राप है

अथवा दमन का प्रतिशोध

कि जल की एक बूँद नहीँ ठहरती यहाँ

जल स्त्रोत इसी गोद मेँ जन्म ले

पलायन कर जाते हैँ

हवा की सनसनाहट

बादलोँ की गडगडाहट

के अतिरिक्त कोई स्वर नहीँ…

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Added by Mohinder Kumar on May 7, 2015 at 3:45pm — 3 Comments

ज़रा सा

वो तेरे इश्क़ में दरिया होना
सिमटकर आज ज़रा सा होना

होश में आके हमने जाना है
कितना मुश्किल था तमाशा होना

तुमको देखा वो सब याद आया
क्या न हो पाना और क्या होना

गलतियां तुममे ढूंढ़ ली मालिक
हमसे हो पाया ना इन्सां होना

गुनाह इस ग़ज़ल का उतरना है
या फिर इसमें ना तेरा होना

तहज़ीब हमसे कोई निभ न सकी
ज़िन्दगी या के काफ़िया होना

मौलिक और अप्रकाशित

Added by मनोज अहसास on May 7, 2015 at 3:36pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  /112

चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या

या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या

 

वहाँ पे गाँव था मेरा जहाँ दुकानें हैं  

किसी से पूछता हूँ , देख लूँ टहल के क्या

 

असर बनावटी टिकता कहाँ था देरी तक

वही पलों में तुम्हें रख दिया बदल के क्या

 

हरेक हाथ में पत्थर छुपा हुआ देखा

ये गाँव फिर से रहेगा कभी दहल के क्या

 

मेरा ये घर सही मिट्टी, मगर ये मेरा है

मुझे न पूछ थे…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 9:16am — 31 Comments

रेल की पटरी जैसे चलती ,साथ चले हैं हम दोनों

पग पग तेरा मान करूँ 
अपमान मेरा मत कर तू भी
एक दिन तो सबको मरना है
अभिमान जरा मत कर तू भी
जीवन की आँख मिचौली में
ठहरूँ पल भर मैं पलक तले 
क्या है भरोसा कल सुबह तक 
कौन बचे और कौन जले
कौन मिलेगा बीच सफर में
साथ मेरे ही चलता जा
आयू भी आधी निकल गयी 
हाथ मले तो मलता जा
इक दूजे को देते रहें है
जाने क्यों हम गम दोनों
रेल की पटरी जैसे चलती
साथ चले हैं हम दोनों

उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित




Added by umesh katara on May 7, 2015 at 7:20am — 8 Comments

दीमक ( लघुकथा )

" ये देखिये , सोनू का परीक्षा परिणाम ।बहुत ही निराशाजनक है ।"
" मैडम क्या आप 'ट्यूशन' लेती हैं ?"
" ट्यूशन का बच्चे के प्रदर्शन से क्या सम्बन्ध ? "
" है क्यों नहीं । पुराने विद्यालय में सोनू सदा अव्वल आता था क्योंकि वहीं के मास्टर जी से 'ट्यूशन' लेता था ।"
" ओह्ह्ह ! यानि बच्चे की बुनियाद में ही दीमक लगी है।"
=======================
मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on May 6, 2015 at 8:00pm — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
एक तरही ग़ज़ल // --सौरभ

मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये

कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये



खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  

फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये



ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’

उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी…

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Added by Saurabh Pandey on May 6, 2015 at 6:30pm — 40 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है-शिज्जु शकूर

2122 2122 2122

शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है

रौशनी से बेख़बर डूबा हुआ है

 

अपने होने का उसे अहसास तो हो

क्यों ग़मों में इस कदर डूबा हुआ है

 

क्या अँधेरा मेरी नज़रों में है मौजूद

या अँधेरे में ये घर डूबा हुआ है

 

रौशनी के सिर्फ इक ज़र्रे के दम पर

ठण्ड से वो बेअसर डूबा हुआ है           

 

इस जुनूने इश्क़ का होगा समर* क्या           *नतीजा

सोच में कोई इधर डूबा हुआ है

 

फिर गुजश्ता…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 6, 2015 at 5:00pm — 18 Comments

कविता : प्रेम

(१)

 

तुम्हारा शरीर

रेशमी ऊन से बुना हुआ

सबसे मुलायम स्वेटर है

 

मेरा प्यार उस सिरे की तलाश है

जिसे पकड़कर खींचने पर

तुम्हारा शरीर धीरे धीरे अस्तित्वहीन हो जाएगा

और मिल सकेंगे हमारे प्राण

 

(२)

 

तुम्हारे होंठ

ओलों की तरह गिरते हैं मेरे बदन पर

जहाँ जहाँ छूते हैं

ठंडक और दर्द का अहसास एक साथ होता है

 

फिर तुम्हारे प्यार की…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 6, 2015 at 4:00pm — 10 Comments

एक सादा ग़ज़ल-नूर

२१२२/ २१२२/ २१२२/ २१२ 

.दिल में गर तूफां उठे तो मुस्कुराना है कठिन

याद करना है सरल पर भूल जाना है कठिन. 

.

यादों के झौंके पे झूले झूलना कुछ और है,

यादों के अंधड़ को लेकिन रोक पाना है कठिन.

.

हिचकियाँ आई यूँ ही होंगी तुझे नादान दिल!

भूलने वालों को तेरी याद आना है कठिन.

.

आड़ दो हाथों की पाकर सर उठा लेती है लौ,

हाँ खुली छत पर दीये का जगमगाना है कठिन.

.

कैसे कैसे लोग अब बसने लगे हैं शह्र में

अब लगे है यां भी अपना…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 4:00pm — 22 Comments

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