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ग़ज़ल (पास है वह कहाँ दूर है )

ग़ज़ल (पास है वह कहाँ दूर है )

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212 -------212 --------212

जो तसव्वुर में मामूर है |

पास है वह कहाँ दूर  है |

आइने पर न तुहमत रखो

वह तो पहले से मग़रूर है |

मुस्करा उनके हर ज़ुल्म पर

यह ही उल्फ़त का दस्तूर है |

उनके दीदार का है असर

मेरे रुख पे न यूँ नूर है |

बे वफ़ाई है वह हुस्न की

जो ज़माने में मशहूर है |

छोड़ जाये गली किस…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 1, 2016 at 9:04pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मार डालेगा तेरा गैर जबाबी होना (ग़ज़ल 'राज')

2122  1122   1122   22

शाम को झील के रुख़सार गुलाबी होना

 मिलके खुर्शीद से जज्बात रूहानी होना

 

उन्स की  मय से लबालब है ग़ज़ल का सागर

, डूबकर उसमे सुखनवर का शराबी होना 

 

बिन कहे छोड़ के जाना यूँ अकेले लिल्लाह

मार डालेगा तेरा गैर जबाबी होना

 

पाक उल्फत या मुहब्बत या इबादत समझो

कृष्ण की चाह में मीरा का दिवानी होना

 

वो मुहब्बत है कहाँ आज वो दिलदार कहाँ

चुन के दीवार में चुपचाप कहानी होना…

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Added by rajesh kumari on March 1, 2016 at 8:40pm — 26 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ऐसे हालात का इल्ज़ाम मुझे मत देना। (ग़ज़ल)....डॉ. प्राची

2122.1122.1122.22



तुम सजा सा कोई ईनाम मुझे मत देना।

प्यार का रुसवा सा अंजाम मुझे मत देना।



तुम पुकारो भी नहीं, और न कभी मैं आऊँ

ऐसे हालात का इल्ज़ाम मुझे मत देना।



अपना साया ही डराए मुझे तन्हाई में

इतनी सूनी भी कोई शाम मुझे मत देना।



तुम अगर ज़ह्र भी दो, हँस के उसे पी लूँ, पर

बेवफाई का गम-ए-जाम मुझे मत देना।



तेरी साँसों से जुड़ी हैं मेरी साँसे हमदम

रुखसती का कभी पैगाम मुझे मत देना।



मेरी पहचान बना दी है तमाशा… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 1, 2016 at 6:02pm — 7 Comments

वक्त आ रहा दुःस्वप्नों के सच होने का (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२

वक्त आ रहा दुःस्वप्नों के सच होने का

जागो साथी समय नहीं है ये सोने का

 

बेहद मेहनतकश है पूँजी का सेवक अब

जागो वरना वक्त न पाओगे रोने का

 

मज़लूमों की ख़ातिर लड़े न सत्ता से यदि

अर्थ क्या रहा हम सब के इंसाँ होने का

 

अपने पापों का प्रायश्चित करते हम सब

ठेका अगर न देते गंगा को धोने का

 

‘सज्जन’ की मत मानो पढ़ लो भगत सिंह को

वक्त आ गया फिर से बंदूकें बोने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 1, 2016 at 6:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल : नाम को गर बेच कर

2122   2122    2122    212

नाम को गर बेच कर व्यापार होना चाहिए

दोस्तों फिर तो हमें अखबार होना चाहिए



आपके भी नाम से अच्छी ग़ज़ल छप जायेगी

सरपरस्ती में बड़ा सालार होना चाहिए



सोचता हूँ मैं अदब का एक सफ़हा खोलकर

रोज़ ही यारो यही इतवार होना चाहिए



क्या कहेंगे शह्र के पाठक हमारे नाम पर

छोड़िये, बस सर्कुलेशन पार होना चाहिए



हम निकट के दूसरे से हर तरह से भिन्न हैं

आंकड़ो का क्या यही मेयार होना चाहिए



नो निगेटिव न्यूज का मुद्दा…

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Added by Ravi Shukla on March 1, 2016 at 5:44pm — 12 Comments

अपशकुनी (लघुकथा)

