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मंज़र बदल जाएगा

जॉन एफ केनेडी

ने कहा

कि यह मत पूछो

कि देश ने तुम्हारे

लिए क्या किया,

यह पूछो कि

तुमने देश के

लिए क्या किया?

इन शब्दों ने मेरे

जीने का अन्दाज़

ही बदल दिया है



मैं शिक्षक हूँ

क्या मैंने छात्रों

का मनोबल

बढ़ा लिया है

पूछूँ मैं

ख़ुद से अब

क्या

तनख़्वाह लेके

सही किया है ?

मैं बेचता हूँ

दूध पानी मिला

मिला के क्या

गाय का नाम

मैंने ही

मिटा रखा है ?

मैने बनके… Continue

Added by S.S Dipu on September 26, 2016 at 11:46pm — 1 Comment

ग़ज़ल

काफिया : कर चल दिए  रदीफ़: आ

बहर : २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

थी जान जब तक वो लडे  फिर जाँ लुटा कर चल दिये

इस देश की खातिर वे खुद को भी मिटा  कर चल दिये|

लड़ते गए सब वीरता से टैंकरों  के सामने

झुकने दिया  ना देश को खुद शिर कटा कर चले दिए |

परिवार को कर देश पर  कुर्बान खुद लड़ने गए

वो वीर थे  जो देश की इज्जत बचा कर चल दिये |

एकेक ने मारा कई को फिर शहीदों से मिले

अंतिम घडी  तक फर्ज अपना सब निभा कर चल दिए…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on September 26, 2016 at 10:34pm — No Comments

ग़ज़ल को ढूँढने, चलिए चलें खेतों में गाँवों में (ग़ज़ल)

1222   1222   1222   1222

न जाने धूल कब से झोंकता था मेरी आँखों में!

जो इक दुश्मन छुपा बैठा था मेरे ख़ैरख़्वाहों में!

भटकते फिरते थे गुमनाम होकर जो उजालों में!

हुनर उन जुगनुओं का काम आया है अंधेरों में!

फ़क़त इक वह्म था,धोखा था बस मेरी निगाहों का,

अलग जो दिख रहा था एक चेहरा सारे चेहरों में!

हक़ीक़त के बगूलों से हुए हैं ग़मज़दा सारे,

हुआ माहौल दहशत का,तसव्वुर के घरौंदों में!

ख़ता इतनी सी थी हमने गुनाह-ए-इश्क़…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 26, 2016 at 5:19pm — 9 Comments

बिगडती बात ( गजल )

१२२२    /    १२२२   /  १२२२   /   १२२२ 

.

जमी जो बर्फ रिश्तों पे  पिघल जाये तो अच्छा है 

बिगड़ती बात बातों से सँभल जाये तो अच्छा है 

 

हमारी याद जब आये शहद यादों में घुल जाये

छिपी जो दिल में कडवाहट निकल जाये तो अच्छा है  

 

तमन्ना  चाँद पाने की बुरी होती नही लेकिन

जमीं से देखकर ही दिल बहल जाये तो अच्छा है

 

मुकद्दर में मुहब्बत के लिखी हैं ठोकरें ही जब 

गमों से पेशतर ये दिल सँभल जाये तो अच्छा…

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Added by Sachin Dev on September 26, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल

बह्र 1222 1222 1222 1222





तेरी बस याद आने से सभी दुःख-दर्द टलतेे हैं।

तेरे ही नाम पे जीवन युँही हम काट चलते हैं।



गमों का दौर है आया नहीं सुख अब दिखाई दे

इसी में डूब कर अबतो सभी दिन-रात ढलते हैं।



यहाँ जो भी मुकम्मल है हिफाज़त को जमाने की

उसी के जह्न में देखो गलत अरमान पलते हैं।



कभी सोचा नहीं जिसने हो जाए अम्न ही कायम

लिए उम्मीद फिर ऐसी उसी के पास चलते हैं।



अदाकारी में जो माहिर समझ में वे नहीं आते

कभी तोला कभी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 26, 2016 at 1:00pm — 19 Comments

करबटें बदलता हूँ

करबटें बदलता हूँ रात भर मैं गलता हूँ

जख्म दिए औरों ने पर मैं खुद ही सिलता हूँ

 

मुँह मोड़ लिया हो अपनों ने तोड़ दिया हो सपनों ने

हर बार मगर हँसकर सबसे अक्सर मैं मिलता हूँ

 

जिन गलियों में बस शूल मिले यादों की बस कुछ धूल मिले

कभी रहे काशी काबा में हर रोज मैं पैदल चलता हूँ

 

वक्त के इस दौर में निकला मैं जिस भी ओर में

सदा बचा मैं शोलों से पर पानी से मैं जलता हूँ

 

सुबह भी देखी थी निराली पल भर में जो हुई थी…

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Added by anupam choubey on September 26, 2016 at 1:00pm — 5 Comments

अब नहीं मेरे गांव में(छंदमुक्त चतुष्पदी कविता)

