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बे-हया निशानी .....

बे-हया निशानी .....

हिज़्र की रातों में

तन्हा बरसातों में

खामोश बातों में

अश्कों की सौगातों में

मेरे नफ़्स में

साँसों के क़फ़स में

चांदनी बन कसमसाती

धड़कनों से बतियाती

सच, ओर कोई नहीं

सिर्फ, तुम ही तुम हो

बारिशों के पानी में

प्यासी कहानी में

नादान जवानी में

लहरों की रवानी में

अंगड़ाई की बेचैनी में

लबों की निशानी में

सच, ओर कोई नहीं

सिर्फ, तुम ही तुम…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2018 at 5:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल--फरेब ओ झूठ की यूँ तो सदा.......(१)

बह्र -बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम

अरकान -मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

मापनी-1222 1222 1222 1222

***

फरेब-ओ-झूठ की यूँ तो सदा जयकार होती है,

मगर आवाज़ में सच की सदा खनकार होती है।

**

हुआ क्या है ज़माने को पड़ी क्या भाँग दरिया में 

कोई दल हो मगर क्यों एक सी सरकार होती है 

***

शजर में एक साया भी छुपा रहता है अनजाना

मगर उसके लिए…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 21, 2018 at 5:00pm — 15 Comments

गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'

उन्हें कौन पूछे उन्हें कौन तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

उदासी उदासी उदासी घनेरी

विरह वेदना प्रीत की है चितेरी

अँधेरे खड़े द्वार पे सिर झुकाये

तभी रात ने स्वप्न इतने सजाये

उसी रात को छल गये चाँद तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

लगी रात की आँख भी छलछलाने

अँधेरा मगर बात कोई न माने

क्षितिज पे कहीं मुस्कुराया सवेरा

तभी रूठ कर चल दिया है अँधेरा

नजर रोज सुनसान राहें बुहारे

युगों से जुदा हैं नदी के…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2018 at 4:30pm — 10 Comments

तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

हुआ कुर्सी का अब तक भी नहीं दीदार जाने क्यों

वो सोचें  बीच  में  जनता  बनी  दीवार  जाने क्यों।१।



बड़ा ही भक्त है या  फिर  जरूरत वोट पाने की

लिया करता है मंदिर नाम वो सौ बार जाने क्यों ।२।



तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते

हकों की बात भी लगती उन्हें व्यापार जाने क्यों ।३।



नतीजा एक भी अच्छा नहीं जनता के हक में जब

यहाँ सन्सद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2018 at 3:35pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८६

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल 

 

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२



न हो जब दिल में कोई ग़म तो फिर लब पे फुगाँ क्यों हो

जो चलता बिन कहे ही काम तो मुँह में ज़बाँ क्यों हो //१



जहाँ से लाख तू रह ले निगाहे नाज़ परदे में

तसव्वुर में तुझे देखूँ तो चिलमन दरमियाँ क्यों हो //२




यही इक बात पूछेंगे तुझे सब मेरे मरने पे

कि तेरे देख भर लेने से कोई कुश्तगाँ क्यों हो…

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Added by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:30am — 19 Comments

रगों में बहता खून  (लघुकथा )

 कैदी ! तुझसे कोई  मिलने आया है I’ –जेल के सिपाही ने सूचना दी  I अगले ही पल काले कोट में एक वकील प्रकट हुआ I

‘आपकी पत्नी ने मुझे आपका वकील एपॉइंट किया है I आप मुझे सच-सच बताइए कि आपने मैरिज-कोर्ट में अपने बेटे की हत्या क्यों की ? क्या आपकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी ?’

     कैदी कुछ नहीं बोला I उसने मुँह फेर लिया I वकील असमंजस में पड़ गया I कुछ देर चुप रहकर वह बोला –‘ देखिये अगर आप ही सहयोग नहीं करेंगे तो मैं आपकी मदद कैसे कर पाऊंगा ?’

‘वकील साहब, आप अपना समय बर्बाद कर रहे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 20, 2018 at 6:24pm — 4 Comments

दिले बेक़रार को थोड़ा करार मिल जाए

दिले बेक़रार को थोड़ा करार मिल जाए,

गुलशने वीरां को राहे बहार मिल जाए।

हट जाए ये फ़सुर्दगी मेरे दीदा-ए-मजहूर से,…

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Added by Ashish Kumar on December 20, 2018 at 5:14pm — 3 Comments