आज शर्मा जी के घर में बहुत हलचल थी, कई रिश्तेदार भी मिलने आये हुए थे| शर्मा जी रिटायर होने के बाद, अपनी पत्नी के साथ छह महीने की तीर्थयात्रा पर जा रहे थे| उनके दोनों बेटे और बहुएँ भी बहुत खुश थे| बेटे इसलिए कि अपनी कमाई से अपने माता-पिता को तीर्थ करवा रहे हैं और बहुएँ इसलिए कि अगले छह महीने वो घर की रानियाँ बन कर रहेंगी|

 

पूजा-पाठ कर प्रसाद हाथ में लिए दोनों पति-पत्नी ने जैसे ही घर के बाहर कदम रखा, बाहर खड़ी एक बिल्ली उनका रास्ता काट गयी| एक बेटे ने उस बिल्ली को हाथ से भगाते…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 1, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

धारा-387 :लघुकथा: हरि प्रकाश दुबे

“अंकल, जरा अपना मोबाइल फ़ोन दे दीजिये I"

“पर क्यों बेटा, तुम्हारे फ़ोन को क्या हुआ?”

“घर पर पिताजी बीमार हैं, माँ से बात कर रहा था, तभी फ़ोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गयी, और देखिये ना यहाँ पर कोई चार्जिंग की जगह भी नहीं है, प्लीज अंकल, ज्यादा बात नहीं करूंगा, चाहे तो पैसे .. I"

“अरे नहीं, पैसे की कोई बात नहीं है बेटा, ये लो आराम से बात करो I"इतना कहते हुए शर्मा जी ने अपना फ़ोन उस नौजवान को दे दिया, और कुछ ही देर बाद वह लड़का वापस आया और बोला, “आपका…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 1, 2016 at 4:30pm — 7 Comments

महज इक हार से जीवन नहीं बुनियाद खो देता -ग़ज़ल

1222    1222    1222    1222

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न कोई दिन बुरा गुजरे  न कोई रात भारी हो

जुबाँ को  खोलना  ऐसे न कोई बात भारी हो /1



दिखा सुंदर तो करता है हमारा गाँव भी लेकिन

बहुत कच्ची हैं दीवारें  न अब बरसात भारी हो /2



न तो धर्मों का हमला हो  न ही पंथों से हो खतरा

न इस जम्हूरियत पर अब किसी की जात भारी हो /3



पढ़ा विज्ञान  है  सबने  करो  तरकीब  कुछ ऐसी

न तो  हो तेरह का खतरा न साढ़े  सात भारी हो /4



महज इक हार से जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 1, 2016 at 11:29am — 12 Comments

हिफ़ाज़त (लघु कथा )

दिन ढलने का वक़्त क़रीब आरहा था कि अचानक रास्ते पर सामने से कारवां की तरफ कोई आदमी भागता हुआ नज़र आया | वह हांफता हुआ पास आकर बोला ,आगे ख़तरा है मेरा क़ाफ़ला लुट  चूका है | सालारे कारवां ने बिना सोचे समझे उसकी बातों पर यक़ीन करके वहीँ पर क़याम करने का हुक्म देदिया ,हामिद ने लाख कहा इस पर यक़ीन मत करो , मुझे इसकी आँखों में फ़रेब नज़र आरहा है | ...... मगर सब बेकार गया | रात को जब क़ाफ़ले वाले बेख़बर सो रहे थे ,हामिद की आँखों से नींद गायब थी | ...... यकबयक उसे घोड़ों के टापों की आवाज़ सुनाई दी…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 1, 2016 at 7:30am — 12 Comments

आहत करने से पहले कितना आहत होना पड़ता है

एक आस थी बावरी
बहुत दिन धकिया गयी 
उदास होने ही नहीं दिया  मन
आखिर आज
जब पहुंच ही गए हो
ले के अपने तंज ,दंश
तो आस का क्या
मन का तो बिलकुल ही क्या
मजाल कि बिन झुलसे रह जाए
कोई चूं भी कर जाए
आप तो  बस आप हैं 
सब आप की सौगात है
बहुत बधाई…
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Added by amita tiwari on March 1, 2016 at 1:30am — 2 Comments

कलयुग के साथी

हॉल में बेचैनी से चहलकदमी करता हुआ दिनेश पत्नी के पास आकर बैठ जाता है। "बरखा तुम्हें पता ही है, मैं और विक्रम कितने गहरे मित्र हैं। तुम भी तो हमारी सहपाठी थी"। कहते हुए दिनेश ने पत्नी की ओर सहमति की आस से देखा। "हाँजी पता है, और मुझे आपके विश्वास पर पूर्ण विश्वास भी"। कहते हुए बरखा ने पति की ओर देखा।

