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क्षणिकाएं —डॉo विजय शंकर

एक नेता ने दूसरे को धोया ,
बदले में उसने उसे धो दिया।
छवि दोनों की साफ़ हो गई।।.......1.

मातृ-भाषा हिंदी दिवस ,
एक उत्सव हम ऐसा मनाते हैं ,
जिसमें हम हिंदी बोलने वालों से
उनकीं माँ का परिचय कराते हैं।। .......2 .

अपनों से हट के कभी
दूर के लोगों से भी मिला करो ,
वो कुछ देगा नहीं ... ,
हाँ ,धोखा भी नहीं देगा।l ....... 3 .

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 17, 2019 at 10:30am — 8 Comments

हिंदी...... कुछ क्षणिकाएं :

हिंदी...... कुछ क्षणिकाएं :

फल फूल रही है

हिंदी के लिबास में

आज भी

अंग्रेज़ी

वर्णमाला का

ज्ञान नहीं

शब्दों की

पहचान नहीं

क्या

ये हिंदी का

अपमान नहीं

शोर है

ऐ बी सी का

आज भी

क ख ग के

मोहल्ले में

शेक्सपियर

बहुत मिल जायेंगे

मगर

हिंदी को संवारने वाले

प्रेमचंद हम

कहाँ पाएँगे

हम आज़ाद

फिर हिंदी क्यूँ

हिंग्लिश की…

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Added by Sushil Sarna on September 16, 2019 at 4:07pm — 10 Comments

अन्तस्तल

भीतर तुम्हारे

है एक बहुत बड़ा कमरा

मानो वहीं है संसार तुम्हारा

वेदना, अतृप्ति, विरह और विषमता

काले-काले मेघ और दुखद ठहराव

इन सब से भरा यह कमरा बुलाता है तुमको

जानती हूँ यह भी कि इस कमरे से तुम्हारा

रहा है बहुत पुराना गहरा गोपनीय रिश्ता  

इस आभासी दुनिया के मिथ्यात्व से दूर होने को

तुम कभी भी किसी भी पल धीरे हलके-हलके

अपराध-भाव-ग्रस्त मानों फांसी के फंदे पर झूलते

बिना कुछ बोले उस कमरे में जब भी…

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Added by vijay nikore on September 16, 2019 at 9:39am — 6 Comments

गजल

जुबां से फूल झड़ते हैं मगर पत्थर उछालें वे

गजब दिलदार हैं, महबूब हैं बस खार पालें वे।1

लगाते आग पानी में, हमेशा ही लगे रहते

बुझे क्यूँ रार की बाती, नई तीली निकालें वे।2

दिलों की आग जब उठकर दिलों को यूँ बुलाती है

करेंगे और क्या बस शीत जल हर बार डालें वे।3

समझना हो गया मुश्किल चलन अब के रफ़ीकों का

सियाही लिख नहीं सकती है' कितना रोज सालें वे।4

हकीकत फासलों में कैद होकर छटपटाती है

सुनेंगे तो नहीं कुछ गाल जितना भी बजालें वे।5

"मौलिक व…

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Added by Manan Kumar singh on September 16, 2019 at 8:10am — 6 Comments

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब(६३)

ये ज़ीस्त रोज़ सूरत-ए-गुलरेज़ हो जनाब

राह-ए-गुनाह से सदा परहेज़ हो जनाब

**

मंज़िल कहाँ से आपके चूमें क़दम कभी

कोशिश ही जब तलक न जुनूँ-ख़ेज़ हो जनाब

**

क्या लुत्फ़ ज़िंदगी का लिया आपने अगर

मक़सद ही ज़िंदगी का न तबरेज़ हो जनाब

**

मुमकिन कहाँ कि ज़िंदगी की पीठ पर कभी

लगती किसी के ग़म की न महमेज़ हो जनाब

**

उस जा पे फ़स्ल बोने की ज़हमत न कीजिये

जिस जा अगर ज़मीं ही न ज़रखेज़ हो…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 15, 2019 at 4:00pm — 2 Comments

मातृभाषा हिन्दी

हिन्दी में हम पढ़े लिखेंगे, हिन्दी ही हम बोलेंगे।
हिन्दी को घर-घर पँहुचाकर, हिन्द द्वार हम खोलेंगे।
सकल हिन्द के हित में हिन्दी,सबको यह बतलायेंगे
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, हिन्दी को फैलायेंगे।।
शर्मसार अपनी हिन्दी को, कभी नहीं होने देंगे।
हिन्दी है सम्भार हिन्द की, इसे नहीं खोने देंगे।
भ्रांत मनुज के गहन तिमिर को,दूर भगाएगी हिन्दी।
कटु विषाद मन जनित व्याधि को,सदा मिटाएगी हिन्दी।।
हिन्दी बिना हिन्द की…
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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on September 14, 2019 at 8:15pm — 4 Comments