कुण्डलियाँ

1

माना होता है समय, भाई रे बलवान

लेकिन उसको साध कर, बनते कई महान

बनते कई महान, विचारें इसकी महता

यह नदिया की धार, न जीवन उनका बहता

सतविंदर कह भाग्य, समय को ही क्यों जाना

नहीं सही भगवान, तुल्य यदि इसको माना।

2

होते तीन सही नकद, तेरह नहीं उधार

लेकिन साच्चा हो हृदय, पक्का हो व्यवहार

पक्का हो व्यवहार, तभी है दुनिया दारी

कभी पड़े जब भीड़, चले है तभी उधारी

सतविंदर छल पाल, व्यक्ति रिश्तों को खोते

उनका चलता कार्य, खरे जो मन के…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 19, 2018 at 3:30pm — 4 Comments

गज़ल -16 ( सिर्फ़ माँ की दुआ चाहिए)

बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम

फ़ाइलुन, फ़ाइलुन, फ़ाइलुन

पूछते हो जो क्या चाहिए

सिर्फ माँ की दुआ चाहिए//१

ख़्वाब मुरझा गए हैं अगर

ख़्वाब की ही दवा चाहिए//२

ज़िन्दगी अब मुकम्मल हुई

तुम मिले और क्या चाहिए//३

आ गए हैं सितारे मगर

चाँद का आसरा चाहिए//४

क़ैद में ही रहीं तितलियां

अब उन्हें भी हवा चाहिए//५

शाइरी का गुमाँ मत करो

खूब ही तज्रिबा चाहिए//६

ज़ुल्म क्यों ख़त्म…

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Added by क़मर जौनपुरी on December 19, 2018 at 11:30am — 5 Comments

ग़ज़ल - ०२

२१२  २१२  २१२  २१२

क्या पता चाँद रोशन रहे ना रहे

कल ये’ चूड़ी ये’ कंगन रहे ना रहे।

 …

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Added by Ashish Kumar on December 18, 2018 at 5:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (जीवन सरोज खिल के भी सुरभित नहीं हुआ।)

221, 2121, 1221, 212

आरोप ये गलत है कि पुष्पित नहीं हुआ।

जीवन सरोज खिल के हाँ सुरभित नहीं हुआ।

छल, साम, दाम, दण्ड, कुटिलता चरम पे थी,

ऐसे ही कर्ण रण में पराजित नहीं हुआ।

कैसा ये इन्क़लाब है, बदलाव कुछ नहीं,

अम्बर अभी तो रक्त से रंजित नहीं हुआ।

गिरकर संभल रहे हैं, गिरे जितनी बार हम, 

साहस हमारा आज भी खण्डित नहीं…

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Added by Balram Dhakar on December 18, 2018 at 4:00pm — 14 Comments

गज़ल नफरत

गज़ल
फेलुन x 4 (16 मात्रा)


नफरत की आग लगाना है
मजहब तो एक बहाना है

खूब लाभ का है ये धंधा
बस इक अफवाह उड़ाना है

हर तरफ खून की है बातें
लाशों का ही नजराना है

धर्म नाम के है दीवाने
जुनून बस खून बहाना है

जला रहे जो अपना ही घर
दर्पण उनको दिखलाना है

शुभ आस करो कुछ ‘‘मेठानी’’
अब नई सुबह को लाना है।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
- दयाराम मेठानी

Added by Dayaram Methani on December 18, 2018 at 1:51pm — 5 Comments

जिनके दिल मे कभी मेरा घर था

2122 1212 22

बाद मुद्दत खुला मुक़द्दर था ।

मेरी महफ़िल में चाँद शब भर था ।।

देख दरिया के वस्ल की चाहत ।।

कितना प्यासा कोई समंदर था ।।

जीत कर ले गया जो मेरा दिल।

हौसला वह कहाँ से कमतर था ।।

दर्द को जब छुपा लिया मैने ।

कितना हैराँ मेरा सितमगर था ।।

अश्क़ आंखों में देखकर उनके ।

सूना सूना सा आज मंजर था ।।

जंग इंसाफ के लिए थी वो ।

कब…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 18, 2018 at 1:00pm — 7 Comments

कौन कितना है मदारी जानते हो

2122 2122 2122



खेल क्या तुम भी सियासी जानते हो ।

कौन कितना है मदारी जानते हो ।।

फैसला ही जब पलट कर चल दिये तुम।।

फिर मिली कैसी निशानी जानते हो।।



हो रहा  है देश का सौदा कहीं  पर ।

खा  रहे  कितने  दलाली  जानते  हो।।

मसअले पर था ज़रूरी मशविरा भी ।

तुम  हमारी  शादमानी  जानते हो।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 17, 2018 at 10:07pm — 8 Comments