"विक्रम भाई साहब तुम्हारे एहसानों का बदला चुकाते हुए इस जनहित प्रनेजेक्ट के साथ अवश्य न्याय करेंगे" ।

दिनेश ने बड़े ही आत्मविश्वास से बरखा के हाथ पे थपकी दी और उठ खड़ा हुआ। "कहाँ जाते…

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Added by shikha tiwari on February 29, 2016 at 9:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल-आश फिर भी न बाज आती है।

२१२२ १२१२ २२

वक्त बेवक्त याद आती है।
बेहया रात दिन रुलाती है।

तेरे खत से महक चुराता हूँ।
तब कहीं एक साँस आती है।

रोज किस्मत मेरी मुहब्बत में।
दर पे आ आ के लौट जाती है।

साफ कह बेवफा सनम तू अब।
मेरी गुरबत से हिचकिचाती है।

जिन्दगी कोसती रही दिल को।
आश फिर भी न बाज आती है।

दिल के हर इक गली मुहल्ले में।
रात भर हिज्र खूं बहाती है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on February 29, 2016 at 1:16pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बरसों बाद भी देखो- शिज्जु शकूर

212 1222 212

बरसों बाद भी देखो, इक जगह पड़े हो तुम

संग की तरह बेहिस, सख़्त हो गये हो तुम



जन्म तो लिया था पर, गाह जी नहीं पाये

अपनी लाश का कब से, बोझ ढो रहे हो तुम



ऐसे छटपटाओ मत, और डूब जाओगे

दलदली जगह है ये जिस जगह खड़े हो तुम



बेकराँ समंदर है, और लहरें तूफ़ानी

थोड़ी देर ठहरो तो, ज़िद पे क्यों अड़े हो तुम



हर बयान पर मेरा, इख़्तिलाफ़ करते हो

दिल में अपने क्या-क्या भ्रम, पाल के रखे हो तुम



शहर की हवाओं के, हर… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on February 29, 2016 at 8:00am — 4 Comments

प्रश्न लियें हैं एक (दोहा-गीत)

मातृभूमि के पूत सब, प्रश्न लियें हैं एक ।

देश प्रेम क्यों क्षीण है, बात नही यह नेक ।।

नंगा दंगा क्यों करे, किसका इसमें हाथ ।

किसको क्या है फायदा, जो देतें हैं साथ ।।

किसे मनाने लोग ये, किये रक्त अभिषेक । मातृभूमि के पूत सब

आतंकी करतूत को, मिलते ना क्यों दण्ड ।

नेता नेता ही यहां, बटे हुये क्यों खण्ड़ ।।

न्याय न्याय ना लगे, बात रहे सब सेक । मातृभूमि के पूत सब

गाली देना देश को, नही राज अपराध ।

कैसे कोई कह गया, लेकर मन की…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 29, 2016 at 7:30am — 4 Comments

मन तू भला बात कब मानता है- ग़ज़ल ( सुझाव अवश्य दें)

2212 2122 122 2212 2122 122



बोला तो था प्यार करना नहीं पर, मन तू बता, बात काहें न मानी।

इस राह में मुश्किलें हैं बहुत सी, बोला तो था, बात काहें न मानी।।



समझाया था है अगन पथ मुहब्बत, जलने से आगाह तुमको किया था।

छालों की सौगात लेकर तड़प अब, तेरी ख़ता, बात काहें न मानी।



तूफ़ाँ वहीँ अपने भीतर में ही रख, गर्जन ये दिल की तू खुद में चुरा ले।

नैनों से नदिया बहाना मना है, अब सह सज़ा, बात काहें न मानी।।



खामोशियों की चदरिया में अब तो, बांधों समेटो हाँ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 29, 2016 at 12:30am — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
उड़ रही हो तो ज़रा पंख क़तर जाती हूँ (एक ग़ज़ल)....//डॉ. प्राची

2122.1122.1122.22



मेरी हस्ती ही मिटा दे! यूँ अखर जाती हूँ।

उसकी नफरत का ज़हर देख सिहर जाती हूँ।



कश्ती कागज़ की हूँ पतवार कहाँ हासिल है,

बह चले धार जिधर संग उधर जाती हूँ।



आ! बिछा दे, मेरी राहों में ज़रा अंगारे

जितना जलती हूँ मैं उतना ही निखर जाती हूँ।



ज़िन्दगी देख मुझे खुश, यूँ पलट कर बोली-

"उड़ रही हो तो ज़रा पंख क़तर जाती हूँ !"