असबंधा छंद "हिंदी गौरव

असबंधा छंद "हिंदी गौरव

भाषा हिंदी गौरव बड़पन की दाता।

देवी-भाषा संस्कृत मृदु इसकी माता।।

हिंदी प्यारी पावन शतदल वृन्दा सी।

साजे हिंदी विश्व पटल पर चन्दा सी।।

हिंदी भावों की मधुरिम परिभाषा है।

ये जाये आगे बस यह अभिलाषा है।।

त्यागें अंग्रेजी यह समझ बिमारी है।

ओजस्वी भाषा खुद जब कि हमारी है।।

गोसाँई ने रामचरित इस में राची।

मीरा बाँधे घूँघर पग इस में नाची।।

सूरा ने गाये सब पद इस में प्यारे।

ऐसी थाती पा कर हम सब से…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 14, 2019 at 9:10am — 3 Comments

नए ख्वाब दिखाने वाला - ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

 

नींद आँखों से मेरी कोई चुराने वाला 

आ गया फिर से नए ख्वाब दिखाने वाला 

 

उन दुकानों पे मिलेंगे तुम्हें झंडे-डंडे  

पास अपने तो है ये काम किराने वाला 

 

जान लेने के लिए लोग खड़े लाइन…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on September 13, 2019 at 8:44pm — 10 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

11212×4

मुझे पीसते हैं जो हर घड़ी,न वो दर्द मुझसे लिखे गए

किसी बेजुबान ख्याल में कई शेर यूं ही कहे गए

भरी रात में तेरी याद के जो चिराग बुझ के महकते हैं,

उन्हें जिंदा रखने की चाह में कई जाम हमसे पिये गये

जिसे हम समझते थे अपना घर वो जहान हमसे था बेखबर

कई रास्ते तो मकान के मुझे तोड़कर भी बुने गए

मुझे ढूंढ लाने की चाह में ,मेरे दोस्तों के वो मशवरे

मेरी जिंदगी का अज़ाब थे सो इसीलिए न सुने गए

कहीं सर…

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Added by मनोज अहसास on September 12, 2019 at 11:33pm — 3 Comments

उपाय(लघुकथा)

‘क्या कहा कालेज की ओर से ट्रिप में जा रही हो I साथ में लडके भी होंगे ?’- माँ ने पूछा I

‘हां होंगे, तो क्या ?  आजकल बहुतेरे उपाय हैं I आपकी नाक नहीं कटेगीI ‘

 (मौलिक / अप्रकाशित )

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 12, 2019 at 4:00pm — 4 Comments

उजास- लघुकथा

घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें". जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.

"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी… Continue

Added by विनय कुमार on September 11, 2019 at 7:36pm — 4 Comments

जलेबी - लघुकथा -

जलेबी - लघुकथा -

आज स्कूल की छुट्टी थी इसलिये गुल्लू बिस्तर से उठते ही सीधा दादा दादी के कमरे की तरफ दौड़ पड़ा। कमरा खाली मिला तो माँ के पास जा पहुंचा,"माँ, दादा जी और दादी जी कहाँ चले गये?"

"यहीं पड़ोस वाले मंदिर तक गये हैं। अभी आने वाले हैं।"

"पर वे लोग रोज तो नहीं जाते मंदिर। आज कोई त्योहार है क्या?"

"आज उनकी शादी की पचासवीं साल गिरह है। इसलिये भगवान जी के दर्शन करने गये हैं।"

"अरे वाह, फिर तो आज विशेष पकवान बनेंगे।"

"हाँ जरूर बनेंगे।"

"माँ…

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Added by TEJ VEER SINGH on September 11, 2019 at 2:44pm — 6 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

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जिंदगी ने सब दिया पर चैन का बिस्तर नहीं

जिस जगह सर को न पटका ऐसा कोई दर नहीं

हार कर मजबूर होकर आज ये कहना पड़ा

इश्क इक ऐसा परिंदा है कि जिसका घर नहीं

मुझको मंजिल से जुदा कर तूने साबित कर दिया

मैं तेरे रस्ते पे हूं पर तू मेरा रहबर नहीं

इस जहां में बस वही आराम से जीता मिला

जिसको अपनी ही गरज है आसमां का डर नहीं

आंखों से ख्वाबों के संग तेरा भरोसा भी गया

मुझको जीना तो पड़ेगा पर तेरा होकर…

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Added by मनोज अहसास on September 10, 2019 at 10:17pm — 4 Comments

गज़ल _तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से

(मफ ऊल_मफाईल_मफाईल_फ ऊलन) 

.

तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से

लेकिन नहीं बच पाओगे तुम मेरी नजर से

.

वो खौफ़ ए ज़माना से या रुस्वाई के डर से

देता रहा आवाज मैं निकले न वो घर से

.

तू जुल्म से आ बाज़ अभी वक़्त है ज़ालिम

पानी भी बहुत हो चुका ऊँचा मेरे सर से

.