वो बगिया पनघट शीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

बुढ़ा बरगद झूमता पीपल-अब नहीं मेरे गाँव में।

परोसा करते थें तृप्त भोजन पानी जो आतिथ्य में,

वो बर्तन कांसे और पीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

-----

भाभी पानी छिट जगाती-अब नहीं मेरे गाँव में

लचका लोरी सोहर गाती-अब नहीं मेरे गाँव में

चाची भाभी बहना को पिछड़ा ये सब लगता है

हँसुली विछुआ झांझ भाती-अब नहीं मेरे गाँव में

-------

फाग चैत की राग गूंजता-अब नहीं मेरे गाँव में

बैल अकड़ ट्रैक्टर से जूझता-अब नहीं मेरे… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on September 26, 2016 at 9:21am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है ( गिरिराज भंडारी )



1222    1222    1222    1222 

मुख़ालिफ इन हवाओं में ठहरना जब ज़रूरी है

चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है

 

रुला देना, रुलाकर फिर हँसाने की जुगत करना

सियासत है , सियासत में यही करतब ज़रूरी है

 

उन्हें चाकू, छुरी, बारूद, बम, पत्थर ही दें यारो  

तुम्हें किसने कहा बे इल्म को मक़तब ज़रूरी है

 

तगाफुल भी ,वफा भी और थोड़ी बेवफाई भी

फसाना है मुहब्बत का, तो इसमें सब ज़रूरी है

 

पतंगे आसमाँनी हों या रिश्ते…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 26, 2016 at 8:30am — 24 Comments

गजल (फूलों की बात)

2122 2122 2122 2



फूल हैं खिलते निगाहें चार करते हैं,

बागवाँ पर हम बड़ा एतबार करते हैं।1



बाँटते खुशबू जमाने से रहे सब हम,

झेलते झंझा कहाँ तकरार करते हैं?2



हम बटोही प्यार के दो बोल के भूखे ,

खुशनुमा बस आपका संसार करते हैं।3



हैं विहँसते हम सदा बगिया सजाने को,

प्यास आँखों की बुझा आभार करते हैं।4



हो नहीं सकता मसल दे पंखरी कोई,

खार भी रखते बहुत हम प्यार करते हैं।5



जां लुटाने की अगर नौबत हुई तब भी,…

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Added by Manan Kumar singh on September 26, 2016 at 7:00am — 6 Comments

ग़ज़ल -- हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए ( दिनेश कुमार 'दानिश' )

2212--2212--2212--2212



हरगिज़ न हमको मूकदर्शक पासबानी चाहिए

दुश्मन का मुँह जो तोड़ दे अब वो जवानी चाहिए



फ़िरक़ा परस्ती की जड़ों को काटना है गर हमें

लफ़्ज़े-सियासत के लिए उम्दा म'आनी चाहिए



ये क्या कि हम बँटते गए दैरो-हरम के नाम पर

जम्हूरियत जब हो, रेआया भी सयानी चाहिए



उस उम्र में बच्चों के हाथों में यहाँ हथियार हैं

जिस उम्र में ख़ुशियों की उनको मेज़बानी चाहिए



ग़ुरबत अशिक्षा भुखमरी के मुद्दए तो गौण हैं

संसद में चर्चा… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 26, 2016 at 5:32am — 4 Comments

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मै हँसूंगा तो उतर जाएंगे चेहरे कितने



मेरी जफाओं का रोना रोते हो बहोत

तुम अपनी वफाओं मे ठहरे कितने



आस्मा अपनी उसत लिए ठहरा है

है समंदर तुम्हारे गहरे कितने



काम थोडा कर लेते है लेकिन

लोग सजा लेते है सहरे कितने



मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे

देखिए तो ये लोग है बहरे कितने



ताबिर जो बतलाते है आज ख़्वाबों कि

बता नही सक्ते दरपेश है ख़तरे कितने



ये तो अपनी नज़र तय करेगी… Continue

Added by Azeem Shaikh on September 25, 2016 at 11:30pm — 5 Comments

मत्तगयंद सवैया: अलका चंगा

छाँव बने तन भाव जगे मन चाव सजे चहकी फुलवारी ,

पावन भाव जगे मन में जब मात बनी यह देह हमारी,

ये वरदान मिला जग में जब बिटिया खेलत गोद हमारी,

चाव जगे इस जीवन के जब आँगन बीच सजी किलकारी,

.

नन्हि परी जब मात पुकारत आतम हो जय धन्य हमारी

झांझर डोलत कोयल बोलत व्याकुल हो महकी अंगनारी

मीत सखी बन जाय सदा सब बात सुने अब मोरि दुलारी

मान करे सबका फिर भी प्रतिपात सहे जग में हर नारी

.