ग़ज़ल-बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

2122 2122 2122 212



काँच के टुकडों में दे दे ज्यों कोई बच्चा मणी

आधुनिकता में कहीं खोया तो है कुछ कीमती।

हुस्न की हर सू नुमाइश़ चल रही है जिस तरह

बेहयाई दफ़्न कर देगी किसी की शायरी।

ताश, कन्चें, गुड्डा, गुड़िया छीन के घर मिट्टी के

लाद दी हैं मासुमों पर रद्दियों की टोकरी।

अब कहाँ हैं गाँव में वें पेड़ मीठे आम के

वे बया के घोसलें, वे जुगनुओं की रौशनी।

ले गयी सारी हया पश्चिम से आती ये हवा…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 17, 2018 at 9:00pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८५

२२१२ १२१२ २२१२ १२



हस्ती का मरहला सभी इक इक गुज़र गया

मैं भी तमाशा बीन था, अपने ही घर गया //१



इश्वागरी के खेल से मैं यूँ अफ़र गया

सारा जुनूने आशिक़ी सर से उतर गया //२



खोया न मैं हवास को आई जो नफ़्से मौत

ज़िंदा हुआ मशामे जाँ, मैं जबकि मर गया //३



हैराँ हूँ अपने शौक़ की तब्दीलियों पे मैं

नश्शा था तेरे हुस्न का, कैसे उतर गया //४…

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Added by राज़ नवादवी on December 17, 2018 at 7:41pm — 8 Comments

शरद ऋतू

मैं इठलाती,

मैं बलखाती,

मंद चाल से,

बढ़ती हूँ

शरद ऋतु जब,

वर्ष में आये

अपना जाल,

बिछाती हूँ||

 

कहीं थपेड़े,

पवन दिलाती

कहीं,

बर्फ पिघलाती हूँ

कहीं,

तरसते धूप

को सब जन

कहीं कपकपी,

खूब दिलाती हूँ

वर्षा ऋतू,

के बाद में आयी,

शरद ऋतू,

कहलाती हूँ||

 

कोई निकाले,

कम्बल अपने,

कोई,

रजाई खोज रहा

कोई जला…

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Added by PHOOL SINGH on December 17, 2018 at 3:00pm — 8 Comments

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिये- ग़ज़ल

2122 2122 212

हर ख़ुशी का इक ज़रीआ चाहिए

ठीक हो वह ध्यान पूरा चाहिए।

दर्द को भी झेलता है खेल में

दिल भी होना एक बच्चा चाहिए।

जान लेना राह को हाँ ठीक है

पर इरादा भी तो पक्का चाहिये।

टूट कर शीशा  जुड़ा है क्या कभी

टूट जाए तो न रोना चाहिए।

झूठ की बुनियाद पर है जो टिका

वो महल हमको तो कचरा चाहिए।

 विष वमन कर जो हवा दूषित करे

उस जुबाँ पर ठोस ताला चाहिए।

मौलिक एवं…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on December 17, 2018 at 6:30am — 10 Comments

ग़ज़ल -प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।

2122 2122 2122 212



रोज के झगड़े, कलह से दिल अब उकता सा गया।

प्यार के बिन प्यार अपने आप घटता सा गया।



दफ़्न कर दी हर तमन्ना, हर दफ़ा,जब भी उठी

बारहा इस हादसे में रब्त पिसता सा गया।



रोज ही झगड़े किये, रोज ही तौब़ा किया

रफ़्ता रफ़्ता हमसे वो ऐसे बिछड़ता सा गया।

चाहकर भी कुछ न कर पाये अना के सामने

हाथ से दोनों ही के रिश्ता फिसलता सा गया।



छोडकर टेशन सनम को लब तो मुस्काते रहें

प्यार का मारा हमारा दिल तड़पता…

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Added by Rahul Dangi Panchal on December 16, 2018 at 8:30pm — 4 Comments

गज़ल -16 ( पत्थर जिगर को प्यार का दरिया बना दिए)

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु, फ़ाइलातु, मुफ़ाईलु, फ़ाइलुन

221, 2121, 1221, 212

ग़ज़ल

*****

उनकी नज़र ने मेरे सभी ग़म भुला दिए

पत्थर जिगर को प्यार का दरिया बना दिए//१



जैसे छुआ हो अब्र ने तपती ज़मीन को

छू कर वो मेरी रूह को शीतल बना दिए//२

ख़ुशबू उठी है क़ल्ब में सोंधी सी इश्क़ की

यादों ने उनके प्यार के छींटे गिरा दिए//३

हल्की सी बस ख़बर थी कि निकलेगा चाँद कल

स्वागत में उसके मैंने सितारे…

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Added by क़मर जौनपुरी on December 15, 2018 at 11:00pm — 3 Comments

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