फँसता है सदा हुस्न के वो जाल में यारो

वाकिफ़ जो नहीं उनके दग़ाबाज़ हुनर से

.

मालूम करें आओ कठिन कितना है रस्ता

कुछ लोग अभी लौट के आए हैं सफ़र…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 10, 2019 at 10:00am — 5 Comments

अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं (६२ )

अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं 

ख़त भी नहीं ख़बर नहीं है जुस्तजू नहीं 

***

दरिया-ए-इश्क़ जो कि उफ़नता था थम गया

यूँ लग रहा है जैसे कि दिल में लहू नहीं

***

ख़ामोश ताकते हैं दरीचा तिरा सनम
हालाँकि इल्म है कि वहां पे भी तू नहीं
***

यादें हैं ख्वाब भी है तस्सवुर भी है तेरा

अफ़सोस बस यही है कि तू…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on September 10, 2019 at 12:00am — 2 Comments

अब बात कुछ और है- लघुकथा

लगभग १५ मिनट बीत गए थे उस रेस्तरां में बैठे हुए, अभी तक खाना सर्व नहीं हुआ था. कलीग के बच्चे के ट्वेल्थ के रिजल्ट की ख़ुशी में आज दोनों फिर उस रेस्तरां में आये थे. अमूमन इतनी देर में बौखला जाने वाली उसकी कलीग ख़ामोशी से मेनू को उलट पलट कर देख रही थी. उसे थोड़ा अजीब लगा, उसने यूँ ही कहा "कितना समय लेते हैं ये बड़े होटल वाले खाना सर्व करने में, मुझे तो समझ ही नहीं आता. वैसे आज तुम कुछ बोल नहीं रही हो, क्या बात है?

कलीग ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली "अरे समय लग जाता है, ये लोग… Continue

Added by विनय कुमार on September 9, 2019 at 5:56pm — 2 Comments

चंद्रयान- 2 का सफर

संपर्क टूटा विक्रम से तो

ना समझ ये विफल रहा

आर्बिटर अभी चक्कर लगा रहा

धैर्य रख, थोड़ा इंतज़ार तो कर

चिंता नहीं बस चिंतन कर ||

 

मार्ग विक्रम भटक गया

भ्र्स्ट ही शायद कारण हो

खंड-खंड होकर बिखर भी गया तो  

खोजने का प्रयास तो कर

चिंता नहीं बस चिंतन कर ||

 

वैज्ञानिकों का अपने हौंसला बढ़ा

साहस के उनके तारीफ तो कर

चूक कहाँ हो गई प्रयास मे

इस बात पर थोड़ा गौर तो कर

चिंता नहीं बस…

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Added by PHOOL SINGH on September 9, 2019 at 11:06am — 3 Comments

ज़िंदगी तू क्यूँ उदास है-

जिंदगी ये तो बता, तू इतनी क्यूँ उदास है

मुझसे है नाराज़ या फिर,औऱ  कोई बात है

मैंने तो तुझसे कभी कुछ खास मांगा भी नहीं

ले रही फिर बारहा तू लंबी क्यूं उच्छवास है

जो तेरी ख़्वाहिश थी शायद वो मिला तुझको नहीं

फ़िक्र ना कर तेरे…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on September 9, 2019 at 11:00am — 2 Comments

ईंटा पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा---ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22 2 

ईंटें पत्थर कंकड़ बजरी ले कर आऊँगा

सुन; तेरे शीशे के घर पर सब बरसाऊँगा

फूँक-फाँक कर वर्ग विभाजन वाला हर अध्याय

क्या है सनातन सब को यह अहसास कराऊँगा

जान रहा, जग की रानी है मुद्रा-माया धारी

किन्तु मनुज से प्रीत ज़रूरी रोज़ सिखाऊँगा

मठ अधिपति को पूज रहे, जबकि नहीं हो निर्बल

वायु-अनल से युक्त बली हो, याद धराऊँगा

तीव्र प्रज्ज्वलित शब्द हैं मेरे ताप भयंकर है

किंतु स्वर्ण-मन-शोधन को मैं…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on September 9, 2019 at 11:00am — 2 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

2×15

इस दुनिया में एक तमाशा जाने कितनी बार हुआ

वो दरिया में डूब गया जो तैर समंदर पार हुआ

अच्छे दिन की चाहत वालों ऐसी भी क्या बेताबी

चार नियम बनते ही बोले जीना ही दुश्वार हुआ

एक पहाड़ी पर शीशे के घर में बैठा बाजीगर

नाच नचाकर देख रहा है कौन बड़ा फनकार हुआ

तुमने अपने मातम पर भी खर्च किया मोटा पैसा

और किसी निर्धन के घर में मुश्किल से त्यौहार हुआ

चार कदम की दूरी पर थी मंजिल…

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Added by मनोज अहसास on September 8, 2019 at 10:40pm — 1 Comment

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