जोगन प्रीत तजे रसना सब भोग सजे मुख खावत नाही

कृष्ण सदा बसते मन में सब भार…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on September 25, 2016 at 11:00pm — 6 Comments

श्रद्धा और श्राद्ध/सतविन्द्र कुमार राणा

आस्थाओं का ढोल बजा है



श्रद्धा का बाजार सजा है



विश्वासों की लगती बोली



मानवता को मारो गोली।





मैं बिकता हूँ तू बिकता है



अब बिकता ईश्वर दिखता है



मान बड़ों का कब होता है



श्रद्धा का मतलब खोता है।





श्रद्धा आडम्बर  बन जाती



जब दुनिया पाखण्ड दिखाती



जीते जी टुकड़ों को तरसे



फिर भोजन कागों पर बरसे।





श्रद्धा से अपनों को मानों



कीमत जीते जी की… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 25, 2016 at 10:34pm — 8 Comments

ग़ज़ल - मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना

1212 1122 1212 22



बड़ा खराब ज़माना है बात क्या करना ।

मेरी ग़ज़ल पे निशाना है बात क्या करना ।।



नहीं है नज्म की तहजीब जिस मुसाफिर को ।

उसी से दिल का फ़साना है बात क्या करना ।।



अजीब शख़्स यूँ पढ़ता उन्हीं निगाहों को ।

किसी को वक्त गवाना है बात क्या करना ।।



बिखर गए है तरन्नुम के हर्फ़ महफ़िल में ।

नजर नज़र से मिलाना है बात क्या करना ।।



हुजूर जिन से दुपट्टे कभी नही सँभले ।

उसे भी घर को बसाना है बात क्या करना ।।



दिखी है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 25, 2016 at 6:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

212 212 212 212 212 212 212 212





एक दिन सब बदल जायेगा हमसफर, ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर

वक़्त है तो कठिन कट रहा है मगर , ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



भावनाएं भंवर के मुहाने पे हैं,तेरी मर्ज़ी भी तो डूब जाने में है

क्यों सताता है फिर खोने पाने का डर,ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



राह कैसी भी हो मुस्कुराले ज़रा,अपने दिल का सबर आज़मा ले ज़रा

तेरी आहट में है रौशनी का नगर, ग़म न कर, ग़म न कर, ग़म न कर ,ग़म न कर



कोई नाशाद है कोई… Continue

Added by मनोज अहसास on September 25, 2016 at 3:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल (दर्द दे वो चले)

दर्द दे वो चले पर दवा कौन दे,

साँस थमने लगी अब दुआ कौन दे।



चाहतें दफ़्न सब हो के दिल में रही,

जब जफा ही लिखी तो वफ़ा कौन दे।



प्यास बढ़ती रही आप छिपते रहे,

आग दिल में लगी पर बुझा कौन दे।



मंजिलें दूर जब हमसे जाने लगी,

हाथको थाम के आसरा कौन दे।



आशियाँ तक हमारा गया है उजड़,

याद में जो उसे अब बसा कौन दे।



बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया



(212 212 212 212 बहर की रचना)



मौलिक व… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 25, 2016 at 11:30am — 8 Comments

ग़ज़ल

बहर : २१२ २१२ २१२ २१२

पेट को चाहिए  खाद्य, नारा नहीं

पेट जितने से भर जाय, सारा नही |

भावना की कमी,  जाँचना चाहिए

भूखे  को चाहिए खाना,चारा नहीं | 

सारे रिश्ते बिगड़ते हैं, तकरार से  

शत्रुवत  और हो जाता  यारा नहीं |

बात है कर्ण प्रिय ,’आयगा अच्छा दिन”

अब किसी को भी यह, लगता प्यारा नहीं |

देख कर ठण्ड वातावरण क्या कहें

पी गए मय मधुर किन्तु प्यारा नहीं |

सिन्धु जल मेघ बन फिर बरसता…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 25, 2016 at 8:30am — 6 Comments

तंत्र-मन्त्र-यंत्र--- डॉo विजय शंकर

तंत्र को नैये-नैये मंत्र मिल रहे हैं ,

सफलता और विकास के नैये-नैये

शब्दकोष रचे जा रहे हैं ,

शब्द , नैये-नैये अर्थ पा रहें हैं ,

अर्थ , पुरुषार्थ में पुरोधा बन रहे हैं।

पा लें , सब पा लें की होड़ लगी हैं ,

क्या खो रहें हैं , देख नहीं पा रहें हैं।

सत्ता , मद - यामिनी ,

सिंहासन , पद - वाहिनी ,

जब डोलता है तो ,

डोलता हुआ नहीं लगता है ,

झूला झुलाता हुआ लगता है ,

जागो , जागते रहो , कहनेवाला ,

खुद नींद में सोया-सोया लगता है।

आगे… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2016 at 7:35am — 8 Comments

चवपैया छंद

(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on September 25, 2016 at 7:30am — 2 Comments

मानवता

आज बलि चढ़
रही है मानवता
हर तरफ़
शहीद हुए जा
रही है सचाई
गुम हो गये
है प्यार के फूल
डरा के छुप
रही है परछायी
कौन है ज़िम्मेदार
दरंदगी के लहु का
हर ओर क्यूँ
हो रही लड़ाई
मौलिक अप्रकाशित

Added by S.S Dipu on September 25, 2016 at 12:24am — 6 Comments

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