बुतशुदा काँच हूँ पत्थर के शहर में साकी,

जोड़ लो कितना भी, हर बार बिखर जाती हूँ।



आस… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 28, 2016 at 12:30pm — 7 Comments

डॉक्टर सड्डन (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मुश्किल से माँ-बाप सालों बाद अपने बेटों से मिलने मुंबई पहुंचे थे। एक के बाद एक पांचों मुंबई में बस गए थे और उनमें से एक खो दिया था। डर लग रहा था कि कहीं ग़लत धंधों में तो नहीं पड़ गये फ़िल्मी दुनिया में दाख़िला पाने के मोह में। दो दिन ही हुये थे माहिम में बड़े बेटे के घर में रुके हुए । बेटे की वास्तविक माली हालत उसकी सेहत और घर देख कर कुछ समझ में नहीं आ रही थी। एक दिन चावल न खाने की बात पर बेटा बाप पर बरस पड़ा।

 "अबे, बुढ़ऊ जो मिल रहा है चुपचाप खा ले, मेरी बीवी के पास इत्ता टाइम नहीं है…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 28, 2016 at 12:00pm — 6 Comments

लिटिल चैम्पियन ( लघुकथा )

"महज़ सात वर्ष की उम्र में "सिल्वर स्क्रीन लिटिल चैम्पियन" जीतने वाला तुम्हारे डांसर बेटे का ,ये क्या हाल हो गया रेखा ?"

 " उस लिटिल चैम्पियनशिप ने ही तो उसको बरबाद किया है " उसने अपने आँखों में उतरे समंदर को संभालते हुए कहा ।

 " ये क्या कह रही हो तुम ! "

 "हाँ ,सच कह रही हूँ , उस चैम्पियनशिप जीतने के बाद नाचने में ही वह लगा रहा , पढ़ाई छूट गयी उसकी , और तुम तो जानती हो कि फिल्मी दुनिया के भाई -भतीजेवाद में कहाँ मिलता है बाहर वालों को स्थान ? "

 " वह स्टेज परफॉर्मर तो बन…

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Added by kanta roy on February 28, 2016 at 11:00am — 6 Comments

अधकढ़ा गुलाब (कहानी)

अधकढ़ा गुलाब

“अरे, आप अँधेरे में क्या कर रही हो? कौन सा खजाना खोल कर बैठी हो, मम्मा, जो हमारी आवाज़ तक नहीं सुन पा रही हो?”

शैली की आवाज़ से विचारों मे डूबी मृदुला वर्तमान में वापस आई.

“नहीं बेटा कुछ नहीं,” कह सामान समेटना चाह ही रही थी, कि दूसरी बेटी शिल्पी भी आ खड़ी हुई.

“प्लीज़ मम्मा, आज तो दिखा ही दो क्या है इस बैग में जो आप हमेशा अकेले में खोलती हो और किसी दूसरी दुनिया मे चली जाती हो!”

“क्या है? ऐसा कुछ भी तो नहीं. बस कुछ पुराने कपड़े और कागज़ वगैरहा हैं. चलो छोड़ो! तुम… Continue

Added by Seema Singh on February 28, 2016 at 8:06am — 8 Comments

नयी क़बा ....

नयी क़बा ....

कितनी अजब होती है

वो प्रथम अभिसार की रात

पुष्पों से सेज सुरभित रहती है

पलकों में उनींदे ख्वाब रहते हैं

एक जिस्म

दो कबाओं में सिमटा

किसी अनजाने पल के इंतज़ार में

ख़ौफ़ज़दा होता है

न चाह कर भी

अपने हाथों से

कुवांरे ख़्वाबों की क़बा का

कत्ल करना पड़ता है

मुहब्बत के

रेशमी  अहसासों का नया पैराहन

खामोश वज़ूद को

एक नया नाम दे देता है

कुवारी क़बा

इक चुटकी भर सिन्दूर में लिपट…

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Added by Sushil Sarna on February 27, 2016 at 8:00pm — No Comments

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